Wasiyat E Sarkar Noori Miyan Alaihir Rahmah

अली वाले जहा बैठे वहीं जन्नत बना बैठे

अली वाले जहा बैठे वहीं जन्नत बना बैठे

अली वाले जहा बैठे वहीं जन्नत बना बैठे
फकीरों का भी क्या चाहे जहा बस्ती बसा बैठे
अली वाले जहा बैठे वहीं जन्नत बना बैठे

फ़राज़ ऐ दार हो मकतल हो ज़िन्दा हो के सेहरा हो
जली इश्के अली की शम्मा ओर परवाने आ बैठे

कोई मौसम कोई भी वक़्त कोई भी इलाका हो
जहां ज़िक्रे अली छेड़ा वहां दीवाने आ बैठे

अली वालों का मरना भी कोई मरने में मरना है
चले अपने मकां से ओर अली के दर पे जा बैठे

ईधर रुखसत किया सबने उधर आए अली लेने
यहां सब रो रहे थे हम वहां महफ़िल सजा बैठे

अभी में क़ब्र में लेटा ही था एक नूर सा फैला
मेरी बाली पे आके खुद अली ऐ मुर्तजा बैठे

अली के नाम की महफ़िल सजी शहरे खमोशा में
थे जितने बेवफा वो सब के सब महफ़िल में आ बैठे

निजामत के लिए मौला ने खुद मीसम को बुलवाया
वो लहजा था के सब दांतो तले उंगली दबा बैठे

ये कौन आए के इस्तकबाल में सब अंबिया उठे
ना बैठेगा कोई तब तक ना जब तक फातिमा बैठे

Leave a Comment

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.