क़ुरबानी

बा’ज़ लोग पूरे घर की तरफ से सिर्फ एक बकरा क़ुरबान करते हैं। हालाँकि बाज़ अवकात घर के कई अफराद साहिबे निसाब होते हैं और इस बिना पर उन सारों पर क़ुरबानी वाजिब होती है। उन सब की तरफ़ से अलग अलग क़ुरबानी की जाए। एक बकरा जो सब की तरफ़ से किया गया किसी का भी वाजिब अदा न हुआ, कि बकरे में एक से ज़ियादा हिस्से नहीं हो सकते। किसी एक तै शुदा फ़र्द ही की तरफ़ से बकरा क़ुरबान हो सकता है।

भैंस और ऊंट में सात क़ुरबानियां हो सकती हैं।
(عالمگیری، ج 5، ص 306)

ना बालिग की तरफ से अगर्चे वाजिब नहीं मगर कर देना बेहतर है (और इजाज़त भी ज़रूरी नहीं)। बालिग औलाद या ज़ौजा की तरफ़ से कुरबानी करना चाहे तो उन से इजाज़त तलब करे अगर उन से इजाज़त लिये बिगैर कर दी तो उन की तरफ से वाजिब अदा नहीं होगा।
(عالمگیری، ج 5، ص 293، بہار شریعت)

इजाज़त दो तरह से होती है:
(1) सरा-हतन : म-सलन इन में से कोई वाजेह तौर पर कह दे कि मेरी तरफ़ से कुरबानी कर दो।
(2) दला-लतन : मसलन यह अपनी ज़ौजा या औलाद की तरफ़ से कुरबानी करता है और उन्हें इस का इल्म है और वोह राज़ी है।

क़ुरबानी के वक़्त में क़ुरबानी करना ही लाज़िम है कोई दूसरी चीज़ इस के क़ाइम मकाम नहीं हो सकती मसलन बजाए क़ुरबानी के बकरा या उस की क़ीमत स-दक़ा (खैरात) कर दी जाए यह नाकाफ़ी है।
(بہار شریعت)

क़ुरबानी के जानवर की उम्र : “ऊंट’ पांच साल का, भैंस दो साल की, बकरा [इस में बकरी, दुम्बा, दुम्बी, और भेड़, (नर व मादा) दोनों शामिल हैं] एक साल का इस से कम उम्र हो तो क़ुरबानी जाइज़ नहीं, ज़ियादा हो तो जाइज़ बल्कि अफ्ज़ल है। हां दुम्बा या भेड़ का छ: महीने का बच्चा अगर इतना बड़ा हो कि दूर से देखने में साल भर का मालूम होता हो तो उस की क़ुरबानी जाइज़ है। याद रखिये! मुत्लकन छ: माह के दुम्बे की कुरबानी जाइज़ नहीं, इस का इतना फ़रबा (या’नी तगड़ा) और क़द आवर होना ज़रूरी है कि दूर से देखने में साल भर का लगे। अगर 6 माह बल्कि साल में एक दिन भी कम उम्र का दुम्बे या भेड़ का बच्चा दूर से देखने में साल भर का नहीं लगता तो उस की क़ुरबानी नहीं होगी।

क़ुरबानी का जानवर बे ऐब होना ज़रूरी है अगर थोड़ा सा ऐब हो (म-सलन कान में चीरा या सूराख हो) तो क़ुरबानी मकरूह होगी और ज़ियादा ऐब हो तो क़ुरबानी नहीं होगी।
(بہار شریعت)

ऐबदार जानवरों की तफ्सील जिन की क़ुरबानी नहीं होती। ऐसा पागल जानवर जो चरता न हो, इतना कमज़ोर कि हड्डियों में मग्ज़ न रहा, (इस की अलामत यह है कि वोह दुबले पन की वजह से खड़ा न हो सके) अन्धा या ऐसा काना जिस का काना पन ज़ाहिर हो, ऐसा बीमार जिस की बीमारी ज़ाहिर हो, (या’नी जो बीमारी की है वजह से चारा न खाए) ऐसा लंगड़ा जो खुद अपने पाउं से क़ुरबान गाह तक न जा सके, जिस के पैदाइशी कान न हों या एक कान न हो, वहशी (यानी जंगली) जानवर जैसे नीलगाय, जंगली बकरा या खुन्सा जानवर (या’नी जिस में नर व मादा दोनों की अलामतें हों), या जल्लाला जो सिर्फ गलीज़ खाता हो। या जिस का एक पाउं काट लिया गया हो, कान, दुम या चक्की एक तिहाई (1/3) से ज़ियादा कटे हुए हों नाक कटी हुई हो, दांत न हों (या’नी झड़ गए हों), थन कटे हुए हों, या खुश्क हों इन सब की क़ुरबानी ना जाइज़ है। बकरी में एक थन का खुश्क होना और भैंस में दो का खुश्क होना, “ना जाइज़’ होने के लिये काफ़ी है।
(الدر ال مختار، ج 9، ص530 – 538)

जिस के पैदाइशी सींग न हों उस की क़ुरबानी जाइज़ है। और अगर सींग थे मगर टूट गए, अगर जड़ समेत टूटे हैं तो क़ुरबानी न होगी और सिर्फ ऊपर से टूटे हैं जड़ सलामत है तो हो जाएगी।
(عالمگیری، ج 5، ص 298)

क़ुरबानी करते वक़्त जानवर उछला कूदा जिस की वजह से ऐब पैदा हो गया यह ऐब मुज़िर नहीं या’नी क़ुरबानी हो जाएगी और अगर उछलने कूदने से ऐब पैदा हो गया और वोह छूट कर भाग गया और फ़ौरन पकड़ कर लाया गया और ज़ब्ह कर दिया गया। जब भी क़ुरबानी हो जाएगी।
(بہار شریعت)

बेहतर यह है कि अपनी क़ुरबानी अपने हाथ से करे जब कि अच्छी तरह ज़ब्ह करना जानता हो। और अगर अच्छी तरह नहीं जानता हो तो दूसरे को ज़ब्ह करने का हुक्म दे मगर इस सूरत में बेहतर यह है कि वक़्ते क़ुरबानी वहाँ हाज़िर हो।
(عالمگیری، ج 5، ص 300)

क़ुरबानी की और उस के पेट में से ज़िन्दा बच्चा निकला तो उसे भी ज़ब्ह कर दे और उसे (या’नी बच्चे का गोश्त) खाया जा सकता है और मरा हुआ बच्चा हो तो उसे फेंक दे कि मुर्दार है।
(بہار شریعت)

दूसरे से ज़ब्ह करवाया और खुद अपना हाथ भी छुरी पर रख दिया कि दोनों ने मिल कर ज़ब्ह किया तो दोनों पर ﺑِﺴْﻢِﷲ कहना वाजिब है। एक ने भी जान बूझ कर छोड़ दी या यह ख्याल करके छोड़ दी कि दूसरे ने कह ली मुझे कहने की क्या ज़रूरत तो, दोनों सूरतों में जानवर हलाल ना हुआ।
(الدر ال مختار، ج9، ص100)

 

 

कुर्बानी

जो भी जानवर को हलाल करें वह पूरी तरह से करें छुरी और किसी
के हाथ में न दे,

मैंने काफी बार देखा है कुर्बानी के वक़्त हाफिज़ साहब पहले जानवर की गर्दन और छुरी फिराते हैं उसके बाद छुरी कसाई के हाथ जाती है फिर वो ज़िब्ह करते हैं उतनी देर में जानवर कितनी तकलीफ से गुजरता होगा
अक्सर देखा गया है जानवर ज़िब्ह करने के बाद कसाई छुरी जानवर की नली में घुसेड़ कर घुमा देते हैं जिससे उसके दिल की झिल्ली फट जाती है और दिल और दिमाग का राब्ता खत्म हो जाता है जिससे खून गोश्त में ही जब्त हो जाता है उसके बाद कसाई हज़रात जानवर के पैरों की रगें काट देते हैं जिससे जानवर कुछ ही पलों में ठंडा हो जाता है फौरन ही जानवर ठंडा होने से पहले ही उसकी खाल उतारने लगते हैं हर तरफ से जानवर को तकलीफ देना

सही तरीका ये हैं कि जो हज़रात भी ज़िब्ह करें वो पूरी तरह से ज़िब्ह करें और जानवर को मुक्कमल तरह से ठंडा होने पर ही उसकी खाल वैगरह उतारें गोश्त बनाये।

मसला ए कुर्बानी

दूसरे से ज़िब्ह कराया और खुद अपना हाथ भी छुरी पर रख दिया कि दोनों ने मिल कर ज़िब्ह किया तो दोनों पर बिस्मिल्लाह कहना वाज़िब है एक ने भी क़सदन छोड़ दी या ये ख़्याल करके छोड़ दी कि दूसरे ने कहा ली मुझे कहने की क्या जरूरत दोनों सूरतों में जानवर हलाल ना हुआ
(दुर्र ए मुख़्तार)
बहार ए शरीयत हिस्सा 15, सफा 149

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