ज़मीं से अर्श-ए-आज़म तक नबी का बोल-बाला है

ज़मीं से अर्श-ए-आज़म तक नबी का बोल-बाला है
उन्हीं के फ़ैज़-ए-आली से जहाँ भर में उजाला है

अ’दू शर्मा गया जब पढ़ दिया कंकर ने भी कलमा
मेरे प्यारे नबी का मो’जिज़ा ये भी निराला है

ज़मीं से अर्श-ए-आज़म तक नबी का बोल-बाला है
उन्हीं के फ़ैज़-ए-आली से जहाँ भर में उजाला है

चराता है जो बच्चा बकरियाँ दाई हलीमा की
वही बच्चा क़मर को पल में टुकड़े करने वाला है

ज़मीं से अर्श-ए-आज़म तक नबी का बोल-बाला है
उन्हीं के फ़ैज़-ए-आली से जहाँ भर में उजाला है

बनाई है उन्हीं के वास्ते दुनिया मेरे रब ने
जिन्हें आग़ोश में दाई हलीमा तू ने पाला है

ज़मीं से अर्श-ए-आज़म तक नबी का बोल-बाला है
उन्हीं के फ़ैज़-ए-आली से जहाँ भर में उजाला है

जिन्हें बुग़्ज़-ओ-अ’दावत है सहाबा से, तुफ़ैल अख़्तर !
उन्हें अपनी जमाअ’त से शह-ए-दीं ने निकाला है

ज़मीं से अर्श-ए-आज़म तक नबी का बोल-बाला है
उन्हीं के फ़ैज़-ए-आली से जहाँ भर में उजाला है

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