Hindi Islamic Stories

Hindi Islamic Stories

Table of contents

कबुतर के बच्चे

एक आराबी अपनी आस्तीन मे कुछ छुपाये हुए हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) की खिदमत मे हाजीर हुआ और कहने लगा ऐ मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम)! अगर आप बता दे की मेरी आस्तीन के अंदर क्या है? तो मै मान लुंगा की वकाई आप सच्चा नबी है।-
हुजुर ने फरमाया वकाई ईमान ले आओगे? उसने कहा:हां वकाई ईमान ले आऊंगा।
फरमाया : तो सुनो, तुम एक जंगल से गुजर रहे थे। तुमने एक दरख्त देखा जिस पर कबुतर का एक घोंसला था। उस घोंसले मे कबुतर के दो बच्चे थे। तुमने इन दोनो इन दोनो बच्चे को पकड़ लिया। बच्चो की मां ने जब देखा तो वह मां अपने बच्चो पर गीरी तो तुमने उसे भी पकड़ लिया। वह दोनो बच्चे और उसकी मां इस वक्त भी तुम्हारे पास है और इस आस्तीन के अंदर है।
आराबी यह सुनकर हैरान रह गया और झट पुकार उठा–
अशहदु अल-ला-इला ह इल्लल्लाह व अशहदु अन न क रसुलुल्लाह

{जामिउल मुजिजात सफा-21}

सबक ।
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हमारे हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) से कोई चीज पिन्हा न थी। एक आराबी भी इस हकीकत को जानता था की जो नबी हो वह गैब जान लेता है।

नफीस हलवा

हजरत उमर फारूक (रदी अल्लाहु अन्हु) के दौर मे जब आजरबाइजान फतह हुआ और मुस्लमानो को मुख्तलिफ चिजे मिली। एक शख्स उतबा नामी को निहायत नफीस हलवा मिला जो उसने हजरत फारुके आजम (रदी अल्लाहु अन्हु) की खिदमत मे तोहफा भेज दिया। हजरत उमर फारुक आजम (रदी अल्लाहु अन्हु) ने उस हलवे को देखकर और चखकर फरमाया: क्या यह हलवा सब ने खाया है।या मेरे लिए आया हि।?
लाने वाले ने अर्ज किया: हुजुर सिर्फ आपके ही लिये आया है। आपने उसी वक्त भेजने वाले के नाम एक खत लिखा-

▶अल्लाह के बन्दे अमीरुल मोमीनीन उमर की जानीब से उतबा बिन मरकद के नाम ।अम्मा बाद! याद रखो की यह हलवा ना तुम्हारी कोशीश से हासील हुआ और न ही तुम्हारी मां या तुम्हारे बाप की कोशीश से हासील हुआ है। हम तो सिर्फ वही चिज ही खायेंगे जिसे तमाम मुस्लमान अपने अपने घर मे पेट भरकर खाये◀
{फुतुहुल बुलदान मुगनियुल वाइजीन, सफा-473}

सबक ।
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यह थे हमारे असलाफ जिन्हे रिआया के हर फर्द का ख्याल था। वह कोई ऐसी चिज न खाते तो रिआया को मयस्सर न आ सके। वह रिआया को अपनी औलाद से भी ज्याद अजीज समझते थे।

 कैदी चचा

जंगे बदर मे जब अल्लाह ने मुस्लमानो को फतह और कुफ्फार को शिकस्त दि तो मुस्लमानो के हाथ जो कैदी आये उनमे हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) के चचा हजरत अब्बास भो थे। कैदीयो से जब तावान तलब किया गया तो हजरत अब्बास कहने लगे की ऐ मुहम्मद! मै तो एक गरीब आदमी हुं। मेरे पास क्या है??
मक्का मे जब आपने मुझे छोड़ा था तो मै तमाम कबीला के अफराद से गरीब था।
हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने फरमाया-
“अब जबकी आपने अपने घर से फौजे कुफ्फार के साथ जंगे बदर मे आना चाहा तो आपने अपनी बिवी उम्मे फजल को पोशीदगी मे चंद सोने की ईंटे देकर आयें थे। चचा जान! यह राज आप क्युं छिपा रहे है??
हजरत अब्बास यह गैब की बात सुनकर हैरान रह गये। और बकौले शाइर :-

▶जनाबे हजरत अब्बास पे राशा हुआ तारी।

कि पैगम्बर तो रखता है दिलो की भी खबरदारी।

ख्याल आया मुस्लमां नेक व बद पहचान जाते है।

मुहम्मद आदमी के दिल की बातें जान जाते है।◀

हुजुर की यह इत्तेला अलल-गैब का मोजीजा देखकर हजरत अब्बास ईमान ले आये।
{दलाइलुल-नब्वी जिल्द-2, सफा-171,}

सबक ।
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हमारे हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) से कोइ बात मख्फी नही। अल्लाह ने हर चीज का हुजुर को इल्म दे दिया है। यह इल्म गैब भी हुजुर का एक मोजीजा है जिस पर हर मुस्लमान का ईमान है।

गुमशुदा ऊंटनी

जंगे तबुक मे हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) की ऊंटनी गुम हो गयी तो एक मुनाफिक ने मुस्लमानो से कहा की तुम्हारा मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) तो नबी होने की मुद्दई है और तुम्हे आसमान की बाते सुनाता है। फिर इसे अपनी ऊंटनी का पता क्युं नही चलता।??
हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने जब मुनाफिक की यह बात सुनी तो फरमाया बेशक मै नबी हुं।और मेरा इल्म अल्लाह की अता फरमुदा है। लो सुनो! मेरी ऊंटनी फलां जगह खड़ी है। एक दरख्त ने उसकी नकील को रोक रखा है। जाओ वहां जाओ। वहां से ऊंटनी को ले आओ।
चुनांचे:-
सहाबा किराम गये तो वकाई ऊंटनी उसी जगह खड़ी थी और उसकी नकील एक दरख्त से अटकी हुई थी।
{जादुल-मआद-जिल्द-3, सफा-3}

सबक ।
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हमारे हुजुर को अल्लाह ने इस कद्र इल्मे गैब अता फरमाया है की कोई बात आपसे छुपी नही। मगर मुनाफिक इस इल्म गैब के मोतरिफ नही।

बैतुल्लाह की कुंजी

हिजरत से पहले बैतुल्लाह की कुंजी कुरैशे मक्का के कब्जे मे थी। यह कुंजी उसमान बिन तलहा के पास रहा करती थी। यह लोग बैतुल्लाह को पिर और जुमेरात के रोज खोला करते थे।
“एक दिन हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) तशरिफ लाए और उसमान बिन तवहा से दरवाजा खोलने को फरमाया। तो उसमान ने दरवाजा खोलने से इंकार कर दिया। हुजुर ने फरमाया: ऐ उसमान! आज तु यह दरवाजा खोलने से इंकार रहा है। एक दिन ऐसा भी आयेगा की बैतुल्लाह की यह कुंजी मेरे कब्जे मे होगी। मै जिसे चाहुंगा यह कुंजी दुंगा।
उसमान ने कहा- तो उस दिन कौमे कुरैश हलाक हो चुकी होगी। हिजरत के बाद जब मक्का फतह हुआ और हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) सहाबा के लश्कर समेत मक्का मे फातिहाना दाखील हुए तो सबसे पहले काबा शरिफ मे तशरिफ लाए और इसी कलीद बर्दार उस्मान से कहा-लाओ वह कुंजी मेरे हवाले कर दो। नाचार उस्मान को वह कुंजी देनी पड़ी। हुजुर ने वह कुंजी लेकर उस्मान को मुख्तीब फरमाकर
फरमाया-उसमान! लो कलीद बर्दार मै भी तुझी को मुकर्रर करता हु। तुझसे कोइ जालीम ही यह कुंजी लेगा।
उस्मान ने दोबारा कुंजी ली तो हुजुर ने फरमाया-उस्मान!वह दिन याद है जब मैने तुझसे कुंजी तलब की थी और तुमने दरवाजा खोलने से मना कर दिया था। मैने कहा था एक दिन ऐसा भी आएगा की यह कुंजी मेरे कब्जे मे होगी और मै जिसे चाहुंगा दुंगा। उस्मान ने कहा-हां हुजुर! मुझे याद है। और मै गवाही देता हुं की आप अल्लाह का सच्चे रसुल है।

सबक ।
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हमारे हुजुर अगली पिछली सब बातो के आलीम है। क्यामत तक जो कुछ भी होने वाला है। सब आप पर रौशन है। खुदा ने आपको ईल्म गैब अता फरमाया है। आप दानाए गुयुब व आलिमे मा कान वमा याकुन है।

जमीन पर हुकुमत

हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने हजरत सिद्दिक अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) के मक्का से हिजरत फरमाई तो कुरैशे मक्का ने ऐलान किया की जो कोइ मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) और उनके साथी सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) को गिरफ्तार करके लायेगा उसे सौ ऊंट इनाम मे दिया जाएगा । सुराका बिन। जअशम ने यह ऐलान सुना तो अपना तेज रफ्तार घोड़ा निकाला और उसपर बैठकर कहने लगा की मेरा यह तेज रफ्तार घोड़ा मुहम्मद और अबु बक्र का पिछा कर लेगा। मै अभी उन दोनो को पकड़कर लाता हुं।
चुनांचे:-
उसने अपना घोड़ा दौड़ाया। थोड़ी देर मे हुजुर के करीब पहुंच गया । सिद्दिके अकबर ने जब देखा की सुराका घोड़े पर सवार हमारे पिछे आ रहा है। हम तक पहुंचेने वाला ही वाला है। तो अर्ज किया या रसुलल्लाह! सूराकाने हमे देख लिया है और शह देखीए हमारे पिछे आ रहा है।
हुजुर ने फरमाया ऐ सिद्दिक! कोइ फिक्र ना करो अल्लाह हमारे साथ है। इतने मे सुराका बिलकुल करीब आ पहुंचा तो हुजुर ने दुआ फरमाइ । जमीन ने फौरन सुराका के घोड़े को पकड़ लिया और उसके चारो पैर पेट तक जमीन मे धस गया। सुराका यह मंजर देखकर घबराया और अर्ज करने लगा।
या मुहम्मद! मुझे और मेरे घोड़े को इस मुसीबत से नजात दिलाइये। मै आपसे वादा करता हुं। की पिछे मुड़ जाऊंगा। जो कोई आपका पिछा करता हुआ आपकी तलाश मे इधर आ रहा होगा उसे भी वापस ले जाऊंगा। आप तक न आने दुंगा चुनांचे हुजुर के हुक्म से जमीन ने उसे छोड़ दिया।
{सच्ची हिकायत हिस्सा अव्वल पेज नम्बर-36}

सबक ।
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हमारे हुजुर का हुक्म व फरमान जमीन पर भी जारी है और काइनात के हर चीज अल्लाह ने हुजुर के ताबे कर दिया है।

गैराते फारूक

हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) जब मेराज से वापस तशरिफ लाये तो फरमाया मैनें जन्नत मे एक बहुत बड़ा महल देखा जिसके सहन मे एक औरत बैठी वजु कर रही थी। मैने पुछा यह महल किसका है??
तो मुझे बयाया गया की यह महल उमर (रदी अल्लाहु अन्हु) का है।
ऐ उमर! महल के अंदर जाता मगर मै तुम्हारी गैरत को याद करके अंदर नही गया और वापस चला आया। हजरत उमर (रदी अल्लाहु अन्हु) ने अर्ज किया या रसुलल्लाह! (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) क्या मै आप पर गैरत करता?? मेरे मां-बाप आप पर कुर्बान हो। या रसुलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ऐसा कब हो सकता है।? फिर हजरत उमर रोने लगे।
{मिश्कात शरिफ, सफा-549, तरिखुल खुलफा, सफा-83}

सबक ।
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हजरत उमर फारूक (रदी अल्लाहु अन्हु) इतने गैरत वाले थे की हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम)
जो सबके आका व मौला है। आपकी गैरत की गवाही दे रहे है । फिर जो हजरत उमर (रदो अल्लाहु अन्हु) की जाते गिरामी पर गुस्तखाना हमला करे वह किस कद्र बेगैरत है।

दिवाना ऊंट

बनी नज्जार के एक बाग मे एक दिवाना ऊंट घुस आया। जो शख्स भी बाग मे जाता वह ऊंट उसे काटने दौड़ता था। लोग बड़ा परिशान थे।हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) की खिदमत मे हाजीर हुए और सारा किस्सा अर्ज किया। हुजुर ने फरमाया: चलो! मै चलता हुं।
चुनांचे:-
उस बाग मे तशरिफ ले गये और उस ऊंट से फरमाया: इधल आओ। उस ऊंट ने जब रसुलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) का हुक्म सुना तो दौड़ता हुआ हाजीर हुआ। अपना सर हुजुर के कदमो मे डाल दिया। हुजुर ने फरमाया: इसकी नकील लाओ नकील लाई गयी । हुजुर नकिल डालकर उसके मालिक के हवाले कर दिया। वह अराम से चला गया। हुजुर ने फिर सहाबा से फरमाया काफीरो के सेवा मुझे जमीन व आसमान वाले सब जानते है की मै अल्लाह का रसुल हुं।
{हुज्जातुल्लाह अलल आलमीन, सफा-458}

सबक ।
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हमारे हुजुर का हुक्म जानवारो पर भी जारी है। और काइनात की हर शय बजुज काफीरो के हमारे हुजुर की रिसालत व सदाकत को जानती है

दरख्तो पर हुकुमत

एक मर्तबा एक आराबी हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) से कहा-
ऐ मुहम्मद! अगर आप अल्लाह का रसुल है तो कोइ निशानी दिखाइये। हुजुर ने फरमाया:- अच्छा तो देखो! वह जो सामने दरख्त खड़ा है उसे जाकर इतना कह दो की तुम्हे अल्लाह के रसुल बुलाता है।
चुनांचे:-
वह आराबी उस दरख्त के पास गया और उससे कहा। तुम्हे अल्लाह का रसुल बुलाता है। वह दरख्त यह बात सुनकर अपने आगे पिछे दायें बायें पिछे गिरा और अपनी जड़े जमीन से उखाड़कर जमीन पर चलते हुवे हुजुर की खिदमत मे हाजीर हो गया और कहने लगा अस्सालामु अलैकुम या रसुलल्लाह! वह आराबी हुजुर से कहने लगा अब इसे हुक्म दिजीए की यह फिर अपनी जगह पर चला जाए।
चुनांचे:-
●हुजुर ने उससे फरमाया की जाओ। वापस चले जाओ वह दरख्त यह सुनकर पिछे मुड़ गया और अपनी जगह जाकर कायम हो गया। आराबी यह मुजीजा देखकर मुस्लमान हो गया और हुजुर को सज्दा करने की इजाजत चाही। हुजुर ने फरमाया सज्दा करना जाएज नही। फिर उसने हुजुर के हाथ पैर मुबारक चुमने की इजाजत चाही तो हुजुर ने फरमाया हां। यह बात जायज है। उसने हुजुर के हाथ और पैर मुबारक चुम लिए।
{हुज्जतुल्लाह अलल आलमीन, सफा-441}

सबक ।
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हमारे हुजुर का हुक्म दरख्तो पर भी जारी है। यह भी मालुम हुआ की बुजुर्गो के हाथ पैर चुमना जाएग है। हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने इससे माना नही फरमाया।

सुरज पर हुकुमत

एक रोज मकामे सहाबा मे हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने नमाजे जुहर अदा की और फिर हजरत अली (रदी अल्लाहु अन्हु) को किसी किसी काम के लिए रवाना फरमाया। हजरत अली (रदी अल्लाहु अन्हु) के वापस आने तक हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम)ने नमाजे अस्र भी अदा फरमा ली। जब हजरत अली वापस आए तो उनकी आगोश मे अपना सर रखकर हुजुर सो गये। हजरत अली ने अभी तक नमाजे अस्र अदा न की थी। उधर सुरज को देखा तो गुरुब होने वाला था। हजरत अली सोचने लगे। इधर रसुले खुदा अराम फरमा है। और उधर नमाजे खुदा का वक्त हो रहा है। रसुले खुदा का ख्याल रखु तो नमाज जाती है। और नमाज का ख्याल करु तो रसुले खुदा की नींद मे खलल वाके होता है। करुं तो क्या करु?
आखीर मौला अली शेरे खुदा (रदी अल्लाहु अन्हु) ने फैसला किया की नमाज कजा होने दो मगर हुजुर की नींद मुबारक मे खलल न आए।
चुनांचे:-
सुरज डुब गया और अस्र का वक्त जाता रहा। हुजुर उठे तो हजरत अली को मगमूम देखकर वजह दर्याफ्त की तो हजरत अली ने अर्ज किया या रसुलल्लाह! मैने आपकी इस्तिराहत के पेशे नजर अभी तक नमाजे अस्र नही पढ़ी। सुरज गुरुब हो गया है। हुजुर ने फरमाया तो गम किस बात का?? लो अभी सुरज वापस आता है। फिर उसी मकाम पर आकर रुकता है जहां वक्ते अस्र होता है।
चुनांचे:-
हुजुर ने दुआ फरमाइ तो गुरुब शुदा सुरज फिर निकला और उल्टे कदम उसी जगह आकर ठहर गया जहां अस्र का वक्त होता है। हजरत अली ने उठकर अस्र की नमाज पढ़ी तो सुरज गुरुब हो गया।
{हुज्जतुल्लाह अलल आलमीन सफा-368}

सबक ।
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हमारे हुजुर की हुकुमत सुरज पर भी जारी है। आप काइनात के हर जर्रा के हाकिम व मुख्तार है। आप जैसा न होगा और न हो सकता है।

 जनाजा

हजरत सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) ने अपने विसाल मुबारक से पहले हजरत अली (रजी अल्लाहु अन्हु) को फरमा दिया था की मेरा जनाजा को तैयार करके हुजरा शरिफ (जिसमे हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) का मजारे अनवर है) के सामने रखकर अर्ज करना “अस्सलामु अलैकुम या रसुलल्लाह” यह अबु-बक्र आपके दरवाजे पर हाजिर है फिर जैसा हुक्म हो वही करना।
चुनांचे आपकी वसीयत के मुताबिक आपके जनाजे को हुजरे के सामने रखकर अर्ज किया गया या रसुलल्लाह! यह आपके यारे गार अबु-बक्र आपके दरवाजे पर हाजीर है। इनकी तमन्ना आपके हुजरे शरिफ मे दफन होने की है।अगर इजाजत हो तो हुजरा शरिफ मे दफन किया जाये??
यह सुनकर हुजरा शरिफ का दरवाजा जो पहले बंद था खुद-ब-खुद गया और अवाज आयी।

▶हबीब को हबीब से मिला दो कियोंकी हबीब को हबीब से मिलने का इश्तियाक है।◀

जब हुजरा शरिफ मे हजरत अबु बक्र (रदी अल्लाहु अन्हु) के दफन करने की इजाजत हुई तो जनाजाए मुबारक को अंदर ले गये और(सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) के कन्धे मुबारक के करिब आपको दफन कर दिया।
{सिरतुस सालिहीन सफा-92,}

सबक ।
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सिद्दिके अकबर (रजी अल्लाहु अन्हु) की बुलन्दी व बाला इसी बात से जाहीर है की आप ही सानी यसनैन फिलगार है। आप ही सानी यसनैन फिलमजार भी हुए।

चांद पर हुकुमत

हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) के दुशमनो ने बिलखुसुस अबु-जहल ने एक मर्तबा हुजुर से कहा की अगर तुम खुदा के रसुल हो तो आसमान पर जो चांद है उसको दो टुकड़े करके दिखाओ। हुजुर ने फरमाया : लो यह भी करके दिखा देता हुं।
चुनांचे:-
आपने चांद की तरफ उंगली मुबारक से इशारा फरमाया तो चांद के दो टुकड़े हो गये। यह देखकर अबु जहल हैरान हो गया। मगर बे-इमान माना भी नही और हुजुर को जादुगर ही कहता रहा।
{हुज्जतुल्लाह सफा-366, बुखारी शरिफ-हिस्सा-2, सफा-271}

सबक ।
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हमारे हुजुर की हुकुमत चांद पर भी जारी है।बावजुद इतने बड़े इख्तियार के बे-ईमान अफराद हुजुर के ईख्तियार व तसर्रुफ को फिर भी नही मानते।

बादलो पर हुकुमत

मदीना मुनाव्वरा मे एक मर्तबा बारिश नही हुइ थी। कहत का सा आलम था। लोग बड़े परिशान थे। एक जुम्मा के रोज हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) जबकी वअज फरमा रहे थे। एक अरबी उठा और अर्ज करने लगा या रसुलल्लाह! माल हलाक हो गया और औलाद फाका करने लगी। दुआ फरमाइये बारिश हो। हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने उसी वक्त अपने प्यारे प्यारे हाथ उठाए ।
रावी का ब्यान है की आसमान बिलकुल साफ था अब्र (बादल) का नाम व निशान तक न था। मगर मदनी सरकार के हाथ मुबारक उठे ही थे की पहाड़ो की मानिंद अब्र छा गए और छाते ही मेंह बरसने लगा। हुजुर मिंबर पर ही तशरिफ फरमा थे की मेंह शुरु हो गया इतना बरसा की छत टपकने लगी। हुजुर के रेश अनवर से पानी के कतरे गिरते हमने देखे। फिर यह मेंह बन्द नही हुआ बल्कि हफता को भी बरसता रहा। फिर अगले दिन भी और फिर उससे अगले हफ्ता को भी हत्ता की लगातार अगले जुम्मा तक बरसता ही रहा । हुजुर दुसरे जुम्मा को वअज फरमाने उठे तो वही अरबी जिसने पहले जुम्मा मे बारिश न होने की तकलीफ अर्ज की थी उठा और अर्ज करने लगा या रसुलल्लाह! अब तो माल गर्क होने लगा और मकान गिरने लगे। अब फिर हाथ उठाइये की यह बारिश बंद भी हो।
चुनांचे हुजुर ने फिर उसी वक्त अपने प्यारे प्यारे नुरानी हाथ उठाए और अपनी उंगली मुबारक से इशारा फरमाकर दुआ फरमाइ की ऐ अल्लाह! हमारे इर्द गिर्द बारिश हो हम पर ना हो। हुजुर का यह इशारा करना ही था की जिस जिस तरफ उंगली गई उस तरफ से बादल फटता गया और मदीना मुनाव्वरा के ऊपर सब आसमान साफ हो गया।
{मिश्कात शरिफ सफा-528}

सबक ।
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सहाबा किराम मुश्किल के वक्त हुजुर ही की बारगाह मे फरियाद लेकर आते थे। उनका यकीन था की हर मुश्किल यहक हल होती है। वकाई वही हल होती रही। इसी तरह आज भी हम हुजुर के मोहताज है। बेगैर हुजुर के वसीले के हम अल्लाह से कुछ भी नही पा सकते। हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) की हुकुमत बादलो पर भी जारी है।

जन्नत का सेब

एक मर्तबा हजरत इमाम हसन और इमाम हुसैन (रदीअल्लाहु अन्हुम) ने बचपन मे 2 तख्तीयो पर कुछ लिखा और दोनो एक दुसरे से कहने लगे की मेरा खत अच्छा है।
चुनांचे दोनो इस बात पर फैसला कराने के लिए हजरत अली (रदी अल्लाहु अन्हु) के पास पहुंचे! मौला अली ने ये फैसला हजरत फातीमा (रदी अल्लाहु अन्हा) के पास पहुंचा दिया!
हजरत फातीमा (रदी अल्लाहु अन्हा) ने फरमाया बेटो! इस बात का फैसला तुम अपने नाना जान! हुजुर मुहम्मदुर्ररसुलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) से कराओ!।
हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने फरमाया: तुम्हारा ये फैसला जिब्राइल करेगें!
जिब्राइल अमीन हाजीर हुए और कहने लगे
“या रसुल्ललाह! खुदा तआला ये फैसला खुद फरमायेगा।
चुनांचे:-
खुदा तआला का जिब्राइल को हुक्म हुआ की जिब्राइल जन्नत से सेब ले जाओ। ओ सेब उन तख्तीयो पर डाल दो सेब जिसकी तख्ती पर ठहर जाए वही खत अच्छा है।
चुनांचे जिब्राइल ने जन्नत से एक लाकर उन तख्तीयो पर गिरा दिया तो खुदा के हुक्म से दो टुकड़े हो गये। एक टुकड़ा हजरत हसन (रदी अल्लाहु अन्हु) की तख्ती पर और दुसरा हजरत हुसैन (रदी अल्लाहु अन्हु) तख्ती पर जा गिरा और फैसला हुआ की दोनो के तख्ती अच्छा है।
(नुज्जाहतुल मजालिस, जिल्द-2, सफा-391)

सबक ।
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हजरत इमाम हसन और हुसैन (रदी अल्लाहु अन्हु) को खुदा तआला अपने महबुब के इन शहजादो की दिल शिकनी नही चाहता।
फिर जो शख्स इन शहजादो की किसी किस्म की तौहीन करे तो वह किस कद्र जालीम है।

अबु-उबैदा का ख्वाब

जिस वक्त सहाबाए किराम का लश्कर मुल्के शाम को फतह करने मे मसगुल था और दामिश्क फतह करने का मंसुबा था मगर दमिश्क के फतह करने मे जिस कद्र परेशानियां पेश आ रही थी। सहाबा किराम को एक किस्म का शक सा था ऐसी हैरानी के वक्त हजरत अबु-उबैदा (रदी अल्लाहु अन्हु) के ख्वाब देखा की मेरे खेमे मे हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) तशरिफ लाये। अबु-उबैदा को बशारत दि की ऐ अबु-उबैदा! मुस्लमानो मे कह दो की आज यह जगह फतह हो जाएगी इत्मीनान रखो। यह फरमाकर हुजुर ने बहुत जल्द वापसी का इरादा फरमाया। हजरत अबु-उबैदा ने अर्ज किया या रसुलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) इस वक्त हुजुर को इतनी जल्दी क्यों है।??
फरमाया अबु-उबैदा! आज अबु बक्र की वफात हो गयी है। मै उसका जानजा तैयार छोड़कर आया हुं मुझे अभी अबु बक्र के जानजे मे वापस जाना है। यह फरमा कर हुजुर फौरन वापस तशरिफ ले गये।
{सिरतुस सालिहीन, सफा-36,}

सबक ।
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हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम)
ने हजरत सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) से एक खास तअल्लुक था और हुजुर की यहां भी सिद्दिके अकबर पर एक खास नजरे रहमत रही।

एक सहराई काफिल

अरब के एक सहरा मे एक बहुत बड़ा काफिला राहे पैमा था अचानक उस काफिला का पानी खत्म हो गया। उस कफिला मे छोटे बड़े बुढ़े जवान और मर्द व औरत सभी थे । प्यास के मारे सबका बुरा हाल था। दुर ता पानी का निशान ना था। पानी उनके पास एक कतरा तक बाकि न रहा था यह आलम देखकर मौत उनके रक्सषकरने लगी। उन पर यह खास करम हुआ की:-
अचानक दो जहां के फरयाद-रस मुहम्मद मुस्तफा (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) उनकी मदद फरमाने वहां पहुंच गये। हुजुर को देखकर सबकी जान मे जान आ गइ। सब हुजुर के गिर्द जामा हो गये। हुजुर ने उन्हे तसल्ली दी और फरमाया की वह सामने जो टिला है उसके पिछे एक स्याह रंग हब्शी गुलाम ऊंटनी पर सवार जा रहा है। उसके पास पानी का एक मश्कीजा है। उसको ऊंटनी समेत मेरे पास ले लाओ।
चुनांचे:-
कुछ आदमी टिले के उस पार गये तो देखा की वाकइ एक ऊंटनी पर सवार हब्शी जा रहा है वह उस हब्शी को हुजुर के पास ले आए। हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने उस हब्शी से मश्कीजा ले लिया। अपने दस्ते रहमत उस मश्कीजा पर फेरकर उसका मुंह खोल दिया। फरमाया : आओ अब जिस कद्र भी प्यासे हो आते जाओ और पानी पी-पीकर अपनी प्यास बुझाते जाओ। चुनाचे-सारे काफीले ने उस मश्कीजा से जारी रहमत से पानी पिना शुरु किया फिर सबने अपने अपने बर्तन भी भर लिये। सब के सब सैराब हो गये। सब बर्तन भी पानी से भर गये। हुजुर का यह मोजीजा देखकर हब्शी बड़ा हैरान हुआ। हुजुर के दस्ते अनवर चुमने लगा। हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने अपना दस्ते अनवर उसके मुंह पर भेर दिया। तो उस हब्शी का स्याह रंग काफुर हो गया। वह सफेद पुरनुर हो गया। फिर उस हब्शी ने कलीमा पढ़कर अपना दिल भी मुनव्वर कर लिया। मुस्लमान होकर जब वह अपने मालीक के पास पहुंचा तो मालीक पुछा तुम कौन हो??
वह बोला तुम्हारा गुलाम हुं।
मालीक ने कहा: तुम गलत कहते हो । वह तो बड़ा स्याह रंग का था वह बोला यह ठीक है मगर मै उस मम्बअ नुर जाते बा-बर्कत से मिलकर और उसपर ईमान लाकर आया हुं। जिसने सारे काएनात को मुनव्वर फरमा दिया है। मालीक ने सारा किस्सा सुना तो वह भी ईमान ले आया।
{मसनवी शरिफ}

सबक ।
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हमारे हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) अल्लाह की रजा से दो जहान के फरियाद रस है और मुसीबत के वक्त मदद फरमाने वाले है।..

कुंजे मे दरिया

हुदैबिया के रोज सारे लश्करे सहाबा मे पानी खत्म हो गया हत्ता की वुजु और पिने के लिए भी पानी का एक कतरा तक न रहा। हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) के पास एक कुजा पानी का था। हुजुर जब उस कुजा से वुजु फरमाने लगे तो सब हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) की तरफ लपके और फरियाद की कि या रसुलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) हमारे पास तो एक कतरा भी पानी का बाकी न रहा। न तो वुजु कर सकते है और ना ही अपनी प्यास बुझा सकते है। हुजुर! यह आप ही के कुजे मे पानी बाकि है हम सब के पास पानी खत्म हो गया है और हम सब प्यास की शिद्दत से बेचैन है। हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने यह बात सुनकर अपना हाथ मुबारक उस कुजे मे डाल दिये लोगो ने देखा की हुजुर के हाथ मुबारक उस कुजे मे डाल दिया लोगो ने देखा की हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) के हाथ मुबारक की पांचो उंगलियों से पानी के पांच चश्मे जारी हो गयें। सबषलोग इन चश्मो से सैराब होने लगे। हर शख्स ने जी भर के पानी पिया और प्यास बुझाई। सबने वुजु भी कर लिया। हजरत जाबीर से पुछा गया कि लशकर की तदाद कितनी थी?? तो फरमाया उस वक्त अगर एक लाख आदमी भी होते तो वह पानी सबके लिए काफी था मगर हम उस वक्त पन्द्रह सौ की तदाद मे थे।
{मिश्कात शरिफ सफा-524}

सबक ।
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हमारे हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) को अल्लाह ने यह इख्तेयार व तसर्रुफ अता फरमाया है की आप थोड़ी चीज को ज्यादा कर देते है। ”न” से हां और मादुम से मौजुद करना अल्लाह का काम है। थोड़े से ज्यादा कर देना मुस्तफा का काम हि। यह अल्लाह ही का अता है।

हजरत जाबीर का मकान और एक हजार मेहमान

हजरत जाबीर (रदी अल्लाहु अन्हु) ने जंगे खंदक के दिनो हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) के शिकमे अनवर पर पत्थर बंधा देखा तो घर आकर अपनी बिवी से कहा की क्या घर मे कुछ है ताकी हम हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) के लिए कुछ पकाएं और हुजुर को खिलाए??
बिवी ने कहा: थोड़े पे जौ है और यह एक बकरी का छोटा बच्चा है। इसे जबह कर लेते है।
आप हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) को बुला लाइये। चुकी वहां लश्कर बहुत ज्यादा है इसलिए हुजुर से पोशीदगी मे कहीएगा की वह अपने हमराह दस आदमीयो से कुछ कम लाएं।
जाबीर ने कहा : अच्छा तो लो मै इस बकरी के बच्चे को जबह करता हुं तुम इसे पकाओ । मै हुजुर को बुला लाता हुं।
चुनांचे:-
जाबीर हुजुर के खिदमत मे पहुंचे तो कान मे अर्ज किया हुजुर मेरे यहां तशरिफ ले चलीए और अपने साथ दस आदमीयों से कुछ कम आदमी ले चलीए। हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने सारे लश्कर को मुखातीब फरमाया: चलो मेरे साथ चलो । जाबीर ने खाना पकाया है। फिर जाबीर के घर आकर हुजुर ने उस थोड़े से आटे मे अपना थुक मुबारक डाल दिया। फिर हुक्म दिया की अब रोटीयां और हंडिया पकाओ। चुनांचे उस थोड़े से आटे और गोश्त मे थुक मुबारक की बर्कत से इतनी बर्कत पैदा हो गयी की एक हजार आदमी खा गए मगर न रोटी कम हुई और न कोई बोटी।
{सच्ची हिकायत हिस्सा-अव्वल, हिकायत-15, पेज नम्बर-31,}

सबक ।
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यह हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) के थुक मुबारक की बर्कत थी कि थोड़े से खाने मे इतनी बर्कत पैदा हो गयी की हजार आदमी सैर शिकम

वसीयत

सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) ने अपनी आखरी मर्ज मे हजरत अली (रदी अल्लाहु अन्हु) को बुलाया और वसीयत फरमायी की ऐ अली! जब मेरी वफात हो जाये तो मुझे तुम अपने हाथो से गुस्ल देना क्योंकी तुमने इन हाथों से हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) को गुस्ल दिया है। फिर मुझे मेरे पुराने कपड़ो मे कफन देकर उस हुजरे शरिफ के सामने रख देना। जिसमे हुजुर का मजारे मुकद्दस है। अगर बेगैर कुंजीयों के ताले खुद खुल जाये तो अंदर दफन कर देना वरना आम मुस्लमानो के कब्रस्तान मे ले जाकर दफन करना।
{सिरतुस सालिहीन, सफा-91,}

सबक ।
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सिद्दिके अकबर जिनके फिराक मे जान दे रहे है। चाहते है की विसाल के बाद मुझे उसी महबुब की आगोशे रहमत मे जगह मिले। मालुम हुआ कि सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) के दिल व जान से चाहने वाले सच्चे मुहीब थे।

सांप का अंण्डा

एक सहाबी हजरत हबीबुल्लाह बिन फदीक (रदी अल्लाहु अन्हु) कही जा रहे थे की उनका पांव इत्तेफाकन एक जहरिले सांप के अंडे पर पड़ गया। और वह पिस गया। उसके जहर के असर से हजरत हबीब बिन फदीक (रदी अल्लाहु अन्हु) की आँखें बिलकुल सफेद हो गइ। नजर जाती रही। यह हाल देखकर उनके वालीद बहुत परिशान हुए और उन्हे लेकर हुजुर(सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम)
की खिदमत मे पहुंचे। हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम)
ने सारा किस्सा सुनकर अपना थुक मुबारक उनकी आँखो मे डाला तो हजरत हबीब बिन फदीक की अंधी आंखे फौरन रौशन हो गई और उन्हे नजर आने लगा। रावी का ब्यान है की मैने खुद हजरत फादीक को देखा। उस वक्त उनकी उम्र 80 साल की थी और आंखे तो उनकी बिल्कुल सफेद थी मगर हुजुर के थुक मुबारक के असर से नजर इतनी तेज थी की सुई मे धागा डाल लेते थे।
{दलाइलुल नुबुव्व सफा-167}

सबक ।
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हमारे हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम)
की मिस्ल बनने वालो के लिए मकामे गौर है की हुजुर वह है जिनकी थुक मुबारक से अंधी आंखो मे बिनाई और नुर पैदा हो जाए और वह वह है। की उनकी थुक के मुतअल्लिक रेलवे स्टेसन मे यह लिखा होता है की थुको मत इससे बिमारी फैलती है।
फिर मर्ज व शिफा दोनो बराबर कैसे हो सकती है।??

बकरी जिन्दा हो गयी

जंगे अहजाब मे हजरत जाबीर (रदी अल्लाहु अन्हु) ने हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) की दावत की और एक बकरी जबह की हुजुर जब सहाबाए किराम के साथ जाबीर के घर पहुंचे तो जाबीर ने खाना लाकर आगे रखा। खाना थोड़ा था और खाने वाले ज्यादा थे। हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने फरमाया थोड़े थोड़े आदमी आते जाओ और बारी बारी खाना खाते जाओ।
चुनांचे:-
ऐसे ही हुआ की जितने आदमी खाना खा लेते वह निकल जाते इस तरह सबने खाना खा लिया। जाबीर फरमाते थे की हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) पहले ही फरमा दिया था की कोइ शख्स गोश्त की हड्डी न तोड़े न फेके सब एक जगह रखते जाए। जब सब खा चुके तो आपने हुक्म दिया की छोटी मोटी सब हड्डीयां जमा कर दो। जमा हो गयी तो आपने अपना दस्ते मुबारक उनपर रखकर कुछ पढ़ा आपका दस्त मुबारक अभी हड्डीयो के ऊपर ही था और जबाने मुबारक से कुछ पढ़ ही रहे थे की वह हड्डीयां कुछ का कुछ बनने लगी। यहां तक की गोश्त पोश्त तैयार होकर कान झाड़ते हुइ वह बकरी उठ खड़ी हुई। हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम) ने फरमाया जाबीर! ले यह अपनी बकरी ले जा।
{दलाइलुल नुबुव्व जिल्द-2, सफा-224,}

सबक ।
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हमारे हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम)मंबऊल-हयात हयात बख्श है।आपने मुर्दा दिलो और मुर्दा जिस्मो को भी जिन्दा फरमा दिया फिर जो हुजुर को मर कर मिट्टी मे मिलने वाला कहते है । (माज अल्लाह) किस कद्र जाहील और बेदिन है।

बाल का कमाल

हमारे हुजुर ﷺ की रीश मुबारक के दो बाल मुबारक हजरत सिद्दीके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) को मिल गए। आप उन दो बालो को बतौर तबर्रुक घर ले आयें और बड़ी ताजीम के साथ अंदर एक जगह रख दिए। थोड़ी देर के बाद अंदर से कुरआन पढ़ने की अवाज आने लगी। सिद्दीके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) अंदर गए तो तिलावत की अवाजे तो आ रही थी मगर पढ़ने वाले नजर न आते थे। हजरत सिद्दके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) ने हुजुर की खिदमत मे हाजीर होकर सारा किस्सा ब्यान किया तो हुजुर ने मुस्कुरा कर फरमाया ।
यह फरिश्ते है जो मेरे बाल के पास जमा होकर कुरआन पढ़ते है।
{जामिउल मुजिजत सफा-62}

सबक ।
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हुजुर ﷺ का हर बाल मम्बउल कमाल है आपका बाल शरीफ ज्यारत गाहे खलाइक है। फिर जिन लोगो को बाल मुंडकर नाइ नालियो मे फेक देता है वह अगर हुजुर की मिस्ल होने की दावा करने लगे तो किस कद्र जुल्म है।

खालीद की टोपी

हजरत खालीद बिन वलीद (रदी अल्लाहु अन्हु) जो अल्लाह की तलवारो मे से एक तलवार थे। आप जिस मैदाने जंग भे तशरिफ ले जाते। अपने टोपी को जरुर सर पर रख कर ले जाते और हमेशा फतह ही पाकर लौटते। कभी शिकस्त का मुंह न देखते।
“एक मर्तबा मर्तबा जंगे यरमुक मे जबकि मैदाने जंग गर्म हो रहे था हजरत खालीद की टोपी गुम हो गयी। आपने लड़ना छोड़कर टोपी की तलाश शुरु कर दी। लोगो ने जब देखा की तीर और पत्थर बरस रहे है। तलवार और नेजा अपना काम कर रहे है। मौत सामने है । इस आलम मे खालीद को अपनी टोपी की पड़ी है। वह उसी को ढ़ुंढ़ने मे मसरुफ हो गये। तो उन्होने हजरत खालीद से कहा: जनाब टोपी का ख्याल छोड़ीये और लड़ना शुरु किजीए। हजरत खालीद ने उनकी इस बात की परवाह ना की और टोपी की बदस्तुर तलाश शुरु रखी। आखीर टोपी उनको मिल गयी तो उन्होने खुश होकर कहा: भाईयों! जानते हो मुझे यह टोपी इतनी अजीज क्यों है? जान लोशमैने आज तक जो जंग भी जीती इसी टोपी के तुफैल । मेरा क्या है? सब इसी की बर्कत है। मै इसके बेगैर कुछ भी नही। अगर यह मेरे सर पर हो तो फिर दुश्मन मेरे सामने कुछ भी नही । लोगो ने कहा आखीर इस टोपी मे क्या खुबी है ??
फरमाया: यह देखो क्या है?
यह हुजुर सरवरे आलम ﷺ के सरे अनवर का बाल मुबारक है जो मैने इसी मे सी रखे है। हुजुर ﷺ एक मर्तबा उमरा बजा लाने को बैतुल्लाह तशरिफ ले गये। सरे मुबारक का बाल उतरवाए तो उस वक्त हममे से हर एक शख्स बाल मुबारक लेने की कोशीश कर रहा था और हर एक दुसरे पर गिरता था तो मैने इसी कोशीश मे आगे बढ़कर चंद बाल मुबारक हासील कर लिए थे। फिर इसी टोपी मे सि लिए। यह टोपी अब मेरे लिए जुम्ला बर्कत व फुतुहात का जरिया है। मै इसी के सदके मे हर मैदान का फातेह बनकर लौटता हुं। फिर बताओ यह टोपी अगर न मिलती तो मुझे चैन कैसे आता?
{हुज्जतुल्लाहुल आलमीन, सफा-686}

सबक ।
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हुजुर सरवरे आलम ﷺ की जुम्ला बर्कत व इनाआमात का जरिया है।आपका बाल शरिफ बर्कत व रहमत है। यह भी मालुम हुआ की सहाबाए किराम हुजुर ﷺ से मुतअल्लिक अशिया का बतौर तबर्रुक आपने पास भी रखते थे। जिसके पास आपका बाल मुबारक होता अल्लाह तआला उसे कामयाबीयों से सरफराज फरमाता था

✴ दिदारे महबुब••
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हजरत सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) ने एक रात ख्वाब देखा की हुजुर ﷺ तशरीफ लाये। आपके बदन मुबारक पर दो सफेद कपड़े थे। थोड़ी देर मे वह दोनो सफेद कपड़े सब्ज रंग के हो गये और इस कद्र चमकने लगे की निगाह उन पर न ठहरती थी । फिर हुजुर ﷺ सामने तशरिफ लाकर हजरत अबु-बक्र (रदी अल्लाहु अन्हु) से अस्सलामु अलैकुम फरमाया और मुसाफा किया। अपना नुरानी हाथ हजरत अबु-बक्र के सिने पर रखा जिसके सबब सारी कल्ब और सिना की तकलीफे दुर हुई।
फिर फरमाया: कि ऐ अबु बक्र! क्या अभी हमसे मिलने का वक्त नही आया?
हजरत अबु बक्र यह बात हुजुर ﷺ से सुनकर इस कद्र रोये की सारे घरवालो को खबर हो गयी।
फिर अर्ज किया: या रसुलल्लाह! ﷺ देखिये आपकी मुलाकत का शर्फ कब मुझे हासील होता है।
हजरत अबु बक्र का फिराक (जुदाई) मे रोना सुनकर हुजुर ﷺ ने फरमाया : घबराओ नही। अब हमारी तुम्हारी मुलाकत का वक्त करीब है।
इस ख्वाब को देखकर हजरत अबु बक्र बहुत खुश हुए।
{सिरतुस सालिहीन, सफा-92}

सबक ।
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सिद्दीके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) को हुजुर ﷺ से और हुजुर ﷺ को सिद्दिके अकबर से बड़ी मुहब्बत थी।

✴ फिराके महबुब••
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हजरत सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) को हुजुर ﷺ से इस कद्र मुहब्बत थी की हुजुर ﷺ के विसाल शरीफ के बाद फिराके महबुब (महबुब की जुदाइ) के सदमे मे बेचैन रहने लगे और थोड़ी मुद्दत के बाद के बाद ही आप बिमार पड़ गये। आपके इलाज के लिए एक हकीम को बुलाया गया। हकीम ने बड़े गौर से देखा और कहा की यह मरीज किसी के मुहब्बत मे बिमार है। इनका महबुब इनसे जुदा है। इसी फिराके महबुब के गम मे यह बिमार हुए । इनका इलाज दिदारे यार के अलावा कुछ नही। जहां तक हो सके इनके महबुब को इन्हे दिखाओ।
(सिरतुस-सालिहीन सफा-60,)

सबक ।
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सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) सच्चे महबुब ﷺ के सच्चे मुहीब (चाहने वाला) व तालिब थे।

दिलेर व बहादुर

एक दिन हजरत अली (रदी अल्लाहु अन्हु) ने लोगो से खड़े होकर फरमाया भला तुम जानते हो तमाम लोगो मे ज्यादा बहादुर और शुजा कौन है।?
हाजिरीन ने जवाब दिया: जनाब आप।
फरमाया: नही। बल्कि सब से ज्यादा दिलेर व बहादुर अबु-बक्र सिद्दीक थे। इसका इम्तेहान युं हुआ की जब बदर की लडाइ पेश आयी तो हमने हुजूर ﷺ के लिए एक छप्पर तैयार किया। हुजूर ﷺ को वहां बैठाकर कहा की हुजूर ﷺ की पासबानी और हिफाजत के लिए कौन शखास खड़ा होगा? ताकी बुत-परास्तो मे से कोइ शख्स आपके पास ना पहुंच सके। मै कसम खाकर कहता हुं। की उस वक्त सिर्फ अबु-बक्र ही आगे बढ़े और आपके सरे मुबारक के पास नंगी तलवार लिए खड़ा रहे।
{नुजहतुल मजालिस, जिल्द-2, सफा-310}

सबक ।
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हजरत सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) सबसे ज्यादा सखी और सबसे ज्यादा हिम्मत वाले भी थे। इस बात के गवाह खुद हजरत मौला अली (रदी अल्लाहु अन्हु) है।

बिलाल की अजादी

हजरत बिलाल (रदी अल्लाहु अन्हु) एक हब्शी गुलाम थे। यह मुस्लमान हुए तो इनके मालिक उमय्या ने जो बड़ा दुश्मने रसुल काफिर था। हजरत बिलाल (रदी अल्लाहु अन्हु) को बड़ी सख्त तकलिफे देना शुरू की। सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) को पता चला तो आपने बहुत बड़ी किमत का सोना देकर हजरत बिलाल (रदी अल्लाहु अन्हु) को आजाद कराया। सिद्दिके अकबर का यह ईसार अल्लाह तआला को बड़ा पसन्द आया। कुरआन मे ईरशाद फरमाया की वह (सिद्दिक) महज अल्लाह की रजा के लिए माल खर्च करता है। और अनकरीब वह रजी होगा।
{कुरआन करीम, पारा-30, रुकू-18, रुहुल ब्यान, जिल्द-4, सफा-331,}

सबक ।
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सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) अपना माल व जर सब कुछ ईस्लाम पर कुर्बान कर डाला। खुद खुदा तआला ने भी कुरआन मे सिद्दिके अकबर की तारिफ फरमाइ। फरमाया है। की हम इसे राजी करेंगे फिर जो सिद्दिक पर राजी नही तो खुदा उस पर राजी नही।

शराबी का मुंह

हजरत इब्रहीम बिन अदहम रहमतुल्लाह अलैह एक रास्ते से गुजर रहे थे। आपने एक शराबी को देखा जो शराब के नशे मे राह मे गिरा हुआ था। बेहोशी के आलम मे अपनी जुबान से बहुत बकवास कर रहा था।
हजरत इब्राहीम उनके पास ठहर गए और फरमाया: यह जुबान तो जिक्र हक के लिए थी। इसे कौन सी आफत पहुंची की यह ऐसे बकवास कर रहा है।
फिर आपने पानी मंगवाया और उसका मुंह और उसकी जुबान धोने लगे और धोकर आगे तशरिफ ले गये।
शराबी होश मे आया तो लोगो ने उसे यह सारा किस्सा सुनाया। शराबी यह सुनकर हजरत इब्राहीम अदहम मेरा मुंह और जुबान धो गये है।
रोया और कहने लगा, ईलाही! तेरे मकबुल बन्दे की शर्म खाकर मै सच्चे दिल से तौबा करता हुं। तु अपने मकबुल बन्दे के तुफैल मुझे बख्श दे।
☆रात को इब्राहीम ने ख्वाब मे देखा कि कोई कहने वाला कह रहा है कि ऐ इब्राहीम! तुने उस शराबी की हमारे खातीर मुंह धोया। हमने तुम्हारे खातीर उसका दिल धोया।
{रौजुर्रियहीन सफा-117,}

सबक ।
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अल्लाह के मकबुल बन्दो की कुरबत व मर्इयत से इंसान की काया पलट जाती है और अल्लाह की रहमत से सब गुनाह धुल जाते है। आकबत अच्छी हो जाती है। फिर जो लोग यह कहें की उन वलियों के पास क्या पड़ा है और उनके पास जाने से क्या फायदा?? वह बदनसीब और बदबख्त है या नही

खुदा की तसदिक

हजरत सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) एक दिन यहुदियो के एक मदरसे मे तशरिफ ले गये। उस दिन यहुदियो के एक बहुत बड़ा आलीम जिसका नाम फखास था आया हुआ था। उसके वजह से वहां बहुत से यहुदी जामा थे। हजरत सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) ने वहां पहुंच कर फखास से फरमाया। ऐ फखास! अल्लाह से डर और मुस्लमान हो जा खुदा की कसम मुहम्मद ﷺ अल्लाह के सच्चे रसुल है।जो हक लेकर आये है तुम लोग उनकी तारिफे तौरेत व इंजील मे पढ़ते हो। लिहाज तुम मुस्लमान हो जाओ और सच्चे रसुल की तसदिक करो। नमाज पढ़ो। जकात दो।और अल्लाह को कर्ज हसना दो। ताकी तुम जन्नत मे जाओ। फखास बोला: ऐ अबु-बक्र! क्या हमारा खुदा हमसे कर्ज मांगता है।ईससे तो यह सबीत हुआ की हम गनी (अमीर) है।और खुदा फाकिर है। हजरत सिद्दीके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) को यह सुनकर बहुत गुस्सा आया और फखास के मुंह पर एक थप्पड़ मारा। फरमाया: कसम खुदा की! अगर हममे और तुम मुआहिद न होता तो ईसी वक्त तेरी गर्दन अगल कर देता। फखास थप्पड़ खाकर हुजुर ﷺ के पास आया और सिद्दिके अकबर की शिकायत की तो हुजुर ﷺ ने सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) से पुछा: सिद्दीके अकबर ने अर्ज किया- हुजुर इसने युं कहा था कि हम गनी है और अल्लाह फकीर है। मुझे इस बात पर गुस्सा आया था। फखास इस बात से फिर गया। कहने लगा मैनें हरगीज ऐसा नही कहा।
उसी वक्त सिद्दिके अकबर की तसदीक मे अल्लाह तआला ने यह आयत नाजील फरमायी।”

“अल्लाह ने उन लोगो का कौल सुना की अल्लाह फाकिर है हम गनी है।”
(कुरआन)

“खुदा तआला की इस तसदिक व शहादत से सिद्दिके अकबर की सदाकत (सच्चाइ) जाहीर हुई।”
(कुरआन करीम पारा-4, रुकू-10, रुहुल ब्यान, जिल्द-1, सफा-393)

सबक ।
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सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) दिन के मामले मे बड़े गैरतमंद थे। आपके सच बोलने का जज्बा की शान यह है की खुदा तआला भी आपके जज्बाए सादका का तारिफ करने वाला और आपका ताईद करने वाला है। फिर जो शख्स सिद्दिके अकबर का मद्दाह नही वह दरअसल खुदा ही से खफा है।

अंगुठी का नक्शा

एक मर्तबा हुजूर ﷺ ने सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) को अपनी अंगूठी मुबारक दी और फरमाया की इस पर “ला इला ह इल्लल्लाह” लिखवा लाओ। सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) गये और अंगुठी पर “ला इला ह इल्लल्लाह” लिखवा लाये। जब अंगुठी हुजुर की खिदमत मे पेश की तो उस पर लिखा था “ला इला ह इल्लल्लाहु मुहम्मदुर्ररसुलुल्लाह” और उसके साथ ही सिद्दिक अकबर का अपना नाम भी लिखा था। हुजुर ﷺ ने दर्याफ्त फरमाया : अबु बक्र! हमने तो “ला इला ह इल्लल्लाह” लिखवाने को कहा था । मगर तुम हमारा नाम भी और अपना नाम भी लिखवा लाये। अर्ज किया: हुजूर मेरा दिल न माना था की खुदा के नाम साथ आपका नाम ना हो। यह आपका नाम तो मैने ही लिखवाया । मगर मेरा नाम। यह तो यहां तक आते आते ही लिखा गया है वरना मैने हरगीज नही लिखवाया। ईतने मे जिबराइल अमीन हाजीर हुए और अर्ज किया: या रसुलल्लाह! ﷺ खुदा ने फरमाया है की सिद्दिक इस काम पर राजी न हुए की आपका नाम हमारे नाम से जुदा करे सिद्दिक ने आपका नाम हमारे नाम के साथ लिखवाया। हमने सिद्दिक का नाम आपके नाम के साथ लिखा दिया।
{तफसीरे कबीर, जिल्द-1, सफा-91,}

सबक ।
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सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) हुजुर ﷺ के सच्चे रफीक है। हर जगह

पुल-सिरात की राहदारी

एक दिन सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) हजरत मौला अली की तरफ देखकर मुस्कुराए। मौला अली (रदी अल्लाहु अन्हु) ने दर्याफ्त किया: मुझे देखकर आप मुस्कुराए क्यों??
सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) ने फरमाया ऐ अली! मुबारक हो मुझसे हुजूर ﷺ ने फरमाया कि जब तक अली किसी को पुल-सिरात से गुजरने की छुट्टी न देगा तब तक वह पुल-सिरात से गुजर ना सकेगा। इस पर हजरत अली (रदी अल्लाहु अन्हु) भी मुस्कुरा पड़े और फरमाया : ऐ खलीफतुल मुस्लिमीन! आपको भी मुबारक हो। मुझसे हुजूर ﷺ ने फरमाया : की ऐ अली! तुम उस शख्स को पुल-सिरात की राहदारी (परवाना) हरगीज न देना जिसके दिल मे अबु-बक्र की अदावत हो बल्कि उसी को देना जो अबु बक्र का मुहीब (मुहब्बत करने वाला) हो।
{नुजहतुल मजालिस, जिल्द-2, सफा-306,}

सबक ।
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हजरत अली (रदी अल्लाहु अन्हु) की मुहब्बत व गुलामी से कुछ फायदा जब ही हासील हो सकता है। जबकी सिद्दिके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) की मुहब्बत दिल मे हो वरना बराए नाम मुहब्बते अली किसी काम की नही। —

पाँच चिजे

एक दिन हजरत अली (रदी अल्लाहु अन्हु) ने हजरत सिद्दीक अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) से पुछा जनाब यह तो फरमाइए आप इतने बड़े मर्तबे को किन बातो से पहुंच गये।
“सिद्दीक अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) ने फरमाया पांच बातों से –
(1)- मैने लोगो को दो तरह के पाया। एक वह जो दुनियां के तलब मे लगे रहते है। दुसरा वह जो आखीरत के तलब मे लगे रहते है। मैने मौला की तलब मे कोशीश की है।,
(2)-मै जबसे इस्लाम मे आया हुं। कभी दुनिया का खाना पेट भरकर नही खाया।क्योंकी इरफाने हक (हक पसंदी) की लज्जत ने मुझे इस दुनिया के खाने से बेनियाज कर दिया।,
(3)-जब से इस्लाम मे आया हुं।कभी सैर होकर पानी नही पिया । क्योंकी मुहब्बते इलाही के पानी सैराब। हो चुका हुं।,
(4)-जब भी मुझे दुनियां व आखिरत के दो काम पेश आये तो मैने उखरवी काम को मुकद्दम (आखिरत के अमल को तरजीह) किया और दुनियांवी काम की कुछ परवाह किये बेगैर उखरवी काम ही को एख्तेयार किया।,
(5)-मै हुजूर ﷺ की सोहबत मे रहा। मेरी यह सोहबत हुजूर ﷺ के साथ बड़ी अच्छी रही।
{नुजहतुल मजालिस, जिल्द-2, सफा-304,}

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हजरत सिद्दिक अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) उम्मत मे सबसे बड़े तालीबे मौला है। (अल्लाह की तलब) आरिफे कामील, मुहिब्बे हक (अल्लाह की मुहब्बत मे) मुत्तकी (तकवे वाले परहेजगार) और रसुलुल्लाह ﷺ के सहाबी है।

आसमान के तारे

एक रात आसमान साफ था और सितारे चमक रहे थे। हुजूर सरवरे कयेनात दो आलम ﷺ हजरत उम्मुल मोमीनीन हजरत आइशा सिद्दीका (रदी अल्लाहु अन्हा) ने आसमान की तरफ देखकर हुजूर ﷺ से दर्याफत फरमाया :
“या रसुलल्लाह ﷺ जितने आसमान के तारे है ईतनी किसी की नेकींया भी है।??
हुजूर ﷺ ने फरमाया हां! हजरत आइशा ने अर्ज किया किसकी ??
हुजूर ﷺ ने फरमाया उमर की। आइशा (रदी अल्लाहु अन्हा) का ख्याल था की सिद्दीके अकबर का नाम लेंगे मगर हजरत उमर का नाम सुनकर हजरत आइशा (रदी अल्लाहु अन्हा) ने अर्ज किया :-
या रसुलल्लाह! ﷺ मेरे वालीद की नेकीयां किधर गयी??
हुजूर ﷺ ने फरमाया : आइशा उमर की सब नाकीयां अबु-बक्र की नेकीयों मे से एक नेकी के बराबर है।
{मिश्कात शरिफ, सफा-552}

सबक ।
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सिद्दीके अकबर (रदी अल्लाहु अन्हु) की बहुत बड़ी शान है। नबीयो के बाद सबसे बड़ी मर्तबा आप ही का है। आप जो शबे हिजरत हुजूर ﷺ के साथ मे रहे उस एक ही नेकी का इतना बड़ा दर्जा है। की आसमान के तारो के बराबर नाकीयां भी उस एक नेकी के बराबर नही हो सकती। —

शागीर्द या उस्ताद

हजरत ईसा अलैहीस्सलाम जब चलने फिरने लगे तो मरयम आपको उस्ताद के पास ले गयी। कहा की इस बच्चे को पढ़ाइये। उस्ताद ने हजरत ईसा अलैहीस्सलाम से कहा! ऐ ईसा! पढ़ “बिस्मिल्लाह” हजरत ईसा अलैहीस्सलाम ने फरमाया “बिस्मिल्लाह हिर्रहमान निर्राहमानिर्रहीम”। उस्ताद ने कहा अलीफ, बे, जीम, दाल,। हजरत ईसा अलैहीस्सलाम ने फरमाया । क्या तुम जानते हो इन हुरूफो के मायने क्या है।?
उस्ताद ने कहा इन हुरूफो के मायने तो मै नही जानता।
फरमाया :तो मुझसे सुन लो।
“अलीफ से मुराद “अल्लाह”
“बे से मुराद “अल्लाह की बहजत”।
“जीम से मुराद है। “अल्लाह का जलाल” और
“दाल से मुराद है। “अल्लाह का दिन”
उस्ताद ने हजरत मरयम (रजी अल्लाहु अन्हा) से कहा: की आप इस बच्चे को वापस ले जाये। यह किसी उस्ताद का मोहताज नही। भला मै इसे क्या पढ़ा सकता हुं। जबकी यह खुद मुझे पढ़ा सकता है।
{नुजहतुल मजालिस जिल्द-2, सफा-432}

सबक ।
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नबी किसी दुनियावी उस्ताद के मोहताज नही होते। उसका उस्ताद व मुअल्लिम खुदा होता है। नबी ऐसे उलुम का चश्मा होता है।जिनसे दुसरे लोग बे-खबर होते है।

युसूफ अलैहीस्सलाम और आईना

हजरत युसूफ अलैहीस्सलाम का एक दोस्त आपसे मुलाकात करने आया। हजरत युसूफ अलैहीस्सलाम उससा फरमाया भाई दोस्त दोस्त के पास आया है तो उसके लिए कोई तोहफा लाता है। बताओ तुम मेरे लिए क्या लाए हो??
दोस्त ने जवाब दिया इस वक्त दुनिया मे आपसे बढ़कर कोइ और हसीन व जमील चीज है ही नही जो मै आपके लिए लाता । ईसलिए मै तो आपकी खिदमत मे आप ही को लाया हुं। युसुफ के लिए तोहफा भी युसूफ ही लाया हुं। यह कहकर एक आईना युसूफ अलैहीस्सलाम के सामने रख दिया । कहा लिजीए इसमे अपने हुश्न व जमाल का नजारा किजीए इससे बढ़कर और क्या तोहफा होगा?
{मसनवी शरिफ}

सबक ।
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इंसान को चाहिए के वह अपना दिल मिस्ल आईने के साफ व शफ्फाफ बना ले। कल जब खुदा पुछे की मारे लिए क्या लाये हो तो यही दिल हाजीर कर दे और अर्ज करे कि इलाही यह दिल लाया हुं जिसमे तेरे ही जलवे है।

मां कि ममता

हजरत दाऊद अलैहीस्सलाम के जमाने मे दो औरतें थीं। दोनो की गोद मे दो बेटे थे । वह दोनो कही जा रहे थे। कि रास्ते मे एक भेड़ीया आया। एक बच्चा उठा ले गया और वह औरत जिसका बच्चा भेड़ीया उठाकर ले गया था, दुसरी औरत के बच्चे को छिनकर बोली की यह बच्चा मेरा है। भेड़ीया तेरे बच्चे को उठाकर ले गया है। दोनो झगड़ा बढ़ गया तो दोनो हजरत दाऊद अलैहीस्सलाम की अदालत मे हाजीर हुई। हजरत दाऊद अलैहीस्सलाम ने वह बच्चा बड़ी औरत को दिला दिया। हजरत सुलैमान अलैहीस्सलाम को जब इस बात की खबर हुई तो आपने फरमाया अब्बाजान एक फैसला मेरा भी है। वह यह है की छुरी मंगवाई जाये मै इस बच्चे को दो टुकड़े करता हुं और आधा बड़ी को और आधा छोटी को दे देता हुं यह फैसला सुनकर बड़ी खामोश रही और छोटी बोली की हुजूर आप बच्चा बड़ी को ही दे दे। लेकीन खुदारा बच्चे को टुकड़े न कीजीए। हजरत सुलैमान अलैहीस्सलाम ने फरमाया बच्चा ईसी छोटी का है जिसके दिल मे सफकते मादरी पैदा हो गयी चुनांचे वह बच्चा छोटी को दे दिया गया।
{फत्हुल-बारी जुज-12, सफा-268, मिश्कत शरिफ, सफा-500,}

सबक ।
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इज्तिहाद के साथ बड़े बड़े मुश्किल मसाइल हल हो जाते है।

तुफाने के बाद

कौमे आद बड़ी जबरदस्त कुम थी जो ईलाका यमन के एक रेगीस्तान अहकाफ मे रहती थी। उन लोगो ने जमीन को बदकारियों से भर दिया था। अपने जौर व कुव्वत के घमन्ड मे दुनिया की दुसरी कौमो को अपनी जफाकारियों से पमाल कर डाला था। यह लोग पुत-परास्त थे अल्लेह तआला ने उनकी हिदायत के लिए हजरत हुद अलैहीस्सलाम को मबऊस फरमाया । आपने उनको दर्शे तौहीद दिया और जौर व सितम से रोका तो वह लोग आपके मुनकिर और मुखालिफ हो गयें । कहने लगे आज हमसे ज्यादा जोर आवर कौन है। ??
कुछ लोग हजरत हुद अलैहीस्सलाम पर ईमान लाये । मगर वह बहुत थोड़े थे। उस कौम ने जब हद से ज्यदा बगावत व शकावत का मुजाहिरा किया और अल्लाह के पैगम्बर की मुखालिफत की तो एक काले रंग का अब्र आया और कौमे आद पर छा गया। वह लोग देखकल खुश हुए की पानी की पानी की जरुरत है। इसमे पानी खुब बरसेगा। मगर उसमे एक हवा चली वह इस शिद्दत से चली की उंट और आदमी को उड़ा कर कही से कही ले जाती थी। यह देखकर वह लोग घरो मे दाखील हुए और अपने दरवाजे बन्द कर लिए । मगर हवा की तेजी से न बच सके । उसने दरवाजे भी उखाड़ दिये उन लोगो को हलाक भी कर दिया। फिर कुदरते एलाही से कुछ काले रंग के परिन्दे आये और उनकी लाशो को समुंद्र मे उठाकर फेक आये। हजरत हुद अलैहीस्सलाम अपने चन्द मोमीनो को लेकर कौम से जुदा हो गये थे। इस लिए वह सलामत रहे।
{कुरआन करीम, पारा-8, रुकू-18, खजाइनुल इरफान-231, रुहुल ब्यान, सफा-237}

सबक ।
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खुदा से बगवत और उसके रसुल की ना फरमानी का एक नतीजा यह भी है की अनासिरे अरबआ यानी मिट्टी आग पानी और हवा भी हमारे लिए अजाब बन जाते है —

बनी-ईसराइल की गुमराही

बनी-ईसराइल ने हजरत मुसा अलैहीस्सलाम के साथ फिरऔन से नजात पाई। दरिया को पार करके जब पार हो गये तो उनका गुजर एक बुत-परस्त कौम पर हुआ जो बुतो के आगे आसन मारे बैठे थे। उन बुतो की पुजा कर रहे थे। यह बुत गाय की शक्ल के थें। बनी-ईसराइल ने हजरत मुसा अलैहीस्सलाम से कहने लगे की ऐ मुसा! जिस तरह इन लोगो के लिए इतने खुदा है। उसी तरह हमे भी आप एक खुदा बना दे। ने हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने फरमाया जाहीलो यह क्या बकने लगे। यह बुत-परस्त तो बर्बादी व हलाकत के हाल मे है। और जो कुछ कर रहे है। बिलकुल बातील है। क्या मै एक अल्लाह के सिवा कोई दुसरा खुदा तुम्हारे लिए तलाश करू??
{कुरआन करीम पारा-9, रुकु-7,}

सबक ।
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खुदा तआला की ईतनी मेहरबानीयो के बा-वजुद जो उसे भुल जाये और बुतों के आगे झुकने पर आमादा हो जाये उनकी गुमराही व जहालत मे क्या कलाम है।??

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और एक बुढ़िया

हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम दरिया पार करने के लिए जब दरिया के पास पहुँचे तो सवारी के मुँह अल्लाह ने फेर दिये की खुद बा खुद वासस पलट आये।तो मूसा अलैहिस्सलाम ने अर्ज़ किया की :- या ईलाही! यह क्या हाल है?
इरशाद हुआ ” तुम क़ब्रे युसूफ के पास हो। उनका जिसमे मुबारक अपने साथ ले लो। मूसा अलैहिस्सलाम को क़ब्र का पता मालूम न था। फ़रमाया क्या तुममे कोई जनता है?
शायद बानी इस्राईल की बुढ़िया को मालूम हो। उसके पास आदमी भेजा की तुझे युसूफ अलैहिस्सलाम की क़ब्र मालूम है? उसने कहा हाँ! मालूम है। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने फरमाया : तो मुझे बता दे। वह बोली: खुदा की क़सम मै न बताउंगी जब तक की जो कुछ मै आपसे मांगू आप मुझे अता न फ़रमाये। मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया तेरी अर्ज़ क़ुबूल है मांग क्या मांगती है?
वह बुढ़िया ने बोली तो हुज़ूर से मैं मांगती हूं की जन्नत में आपके साथ रहूँ उस दर्जे में जिसमें आप होंगे। मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया जन्नत मांग ले यानि तुझे यही काफी है इतना बढ़ा सवाल न कर। बुढ़िया खुद बोली ख़ुदा की क़सम ! मैं न मानूँगी मगर यही की आपके साथ रहूं । मूसा अलैहिस्सलाम उससे यही रद्द वा बदल करते रहे। अल्लाह ने वहय भेजी। मूसा वह जो मांग रही है तुम उसे वही अता कर दो की इसमें तुम्हारा कोई नुक़सान नहीं। चुनाचें:- मूसा अलैहिस्सलाम ने जन्नत में अपने रिफ़ाक़त उसे अता फरमा दी। उसने युसूफ़ अलैहिस्सलाम की क़ब्र बता दी। मूसा अलैहिस्सलाम जनाज़ा मुबारक को साथ लेकर दरिया पार फरमा गये।
{तबरानी शरीफ़, अल-अम्न वल-उला, सफ़ा 229}

सबक।
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हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने उस बुढ़ीया को न सिर्फ जन्नत ही बल्कि जन्नत मे अपनी रिफाकत भी दे-दी ।
मालुम हुआ की खुदा के मकबुलो को जन्नत पर ईख्तीयार हासील है। फिर जो मकबुलो और रसुलो के सरदार हुजुरे अक्दस ﷺ को बे ईख्तेयार कहे बड़ा ही बे-खबर और जाहील है।

नमकहराम गुलाम

एक मर्तबा हजरत जिब्रइल अलैहीस्सलाम फिरऔन के पास एक सवाल लाये। जिसका मजमुन यह था की बादशाह का क्या हुक्म है। ऐसे गुलाम के हक मे जिसने एक शख्स के माल व नेमत मे परवरिश पाई फिर उसी के नाशुक्री की और उसके हक मे मुन्कीर हो गया और अपने आप मौला होने का दावेदार हो गया।
ईस पर फिरऔन ने जवाब लिखा की जो नमकहराम गुलाम अपने आका की नेमतो का इन्कार करे और उसके मुकाबील आये उसकी यह सजा है की उसको दरिया मे डुबो दिया जाए।
चुनांचे:- फिरऔन जब खुद दरिया मे डुबने लगा तो हजरत जिब्रइल अलैहीस्सलाम ने उसका वही फतवा उसके सामने पेश कर दिया और उसको उसने पहचान लिया।।
{खजाइनुल ईरफान, सफा-611}

सबक ।
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इंसान अगर अपने गुलाम की ना-फरमानी पर गुस्सा मे आ जाता है और उसे सजा देता है। तो फिर वह खुद भी अगर अपने मालीके हकीकी का ना-फरमान होगा तो सजा भुगतने को तैयार रहे।

फिरऔन की हलाकत (मौत)

हजरत मुसा अलैहीस्सलाम और फिरऔनीयो के ईमान न लाने से मायुस हो गये। तो आपने उनकी हलाकत की दुआ की और कहा :-
“ऐ हमारे रब! उनके माल बर्बाद कर दे और उनके दिल सख्त कर दे की ईमान न लाये जब तक दर्दनाक अजाब ना देख ले।”
हजरत मुसा अलैहीस्सलाम की ये दुआ कुबुल हुई। खुदा ने उन्हे हुक्म दिया की वह बनी ईसराइल को लेकर रातो रात शहर से निकल जाए।
चुनांचे:- हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने अपनी कौम को निकल चलने का हुक्म फरमाया और बनी ईसराइल के औरते फिरऔनी औरते के पास गयी और कहने लगी हमे एक मेले मे शरीक होना है। वहां पहनकर जाने के लिये हमे उधार के तौर पर अपने जेवर दे-दो। चुनांचे फिरऔनी औरतो ने अपने अपने जेवर उन बनी ईसराइल की औरतो को दे दिये। फिर सब बनी ईसराइली औरतो और बच्चो समेत हजरत मुसा अलैहीस्सलाम के साथ रातो रात ही निकल गये। उन सब मर्द औरतो छोटो बड़ो की तदाद 6 लाख थी।
फिरऔन को जब इस बात की खबर पहुंची तो वह भी रातो रात ही पिछा करने के लिये तैयार हो गया। अपनी सारी कौम को लेकर बनी ईसराइल के पिछे निकल पड़ा। फिरऔनीयो की तदाद बनी ईसराइल से दो गुनी थी। सुबह होते ही फिरऔन के लश्कर ने बनी ईसराइल को पा लिया। बनी ईसराइल ने देखा की पिछे फिरऔन लश्कर के साथ आ रहा है। आगे दरिया भी आ गया है। उन्होने हजरत मुसा अलैहीस्सलाम से अर्ज किया तो हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने अपना असाए मुबारक दरिया पर मारा तो दरिया कट गया और उसमे 12 रास्ते जाहीर हो गये। बनी ईसराइल उन रास्तो से दरिया पार कर गये। जब फिरऔनी लश्कर दरिया के किनारे पहुचे तो वह भी दरिया पार करने के लिये उन रास्तो पर चल पड़े जब फिरऔन और उसका सारा लश्कर बारह रास्तो मे दाखील हो गया तो खुदा ने दरिया को हुक्म दिया की वह मिल जाये। उन सब को डुबो दे। दरिया फौरन मिल गया और फिरऔन अपने अजीम लश्कर के समेत दरिया मे गर्क हो गया।
{कुरआन करीम, पारा-11, रुकु-14, रूहुल ब्यान जिल्द-1, सफा-761}

सबक ।
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हद से ज्यादा कुफ्र व सरकशी का अंजाम बेहद हौलनाक होता है। और इसे दुनिया मे भी हलाकत व बर्बादी का सामना करना पड़ता है।

खुन ही खुन

हजरत मुसा अलैहीस्सलाम की बददुआ से फिरऔनीयो पर जुओ मेंढ़कों का अजाब नाजील हुआ। फिर आपकी दुआ से वह अजाब रफा हो गया। मगर फिरऔनी फिर भी ईमान न लाये । और कुफ्र पर कायम रहे। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने फिर बददुआ फरमायी तो तमाम कुंओ का पानी नहरो और चश्मो का पानी दरियाए निल का पानी गर्ज हर पानी उनके लिए ताजा खुन बन गया। वह ऐस नयी मुसीबत से बहुत परिशान हुए। जो भी पानी उठाते उनके लिए खुन बन जाता। कुदरते खुदा का करिश्मा देखीये की बनी ईसराइल के लिए पानी पानी ही था मगर फिरऔनीयों के लिए हर पानी खुन बन गया था। आखीर तन्ग आकर फिरऔनीयों ने बनी ईसराइल के साथ मिलकर एक ही बर्तन से पानी लेने का ईरादा किया तो जब बनी ईसराइल पानी निकालते तो पानी निकलता। जब फिरऔनी निकालते तो उसी बर्तन से खुन निकलता था। यहाँ तक की फिरऔनी औरते प्यास तन्ग आकर बनी ईसराइल की औरते के पास आई और उन से पानी माँगा तो वह पानी बर्तन मे आते ही खुन हो गया। तो फिरऔनी औरते कहने लगी की तु पानी अपने मुंह म लेकर मेरे मुंह मे कुल्ली कर दे । जब तक वह पानी बनी ईसराइल की औरतो के मुंह मे रहा पानी था और जब और जब फिरऔनी औरते के मुंह मे पहुंचा खुन हो गया।

फिरऔन खुद प्यास से लाचार हुआ तो उसने दरख्तो की रतुबत चुसी। वह रतुबत मुंह मे पहुंचते ही खुन बन गयी। इस कहरे ईलाहीषसे आजीज आकर फिरऔनीयो ने फिर हजरत मुसा अलैहीस्सलाम से इल्तेजा की कि एक मर्तबा और दुआ किजीये और इस अजाब को भी टालीये। फिर हम यकीनन ईमान ले आयेंगे।
चुनांचे :- हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने दुआ फरमायी और उन पर से यह अजाब भी रफा हो गया। मगर वह बेईमान फिर भी अपने अहद पर कायम न रहे।।
{कुरआन करीम, पारा-9, रूकु-6, खजाइनुल इरफान,सफा-240, रुहुल ब्यान, जिल्द-1, सफा-460}

सबक ।
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खुदा तआला अपने ना-फरमान बन्दो को बार-बार मोहलत देता है। ताकी वह संभल जायें मगर कुफ्र आशना बन्दे इस मोहलत से फायदा नही उठाते और बदस्तुर अपने कुफ्र पर कायभ रहते है। और नुकशान उठाते है।

जुएं और मेढ़क

हजरत मुसा अलैहीस्सलाम की बददुआ से फिरऔनीयो पर टिड्डी दल का अजाब आ गया । वह फिरऔनीयों की सब खेती दरख्त फल और घरो के दरवाजे और छाते तक खा गयी। फिरऔनीयो ने अजीज आकर हजरत मुसा अलैहीस्सलाम से यह अजाब टल जाने की इल्तीजा की और हजरत मुसा अलैहीस्सलाम पर इमान लाने का वादा किया। ने दुआ और आपकी दुआ से यह अजाब टल गया। मगर फिरऔनी अपने अहद पर कायम न रह सके और ईमान न लाये। ईस पर हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने फिर बददुआ फरमायी और फिरऔनीयो पर जुंओ का अजाब नाजील हो गया । यह जुंए फिरऔनीयों के कपड़ोमे घुसकर उनके जिस्मो को काटती। उनके खाने मे भर जाती थीं। घुन के शक्ल मे उनके गेंहु की बोरीयों फैल फैलकर उनके गेहुं को तबाह करने लगीं अगर कोई 10 बोरी गेहुं को चक्की पर ले जाता तो 3 सेर वापस लाता। फिरऔनीयों के जिस्मो पर इस कसरत से चलने लगी की उनके बाल भवें पलके चाटकर जिस्म पर चेचक की तरह दाग कर दियें। उन्हे सोना दुसवार कर दिया। यह मुसीबत देखकर उन्होने हजरत मुसा अलैहीस्सलाम से बला टल जाने की इल्तेजा की और ईमान लाने का वादा किया हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने दुआ की और यह भी बला टल गई। मगर वह काफीर अपने अहद पर कायम न रह सके और कुफ्र से बाज न आये। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने फिर उनके लिए बददुआ की तो अल्लाह तआला ने उन पर मेंढ़को का अजाब नाजील किया। हाल यह हुआ की आदमी बैठता थे तो उसकी गोद मे मेंढ़क भर जाते थे। बात करने के लिये मुंह खोलता तो मेंढ़क कुदकर मुंह मे पहुंचता। हांडीयो मे मेंढ़क खानो मे मेंढ़क और चुल्हो मे मेंढ़क भर जाते थे।आग बुछ जाती थी। लेटते तो मेंढ़क उपर सवार होते थें। इस मुसीबत से फिरऔनी रो पड़े । हजरत मुसा अलैहीस्सलाम से अर्ज किया की अबकी बार हम अपनी अहद पर कायम रहेंगें और पक्की तौबा करते है। हम पर से मुसीबत टल जाये। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने फिर दुआ फरमायी और यह अजाब भी रफा हो गया। मगर तमाशा देखीये वह कफीर फिर भी अपने अहद पर कायम न रहे और अपने कुफ्र पर बदस्तुर डटे रहे।।
{कुरआन करीम, पारा-9, रुकु-6, खजाइनुल इरफान, सफा-240, रुहुल ब्यान, जिल्द-1, सफा-760,}

सबक ।
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कफीरो के वायदे का कोई एतेबार नही। बार-बार अहद शिकनी करना काफीरो का काम है।

टिड्डी दल

फिरऔन के कौम ने हजरत मुसा अलैहीस्सलाम को सताया तो मुसा अलैहीस्सलाम की बददुआ से उन पर पानी का अजाब आ गया जिससे वह बुरी तरह घबरा गये। फिर हजरत मुसा अलैहीस्सलाम से ही इल्तिजा करने लगे की इस अजाब को टल जाने की दुआ किजीए। हम आप पर इमान ले आयेंगे । हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने दुआ फरमायी तो पानी का अजाब टल गया। और वह पानी रहमत के शक्ल मे तबदील होकर जमीन की सरसब्जी व शदाबी का सबब बन गया। खेतीयाँ खुब हुइ। दरख्त खुब फले। इस तरह के सरसब्जी पहले कभी न देखी। फिरऔनी कहने लगे यह पानी तो नेमत था। हमे मुसा पे इमान लाने की क्या हाजत है।??
चुनांचे – वह मगरूर अपने अहद से फिर गये। तो मुसा अलैहीस्सलाम ने फिर उनके लिए बददुआ फरमाई । और एक महीने अफीयात से गुजर जाने के बाद अल्लाह ने फिर उन पर टिड्डियां भेज दी। जो खेतीयां और दरख्तो के फल हत्ता के फिरऔनीयों के दरवाजे और छतें भी खा गइ। कुदरते हक का करिश्मा देखीये कि टिड्डियां फिरऔनियों के घरो मे तो घुस आई मगर बनी इसराइल के घरो मे मुतलक न गई । तन्ग आकर उन मगरूरो ने हजरत मुसा अलैहीस्सलाम से फिर इस अजाब के टल जाने की ईल्तेजा की और वादा किया की यह बला टल जाये तो हम जरूर ईमान ले आयेंगे। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने दुआ फरमाई और टिड्डी का अजाब भी दुर हो गया। मगर कफीरो का कुफ्र बदस्तुर रहा। और वह अपने अहद से फिर गये।
(कुरआन करीम, पारा-9, रुकू-6, खजाइनुल, सफा-229, रूहुल ब्यान, जिल्द-1, सफा-760,)

सबक ।
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ईंसान की हद से ज्यदा सरकशी पर अल्लाह तआला किसी कमजोर मखलूक से उसे तबाह कर देता है। गाफील ईंसान मुसीबत के वक्त तो अल्लाह तआला की तरफ रुजू का अहद कर लेता है। मगर मुश्किल रफा हो जाने के बाद फिर वही चाल बे-ढ़न्गी ईख्तियार कर लेते है। यह बात बड़ी खतरनाक है।

पानी का अजाब

हजरत मुसा अलैहीस्सलाम के असाए मुबारक का अजदहा बन जाना देखकर फिरऔन के खुशनसीब जादुगर हजरत मुसा अलैहीस्सलाम पर इमान ले आये । लेकीन फिरऔन और उसकी सरकश कौम अपने कुफ्र से बाज न आई। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने यह सरकशी देखकर उसके हक मे बद्दुआ फरमा दी और अर्ज किया की :-

इलाही फिरऔन बहुत सरकश हो गया है। इसकी कौम भी अहद शिकन और मगरूर हो गयी है। उन्हे ऐसे अजाब मे गिरफ्तार कर जो इनके लिए सजा हो।और मेरे कौम और बाद वालो के लिए इबरत।

हजरत मुसा अलैहीस्सलाम की यह दुआ कबुल हो गइ। अल्लाह ने फिरऔनीयो पर एक तुफान भेजा। अब्र आया, अंधेरा छा गया। कसरत से बारिश होने लगी। फिरऔनीयो के घरो मे पानी उनके गर्दन तक आ गया। उनमे जो बैठा डुब गया। न हिल सकते थे, न कुछ कर सकते थे। हफ्ते से हफ्ते तक सात रोज तक इसी मुसीबत मे मुबतला रहे। कदरते खुदावंदी का करिशमा देखीये कि बावजुद इसके बनी इसराइल के घर उन फिरऔनीयो के घर से मिले हुए थे मगर बनी इसराइल के घरो मे पानी न आया। जब यह लोग अजीजी हुए तो हजरत मुसा अलैहीस्सलाम से अर्ज किया की हमारे लिए मुसीबत टल जाने की अपने रब से दुआ फरमाइये। यह मुसीबत टल गई तो हम आप पर ईमान ले आयेंगे।

चुनांचे हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने दुआ फरमाई तो तुफान की मुसीबत रफा हो गई।।
{कुरआन करीम, पारा-9, रूकू-6, खजाइनुल इरफान, सफा-239, रूहुल ब्यान, जिल्द-1, सफा-768}

सबक ।
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यह पानी जो हमारे लिए मोजिबे हयात है। जब अजाबे इलाही बनकर आ जाये तो हमारी जानो और मालो के लिए तबाही का सबब बन जाता है। पानी का इस तरह का सैलाब हमारे अपने आमाले बद का नतीजा होता है। यह भी मालुम हुआ की खुदा के मकबुल और प्यारो की दुआ से बड़े बड़े अजाब टल जाते है।

जादुगरों की शिकस्त (हार)

हजरत मुसा अलैहीस्सलाम के असा का सांप बन जाना फिरऔन के लिए बड़ी मुश्किल का बाइस हुआ। वह घबरा गया। फिरऔन के दरबारी फिरऔन से कहने लगे की मुसा कही से जादु सिखकर आया है। अब तुम भी अपनी सारे ममलिकत से जादुगरो को जमा करो और उनको मुसा के मुकाबले मे लाओ।

फिरऔन ने अपने आदमी सारे ममलिकत मे भेज दिये। वह हर मकाम से जादुगरो को जमा करके ले आये। जब हजारो की तदाद मे जादुगर जमा हो गये तो फिरऔन न हजरत मुसा अलैहीस्सलाम को उन जादुगरो से मुकाबला करने का चालेंज दिया हजरत मुसा अलैहीस्सलाम को वह चालेंज कुबुल कर लिया। फिरऔन ने पुछा : कौन सा दिन होगा?? आप ने फरमाया तुम्हारे मेले के दिन मुकर्रर करता हुं।यह फिरऔनीयो का एक ऐसा दिन था जिस दिन वह जिनते करके दुर दुर से जमा होते थे। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने यह दिन इस लिए मुकर्रर फरमाया की यह रोज उसकी गायत शौकत का दिन था। इस दिन का मुकर्रर करना सब लोगो पर हक वाजेह (जाहीर) कर देने के लिए था।

चुनांचे जब वह दिन आया तो हजारो जादुगर मकामे मुकर्रर पर पहुच गयें। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम भी तशरिफ ले आये। हजारो के इस भीड़ से उन जादुगरो ने अपनी अपनी रस्सियां और लाठीया डाल दी। जब लठीया डाली तो वह सब के सब सांप बन गयी और दौड़ने लगी। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने देखा की जमीन सांपो से भर गयी है। और मेले के मैदान मे सांप ही सांप दौड़ रहे है। यह हैबतनाक मंजर देखकर लोग हैरान रह गये ईतने मे हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने भी अपना असा डाल दिया तो वह एक अजीब व गरीब अजदहा बन गया। जादुगरो की तमाम सहरकारीयों को एक एक करके निगलने लगा तमाम रस्सियां और लाठीयां जो उन्होने जमा की थी और जो सांप बनकर फिर रही थी और जो तीन सौ ऊंटो का बोझ थी सबका खात्माकर दिया। जब हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने उसे दस्ते मुबारक मे लिया । पहले की तरह वह फिर असा बन गया। उसकी मोटाइ और वजन अपने हाल पर रहा । यह देखकर जादुगरों ने पहचान लिया की यह असाए मुसा सेहर (जादु) नही है। कुदरते बशरी (इंसानी) ऐसा करिश्मा नही दिखा सकती । जरूर यह अम्रे आसमानी है। यह बात समझकर वह सब कहते हुए सज्दे मे गिर गये और इमान ले आये।
{कुरआन करीम, पारा-9, रुकु-4, खजाइनुल इरफान सफा-237}

सबक ।
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सारी खुदाइ एक तरफ फज्ले इलाही एक तरफ के मुताबीक सारी दुनिया मुकाबले को आ जाये मगर फतह व नुसरत उसी तरफ होगी जिसकी तरफ ताइदे हक होगी बातील को कभी फरोग (तरक्की) न होगा।।

अजदहा का हमला

हजरत मुसा अलैहीस्सलाम शर्फ नुबुव्वत से मुशार्रफ होकर जब फिरऔन के पास पहुंचे तो उससे फरमाया की ऐ फिरऔन! मै अल्लाह का रसुल हुं। और हक व सदाकत का अलमबर्दार हुं। दावा-ए-खुदाई को छोड़ और एक अल्लाह का इबदत करने वाला बन । फिरऔन ने कहा: तुम अल्लाह के रसुल हो तो कोइ निशानी दिखाओ। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने फरमाया : तो लो देखो । आपने असा मुबारक जमीन पर डाल दिया। जब आपने वह असा जमीन पर डाला तो वह एक बड़ा अजदहा बन गया। जर्द रंग मुंह खोले हुए जमीन से एक मिल उचा, अपनी दुम पर खड़ा हो गया । वह एक जबड़ा उसने जमीन पर रखा और एक शाही महल के दिवार पर फिर उसने फिरऔन की तरफ मुंह किया तो फिरऔन तख्त। से कुद कर भागा । लोगो की तरफ रुख किया तो ऐसी भगदड़ पड़ी की हजारो आदमी कुचल कर मर गये। फिरऔन घर मे जाकर चीखने लगा । कहने लगा: ऐ मुसा! तुम्हे उसकी कसम जिसने तुझे रसुल बनाया इसको पकड़ लो । हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने इसको उठा लिया और वह मिस्ल साबीक असा था । फिरऔन की जान मे जान आयी।।
{खजाइनुल इरफान, सफा-236}

सबक ।
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पैगम्बर बड़ी शान व शौकत और अजीम ताकत का मालीक होता है। बड़े से बड़े बादशाह भी उसका मुकाबला नही कर सकता।

खौफनाक सांप

हजरत मुसा अलैहीस्सलाम के हाथ मे एक असा था। खुदा ने फरमाया: ऐ मुसा: जरा इस असा को जमीन पर डालो। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने उसे जमीन पर डाला तो वह खौफनाक सांप बनकर लहरने लगा। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने यह मंजर देखकर पिठ मोड़ ली। पिछे मुड़कर न देखा।
खुदा ने फरमाया : ऐ मुसा! डरो नही। इसे पकड़ लो, यह फिर वही असा बन जाएगा।
आप ने उस सांप को पकड़ा तो वह फिर से असा बन गया। अल्लाह ने फरमाया तआला ने यह भी एक मोजीजा अता फरमाकर हजरत मुसा अलैहीस्सलाम से फरमाया की अब फिरऔन की तरफ जाओ । उसे डराओ और उसे समझाओ की वह कुफ्र व तुगयानी को छोड़ दे अगर वह मोजीजा तलब करे तो यह असा डाल कर उसे दिखाओ।।
{कुरआन करीम, पारा-16, रूकू-10, पारा-20, रुकू-7}

सबक ।
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अंबीया अलैहीस्सलाम को अल्लाह तआला ने बड़े-बड़े मोजीजात अता फरमाये है। वह ऐसे ऐसे काम कर दिखाते है। जो दुसरे हरगीज नही कर सकते।

दरख्त से अवाज

हजरत मुसा अलैहीस्सलाम हजरत शोएब अलैहीस्सलाम के पास 10 साल तक रहे। फिर हजरत शोएब अलैहीस्सलाम ने अपनी साहबजादी का निकाह हजरत मुसा अलैहीस्सलाम के साथ कर दिया। इतने अरशे के बाद आप हजरत शोएब अलैहीस्सलाम से इजाजत लेकर अपनी वलीदा से मिलने के लिये मिश्र की तरफ रवाना हुए। आपकी बिबी भी साथ थी। रास्ते मे जबकी आप रात के वक्त एक जंगल मे पहुचे तो रास्ता गुम हो गया। अंधेरी रात और सर्दी का मौसम था। उस वक्त आपने जंगल मे दुर एक चमाकती हुई आग देखी और बिवी से फरमाया : तुम यही ठहरो मैने वह दुर आग देखी है। मै वही जाता हुँ। शायद वहां से कुछ खबर मिले। तुम्हारे तापने के लिए कुठ आग ला साकुंगा ।

चुनांचे : आप अपनी बिवी को वही बैठाकर उस आग की तरफ चले और जब उसके पास पहुचे तो वहां एक सरसब्ज व शादाब दरख्त (हरा भरा पेड़) देखा जो उपर से निचे तक निहायत रौशन था। जितना उसके करीब जाते वह दुर हो जाता है। जब ठहर जाते तो वह करीब हो जाता। आप इस नुरानी दरख्त के इस अजीब हाल को देख रहे थे। की उस नुरानी दरख्त से आवाज आइ : ऐ मुसा! मै सारे जहाँ का रब अल्लाह हुं। तुम बड़े पकीजा मकाम पे गये हो । अपने जुते उतार डालो । जो तुझे वहय होती है कान लगा कर सुनो! मै तुम्हे पसन्द कर लिया।
{कुरआन करीम, पारा-16, रुकु-20, रुकु-7, खजाइलनुल इरफान, सफा-442,549}

मदयन का कुंआ

हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने बड़े होकर जब हक का ब्यान और फिरऔन और फिरऔनीयो की गुमराही का ब्यान शुरू किया तो बनी इसराइल के लोग आपकी बात सुनते और आपकी इत्तेबा करते। आप फिरऔनीयो के दीन की मुखालाफत फरमाते। रफ्ता-रफ्ता इस बात का चर्चा हुआ । फिरऔनी जुस्तजु मे हुए। फिर फिरऔन के बावरची का मुसा अलैहीस्सलाम के मुक्का से मारा जाना भी जब उन लोगो को मालूम हुआ तो फिरऔन ने हजरत मुसा अलैहीस्सलाम के कत्ल का हुक्म दिया। लोग हजरत मुसा अलैहीस्सलाम की तलाश मे निकले। फिरऔनियो मे से एक मर्दे नेक हजरत मुसा अलैहीस्सलाम का खैर ख्वाह भी था । वह दौड़ते हुआ आया और हजरत मुसा अलैहीस्सलाम को खबर दी। कहा : आप यहां से कही तशरिफ ले जाए । हजरत मुसा अलैहीस्सलाम उसी हालत मे निकल पड़े और मदयन की तरफ रूख किया।

मदयन वह मकाम है। जहां हजरत शोएब अलैहीस्सलाम तशरिफ रखते थे । यह शहर फिरऔन के हुदुदे सल्तनत से बाहर था। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने उसका रास्ता भी न देखा था न कोइ सवारी साथ थी न कोइ हमराही।

चुनांचे अल्लाह ने एक फरिश्ता भेजा जो आपको मदयन तक ले गया । हजरत शोएब अलैहीस्सलाम इसी शहर मे रहते थे। आपकी दो लड़कीयां थी और बकरिया आपका रोजी रोटी का जरिया ।मदयन मे एक कुआं था। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम पहले उसी कुंए पर पहुचे । आपने देखा की बहुत से लोग उस कुंए मे से पानी खिचते है। और अपने जानवरो को पिला लेते है। हजरत शोएब अलैहीस्सलाम की दोनो लड़कीयां भी अपनी बकरियों को अलग रोक कर वही खड़ी है। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने उन लड़कीयों से पुछा : की तुम अपनी बकरियों को पानी क्यों नही पिलाती??
उन्होने कहा की हमसे डोल खिंचा नही जाता। यह लोग चले जायेगे तो जो पानी हौज मे बच जायेगा वह हम अपनी बकरियों को पिला लेंगें । हजरत मुसा अलैहीस्सलाम को रहम आ गया । पास ही एक दुसरा कुआं था जिस पर एक बहुत बड़ा पत्थर ढका हुआ था और जिसको बहुत से आदमी मिलकर हटाते थे। आपने तन्हा उसको हटा दिया और उस मे से डोल खिचकर उनकी बकरियो को पिला दिया ।
घर जाकर उन दोनो लड़कीयों ने हजरत शोएब अलैहीस्सलाम से कहा अब्बाजान! एक बड़ा नेक और नया मुसाफिर आया है जिसने आज हम पर रहम खाकर हमारी बकरियों को सैराब कर दिया है। हजरत शोएब अलैहीस्सलाम ने एक शहबजादी से फरमाया की जाओ और उस नेक मर्द को मेरे पास बुला लाओ ।
चनांचे बड़ी शहबजादी चेहरे को आस्तीन से ढ़के हुए और जिस्म को छुपाए हुए बड़ी शर्म व हया से चलते हुई हजरत मुसा अलैहीस्सलाम के पास आयी और कहा की मेरे अब्बाजान आपको बुलाते है। ताकी आपको उजरत दे। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम उजरत लेने पर तो राजी न हुए मगर हजरत शोएब अलैहीस्सलाम की ज्यारत और उनकी मुलाकत चे लिए चल पड़े। उन साहबजादी से फरमाया की आप मेरे पिछे रहकर रास्ता बताती जाए।
यह आप ने पर्दे के एहतेराम से फरमाया और इसी तरह तशरिफ लाए।

जब हजरत शोएब अलैहीस्सलाम के पास पहुचे तो शोएब अलैहीस्सलाम से आपने फिरऔन का हाल और अपनी विलादत से लेकर फिरऔन के बावर्ची के मारे जाने तक सारा किस्सा सुनाया ! हजरत शोएब अलैहीस्सलाम ने फरमाया : अब फिक्र न करो । तुम जालिमो से बचकर यहाँ चले आये। अब यहाँ मेरे पास रहो।।
{कुरआन करिम, पारा-20, रूकू-6, खजाइनुल इरफान-548}

सबक।
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♥जालीम और मगरूर हाकीम अल्लाह वालो के पिछे पड़ जाते है। अल्लाह वाले परेशानियां बर्दाश्त फरमा लेते है। मगर इशाअते हक से नही रुकते। अल्लाह तआला अपने उन हक गो बंदो की हिफाजत फरमाता है।

मुसा अलैहीस्सलाम का तमांचा

हजरत मुसा अलैहीस्सलाम के पास जब मलकुल मौत हाजीर हुए तो हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने मलकुल मौत को एक ऐसा तमांचा मारा की मलकुल मौत की आँखे निकल आइ ! मलकुल मौत फौरन वापस पलटे और अल्लाह के हुजूर अर्ज करने लगे :
इलाही! आज तो तुने मुझे एक ऐसे अपने बन्दे की तरफ भेजा है। जो मरना ही नही चाहता । यह देख! की उसने मुझे तमांचा मार कर मेरी आँखे निकाल दी है। खुदा ताअला ने मलकुल-मौत की आँखे दुरुस्त फरमा दी और फरमाया : मेरे बन्दे मुसा के पास फिर जाओ और एक बैल साथ लेते जाओ। मुसा से कहना की अगर तुम और जिना चाहते हो तो इस बैल के पुस्त पर हाथ फेरो । जितना बाल तुम्हारे हाथ के निचे आ जाएगें उतने ही साल जिन्दा रह लेना ।

चुनांचे : मलकुल-मौत बैल लेकर फिर हाजीर हुए और अर्ज करने लगे : हुजूर! इसकी पुस्त पर हाथ फेरीये। जितने बाल आपके हाथ के निचे आ जायेंगे उतना साल आप और जीन्दा रह ले। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने फरमाया फिर इसके बाद तुम आ जाओगे??
अर्ज किया हाँ! तो फरमाया फिर अभी ले चलो।
{मिश्कात शरीफ, सफा-466}

सबक।
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अल्लाह के नबीयो की यह शान है। की चाहे तो मलकुल-मौत को भी तमांचा मार दे। उसकी आँख तक निकाल दे। नबी वह होता है। जो मरना चाहे तो मलकुल-मौत करीब आता है। अगर न मरना चाहे तो मलकुल मौत वापस चले जाते है। हलाकी अवाम की मौत इस शेअर के मिस्दाक होती है। की :-

लाई हयात आए कजा ले चली चले।
अपनी खुशी न आये न अपनी खुशी चले।

मुसा अलैहीस्सलाम का मुक्का

हजरत मुसा अलैहीस्सलाम जब 30 साल के हो गये तो एक दिन फिरऔन के महल से निकल कर शहर मे दाखील हुए। आप दो आदमीयो को आपस मे लड़ते हुए झगड़ते देखे। एक तो फिरऔन का बावरची था और दुसरा हजरत मुसा अलैहीस्सलाम की कौम यानी बनी इसराइल मे से था। फिरऔन का बावरची लकड़ीयो की गट्ठर ऊस दुसरे आदमी पर लाद कर उसे हुक्म दे रहा था की वह फिरऔन के बावरचीखाने तक वह लकड़ीयो को लेकर चले। हजरत मुसा अलैहीस्सलाम ने यह बात देखी तो फिरऔन के के बावरची से फरमाया: इस गरिब आदमी पर जुल्म न कर । लेकीन वह बाज न आया और बदजुबानी पर उतर आया । हजरत मुसा अलैहीस्सलाम उसे एक मुक्का मारा तो उस एक मुक्के से उस फिरऔनी का दम निकल गया और वह वही ढ़ेर हो गया।
(कुरआने करीम पारा 20, रुकू 5, रूहुल ब्यान जिल्द-2, सफ-625)

सबक।
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अंबियाए किराम मजलूमो के हामी बनकर तशरिस लाए है। यह मालुम हुआ की नबी सीराते सुरत और जोर व ताकत मे भी बुलंद व बाला होते है। नबी का मुक्का एक इम्तियाजी मुक्का था की एक ही मुक्का से जालिम का कम तमाम हो गया!!!

हजरत आदम अलैहीस्सलाम और जंगली हिरन

✴ हजरत आदम अलैहीस्सलाम जब जन्नत से जमीन पर तशरिफ लाये तो जमीन के जानवर आपकी ज्यारत को हाजीर होने लगे। हजरत आदम अलैहीस्सलाम हर जानवर के लिए उसके लायक दुआ फरमाते। इसी तरह जंगल के हिरन भी सलाम करने और ज्यारत के नियत से हाजीर हुए। आपने अपना हाथ मुबरक उनकी पुस्तो (पिठो) पर फेरा उनके लिए दुआ फरमाई । तो उनमे नाफ-ए-मुश्क पैदा हो गयी। वह हिरन जब यह खुश्बु का तोहफा लेकर अपने कौम मे वापस आये तो हिरनो के दुसरे गिरोह ने पुछा की यह खुश्बु तुम कहां से लाये?
वह बोले: अल्लाह का पैगम्बर आदम अलैहीस्सलाम जन्नत से जमीन पर तशरिफ लाये है। हम उनकी ज्यारत के लिए हाजीर हुए थे तो उन्होने रहमत भरा अपना हाथ हमारी पुश्तो पर फेरा तो यह खुश्बु पैदा हो गयी। हिरनो का वह दुसरा गिरोह बोला : तो फिर हम सभी जाते है। चुनांचे वह बी गये । हजरत आदम अलैहीस्सलाम ने उनकी पुश्तो पर भी हाथ फेरा मगर उनमे वह खुश्बु पैदा न हुइ । वह वैसे ही वापस आ गये। वापस आकर वह तअज्जुब मे होकर बोले की क्या बात है।? तुम गये तो खुश्बु मिल गई और हम गये तो कुछ न मिला । पहले गिरोह ने जवाब दिया – उसकी वजह यह है की हम गये थे सिर्फ जियारत की नियत से तुम्हारी नियत दुरूस्त न थी।
{नुजहतुल मजालिस, जिल्द-1, सफा-4}

सबक।
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अल्लाह वालो के पास नेक नियत से हाजीर होने मे कुछ मिलता है। मगर किसी बदबख्त को कुछ न मिले तो उसकी नियत क कुसूर होता है। अल्लाह वालो की दैन व अता का कोइ कुसूर नही होता।

शैतान का थूक

अल्लाह ने जब हज़रत आदम अलैहिस्सलाम का पुतला मुबारक तैयार फ़रमाया तो फ़रिश्ते हज़रात आदम अलैहिस्सलाम के इस पुतला मुबारक की ज़ियारत करते थें । मगर शैतान जल भून गया। एक मर्तबा उस मरदूद ने बुग्ज़ व कीने में आकर हज़रते आदम अलैहिस्सलाम के पुतले मुबारक पर थूक दिया। यह थूक हज़रते आदम अलैहिस्सलाम के नाफ मुबारक के मक़ाम पर पड़ी । अल्लाह तआला ने जिब्रइल अलैहिसलाम को हुक्म दिया की इस जगह से उतनी मिटटी निकल कर उस मिटटी का कुत्ता बना दो ।
चुनांचे उस शैतान के थूक से मिली मिटटी का कुत्ता बना दिया गया।
यह कुत्ता आदमी से मानूस इसलिए है की मिटटी हज़रते आदम अलोहिस्सलाम की है और पलीद (गन्दा) इसलिए है की थूक शैतान की है। रात को जहत इसलिए है की हाथ इसमें जिब्राइल अलैहिस्सलाम के लगे हैं।
(रिहूल ब्यान जिल्द 1, सफा 68)

सबक:-
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शैतान के थूक से हज़रते आदम अलैहिस्सलाम का कुछ नहीं बिगड़ा। मगर मक़ामे नाफ़ शिकम (पेट) के लिये वजहे ज़ीनत बन गया।
इसी तरह अल्लाह के बारगाह में गुस्ताख़ी करने से उन अल्लाह वालों का कुछ नहीं बिगाड़ता है बल्कि उनकी शान और भी चमकती है। यह भी मालूम हुआ की अल्लाह वालों को हसद व नफ़रत की निगाह से देखना शैतानी काम है

हजरत आदम अलैहीस्सलाम और शैतान

खुदावंद करीम ने फरिश्तो मे जब ऐलान फरमाया की मै जमीन पर अपना एक खलीफा बनाने वाला हुँ। तो शैतान ने इसका बुरा माना । अपने जी ही जी मे हसद की आग मे जलने लगा।
🔘 चुनांचे-जब खुदा ने हजरत आदम अलैहीस्सलाम को पैदा फरमाकर फरिश्तो को हुक्म दिया की मेरे खलीफा के आगे सज्दे मे झुक जाओ तो सब सज्दे मे झुक गये। मगर शैताश अकड़ा रहा और न झुका। खुदावंद करीम को उसका यह तकब्बुर पसन्द न आया । उससे दरयाफ्त फरमाया :
की अए इबलीस । मैने जफ अपने दस्ते कुदरत से बनाए हुए खलीफा के आगे सज्दा करने का हुक्म दिया तो तुमने क्यो न सज्दा किया ??
शैतान ने जवाब दिया : मै आदम से अच्छा हुं।इसलिए की मै आग से बना हुं और वह मिट्टी से बना है। फिर मै एक बशर को सजदा क्यों करता??
खुदा तआला ने इसका यह तकब्बुर भरा जवाब सुना तो फरमाया-
“मरदुद! निकल जा मेरी बारगाहे रहमत से । जा तु क्यामत तक के लिए मरदुद व मलऊन है।
{सुर: बकर:}

सबक।
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खुदा के रसुल और उसके मकबुलो की इज्जत व ताजीम करने से खुदा खुश होता है। और उनको अपनी मिस्ल बशर समझकर उनकी ताजीम से इन्कार कर देना फेअले शैतानी है । एक पैगम्बरे खुदा को सबसे पहले तहकीरन (हकीर नजर से) बशर कहने वाला शैतान है।

अब्दुल्लाह बिन मुबारक और एक सय्यदजादा

हजरत अब्दुल्लाह बिन मुबारक रहमतुल्लाह अलैहि एक बड़े मजमे के साथ मस्जिद से निकले तो एक सय्यदजादा ने उन से कहा:
“ऐ अब्दुल्लाह यह कैसा मजमा है ? देख भै फरजन्दे रसुल हुँ। और तेरा बाप तो ऐसा न था।
हजरत अब्दुल्लाह बिन मुबारक ने जवाब दिया : मै वह काम करता। हुँ जो तुम्हारे नाना जान किया करते थे और तुम नही करते । और यह भी कहा की बेशक तुम सय्यद हो और तुम्हारे वालीद रसुलुल्लाह ﷺ ही है और मेरा वालीद ऐसा न था मगर तुम्हारे वालीद से इल्म की मिरास बाकी रही। मैने तुम्हारे वालीद की मिरास ली और मै अजीज और बुजुर्ग हो गया। तुमने मेरे वालीद की मिरास ली तुम इज्जत न पा सके।
उसी रात ख्वाब मे हजरत अब्दुल्लाह बिन मुबारक ने हुजूर ﷺ को देखा की आपका चेहराए मुबारक बदला हुआ है। अर्ज किया :
“या रसुलुल्लाह! ﷺ यह रंजीश क्यो है।?
फरमाया : तुमने मेरे एक बेटे पर नुक्ताचीनी की है। अब्दुल्लाह बिन मुबारक जागे और उस सय्यद की तलाश मे निकले ताकी उससे माफी तलब की करे। उधर उन सय्यदजादे ने भी उसी रात को ख्वाब मे हुजूर ﷺ को देखा और उससे फरमाया: की बेटा! अगर तु अच्छा होता तो क्या ऐसा कलीमा कहता।वह सय्यदजादे भी जागे और हजरत अब्दुल्लाह बिन मुबारक की तलाश मे निकले । चुनांचे दोनो की मुलाकात हो गयी और दोनो ने अपने अपने ख्वाब सुनाकर एक दुसरे से माजरत तलब की।
{तजकिरतुल औलीया, सफा-173}

सबक।
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हमारे हुजूर ﷺ उम्मत की हर बात पर शाहीद और हर बात से बाखबर है। यह भी मालुम हुआ की हुजूर ﷺ से निस्बत रखने वाले किसी चीज पर नुक्तचीनी करना हुजूर की नराजगी की वजह है

एक सय्यदजादी और मजूसी

मुल्क समरकंद मे एक बेवा सय्यदजादी रहती थी। उसके चन्द बच्चे भी थे ।
“एक दिन वह अपने भुखे बच्चो को लेकर एक रईस आदमी के पास पहंची और कहा: मै सय्यदजादी हूं मेरे बच्चे भुखे है। इन्हे खाना खिलाओ । वह रईस आदमी जो दौलत के नशे मे चुर और बराए नाम मुस्लमान था, कहने लगा तुम अगर वकाई सय्यदजादी हो तो कोई दालील पेश करो। सय्यदजादी बोली मै एक गरिब बेवा हुं। जबान पर एतेबार करो की सय्यदजादी हुं और दलील कया पेश करू??
वह बोले : मै जुबानी जमा खर्च को नही मानता अगर कोइ दलील है तो पेश करो वरना जाओ। वह सय्यदजादी अपने बच्चे को लेकर वापस चली आई एक माजूसी (पारसी आग पुजने वाले) रइस के पास पहुंची और अपना सारा किस्सा ब्यान किया। वह मजूसी बोला मोहतरमा! अगरचे मै मुस्लमान नही हुं मगर तुम्हारी सयादत की ताजीम व तौकीर व कद्र करता हुं। आओ और मेरे यहां ही क्याम फरमाओ। मै तुम्हारी रोटी और कपड़े का जमीन हुं । यह कहा और उसे अपने यहां ठहराकर उसे और उसके बच्चे को खाना खिलाया और उसकी बड़ी खिदमत की। रात हुई तो वह बराए नाम मुस्लमान रईस सोया और उसने ख्वाब मे हुजूर ﷺ को देखा जो एक बहुत बड़े नुरानी महल के पास तशरीफ फरमा थे। उस रइस आदमी ने पुछा : या रसुलल्लाह: ﷺ यह नुरानी महल किसके लिए है।??
‘हुजूर ﷺ ने फरमाया मुस्लमान के लिए। वह बोला हुजूर मै मुस्लमान हुं। यह मुझे अता फरमा दिजीए।
☆ हुजूर ﷺ ने फरमाया: अगर तु मुस्लमान है तो अपने इस्लाम की कोइ दलील पेश कर। वह रइस यह सुनकर बड़ा घबराया। हुजूर ﷺ ने फिर उससे फरमाया: मेरी बेटी तुम्हारे पास तो तु उससे सयादता की दलील तलब करे और खुद बगैर दलील पेश किये इस महल मे चला जाए, नामुमकिन है। यह सुनकर उसकी आँखे खुल गयी और बड़ा रोया। फिर उस सय्यदजादी की तलाश मे निकला तो उसे पता चला की फला मजूसी के घर क्याम पजीर है। चुनांचे उस मजुसी के पास और कहा एक हजार रूपये ले लो और वह सय्यदजादी मेरे सुपुर्द कर दो।
“मजूसी बोला :: क्या मै वह नुरानी महल एक हजार रूपये मे बेच दुं?? नामुमकीन है। सुन लो! हुजूर ﷺ जो तुम्हे ख्वाब मे मिलकर उस महल से दुर कर गये है। वह मुझे ख्वाब मे मिलकर और कलीमा पढ़ाकर उस महल मे दाखील फरमा गये है। अब मै भी बिबी भी बच्चो समेत मुस्लमान हुँ। मुझे हुजूर बशारत दे गये है की तु अहल व अयाल समेत जन्नती है।
{नुजहतुल मजालिस, जिल्द-2, सफा-64}

सबक।
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दलील तलब करने वाला बराए नाम मुस्लमान भी जन्नत से महरूम रह गया! और निस्बते रसुल का लिहाज करके बगैर दलील के भी ताजीम व अदब करने वाला एक मजूसी भी दौलते ईमान से मुशर्रफ होकर जन्नत पा गया।
मालूम हुवा की अदब व ताजीमे रसूल के बाब मे बात बात पर दलील तलब करने वाला बराए नाम मुस्लमान बदबख्त और महरूम रह जाने वाला है।

फंसा हुवा जहाज

एक मर्दे सालेह को एक काफिर बादशाह ने गिरफ्तार कर लिया वह फरमाते है की उस बादशाह का एक बहुत बड़ा जहाज दरिया मे फंस गया था जो बड़ी कोशीश के बावजूद दरिया से निकल न सका। आखीर एक दिन जिस कदर कैदी थे उनको बुलाया गया। ताकी वह सब मिलकर उस जहाज को निकाले । चुनाँचे उन कैदीयो ने जिनकी तादाद तीन हजार थी, मिलकर कोशीश की। फिर भी वह जहाज निकल न सका। फिर ऊन कैदीयो ने बादशाह से कहा की जिस कदर मुस्लमान कैदी हो उनको कहिये वह यह जहाज को निकाल सकेंगे। लेकीन शर्त यह है की वह जो भी नारा लगाये उन्हे रोका न जाए। बादशाह ने यह बात तस्लिम कर ली। सब मुस्लमान कैदीयो को रिहा करके कहा की तुम अपनी मर्जी के मुताबीक जो नारा लगाना चाहो लगाओ और जहाज को निकालो । वह मर्दे सालेह फरमाते है। को हम सब मुस्लमान कैदीयो की तादाद चार सौ थी। हमने मिलकर नारा-ए-रिसालत लगाया और एक अवाज मे या रसुलल्लाह ﷺ कहा और जहाज को एक धक्का लगाया तो वह जहाज अपनी जगह से हिल गया। फिर हमने नारा लगाते हुए उसे रूकने नही दिया यहां तक उसे बाहर निकाल दिया।
{शवाहिदुल हक, सफा-163}

सबक।
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नारा-ए-रिसालत मुस्लमानो का महबुब नारा है। मुस्लमानो ने इसे हमेशा अपनाए रखा। इस नामे पाक से बड़े बड़े मुश्किल काम हल हो जाते है। फिर जो शख्स इस नारे की मुखालफत करे किस कदर बेखबर है।

अबुल-हसन खरकानी और हदीस का दर्स

हजरत अबुल हसन खरकानी अलैहीर्रहम: के पास एक शख्स इल्मे हदीस पढ़ने के लिए आया और दरयाफ्त किया की आप ने हदीस कहाँ से पढ़ी??
“हजरत ने फरमाया: बराहे रास्त हुजूर ﷺ से । उस शख्स को यकीन न आया । रात को सोया तो सोया तो हुजूर ﷺ ख्वाब मे तशरीफ लाये और फरमाया-
“अबुल हसन सच कहता है।मैने ही उसे पढ़ाया है। सुबह वह हजरत अबुल हसन की खिदमत मे हाजीर हुआऔर हदीस पढ़ने लगा । बाज मकामात पर हजरत अबुल हसन ने फरमाया: यह हदीस हुजूर ﷺ से मरवी नही है। उस शख्स ने पुछा आपको कैसे मालुम??
“फरमाया : तुमने हदीस मुबारक पढ़ना शुरू किया तो मैने अबरूए मुबारक को देखना शुरू किया । मेरी यह आँखे हुजूर ﷺ के चेहराए मुबारक पर है। जब हुजूर ﷺ के चेहरे मुबारक पर शिकन पड़ती है तो मै समझ जाता हूँ की हुजूर ﷺ इस हदीस से ईन्कार फरमा रहे है।
{तजकिरतुल औलीया, सफा 466}

सबक।
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हमारे हुजूर ﷺ जिन्दा है और हाजीर व नाजीर है। यह भी मालुम हुआ की अल्लाह वाले हुजूर ﷺ के दिदारे पुर अनवार से अब भी मुशर्रफ होते है। फिर जो हुजूर ﷺ को जिन्दा न माने वह खुद ही मुर्दा है

जजीरे का कैदी

इब्ने मरजुक ब्यान करते है की जजीरए शकर के एक मुस्लमान को दुश्मन ने कैद कर लिया और उसके हाथ पाँव लोहे की जंजीरो से बाँधकर कैदखाने मे डाल दिया। उस मुस्लमान ने हुजूर (सल्लल्लाहु अलैही व सल्लम) का नाम लेकर फरियाद की । जोर से कहने लगा या रसुलल्लाह! यह नारा सुनकर काफीर बोले : अपने रसुल से कहो तुम्हे इस कैद से छुड़ाने आये । फिर जब रात हुई और आधी रात का वक्त हुआ तो कैदखाने मे कोई शख्स आया और उसने कैदी से कहा : उठो अजान कहो। कैदी ने अजान देना शुरू किया और जब वह इस जुमले “अशहदुअन्न न मुहम्मदर्रसुल्लाह पर पहुचा तो उसकी सब जंजीरे टुट गइ और वह आजाद हो गया । फिर उसके सामने एक बाग जाहीर हो गया । वह उस बाग से होता हुआ बाहर आ गया सुबह उसकी रिहाइ का सारे जजीरे मे चर्चा होने लगा।
{शवाहिदुल हक, सफा-162}

सबक।
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मुस्लमान हुजुर (सल्लल्लाहु अलैही व सल्लम) का नारए रिसालत हमेशा लगते रहे है। इस नारे को मजाच उड़ाना दुशमनाने रिसालत का काम है। मालूम हुआ की हुजूर (सल्लल्लाहु अलैही व सल्लम) का नाम मुश्किल कुशा है की यह नाम लेते ही मुसीबत की कड़ीयां टुट जाती है।

कातील की रिहाई

बगदाद के हाकीम इब्राहीम बिन इस्हाक ने एक रात ख्वाब मे हुजूर अकरम (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) को देखा । हुजूर (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) ने उससे फरमाया कातील को रिहा कर दो। यह हुक्म सुनकर हाकीमे बगदाद कांपता हुआ उठा और मतेहत अमला से पुछा की क्या कोइ ऐसा मुजरिम भी है जो कातील है??
उन्होने बताया की हां! एक शख्स भी है जिस पर कत्ल का इलजाम है। हाकीमे बगदाद ने कहा: उसे मेरे सामने लाओ। चुनांचे उसे लाया गया । हाकीमे बगदाद ने पुछे सच सच बताओ वक्या क्या है।? उस ने सच कहुंगा झुठ हरगीज ना कहुंगा ।

बात यह हुई की हम चन्द आदमी मिलकर एय्यासी व मदमाशी किया करते थे । एक बढ़ी औरत को हमने मुकर्रर कर रखा था जो हर रात किसी बहाने से कोइ न कोइ औरत ले आती थी ।
“एक रात वह एक ऐसी औरत को लाइ जिस ने मेरी दुनीयाँ मे इन्कलाब बरपा कर दिया। –
● बात यह हूई की वह औरत जब हमारे सामने आई तो चिख मारकर बेहोश होकर गिर गई । मैने उसे उठाकर एक दुसरे कमरे मे लाकर उसे होश मे लाने की कोशीश की । जब वह होश मे आ गइ तो उससे चिखने और बेहोश होने की वजह पुछी।
वह बोली:ऐ नौजवान मेरे हक मे अल्लाह से डर। फिर कहती हुँ की अल्लाह से डर । यह बुढ़ीया तो मुझे बहाने से इस जगह ले आई है। देख मै एक शरीफ औरत हुँ। सय्यदा हूँ मेरे नाना रसूलूल्लाह (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) और माँ फातीमा जुहरा है। खबरदार! इस इस निस्बत का लिहाज रखना और मेरी तरफ बद-निगाही से न देखना ।
मै जब उस पाक औरत से, जो सय्यदा थी यह बात सुनी तो, लरज गया और अपने दोस्तो के पास हकीकते हाल से आगाह किया। कहा की अगर आकबत की खैर चाहते हो तो इस मुकर्ररमा मोअज्जमा खातुन की बे अदबी न होने पाये । मेरे दोस्तो ने यह बात से यह समझा की श्याद मै उनको हटाकर खूद तन्हा ही यह गुनाह करना चाहता हुँ। उनसे धोखा कर रहा हुँ।इसी ख्याल से वह मुझसे लड़ने पर आमादा हो गये।
मैने कहा : मै तुम लोग को किसी सुरत मे इस गलत और बुरे काम की ईजाजत न दुँगा। लड़ुंगा मर जाऊंगा मगर इस सय्यदा की तरफ बद-निगाही मंजूर न करूंगा। चुनाँचे वह मुझपर झपट पड़े और मुझे उनके हमले से एक जख्म भी आ गया । बिच मे एक शख्स जो उस सय्यदा के कमरे की तरफ जाना चाहता था, मेरे रोकने पर मुझपर हमलावर हुवा तो मै उस पर छुरी से हमला कर दिया । उसे मार डाला । फिर उस सय्यदा को अपनी हिफाजत मे लेकर बाहर निकला तो शोर मच गये । छुरी मेरे हाथ मे थी। मै पकड़ा गया और यह ब्यान दे रहा हुँ।
हाकीमे बगदाद ने कहा: तुम्हे रसुलुल्लाह (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) के हुक्म से रिहा कीया जाता है।
{हुज्जतुल्लाह अलल-आलमीन, सफ-813}

सबक।
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हमारे हुजूर (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) अपनी उम्मत के हर नेक व बद आदमी और हर नेक व बद अमल को जानते और देखते है।
यह भी मालूम हुआ की हुजुर की निस्बत के लिहाज व अदब से आदमी क अंजाम अच्छा हो जाता है। लिहाजा हर उस चिज का दिल मे अदब व एहतेराम रखना चाहीये जिसका हुजुर (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) से तअल्लुक हो।

शाहे रोम का कैदी

उन्दलुस के एक मर्द सालेह (नेक आदमी) के लड़के को शाह रोम ने कैद कर लिया था । वह मर्द सालेह फरयाद लेकर मदिन मुनव्वरा को चल पड़ा। रस्ते मे एक दोस्त मिला । उसने पुछा कहां जा रहे हो ??
तो उसने बताया की मेरे लड़के को शाहे रोम ने कैद कर लिया है।और तीन सौ रूपये उस पर जुर्माना कर दिया है।मेरे पास इतने रूपये नही जो देकर मै उसे छुड़ा सकूं। इसलिए हुजूर (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) के पास फरियाद लेकर जा रहा हुँ। उस दोस्त ने कहा : मगर मदिना मुनव्वरा ही पहुचने की क्या जरूरत है।??
•हुजूर से तो हर मकाम पर शफाअत कराइ जा सकती है।
उसने कहा ठिक है । मगर मै तो वही हाजीर हुंगा।
“चुनांचे वह मदिना मुनव्वरा हाजीर हुवा और रौजाए मुनव्वरा की हाजीर के बाद अपनी हाजत अर्ज की । फिर ख्वाब मे हुजूर (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) की ज्यारत हुइ तो हुजूर ने उससे फरमाया : जाओ अपने शहर पहुंचो । चुनांचे वह वापस आ गया और घर आकर देखा की लड़का घर आ गया है। लड़के से रिहाई का किस्सा पुछा तो उसने बताया की फुलां रात मुझे और मेरे सब साथी कैदीयों को बादशाह ने खुद ही रिहा कर दिया है। उस मर्दे सालेह ने हिसाब लगाया तो यह वही रात थी जिस रात हुजूर (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) की ज्यारत हुई थी और आप ने फरमाया था जाओ अपने शहर पहुँचो।

सबक।
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हमारे हुजूर (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) हर मुसीबत जदा की मदद फरमाते है। कब्र अनवर मे तशरीफ फरमा होकर भी अपने गुलामो की मदद फरमाते है। उनके गुलाम किसी मकान पर भी उनकी तवज्जह करे हुजूर (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) की रहमत उनका काम कर देती है।
•यह भी मालुम हुआ की पहले बुजूर्ग भी हुजूर की बारगाह मे फरयाद किया करते थे।

ख्वाब का दुध

हजरत शेख अबु अब्दुल्लाह फरमाते है । की एक मर्तबा हम मदिना मुनव्वरा हाजीर हुए तो मस्जिद-ए-नबवी मे मेहराब के पास एक बुजूर्ग आदमी को सोये हुए देखा । थोड़ी देर मे वह जागे । जागते ही रौजा-ए-अनवर के पास जाकर हुजूर ﷺ पर सलाम अर्ज किया और फिर मुस्कुराते हुए लौटे । एक खादिम ने उनसे इस मुस्कुराहट की वजह पुछी।
“तो बोले : मै सख्त भुखा था। इसी आलम मे मै रौजा-ए-अनवर पर हाजीर होकर भुख की शिकायत की तो ख्वाब मे मैने हुजूर ﷺ को देखा। आपने मुझे एक प्याला दुध अता फरमाया। मैने खूब पेट भरकर दुध पिया। फिर उस बुजुर्ग ने अपनी हथेली पर मुंह से थुक कर दिखाया तो हमने देखा कि हथेली पर वाकइ दुध ही था।
{हुज्जतुल्लाह अलल आलमीन, सफा-804}

सबक।
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हुजूर ﷺ को ख्वाब मे देखने वाला हुजूर ही को देखता है। हुजूर ﷺ कि ख्वाब मे भी जो अता हो वह वकाइ अता होती है। यह भी मालूम हुवा कि हुजूर ﷺ आज भी वैसे हि जिन्दा है। जैसे पहले थे।

मुकद्दस पानी

एक मकाम पर हुजुर (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) वाजु फरमाया तो हजरत बेलाल (रदी अल्लाहु अन्हु) ने वाजू से बचा हुवा पानी ले लिया। दिगर (और दुसरे) सहाबा-ए-किराम ने जब देखा की हजरत बेलाल (रदी अल्लाहु अन्हु) के पास हुजुर (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) के वाजू का बचा हुवा पानी है। तो हजरत बेलाल (रदी अल्लाहु अन्हु) की तरफ दौड़े और मुकद्दस पानी को हासील करने की कोशीश करने लगे।जिस किसी को उस पानी से थोड़ा पानी मिलता ओ उस पानी को अपने मुंह पर मल लेते। और जिस किसी को न मिल सका तो उसने किसी दुसरे के हाथ से तरी लेकर मुंह पर हाथ फेर लेते।
{मिसकात शरिफ, पेज-65,}

सबक।
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सहाबा-ए-किराम (रदी अल्लाहु अन्हु) को हर उस चिज से जिसे हुजूर (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) से कोइ निस्बत हासील हो गइ ।
मोहब्बत व प्यार था और उसे वाजीब-ए-ताजीम समझते थे। उस से बरकत हासील करते थे। मालूम हुवा की तबार्रूक कोइ नयी बात और बिद्दत नही बल्की सहाबा-ए-किराम को भी मालुम था।
ये भी मालुम हुवा की अपने वाजु के बचे हुए पानी को बा-तौर तबार्रूक लेकर अपने चेहरो पर मल लेने का हुक्म हुजूर (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) ने भी नही दिया मगर सहाबा-ए-किराम फिर भी ऐसा करते थे । उनकी मोहब्बत की वजह से था जो ऐन इमान है।
इसी तरह हुजूर (सल्ललल्लाहु अलैही वसल्लम) ने जुलुस, मिलाद, महफिल-ए-मिलाद अजान मे नाम-ए-पाक सुनकर अंगुठे चुमने का हुक्म अगर न भी दिये हो तो भी जो शख्स मोहब्बत की वजह से ऐसा करेगा ईनशाअल्लाह-वा-ताआला सहाबा-ए-किराम के सदके मे सवाब पायेगा।।

रसुलल्लाह ﷺ का पैगाम एक मजूसी के नाम

✴ शीराज के एक बुजुर्ग हजरत फाश फरमाते हैं कि मेरे यहां एक बच्चा पैदा हुवा !
मेरे पास खर्च करने के लिए कुछ भी न था ! वह मौसम इन्तीहाइ सर्द था, मै इसी फिक्र मे सो गया तो ख्वाब मे हुजूर ﷺ की ज्यारत नसीब हुइ !
आपने फरमाया : कया बात हैं??
●मैने अर्ज किया : हुजुर खर्च के लिए मेरे पास कुछ भी नही ! बस इसी फिक्र मे था,
हुजूर ﷺ ने फरमाया : दिन चढ़े तो फला मजूसी के घर जाना और उस से कहना की रसुललल्लाह ﷺ ने तुझे कहा है की बिस दिनार तुझे दे दे,

हजरत फाश सुबह उठे तो हैरान हूए की एक मजूसी के घर कैसे जाऊं और रसुललल्लाह का हुक्म वहां कैसे सुनाऊं ??
फिर यह बात भी दूरूस्त है की ख्वाब मे हुजूर नजर आये तो वह हुजूर ही होते हैं !
इसी शश-व-पंज मे वह दिन भी गुजर गया !
●दुसरी रात फिर हुजुर कि ज्यरत हुई !
हुजुर ﷺ ने फरमाया : तुम इस ख्याल को छोड़ दो और उस मजूसी के पास मेरे पैगाम पहुंचा दो !
●चुनांचे हजरते फाश सुबह उठे और उस मजूसी के घर चल पड़े। क्या देखते है की वह मजूसी अपने हाथ मे कुछ लिए हुए दरवाजे पर खड़ा है !
जब उनके पास पहुंचा तो (चुकी वह उनको जानता न था ! यह पहली मर्तबा उनके पास आए थे) इस लिए शर्मा गये !
●वह मजूसी खुद ही बोल पड़ा बड़े मियां ! कया कुछ हाजत है ??
•हजरत फाश बोले हां! मुझे रसुललल्लाह ﷺ ने तुम्हारे पास भेजा है कि तुम मुझे बिस दिनार दे दो !
●उस मजुसी ने अपना हाथ खोला और कहे ले लिजीए ! यह बिस दिनार मैने आप ही के लिए निकाल कर रखे थे ! आपकी राह देख रहा था!
●हजरत फाश ने वह दिनार लिए और उस मजूसी से पुछा भाइ तो भला रसुललल्लाह ﷺ को ख्वाब मे देखकर यहां आया हूं ! मगर तुझे कैसे मेरे बारे मे कैसे इल्म हो गया??

●वह बोला रात को इस शक्ल व सुरत के एक नुरानी बुजूर्ग को ख्वाब मे देखा है जिन्होने फरमाया की एक शख्स
साहिबे हाजत है और वह कल तुम्हारे पास पहुंचेगा उसे दिनार दे देना !
●चुनांचे मै यह बिस दिनार लेकर तुम्हारा ही इन्तेजार मे था
हजरत फाश ने जब उसकी जबानी रात को मिलने वाले नुरानी बुजुर्ग का हुलीया सुना तो वह हुजूर ﷺ का था,
चुनांचे हजरत फाश ने उससे कहा की यही हुजूर ﷺ हैं! वह मजूसी यह वाकिया सुनकर थोड़ी देर ठहरा और फिर कहा मुझे अपने घर ले चलो !
●चुनांचे वह हजरत फाश के घर आया और कलीमा पढ़कर मुस्लमान हो गया फिर उसकी बिवी बहन और उसकी औलाद भी मुस्लमान हो गया, !!!!!!!!
{शवहिदुल हक सफा-166}

सबक,
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हमारे हुजूर ﷺ की नजरे रहमत जिस पर पड़ जाये उसका बेड़ा पार हो जाता है!
यह भी मालूम हुवा कि हुजूर ﷺ अपने मोहताज गुलामो कि फरियाद सुनते है और विसाल शरिफ के बाद भी मोहताजो की मदद फरमाते है

Aayi Naseem e Koo-e Muhammad ﷺ
Adam Se Layi Hai Hasti Meiñ Aarzu e Rasool
Saare Aalam Meiñ Mohabbat Ki Ghata Chhayi Hai
Saaya e Ahmad-e Mukhtar Mubarak Bashad
Ye Adna Hai Wasf e Kamaal-e Mohammad ﷺ
Maikasho Mashrab-e Rindana Mubarak Bashad
Qibla o Kaab e Imaam Rasool e Arabi
Mera Dil Aur Meri Jaan Madine Wale
Mahshar Mein Muhammad Ka Unwaan Nirala Hai
Ada Ki Lai Rahi Hai Arsh Ki Pahlu Nasheeñ Hokar
Sirajam Munira Nigar e Madina
Kya Poochhte Ho Garmi-e Bazar-e Mustafa
Shauq e Deedar Mein Ab Jee Pe Mere Aan Bani
Ye Khusravi o Shaukat e Shahana Mubarak
Jaan Par Ban Gayi Ab Ayiye Shaiyan Lillah
Phir Dil Mein Mere Aayi Yaad e Shahe Jilaani – Manqabat Ghaus Paak
Meerañ Muhiyyudin Shaikh Zamaani
Bahaar e Rauza e Sabir
Haqiqat Meiñ Ho Sajda Jabha-Saayi Ka Bahana Ho -Manqabat Sabir Piya
Ya Ali Ahmad Alauddin Sabir Kaliyari
Ghareeb Parwar o Banda Nawaz Ki Chaadar – Manqabat Sabir Piya
Is Taraf Bhi Karam Ay Rashk e Masiha Karna