बाग़े-जन्नत में निराली चमन आराई है

बाग़े-जन्नत में निराली चमन आराई है बाग़े-जन्नत में निराली चमन आराई है क्या मदीने पे फ़िदा हो के बहार आई है उन के गेसू नहीं रहमत की घटा छाई है उन के अब्रू नहीं दो क़िब्लों की यकजाई है सरे-बालीं उन्हें रहमत की घटा लाई है हाल बिगड़ा है तो बीमार की बन आई है …

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