Waseem Barelvi Ghazal LYRICS | वसीम बरेलवी ग़ज़ल

Waseem Barelvi Ghazal LYRICS

 

 

Waseem Barelvi Ghazal वसीम बरेलवी ग़ज़ल
लहू न हो तो क़लम / वसीम बरेलवी
लहू न हो तो क़लम तरजुमाँ नहीं होता

हमारे दौर में आँसू ज़ुबाँ नहीं होता

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगा

किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

ये किस मक़ाम पे लाई है मेरी तनहाई

के मुझ से आज कोई बदगुमाँ नहीं होता

मैं उस को भूल गया हूँ ये कौन मानेगा

किसी चराग़ के बस में धुआँ नहीं होता

‘वसीम’ सदियों की आँखों से देखिये मुझ को

वो लफ़्ज़ हूँ जो कभी दास्ताँ नहीं होता

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है / वसीम बरेलवी
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे

तेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे

घर सजाने का तस्सवुर तो बहुत बाद का है

पहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे

क़हक़हा आँख का बर्ताव बदल देता है

हँसने वाले तुझे आँसू नज़र आयें कैसे

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा

एक क़तरे को समुन्दर नज़र आयें कैसे

कितना दुश्वार है दुनिया ये हुनर आना भी / वसीम बरेलवी
कितना दुश्वार था दुनिया ये हुनर आना भी

तुझ से ही फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी

कैसी आदाब-ए-नुमाइश ने लगाईं शर्तें

फूल होना ही नहीं फूल नज़र आना भी

दिल की बिगड़ी हुई आदत से ये उम्मीद न थी

भूल जाएगा ये इक दिन तिरा याद आना भी

जाने कब शहर के रिश्तों का बदल जाए मिज़ाज

इतना आसाँ तो नहीं लौट के घर आना भी

ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं

तेरा होना भी नहीं और तिरा कहलाना भी

ख़ुद को पहचान के देखे तो ज़रा ये दरिया

भूल जाएगा समुंदर की तरफ़ जाना भी

जानने वालों की इस भीड़ से क्या होगा ‘वसीम’

इस में ये देखिए कोई मुझे पहचाना भी

उड़ान वालो उड़ानों पे वक़्त भारी है / वसीम बरेलवी
उड़ान वालो उड़ानों पे वक़्त भारी है

परों की अब के नहीं हौसलों की बारी है

मैं क़तरा हो के तूफानों से जंग लड़ता हूँ

मुझे बचाना समंदर की ज़िम्मेदारी है

कोई बताये ये उसके ग़ुरूर-ए-बेजा को

वो जंग हमने लड़ी ही नहीं जो हारी है

दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत

ये एक चराग़ कई आँधियों पे भारी है

उसूलों पे जहाँ आँच आये / वसीम बरेलवी
उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है

जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये

कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटें

सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक आँखों में त’अल्लुक़ टिक नहीं पाता

मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का

जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो

कि इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है / वसीम बरेलवी
तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते

इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है

ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते

जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का

उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते

ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना

बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते

बिसाते -इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता

यह और बात कि बचने के घर नहीं आते

‘वसीम’ जहन बनाते हैं तो वही अख़बार

जो ले के एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते

आते आते मेरा नाम / वसीम बरेलवी
आपको देख कर देखता रह गया

क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया

आते-आते मेरा नाम-सा रह गया

उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया

वो मेरे सामने ही गया और मैं

रास्ते की तरह देखता रह गया

झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये

और मैं था कि सच बोलता रह गया

आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे

ये दिया कैसे जलता हुआ रह गया

ज़रा सा क़तरा कहीं / वसीम बरेलवी
जरा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है,

समंदरो ही के लहजे में बात करता है।

खुली छतों के दियें कब के बुझ गये होते,

कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है।

शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं,

किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है।

ये देखना है कि सहरा भी है समुंदर भी,

वो मेरी तिश्ना-लबी किस के नाम करता है।

तुम आ गए हो तो कुछ चाँदनी सी बातें हों,

ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है।

जमीं की कैसी वकालत हो फिर नहीं चलती,

जब आसमाँ से कोई फैसला उतरता है।

मिली हवाओं में उड़ने की / वसीम बरेलवी
मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो

के मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो

वो बेख़याल मुसाफ़िर मैं रास्ता यारो

कहाँ था बस में मेरे उस को रोकना यारो

मेरे क़लम पे ज़माने की गर्द ऐसी थी

के अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारो

तमाम शहर ही जिस की तलाश में गुम था

मैं उस के घर का पता किस से पूछता यारो

मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले / वसीम बरेलवी
मैं चाहता भी यही था वो बेवफ़ा निकले

उसे समझने का कोई तो सिलसिला निकले

किताब-ए-माज़ी[1] के औराक़[2] उलट के देख ज़रा

न जाने कौन-सा सफ़्हा[3] मुड़ा हुआ निकले

जो देखने में बहुत ही क़रीब लगता है

उसी के बारे में सोचो तो फ़ासिला निकले

शब्दार्थ

1अतीत की पुस्तक

2 पन्ने

3पन्ना

क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता / वसीम बरेलवी
क्या दुःख है, समंदर को बता भी नहीं सकता

आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता

तू छोड़ रहा है, तो ख़ता इसमें तेरी क्या

हर शख़्स मेरा साथ, निभा भी नहीं सकता

प्यासे रहे जाते हैं जमाने के सवालात

किसके लिए ज़िन्दा हूँ, बता भी नहीं सकता

घर ढूँढ रहे हैं मेरा , रातों के पुजारी

मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता

वैसे तो एक आँसू ही बहा के मुझे ले जाए

ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता.

खुल के मिलने का सलीक़ा आपको आता नहीं / वसीम बरेलवी
खुल के मिलने का सलीक़ा आपको आता नहीं

और मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं

वो समझता था, उसे पाकर ही मैं रह जाऊंगा

उसको मेरी प्यास की शिद्दत का अन्दाज़ा नहीं

जा, दिखा दुनिया को, मुझको क्या दिखाता है ग़रूर

तू समन्दर है, तो हो, मैं तो मगर प्यासा नहीं

कोई भी दस्तक करे, आहट हो या आवाज़ दे

मेरे हाथों में मेरा घर तो है, दरवाज़ा नहीं

अपनों को अपना कहा, चाहे किसी दर्जे के हों

और अब ऐसा किया मैंने, तो शरमाया नहीं

उसकी महफ़िल में उन्हीं की रौशनी, जिनके चराग़

मैं भी कुछ होता, तो मेरा भी दिया होता नहीं

तुझसे क्या बिछड़ा, मेरी सारी हक़ीक़त खुल गयी

अब कोई मौसम मिले, तो मुझसे शरमाता नहीं

अपने हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा / वसीम बरेलवी
अपने हर इक लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा

उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

तुम गिराने में लगे थे तुम ने सोचा भी नहीं

मैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊँगा

मुझ को चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र

रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा

सारी दुनिया की नज़र में है मेरी अह्द—ए—वफ़ा

इक तेरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा?

मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा / वसीम बरेलवी
मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा

अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा

ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा

ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा

कोई चराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए

जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे

सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी जला लेगा

हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उस से रिश्ता वसीम

मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा

हुस्न बाज़ार हुआ क्या कि हुनर ख़त्म हुआ / वसीम बरेलवी
हुस्न बाज़ार हुआ क्या कि हुनर ख़त्म हुआ

आया पलको पे तो आँसू का सफ़र ख़त्म हुआ

उम्र भर तुझसे बिछड़ने की कसक ही न गयी ,

कौन कहता है की मुहब्बत का असर ख़त्म हुआ

नयी कालोनी में बच्चों की ज़िदे ले तो गईं ,

बाप दादा का बनाया हुआ घर ख़त्म हुआ

जा, हमेशा को मुझे छोड़ के जाने वाले ,

तुझ से हर लम्हा बिछड़ने का तो डर ख़त्म हुआ.

रात के टुकड़ों पे पलना छोड़ दे / वसीम बरेलवी
रात के टुकड़ों पे पलना छोड़ दे

शम्अ से कहना के जलना छोड़ दे

मुश्किलें तो हर सफ़र का हुस्न हैं,

कैसे कोई राह चलना छोड़ दे

तुझसे उम्मीदे- वफ़ा बेकार है,

कैसे इक मौसम बदलना छोड़ दे

मैं तो ये हिम्मत दिखा पाया नहीं,

तू ही मेरे साथ चलना छोड़ दे

कुछ तो कर आदाबे-महफ़िल का लिहाज़,

यार ! ये पहलू बदलना छोड़ दे.

तुझको सोचा तो पता हो गया रुसवाई को / वसीम बरेलवी
तुझको सोचा तो पता हो गया रुसवाई को

मैंने महफूज़ समझ रखा था तन्हाई को

जिस्म की चाह लकीरों से अदा करता है

ख़ाक समझेगा मुसव्विर तेरी अँगडाई को

अपनी दरियाई पे इतरा न बहुत ऐ दरिया ,

एक कतरा ही बहुत है तेरी रुसवाई को

चाहे जितना भी बिगड़ जाए ज़माने का चलन,

झूठ से हारते देखा नहीं सच्चाई को

साथ मौजों के सभी हो जहाँ बहने वाले ,

कौन समझेगा समन्दर तेरी गहराई को.

मैं अपने ख़्वाब से बिछ्ड़ा नज़र नहीं आता / वसीम बरेलवी
मैं अपने ख़्वाब से बिछ्ड़ा नज़र नहीं आता

तू इस सदी में अकेला नज़र नहीं आता

अजब दबाव है इन बाहरी हवाओं का

घरों का बोझ भी उठता नज़र नहीं आता

मैं इक सदा पे हमेशा को घर छोड़ आया

मगर पुकारने वाला नज़र नहीं आता

मैं तेरी राह से हटने को हट गया लेकिन

मुझे तो कोई भी रस्ता नज़र नहीं आता

धुआँ भरा है यहाँ तो सभी की आँखों में

किसी को घर मेरा जलता नज़र नहीं आता.

क्या बताऊं कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैंने किया / वसीम बरेलवी
क्या बताऊं कैसे ख़ुद को दर-ब-दर मैंने किया,

उम्र भर किस-किस के हिस्से का सफ़र मैंने किया ।

तू तो नफ़रत भी न कर पाएगा उस शिद्दत [1] के साथ,

जिस बला का प्यार तुझसे बे-ख़बर मैंने किया ।

कैसे बच्चों को बताऊँ रास्तों के पेचो-ख़म[2]

ज़िन्दगी भर तो किताबों का सफ़र मैंने किया ।

शोहरतों[3] की नज़्र[4] कर दी शे’र की मासूमियत,

इस दिये की रोशनी को दर-ब-दर मैंने किया ।

चंद जज़्बातों से रिश्तों के बचाने को ‘वसीम‘,

कैसा-कैसा जब्र[5] अपने आप पर मैंने किया ।

 

शब्दार्थ

1अति,तनमन्यता

2घुमाव-फिराव

3 प्रसिद्धि

4 भेंट

5अत्याचार

कहाँ तक आँख रोएगी कहाँ तक किसका ग़म होगा / वसीम बरेलवी
कहाँ तक आँख रोएगी कहाँ तक किसका ग़म होगा

मेरे जैसा यहाँ कोई न कोई रोज़ कम होगा

तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना रो चुका हूँ मैं

कि तू मिल भी अगर जाये तो अब मिलने का ग़म होगा

समन्दर की ग़लतफ़हमी से कोई पूछ तो लेता ,

ज़मीं का हौसला क्या ऐसे तूफ़ानों से कम होगा

मोहब्बत नापने का कोई पैमाना नहीं होता ,

कहीं तू बढ़ भी सकता है, कहीं तू मुझ से कम होगा

कौन-सी बात कहाँ , कैसे कही जाती है / वसीम बरेलवी
कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती है

ये सलीक़ा हो, तो हर बात सुनी जाती है

जैसा चाहा था तुझे, देख न पाये दुनिया

दिल में बस एक ये हसरत ही रही जाती है

एक बिगड़ी हुई औलाद भला क्या जाने

कैसे माँ-बाप के होंठों से हँसी जाती है

कर्ज़ का बोझ उठाये हुए चलने का अज़ाब

जैसे सर पर कोई दीवार गिरी जाती है

अपनी पहचान मिटा देना हो जैसे सब कुछ

जो नदी है वो समंदर से मिली जाती है

पूछना है तो ग़ज़ल वालों से पूछो जाकर

कैसे हर बात सलीक़े से कही जाती है

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते / वसीम बरेलवी
तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते

इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है

ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते

जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का

उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते

ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना

बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते

बिसाते-इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता

यह और बात कि बचने के घर नहीं आते

वसीम जहन बनाते हैं तो वही अख़बार

जो लेके एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते