ISLAMIC SHARIA IN HINDI

अनवारे शरिअत {पोस्ट न. 72}
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दुरूद शरीफ़ और मुफीद दुआयें

( 15 ) आईना देख कर पढ़े
“ अल्हम्दु लिल्लाहि अल्लाहुम्म कमा हस्सन त खल की फ़हस्सिन खुलकी “

( 16 ) जब किसी को रुखसत करे तो यह दुआ पढ़े
” अस्तौ दि उल्लाह दी न क व अमा न त क व खवाती म अ म लि को सफ़र में जाते वक़्त अहबाब व अइज़्जा से रुखसत होते वक़्त कहे
“ अस्तौदि उ कुमुल्ला हल्लजी ला युजीउ व दाइअह “

( 17 ) वक़्ते सफ़र यह दुआ पढ़े

“अल्लाहुम्म बि क असूलु व बि क अहूलु व बि क असीरु ” जब सफ़र पर रवाना हो जाये तो यह दुआ पढ़े ।_

” अल्लहुम्म इन्न नस्अलु क फ़ो स फ रिना हाजल बिर्र वत्तक़वा | व मिनल अ म लि मा तिरजा “

फिर यह दुआ पढ़े

अल्लाहुम्म हव्विन अलयना हाजस्स फ़ र वत विअन्ना बुअ्दहू अल्लाहुम्म अन्तर साहि बु फ़िस्सफ़रि वल खलीफतु फिल अहलि अल्लाहुम्म इन्नी अऊजु बि क मिव व असाइस्स फ़ रि व कआ बतिल मन जरि व सूइल मुन कल बि फ़िल मालि वल अलि वल व ल दि ” ।

( 18 ) सफ़र से वापसी पर यह दुआ पढ़े
“ आइबू न ताइबू न आबिदू न लिरब्न्निा हामिदू न “

( 19 ) शहर में दाखिल होते वक्त पढ़े
“ अल्लाहुम्म बारिक लना फोहा ” तीन बार “ अल्लाहुम्मरजुकना जनाहा व ह ब्बिना इला अहलिहा व ह ब्बिब सालिही अहलिहा इलयना “

( 20 ) जब मंजिल पर पहुंचे यह दुआ पढ़े
” रब्बि अनज़िलनी मुनज़लम्मुबारकन व अन त खयरुल्मुनज़िलीन “

( 21 ) आंधी और अंधेरे के वक़्त की दुआ
” अल्लाहुम्म इन्ना नस्अलु क मिन खयरि हाजिहिरीहि व खरि मा फीहा व खयरी मा उमिरत बिहिव नऊजुबिक मिन शरिहाजिहिरीहि व शरिमा फोहा व शरीमा उमिरतबिहि “

समाप्त THE END

बिऔनिही तआला सुम्न बिऔनिरसू लिहिल अअला जल्ल जलालुहु व सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ।

 

अनवारे शरिअत सफा, 136//137//138
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अनवारे शरिअत {पोस्ट न. 71}
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दुरूद शरीफ़ और मुफीद दुआयें

( 1 ) सल्लल्लाहु अलन्नबीयिल उम्मीयि व आलिही सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सलातौं वसलामन अलय क या रसूलुल्लाह ।
इस दुरूद शरीफ़ को बाद नमाज़ जुमा दस्त बस्ता मदीना मुनव्वरह की तरफ़ मुतवज्जिह होकर सौ बार पढ़े दीन व दुनियां की बेशुमार नेमतों से सरफ़राज़ हो ।

( 2 ) पहले दाहिना क़दम रखकर मस्जिद में दाखिल हो और यह दुआ पढ़े ।
“ अल्लाहुम्मफ़ तह ली अबवा ब रह मतिक “

( 3 ) पहले बांया कदम मस्जिद से निकाले और यह दुआ पढ़े ।
” अल्लाहुम्म इन्नी असअलु क मिन फ़जलि क व रहमतिक “

( 4 ) चांद देख कर यह दुआ पढ़े ।
“ अल्लाहुम्म अहिल्लहु अलयना बिल अम ने वल ईमान वस्सलामति वल इस्लाम रब्बी व रब्बुकललाहु या हिलाल ।

( 5 ) जब बुरा ख्वाब देखे और जग जाए तो तीन बार “ अऊजु बिल्लाहि मिनश्शयता निर्रजीम ” पढ़े और तीन बार बायें तरफ थूके फिर सोना चाहे तो करवट बदल कर सोये ।

( 6 ) जब आसमान से तारा टूटता हुआ देखे तो निगाह नीची कर ले और यह दुआ पढ़े “ माशअल्लाहु लाहौ  ल वला कूवत इल्ला बिल्लाह ।

( 7 ) अंधे , लंगड़े और कोढ़ी वगैरा किसी मुसीबत ज़दा को देखे तो यह दुआ पढ़े । मगर आशेबे चश्म ( आंख उठना ) जुकाम और खारिश के मरीजों को देख कर यह दुआ न पढ़ें कि इन बीमारियों से बदन की इसलाह होती है वह दुआ यह है ।
“ अलहम्दु लिल्लाहिललजी आफानी मिम्मबतला क बिही व फ़ज्जलनी अला कसीरिम मिम्मन न ल क तफजीला “

( 8 ) जब सोना चाहें तो यह दुआ पढ़ें ।
“ अल्लाहुम्म बिइस्मिक अमूतु व अह या “

और दूसरे सभी अवराद से फ़ारिग होकर सूरये काफ़िरून पूरी पढ़े और खामोश सो जाए । उसके बाद अगर बात चीत की ज़रूरत पड़ जाए तो दोबारा फिर पूरी सूरह पढ़ ले ।

 

अनवारे शरिअत सफा, 134//135

जारी रहेगा इन्शाअल्लाह…..
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अनवारे शरिअत {पोस्ट न. 70}
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दुरूद शरीफ़ और मुफीद दुआयें

( 1 ) सल्लल्लाहु अलन्नबीयिल उम्मीयि व आलिही सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सलातौं वसलामन अलय क या रसूलुल्लाह ।
इस दुरूद शरीफ़ को बाद नमाज़ जुमा दस्त बस्ता मदीना मुनव्वरह की तरफ़ मुतवज्जिह होकर सौ बार पढ़े दीन व दुनियां की बेशुमार नेमतों से सरफ़राज़ हो ।

( 2 ) पहले दाहिना क़दम रखकर मस्जिद में दाखिल हो और यह दुआ पढ़े ।
“ अल्लाहुम्मफ़ तह ली अबवा ब रह मतिक “

( 3 ) पहले बांया कदम मस्जिद से निकाले और यह दुआ पढ़े ।
” अल्लाहुम्म इन्नी असअलु क मिन फ़जलि क व रहमतिक “

( 4 ) चांद देख कर यह दुआ पढ़े ।
“ अल्लाहुम्म अहिल्लहु अलयना बिल अम ने वल ईमान वस्सलामति वल इस्लाम रब्बी व रब्बुकललाहु या हिलाल ।

( 5 ) जब बुरा ख्वाब देखे और जग जाए तो तीन बार “ अऊजु बिल्लाहि मिनश्शयता निर्रजीम ” पढ़े और तीन बार बायें तरफ थूके फिर सोना चाहे तो करवट बदल कर सोये ।

( 6 ) जब आसमान से तारा टूटता हुआ देखे तो निगाह नीची कर ले और यह दुआ पढ़े “ माशअल्लाहु लाहौ  ल वला कूवत इल्ला बिल्लाह ।

( 7 ) अंधे , लंगड़े और कोढ़ी वगैरा किसी मुसीबत ज़दा को देखे तो यह दुआ पढ़े । मगर आशेबे चश्म ( आंख उठना ) जुकाम और खारिश के मरीजों को देख कर यह दुआ न पढ़ें कि इन बीमारियों से बदन की इसलाह होती है वह दुआ यह है ।
“ अलहम्दु लिल्लाहिललजी आफानी मिम्मबतला क बिही व फ़ज्जलनी अला कसीरिम मिम्मन न ल क तफजीला “

( 8 ) जब सोना चाहें तो यह दुआ पढ़ें ।
“ अल्लाहुम्म बिइस्मिक अमूतु व अह या “

और दूसरे सभी अवराद से फ़ारिग होकर सूरये काफ़िरून पूरी पढ़े और खामोश सो जाए । उसके बाद अगर बात चीत की ज़रूरत पड़ जाए तो दोबारा फिर पूरी सूरह पढ़ ले ।

 

अनवारे शरिअत सफा, 134//135

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अनवारे शरिअत {पोस्ट न. 69}
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इस्लामी कलिमे

( 1 ) अव्वल कलिमये तैइब ।
ला इलाह इल्लल्लाहु मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह ।

( 2 ) दूसरा कलिमये शहादत ।
अश्हदु अल्ला इलाह इल्लल्लाहु व अश् हदु अन्न मुहम्मदन अब्दुहु व रसूलुह ।

( 3 ) तीसरा कलिमये तमजीद ।
सुबहानल्लाहि वल्हम्दुलिल्लाहि व लाइला ह इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर वला ही ल वला कूवत इल्ला बिल्लाहिल अलीयिल अजीम ।

( 4 ) चौथा कलिमये तौहीद ।
_*लाइला – ह इल्लल्लाहु वहदहु ला शरी क लहू लहुल मुल्कु व लहुल हम्दु युह् यी व युमीतु व हु व हय्युल्लायमूतु बि यदि हिल खैरु व हुव अला कुल्लि शैइन कदीर ।*

( 5 ) पांचवा कलिमये रद्दे कुफ्र ।
अल्लाहुम्म इन्नी अऊजु बिक मिन अन उशरिक बि क शै औं वअना अअलमु बिही व असतगफ़िरु क लिमाला अअलमु बिही तुब्तु अनहु वतबर्रातु मिनल कुफ़रि वश शिर कि वल मआसी कुल्लिहा व अस्लम्तु व आमन्तु व अकूल ला इलाह इल्लल्लाहुमुहम्मदुर्रसूलुल्लाह ।

ईमाने मुजमल ।

आमन्तु बिल्लाहि कमा हु व बि अस्माइहि व सिफ़ातिही व क़बिल्तु जमी अ अह कामिही ।

ईमाने मुफ़स्सल ।

आमन्तु बिल्लाहि व मलाइ क तिही व कुतु बिही व रुसुलिही वल योमिल आखिरि वल कदरि खैरिही व शररिही मिनल्लाहि तआला वल ब सि बदल मौत ।

 

अनवारे शरिअत सफा, 133//134

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अनवारे शरिअत {पोस्ट न. 66}
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✨लिबास ( पहनावा ) का बयान

✍….इतना लिबास ज़रूर पहनें कि जिसे से सत्रे औरत हो जाये । औरतें बहुत बारीक और चुस्त कपड़ा हरगिज़ न पहनें कि जिससे बदन के हिस्से जाहिर हों कि औरतों को ऐसा कपड़ा पहनना हराम है और मर्द भी पाजामा या तहबन्द इतना हल्का न पहनें कि जिस से बदन की रंगत झलके और सतर ( झुपाव ) न हो कि मर्दो को भी ऐसा पाजामा व तहबन्द पहनना हराम है । और धोती न पहनें कि धोती पहनना हिन्दुओं का तरीका है और उससे सत्र भी नहीं होता कि चलने में रान का पिछला हिस्सा खुल जाता है । मुसलमानों को इस से बचना ज़रूरी है । और नैकर जांघिया हरगिज़ न पहनें कि हराम है । लेकिन तहबन्द वगैरा के नीचे पहनें तो कोई हर्ज नहीं ।

✨जीनत ( सिंगार ) का बयान

✍….मर्दो को सोने की अंगूठी पहनना हराम है और चांदी की सिर्फ एक अंगूठी एक नग वाली जो वज़न में साढ़े चार माशा से कम हो पहन सकते हैं । और कई अंगूठी या एक अंगूठी या कई नग वाली या छल्ले नहीं पहन सकते कि नाजाइज़ है और औरतें सोना चांदी की हर किस्म की अंगूठियां और छल्ले पहन सकती हैं लेकिन दूसरी धातों की अंगूठियां जैसे तांबा , पीतल , लोहा और जस्ता वगैरा तो यह मर्द व औरत दोनों के लिए नाजाइज़ हैं । लड़कियों को सोने चांदी के जेवर पहनाना जाइज़ है । लड़कों को हराम है पहनाने वाले गुनाहगार होंगे । इसी तरह लड़कियों के हाथ पांव में मेंहदी लगाना जाइज है और लड़कों के हाथ पांव में जीनत के लिए मेंहदी लगाना नाजाइज़ है ।

अनवारे शरिअत सफा, 129/130/131

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अनवारे शरिअत {पोस्ट न. 65}
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खाने का बयान

खाना खाने से पहले और बाद में दोनों हाथ गट्टों तक धोए । सिर्फ एक हाथ या सिर्फ उंगलियां न धोए कि सुन्नत अदा न होगी । खाने से पहले हाथ धोकर पोंछना मना है और खाने के बाद हाथ धोकर पोंछ ले कि खाने का असर बाक़ी न रहे बिस्मिल्लाह पढ़ कर खाना शुरू करें अगर शुरू में बिस्मिल्लाह पढ़ना भूल जाये तो जब याद आये यह दुआ पढ़े । “ बिस्मिल्लाहि फी अव्वलिही व आखिरिही ” रोटी पर कोई चीज़ न रखी जाए और हाथ रोटी से न पोंछे । नंगे सर खाना अदब के खिलाफ़ है । खाना दाहिने हाथ से खायें बायें हाथ से खाना शैतान का काम है । खाने के वक्त बायां पांव बिछा दें और दाहिना खड़ा रखें या सुरीन ( पुट्ठा ) पर बैठे और दोनों घुटने खड़े रखे । खाने के वक़्त बातें करता रहे । बिल्कुल चुपचाप रहना मजूसियों का तरीका ‌है मगर बुरी बातें न बके बल्कि अच्छी बातें करें । खाने के बाद उंगलियां चाट ले और बर्तन को भी उंगलियों से पोंछ कर चाट ले । खाने की शुरूआत नमक से की जाए और खत्म भी उसी पर करे कि उस से बहुत सी बीमारियां खत्म हो जाती हैं । खाने के बाद यह दुआ पढ़े ।

अलहम्दु लिल्लाहिल्लजी अत अम ना व सकाना व कफ़ाना व ज अलना मिनल मुस्लिमीन ।

पीने का बयान

पानी बिस्मिल्लाह पढ़ कर दाहिने हाथ से पीये । बायें हाथ से पीना शैतान का काम है और तीन सांस में पीये हर मर्तबा बर्तन को मुंह से हटा कर सांस ले । पहली और दूसरी मर्तबा एक एक घुट पिये और तीसरी सांस में जितना चाहे पी डाले खड़े होकर पानी हरगिज़ न पीये । हदीस शरीफ में है कि जो शख्स भूलकर ऐसा कर डाले वह कै कर दे और पानी को चूस कर पीये गट गट गट बड़े घूंट न पीये जब पी चुके तो अलहम्दु लिल्लाह कहे । पीने के बाद गिलास वगैरा का बचा हुआ पानी फेंकना इसराफ़ व गुनाह है । सुराही में मुंह लगाकर पानी पीना मना है इसी तर लोटे की टोंटी से भी पानी पीना मना है मगर जब कि देख लिया हो कि उनमें कोई चीज नहीं है तो हर्ज नहीं ।

अनवारे शरिअत सफा, 128/129

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अनवारे शरिअत {पोस्ट न. 64}
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इद्दत का बयान

सवाल : – इद्दत कितने दिन की होती है ।

✍जवाब : – बेवह ( विधवा ) औरत अगर हामिला हो तो उसकी इद्दत बच्चा पैदा होना है और अगर हामिला न हो तो उसकी इद्दत चार महीने दस दिन है । और तलाक़ वाली औरत अगर हामिला हो तो उसकी इद्दत भी बच्चा जनना है । और तलाक़ वाली औरत अगर आइसा यानी पचपन साला या नाबालिग हो तो उसकी इद्दत तीन माह है । और तलाक़ वाली औरत अगर हामिला , नाबालिग या पचपन साला न हो यानी हैज़ वाली हो तो उसकी इद्दत तीन हैज़ है । चाहे यह तीन हैज़ तीन माह या तीन साल या उससे ज्यादा में आये ।

नोट : – ( 1 ) तलाक़ वाली गैर मदखूला औरत यानी जिससे शौहर ने हमबिसतरी नहीं की है उसके लिए कोई इद्दत नहीं ।

( 2 ) अवाम में जो मशहूर है कि तलाक़ वाली औरत की इद्दत तीन महीने तेरह दिन है तो यह बिल्कुल गलत और बे बुनियाद है । जिसकी शरीअत में कोई अस्ल नहीं ।

अनवारे शरिअत सफा, 127/128

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अनवारे शरिअत {पोस्ट न. 63}
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तलाक़ का बयान

सवाल : – तलाक़ किसे कहते हैं ?

✍जवाब : – औरत निकाह से शौहर की पाबन्द हो जाती है उस पाबन्दी के उठा देने को तलाक़ कहते हैं ।

सवाल : – तलाक़ देना कैसा है ?

✍जवाब : – तलाक़ देना जाइज़ है लेकिन बगैर वजहे शरयी मना है । और वजहे शरयी हो तो तलाक देना मुबाह है बल्कि अगर औरत शौहर को या दूसरों को तकलीफ़ देती हो या नमाज़ न पढ़ती हो तो तलाक देना मुसतहब है । और अगर शौहर नामर्द हो या उस पर किसी ने जादू कर दिया हो कि हमबिस्तरी ( सम्भोग ) नहीं कर पाता और उसके दूर करने की भी कोई सूरत नज़र नहीं आती तो इन सूरतों में तलाक़ देना वाजिब है । अगर तलाक़ नहीं दी तो गुनाहगार होगा ।

सवाल : – तलाक देने का बेहतरीन तरीका क्या है ?

✍जवाब : – तलाक देने का बेहतरीन तरीका यह है कि जिस तुहर में हमबिस्तरी ( सम्भोग ) न की हो उसमें एक तलाक रजयी दे और औरत के करीब न जाए यहां तक कि इद्दत गुज़र जाए । और एक तलाके बाइन दे तो भी जाइज़ है और अगर औरत मदखूला हो यानी शौहर उससे हमबिस्तरी ( सम्भोग ) कर चुका हो तो तीन तलाक़ न दे कि इस सूरत में बगैर हलाला दोबारा निकाह न होगा । और अगर शौहर ने उससे हमबिसतरी नहीं की है तो इन लफ़्ज़ों के साथ तलाक न दे कि मैंने उसे तीन तलाक़ दी या तलाके मुग़ल्ल्ज़ा दी कि इस सूरत में वह भी बगैर हलाला तलाक़ देने वाले के लिए हलाल न होगी ।

अनवारे शरिअत सफा, 126/127

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अनवारे शरिअत पोस्ट न. 62}
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*निकाह का बयान *

सवाल : – निकाह करना कैसा है ?

✍जवाब : – जो शख्स नान व नफका की कुदरत रखत हो अगर उसे यक़ीन हो कि निकाह नहीं करेगा तो गुनाह में मुबतिला हो जाएगा तो ऐसे शख्स को निकाह करना फ़र्ज है । और अगर गुनाहगार का यकीन नहीं बल्कि सिर्फ ख़तरा है तो निकाह करना वाजिब है । और शहवत ( लालसा ) का बहुत ज़्यादा ग़लबा न हो तो निकाह करना सुन्नते मुअक्कदा है । और अगर इस बात का खतरा है कि निकाह करेगा तो नान व नफका न दे सकेगा या निकाह के बाद जो फ़राइज़ मुतअल्लिका हैं उन्हें पूरा न कर सकेगा तो निकाह करना मकरूह है । और इन बातों का खतरा ही नहीं बल्कि यकीन हो तो निकाह करना हराम है ।

सवाल : – किन औरतों से निकाह करना हराम है ?

✍जवाब : – मां , बेटी , बहिन , फूफी , खाला , भतीजी , भांजी , दूध पिलाने वाली मां , दूध शरीकी बहिन , सास , मदखूला बीवी की बेटी , नसबी बेटा की बीवी , दो बहनों को इकट्ठा करना , शौहर वाली औरत , काफिरा अस्लीया और मुरतद्दा वहाबीया इन सब से निकाह हराम है । इस मसअला की मजीद तफ़सील बहारे शरीअत वगैरा से मालूम करें ।

सवाल : – अगर लड़की – लड़का नाबालिग हों तो निकाह कैसे होगा ?

✍जवाब : – अगर नाबालिग हों तो उनके वली की इजाज़त से होगा ।

सवाल : – वली होने का हक़ किसको है ?

✍जवाब : – अगर औरत मजनून ( पागल ) है और बेटे वाली है तो उस के बेटे को वली होने का हक है । फिर उस के पोता परपोता वगैरा को । अगर यह न हों या जिसका निकाह है वह नाबालिग हो तो बाप वाली होगा । अगर यह न हो तो दादा फिर परदादा वगैरहुम । फिर हक़ीकी भाई । फिर सौतेला भाई फिर हक़ीकी भाई का बेटा फिर सौतेले भाई का बेटा । फिर हकीकी चचा फिर सौतेला चचा । फिर हकीकी चाचा का बेटा फिर सौतेला चाचा का बेटा । फिर बाप का हक़ीकी चाचा फिर सौतेले चाचा फिर बाप के हकीकी चाचा का बेटा फिर सौतेले चाचा का बेटा । खुलासा यह कि उस खानदान में सब से ज़्यादा करीब का रिश्तेदार जो मर्द हो वही वली होगा । और अगर यह सब न हों तो मां वली हैं । फिर दादी फिर नानी फिर बेटी फिर पोती वगैरा फिर नाना ।

निकाह पढ़ाने का तरीका

सवाल : – निकाह पढ़ने का तरीका क्या है ?

✍जवाब : – निकाह पढ़ने का बेहतर तरीका यह है कि दुल्हन अगर बालिग हो तो निकाह पढ़ने वाला दुल्हन से वर्ना उसके वली से इजाजत लेकर मज्लिसे निकाह में आये । दूल्हा को पांचो कलिमे या कलिमये तय्यिबा और ईमाने मुजमल व मुफ़स्सल पढ़ाये फिर खड़े होकर खुतबये निकाह पढ़े और बैठ कर पढ़ना भी जाइज़ है । फिर दूल्हा की तरफ़ मुखातिब हो कर यूं कहे कि मैंने बहैसियत वकील फुलां बिन्ते फुलां ( जैसे हिन्दा बिन्ते जैद ) को इतने महर के बदले आपके निकाह में दिया क्या आपे ने कुबूल किया । जब दूल्हा कबूल कर ले तो निकाह पढ़ने वाला दूल्हा दुल्हन के दरमियान उल्फ़त व मुहब्ब्त की दुआ करे ।

अनवारे शरिअत सफा,123/124/125/126

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अनवारे शरिअत पोस्ट न. 61}
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रोज़ा के मकरूहात

सवाल : – किन चीजों से रोज़ा मकरूह हो जाता है ?

✍जवाब : – झूट , गीबत , चुगली , गाली देने , बेहूदा बात करने और किसी को तकलीफ़ देने से रोज़ा मकरूह हो जाता है ।

सवाल : – क्या रोज़ादार को कुल्ली करने के लिए मुंह भर पानी लेना मकरूह है ?

✍जवाब : – हां रोज़ादार को कुल्ली करने के लिए मुंह भर पानी लेना मकरूह है ।

सवाल : – क्या रोज़ा की हालत में खुश्बू सूंघना , तेल मालिश करना और सुर्मा लगाना मकरूह है ?

✍जवाब : – नहीं रोज़ा की हालत में खुश्बू सूंघना , तेल मालिश करना और सुर्मा लगाना मकरूह नहीं । मगर मर्दो को ज़ीनत के लिए सुर्मा लगाना हमेशा मकरूह है और रोज़ा की हालत में बदरजए औला ( ज़रूर ) मकरूह है ।

सवाल : – क्या रोज़ा में मिसवाक करना मकरूह है ?

✍जवाब : – नहीं । रोज़ा में मिसवाक करना मकरूह नहीं बल्कि जैसे और दिनों में मिसवाक करना सुन्नत है वैसे ही रोज़ा में भी मिसवाक करना मसनून है । चाहे मिसवाक खुश्क हो या तर ( गीली ) और ज़वाल से पहले करे या बाद में किसी वक़्त मकरूह नहीं ।

अनवारे शरिअत सफा,122/123

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अनवारे शरिअत पोस्ट न. 60}
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रोज़ा तोड़ने और न तोड़ने वाली चीजों का बयान

सवाल : – किन चीजों से रोजा टूट जाता है ?

✍जवाब : – खाने पीने से रोजा टूट जाता है जबकि रोज़ादार होना याद हो और हुक्का बीड़ी सिगरेट वगैरा पीने और पान या सिर्फ तम्बाकू खाने से भी बशर्ते कि याद हो रोज़ा जाता रहता है । कुल्ली करने में बिला इरादा पानी हलक से उतर गया या नाक में पानी चढ़ाया और दिमाग तक चढ़ गया या कान में तेल टपकाया या नाक में दवा चढ़ाई अगर रोज़ादार होना याद है तो रोज़ा टूट गया वर्ना नहीं । क़सदन ( जान बूझकर ) मुंह भर कै की और रोज़ादार होना याद है तो रोज़ा जाता रहा । और मुंह भर न हो तो नहीं । और अगर बिला इख्तियार कै हो और मुंह भर न हो तो रोज़ा गया और अगर मुंह भर हो तो लौटाने कि सुरत में जाता रहा वर्ना नहीं ।

सवाल : – किन चीज़ों से रोज़ा नहीं टूटता ।

✍जवाब : – भूलकर खाने पीने से रोज़ा नहीं टूटता , तेल या सुर्मा लगाने और मक्खी , धुंवा या आटे वगैरा का गुबार ( गर्दा ) हलक में जाने से रोज़ा नहीं जाता , कुल्ली की और पानी बिल्कुल उगल दिया सिर्फ कुछ तरी मुंह में बाकी रह गयी थी थूक के साथ उसे निगल गया या कान में पानी चला गया या खंकार मुंह में आया और खा गया अगरचे कितना ही हो रोजा न जायेगा । इहतिलाम ( स्वप्नदोष ) हुआ या गीबत ( चुगली ) की तो रोज़ा न गया अगरचे गीबत सख्त कबीरा ( बड़ा ) गुनाह है । और जनाबत ( नापाकी ) की हालत में सुबह की बल्कि अगरचे सारे दिन जुनुब ( नापाक ) रहा रोजा न गया । मगर इतनी देर तक जान बूझकर गुस्ल न करना कि नमाज़ क़ज़ा हो जाए गुनाह और हराम है ।

अनवारे शरिअत सफा,121/122

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अनवारे शरिअत पोस्ट न. 59}
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रोजा का बयान

सवाल : – रोज़ा किसे कहते हैं ?

✍जवाब : – सुबह सादिक़ से गुरूबे आफ़ताब ( सूर्य अस्त ) तक नीयत के साथ खाने , पीने और जिमा ( संभोग ) से रुकने का नाम रोज़ा है ।

सवाल : – रमज़ान शरीफ के रोजे किन लोगों पर फर्ज हैं ?

✍जवाब : – रमज़ान शरीफ के रोजे हर मुसलमान आक़िल बालिग मर्द और औरत पर फ़र्ज़ हैं । उनकी फ़रज़ीयत का इन्कार करने वाला काफ़िर और बिला उज़्र छोड़ने वाला सख्त गुनाहगार और फ़ासिक मरदूदुश्शहादत है । और बच्चा की उम्र जब दस साल हो जाये और उसमें रोज़ा रखने की ताक़त हो तो उस से रोज़ा रखवाया जाए और न रखे तो मार कर रखवायें ।

सवाल : – किन सूरतों में रोज़ा न रखने की इजाज़त है ?

✍जवाब : – जिन सूरतों में रोजा न रखने की इजाजत है उनमें से बाज़ यह हैं ( 1 ) सफ़र यानी तीन दिन की राह के इरादा से बाहर निकलना लेकिन अगर सफ़र में मशक्कत न हो तो रोज़ा रखना अफ़ज़ल है ।

( 2 . 3 ) हामिला और दूध पिलाने वाली औरत को अपनी जान या बच्चा का सही अंदेशा हो तो इस हालत में रोज़ा न रखने की इजाज़त है ।

( 4 ) मर्ज़ यानी मरीज़ को मर्ज बढ़ जाने या देर में अच्छा होने या दन्दुरुस्त को बीमार हो जाने का गालिब गुमान हो तो उस दिन रोजा न रखना जाइज़ है ।

( 5 ) शैखे फानी यानी वह बूढ़ा कि न अब रोज़ा रख सकता है और न आइन्दा उसमें इतनी ताक़त आने की उम्मीद है कि रख सकेगा तो उसे रोज़ा न रखने की इजाजत है । और हैज़ व निफास की हालतों में रोजा रखना जाइज़ नहीं ।

सवाल : – क्या ऊपर बयान किए हुए लोगों को बाद में रोजा की क़ज़ा करना फर्ज हैं ?

✍जवाब : – हां उज़्र खत्म हो जाने के बाद सब लोगों को रोजा की क़ज़ा करना फर्ज है और शैखे फानी अगर जाड़ों में कजा रख सकता है तो रखे वर्ना हर रोजा के बदले दोनों वक़्त एक मिसकीन को पेट भर खाना खिलाए या हर रोज़ा के बदले सदकए फ़ित्र की मिकदार मिसकीन को दे दे ।

सवाल : – जिन लोगों को रोज़ा न रखने की इजाज़त है क्या वह किसी चीज़ को अलानियह खा पी सकते हैं ?

✍जवाब : – नहीं । उन्हें भी अलानियह किसी चीज़ को खाने पीने की इजाजत नहीं ।

सवाल : – रमज़ान के रोजे की नीयत किस तरह की जाती है ?

✍जवाब : – नीयत दिल के इरादा का नाम है मगर जुबान से कह लेना मुसतहब है अगर रात में नीयत करे तो यूं कहे नवैतु अन असू म ग़दन लिल्लाहि तआला मिन फरजि रमज़ान और दिन में नीयत करे तो यूं कहे नवैतु अन असू म हाजल यौम | लिल्लाहि तआला मिन फर जि र म जान ।

सवाल : – रोजा इफ़तार करने के वक़्त कौन सी दुआ पढ़ी जाती है ?

✍जवाब : – यह दुआ पढ़ी जाती है । अल्लाहुम्म लक सुम्तु व बि क आमन्तु व अलै क तवक्कलतु व अला रिज़कि क अफ़तरतु | फगफिरली मा कद्दम्तु व मा अख्खरतु ।

अनवारे शरिअत सफा,119/120/121

जारी रहेगा इन्शाअल्लाह…..
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अनवारे शरिअत पोस्ट न. 58}
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सदकये फ़ित्र का बयान

सवाल : – सदक़ये फ़ित्र देना किस पर वाजिब होता है ?

✍जवाब : – हर मालिके निसाब पर अपनी तरफ़ से और अपनी हर नाबालिग औलाद की तरफ से एक एक सदक़ये फ़ित्र देना ईदुल फित्र के दिन वाजिब होता है ।

सवाल : – सदक़ये फ़ित्र की मिक़दार क्या है ?

✍जवाब : – सदक़ये फ़ित्र की मिकदार यह है कि गेंहूं या उसका आटा आधा साअ दें । और खजूर , मुनक्का या जौ या उस का आटा एक साअ दें और अगर इन चारों के अलावा कोई दूसरा गल्ला वगैरा देना चाहें तो कीमत का लिहाज़ करना यानी उस चीज़ का आधे साअ गेंहूं या एक साअ जौ की कीमत का होना ज़रूरी है ।

सवाल : – साअ कितनी मिकदार का होता है ?

✍जवाब : – आला दर्जा की तहकीक़ और इहतियात यह है कि साअ का वजन तीन सौ इक्कयावन ( 351 ) रुपया भर होता है और आधा साअ एक सौ पच्चहत्तर ( 175 ) रुपये अठन्नी भर ऊपर ।

सवाल : – नए वज़न से साअ कितने का होता है ?

जवाब : – नए वज़न से एक साअ चार किलो और तकरीबन 94 ग्राम होता है । और आधा साअ दो किलो तकरीबन 47 ग्राम का होता है ।

सवाल : – अगर गेहूं या जौ देने की बजाय उनकी कीमत दी जाये तो क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – गेंहूं या जौ देने के बजाय उनकी कीमत देना अफ़ज़ल हैं ।

सवाल : – सदक़ये फ़ित्र किन लोगों को देना जाइज़ है ?

✍जवाब : – जिन लोगों को ज़कात देना जाइज़ है उनको सदकये फ़ित्र भी देना जाइज़ है और जिन लोगों को ज़कात देना जाइज़ नहीं उनको सदक़ये फ़ित्र भी देना जाइज़ नहीं ।

अनवारे शरिअत सफा,117/118/119

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अनवारे शरिअत पोस्ट न. 57}
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ज़कात का माल किन लोगों पर खर्च किये जाए

सवाल : – ज़कात और उश्र का माल किन लोगों को दिया जाए ?

✍जवाब : – जिन लोगों को दिया जाता है उनमें से कुछ यह हैं ( 1 ) फ़कीर यानी वह शख़्स कि जिसके पास कुछ माल है लेकिन निसाब भर नहीं ।

( 2 ) मिसकीन यानी वह शख़्स कि जिसके पास खाने के लिए गल्ला और बदन छिपाने के लिए कपड़ा भी न हो ।

( 3 ) कर्जदार यानी वह शख्स कि जिसके जिम्मा क़र्ज़ हो और उसके पास कर्ज से फ़ाज़िल कोई माल बक़दरे निसाब न हो ।

( 4 ) मुसाफिर जिसके पास सफ़र की हालत में माल न रहा उसे ज़रूरत भर को ज़कात देना जाइज़ है ।

सवाल : – किन लोगों को ज़कात देना जाइज़ नहीं ?

✍जवाब : – जिन लोगों को ज़कात देना जाइज़ नहीं उनमें से कुछ यह हैं ।

( 1 ) मालदार यानी वह शख्स जो मालिके निसाब हो ।

( 2 ) बनी हाशिम यानी हज़रते अली , हज़रते जाफ़र , हज़रते अक़ील और हज़रते अब्बास व हारिस बिन अब्दुल मुत्तलिब की औलाद को देना जाइज़ नहीं ।

( 3 ) अपनी नस्ल और फरा यानी मां , बाप , दादा दादी , नाना नानी वगैरहुम और बेटा , बेटी , पोता , पोती , नवासा नवासी को ज़कात देना जाइज़ नहीं ।

( 4 ) औरत अपने शौहर को और शौहर अपनी औरत को अगरचे तलाक़ दे दी हो जब तक की इद्दत में हो ज़कात नहीं दे सकता ।

( 5 ) मालदार मर्द के नाबालिग बच्चे को ज़कात नहीं दे सकता और मालदार की बालिग औलाद को जबकि मालिके निसाब न हो दे सकता है ।

( 6 ) वहाबी या किसी दूसरे मुरतद बद मज़हब और काफ़िर को जकात देना जाइज नहीं ।

सवाल : – सैय्यद को ज़कात देना जाइज़ है या नहीं ?

✍जवाब : – सैयिद को ज़कात देना जाइज़ नहीं इसलिए कि वह भी बनी हाशिम में से हैं ।

सवाल : – ज़कात का पैसा मस्जिद में लगाना जाइज़ है या नहीं ?

जवाब : – ज़कात का माल मस्जिद में लगाना , मदरसा तामीर करना या उससे मैयित को कफ़न देना या कुआं बनवाना जाइज नहीं यानी अगर इन चीजों में जकात का माल खर्च करेगा तो जकात अदा न होगी ।

सवाल : – कुछ लोग अपने आप को खानदानी फ़कीर कहते हैं उनको ज़कात और गल्ला का उश्र देना जाइज़ है या नहीं ?

✍जवाब : – अगर वह लोग साहिबे निसाब हों तो उन्हें ज़कात और उश्र देना जाइज़ नहीं ।

सवाल : – किन लोगों को जकात देना अफजल है ?

✍जवाब : – ज़कात और सदक़ात में अफ़ज़ल यह है कि पहले अपने भाई बहनों को दे फिर उनकी औलाद को फिर चचा और फूफियों को फिर उनकी औलाद को फिर मामू और खाला को फिर उनकी औलाद को फिर दूसरे रिश्तादारों को फिर पड़ोसियों को फिर अपने पेशा वालों को फिर अपने शहर या गांव के रहने वालों को । और ऐस तालिबे इल्म को भी ज़कात देना अफ़ज़ल है जो इल्मेदीन हासिल कर रहा हो बशर्ते कि यह लोग मालिके निसाब न हों ।

अनवारे शरिअत सफा,115/116/117

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अनवारे शरिअत
{पोस्ट न. 56}

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
अल्लाह के नाम से शुरू जो बोहत मेहरबान रहमत वाला
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उश्र का बयान

❓सवाल : – किन चीज़ों की पैदावार में उश्र वाजिब है ?

✍जवाब : – गेंहूं , जौ , ज्वार , बाजरा , धान और हर किस्म के ग़ल्ले और अल्सी , कुसुम , अखरोट , बादाम और हर किस्म के मेवे , रुई , फूल , गन्ना , खरबूजा , तरबूज़ , खीरा , ककड़ी , बैगन और हर किस्म की तरकारी सब में उश्र वाजिब है । थोड़ा पैदा हो या ज्यादा ।

❓सवाल : – किन सूरतों में दसवां हिस्सा और किन सूरतों में बीसवां हिस्सा वाजिब होता है ?

✍जवाब : – जो पैदावार बारिश या ज़मीन की नमी से हो उसमें दसवां हिस्सा वाजिब होता है और जो पैदावार चरसे डोल , पम्पिंग मशीन या ट्यूबविल वगैरा के पानी से हो या खरीदे हुए पानी से हो उसमें बीसवां हिस्सा वाजिब होता है ।

❓सवाल : – क्या खेती के अख़राजात ( खर्चा ) हल बैल और काम करने वालों की मजदूरी निकाल कर दसवां बीसवां वाजिब होता ?

✍जवाब : – नहीं । बल्कि पूरी पैदावार का दसवां बीसवां वाजिब होता है ।

❓सवाल : – गौरमिन्ट को जो माल गुज़ारी दी जाती है वह उश्र की रक़म से मुजरा की जाएगी या नहीं ?

✍जवाब : – वह रकम उश्र से मुजरा नहीं की जाएगी ।

❓सवाल : – ज़मीन अगर बटाई पर दी तो उश्र किस पर वाजिब ?

✍जवाब : – ज़मीन अगर बटाई पर दी तो उन दोनों पर वाजिब ।

अनवारे शरिअत सफा,114/115

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अनवारे शरिअत
{पोस्ट न. 55}

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
अल्लाह के नाम से शुरू जो बोहत मेहरबान रहमत वाला
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जकात का बयान

❓सवाल : – ज़कात फ़र्ज़ है या वाजिब ?

✍जवाब : – ज़कात फर्ज है । उसकी फरजीयत का इन्कार करने वाला काफ़िर और न अदा करने वाला फ़ासिक और अदायगी मे देर करने वाला गुनाहगार मरदूदुश्शहादत हैं । ( गवाही न देने के योग ) नहीं ।

❓सवाल : – ज़कात फ़र्ज होने की शर्ते क्या हैं ?

✍जवाब : – चन्द शर्ते हैं । मुसलमान आकिल बालिग होना , माल बक़दरे निसाब का पूरे तौर पर मिलकियत में होना , निसाब का हाजते अस्लीया और किसी के बकाया से फारिग होना , मालेतिजारत या सोना चांदी होना और माल पर पूरा साल गुज़र जाना ।

❓सवाल : – सोना चांदी का निसाब क्या है और उनमें कितनी ज़कात फ़र्ज़ है ?

✍जवाब : – सोने का निसाब साढ़े सात तोला है जिसमें चालीसवां हिस्सा यानी सवा दो माशा जकात फर्ज है । और चांदी का निसाब साढ़े बावन तोला है जिस में एक तोला तीन माशा छ : रत्ती ज़कात फर्ज है । सोना चांदी के बजाय बाज़ार भाव से उनकी कीमत लगा कर रुपया वगैरा देना भी जाइज़ है ।

❓सवाल : – क्या सोना चांदी के जेवरात में भी ज़कात वाजिब होती ?

✍जवाब : – हां सोना चांदी के जेवरात भी ज़कात वाजिब होती है ।

❓सवाल : – तिजारती माल का निसाब क्या है ?

✍जवाब : – तिजारती माल की कीमत लगाई जाए फिर उससे सोना चांदी का निसाब पूरा हो तो उसके हिसाब से जकात निकाली जाए ।

❓सवाल : – कम से कम कितने रुपये हों कि जिन पर ज़कात वाजिब होती है ?

✍जवाब : – अगर सोना चांदी न हो और न माले तिजारत हो तो कम से कम इतने रुपये हों कि बाज़ार में साढ़े बावन तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोना खरीदा जा सके तो उन रुपयों की जकात वाजिब होती है ।

❓सवाल : – हाजते अस्लीया किसे कहते हैं ?

✍जवाब : – ज़िन्दगी बसर करने के लिए जिस चीज़ की ज़रूरत होती है जैसे जाड़े और गर्मियों में पहनने के कपड़े , खानादरी के सामान , पेशावरों के औजार और सवारी के लिए साईकिल और मोटर वगैरा यह सब हाजते अस्लीया में से हैं इनमें ज़कात वाजिब नहीं ।

❓सवाल : – निसाब का दैन से फ़ारिग होने का क्या मतलब है ?

✍जवाब : – इसका मतलब यह है कि मालिके निसाब पर किसी का बाक़ी न हो या इतना हो कि अगर बाक़ी अदा कर दे तो भी निसाब बचा रहे तो इस सूरत में ज़कात वाजिब है और अगर बाकी इतना हो कि अदा कर दे तो निसाब न रहे तो इस सूरत में ज़कात वाजिब नहीं ।

❓सवाल : – माल पर पूरा साल गुज़र जाने का क्या मतलब है ?

✍जवाब : – इसका मतलब यह है कि हाजते अस्लीया से जिस तारीख को पूरा निसाब बच गया उस तारीख से निसाब का साल शुरू हो गया फिर साले आइन्दा अगर उसी तारीख को पूरा निसाब पाया गया तो ज़कात देना वाजिब है । अगर दरमियाने साल में निसाब की कमी हो गयी तो यह कमी कुछ असर न करेगी ।

अनवारे शरिअत सफा,111/112/113/114

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अनवारे शरिअत
{पोस्ट न. 54}

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
अल्लाह के नाम से शुरू जो बोहत मेहरबान रहमत वाला
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नमाज़े जनाज़ा का बयान

❓सवाल : – नमाज़े जनाज़ा फ़र्ज़ है या वाजिब ?

✍जवाब : – नमाज़े जनाज़ा फ़र्ज़ किफ़ाया है यानी अगर एक शख्स ने पढ़ली तो सब छुटकारा पा गए और अगर खबर हो जाने के बाद किसी ने पढ़ी तो सब गुनाहगार हुए ।

❓सवाल : – जनाज़ा में कितनी चीजें फर्ज हैं ?

✍जवाब : – दो चीजें फर्ज हैं चार बार “ अल्लाहु अकबर ” कहना , कियाम यानी खड़ा होना ।

❓सवाल : – नमाज़े जनाज़ा में कितनी चीजें सुन्नत हैं ?

✍जवाब : – नमाज़े जनाज़ा में तीन चीजें सुन्नते मुअक्कदा हैं । अल्लाह तआला की सना , हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम पर दुरूद , और मैइत के लिए दुआ ।

❓सवाल : – नमाज़े जनाज़ा पढ़ने का तरीका क्या है ?

जवाब : – पहले नीयत करे । नीयत की मैंने नमाज़े जनाज़ा की चार तकबीरों के साथ अल्लाह तआला के लिए दुआ इस मैइत के लिए ( मुक़तदी इतना और कहे , पीछे इस इमाम के ) मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के फिर कानों तक दोनों हाथ उठाकर अल्लाहु अकबर कहता हुआ हाथ वापस लाए और नाफ के नीचे बांध ले फिर यह सना पढ़े जो उपर नमाज़ के तरीके मे बताया गया ।

फिर बगैर हाथ उठाए अल्लाहु अकबर कहे और दुरुद इब्राहीमी पढ़े जो पांच वक़्त की नमाज़ में पढ़े जाते हैं । फिर बगैर हाथ उठाए अल्लाहु अकबर कहे और बालिग का जनाज़ा हो तो यह दुआ पढ़े ।

अल्लाहुम्ममग्फिर लिहैयिना व मैयितिना व शहिदिना व गाइबिना सगीरिना व कबीरिना व ज क रिना व उनसाना अल्लाहुम्म मन अयैतहू मिन्ना फ़अह यही अलल्इस्लामि व मन तवफ्फैतहू मिन्ना फ़तवफ्फ़हू अलईमान “
اَللّٰہُمَّ اغْفِرْ لِحَیّ‌ِنَا وَمَیْ‌ِتِنَا وَشَاھِدِنَا وَغآ ںِٔبِنَا وَصَغِیْرِنَا وَسَبِیْرِنَا وَذَکَرِنَا وَاُنْثٰنَا اَللّٰہُمَّ مَنْ تَوَفَّیْتُهٗ مِنَّا فَتَوَفَّهٗ عَلَے الْاِیْمَان
इसके बाद चौथी तकबीर कहे फिर बगैर कोई दुआ पढ़े हाथ खेलकर सलाम फेर दे और नाबालिग बच्चे का जनाज़ाहो तो यह दुआ पढ़ी जाए

“ अल्लाहुम्मज अल्हु लना फ़रातन वज्अल्हुलना अज्रन व जुख्रव वज्अल्हु लना शफिअन व मुशफ्फआ “
اَللّٰہُمَّ اجْعَلْهُ لَنَا فَرَاطاًوَّاجْعَلْهُ لَنَا اَجْرًا وَّذُخْرًا وَّاجْعَلْهُ لَنَا شَافِعًا وَّمُشَفَّعًا
और अगर नाबालिग लड़की का जनाज़ा हो तो यह दुआ पढ़े ।
“ अल्लाहुम्मज अल्हा लना फ़रतन वज्अल्हा लना अज्रन व जुख्रव वज्अल्हा लना शा फिअतव् व मुशफ्फअतन ।
اَللّٰہُمَّ اجْعَلْهَا لَنَا فَرَطاً وَّاجـعَلْهَا لَنَا اَجْرًاوَّذُخْرًا وَّاجْعَلْهَا لَنَا شَافِعَۃً وَّمُشَفَّعَۃً

❓सवाल : – अस्र या फज़्र की नमाज़ के बाद जनाज़ा पढ़ना कैसा?

✍जवाब : – जाइज़ है और यह जो अवाम में मशहूर है कि नहीं जाइज है गलत है ।

❓सवाल : – क्या सूरज निकलने , डूबने और ज़वाल के वक़्त नमाजे जनाज़ा . पढ़ना मकरूह है ?

✍जवाब : – जनाज़ा अगर उन्हीं वक्तों में लाया गया तो नमाज़ उन्हीं वक़्तों में पढ़ें कोई कराहत नहीं कराहत उस सूरत में हैं कि पहले से तैयार मौजूद है और देर की यहां तक कि वक्ते कराहत आ गया ।

अनवारे शरिअत सफा,109/110/111

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 53)
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अकीका का बयान (भाग 2)

❓सवाल : – लड़का के अक़ीक़ा की क्या दुआ है ।

✍जवाब : – लड़का के अकीका की दुआ यह है
“ अल्लाहुम्म हाजिही अकीकतु बनी फुलां
اَللّٰہُمَّ عَقِیْکَۃُ ابْنِی فُلَاں
( फुलां की जगह बेटे का नाम ले अगर दूसरे के बेटे का अक़ीक़ा करे तो इबनी फुलां की जगह लड़का और उसके बाप का नाम ले )

दमुहा बिदमिही व लह मुहा बिलह मिही व शमुहा बिशहमिही व अजमुहा बिअजमिही वजिलदुहा बिजिलदिही व शअरुहा बिशअरिही अल्लाहुम्मजअल्हा फिदाँअल लिबनी फलां

دَمُہَا بِدَمِهٖ وَلَحْمُہَا بِلَحْمِهٖ وَشَحْمُہَا بِشَحْمِهٖ وَعَظْمُہَا بِعَظْمِهٖ وَجِلْدُھَا بِجِلْدِہٖ وَشَعْرُھَا بِشَعْرِهٖ اَلَلّٰہُمَّ اجْعَلْہَا فِدًأ‍ً لّ‌ِابْنِیْ فُلَاں

( इस जगह भी फुलां की जगह बेटे का नाम ले । और अगर दूसरे के लड़के का अकीका करे तो लि के बाद उसका और उसके बाप का नाम ले )

मिन्नारि व तक़बलहा मिन्हु कमा तकब्बल तहा मिन नबीइकल मुस्तफा वहबीबिकल मुजतबा अलैहित तहीयतु वस्सनाइ इन्न सलाती व नुसुकी व महयाय व ममाती लिल्लाहि रब्बिल आलमीन । ला शरीक लहू व बिजालि क उमिरतु व अना मिनल मुस्लिमीन । अल्लाहुम्म मिन क व ल क बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर ।
مِنَالنَّارِ وَتَقَبَّلْہَا مِنْهُ کَمَا تَقَبَّلْتَہَا مِنْ نَبِیّ‌ِکَ الْمُصْطَفٰی وَحَبِیْبِکَ الْمُجْتَبٰی عَلَیْهِ التَّحیَّۃُ وَالثَّنَا ءِ اِنَّ صَلَاتِی وَنُسُکِیْ وَمَحْیَا یَ وَمَمَا تِیْ لِلّٰهِ رَبّ‌ِالْعٰلَمِیْنَ۔لَاشَرِیْکَ لَهٗ وَبِذٰلِکَ اُمِرْتُ وَاَنَامِنَ المُسْلِمِیْنَ اَلَلّٰہُمَّ مِنْکَ وَلَکَ بِسْمِ اللّٰهِ اَللّٰهُ اَکْبَرْ
कह कर ज़बह करे ।

सवाल : – लड़की के अक़ीका की क्या दुआ है ।

जवाब : – लड़की के अक़ीका की दुआ यह है
अल्लाहुम्मा हाज़िही अक़ीक़तु बिनती फुलां
اَللّٰہُمَّ ھٰذِہٖ عَقِیْکَۃُ بِنْتِیْ فُلَاں
( फुलां की जगह अपनी बेटी का नाम लो । अगर दूसरे की लड़की का अक़ीक़ा करे तो बिनती फुलां की जगह लड़की और उसके बाप का नाम ले )

दुमुहा बिदमिहा व लहमुहा बिलह मिहा व शमुहा बिशहमिहा व अज्मुहा बिअफ्रिमहा व जिलदुहा बिजिलहिदा व शअरुहा बिशअरिहा । अल्लाहुम्मजअल्हा फिदाअन लिबिनती फुलां
دَمُہَا بِدَمِہَا وَلَحْمُہَا بِلَحْمِہَا وَشَحْمُہَا بِشَحْمِہَا وَعَظْمُہَا بِعَظْمِہَا وَجِلْدُھَا بِجِلْدِھَا وَشَعْرُھَا بِشَعْرِھَا اَلَلّٰہُمَّ اجْعَلْہَا فِدًآ‌ءً لِبِنْتِیْ فُلَاں
( इस जगह भी फुलां की जगह बेटी का नाम ले । अगर दूसरे की लड़की का अक़ीका करे तो लि , के बाद लड़की और उसके बाप का नाम ले )

मिन्नारि व तकब्बल्हा मिन्हा कमा तक़ब्बल्तहा मिन नबी इकलमुस्तफा व हबीबिकलमुज्तबा अलैहित्तहीयतु वस्सना इन्ना सलाती व नुसुकी व मह्याय व नमाति लिल्लाहि रब्बिल आलमीन । ला शरीक लहु व बिजालि क उमिरतु व अना मिनल मुसिलमीन अल्लाहुम्म मिन कव ल क बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर
مِنَالنَّارِ وَتَقَبَّلْتَہَا مِنْہَا کَمَا تَقَبَّلْتَہَا مِنْ نَبِیّ‌ِکَ الْمُصْطَفٰی وَحَبِیْبِکَ الْمُجْتَبٰی عَلَیْهِ التَّحیَّۃُ وَالثَّنَا ءِ اِنَّ صَلَاتِی وَنُسُکِیْ وَمَحْیَا یَ وَمَمَا تِیْ لِلّٰهِ رَبّ‌ِالْعٰلَمِیْنَ۔لَاشَرِیْکَ لَهٗ وَبِذٰلِکَ اُمِرْتُ وَاَنَامِنَ الْمُسْلِمِیْنَ اَلَلّٰہُمَّ مِنْکَ وَلَکَ بِسْمِ اللّٰهِ اَللّٰهُ اَکْبَرْ
कह जबह करे।

❓सवाल : – अगर यह दुआ न पढ़े तो अक़ीका होगा या नहीं ।

⁦✍⁩जवाब : – अगर यह दुआ न पढ़े और अकीका की नीयत से | बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर कह कर जबह कर दे तो भी अकीका हो जाएगा ।

( बहारे शरीअत )

* अनवारे शरिअत, सफा 106/107*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 52)
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अकीका का बयान (भाग 1)

❓सवाल : – अकीका किसे कहते हैं ।

✍जवाब : – बच्चा पैदा होने के शुक्रिया में जो जानवर ज़बह किया जाता है उसे अक़ीक़ा कहते हैं ।

❓सवाल : – किन जानवरों को अक़ीका में ज़बह किया जाता है ।

✍जवाब : – जिन जानवरों को कुर्बानी में ज़बह किया जाता है । उन्हीं जानवरों को अक़ीका में भी ज़बह किया जाता है ।

❓सवाल : – लड़का और लड़की के अकीका में कितने जानवर मुनासिब है ।

✍जवाब : – लड़का के अक़ीका में दो बकरा और लड़की के अक़ीक़ा में एक बकरी ज़बह करना मुनासिब है । और लड़का के अक़ीका में बकरियां और लड़की में बकरा किया जब भी हर्ज नहीं और पहुंचान न हो तो लड़का में एक बकरा भी ज़बह कर सकते हैं । और अक़ीक़ा में बड़ा जानवर जबह किया जाए तो लड़का के लिए सात हिस्से में से दो हिस्से और लड़की के लिए एक हिस्सा काफ़ी है ।

❓सवाल : – अवाम में मशहूर है कि बच्चा के मां बाप , दादा , दादी और नाना नानी अक़ीक़ा का गोश्त न खाएं क्या यह सही है ।

✍जवाब : – ग़लत है । माँ बाप , दादा दादी और नाना नानी वगैरा सब खा सकते हैं ।

❓सवाल : – अक़ीका के लिए कौन सा दिन बेहतर है ।

✍जवाब : – अक़ीका के लिए बच्चा की पैदाइश का सातवां दिन बेहतर है और सातवें दिन न कर सकें तो जब चाहें करे सुन्नत अदा हो जाएगी ।

* अनवारे शरिअत, सफा 106/107*

जारी रहेगा इंशाअल्लाह…..
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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 51)
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कुर्बानी का बयान

❓सवाल : – कुर्बानी करना किस पर वाजिब है ।_

✍जवाब : – कुर्बानी करना हर मालिके निसाब पर वाजिब है ।

❓सवाल : – कुर्बानी का मालिके निसाब कौन है ।

✍जवाब : – कुर्बानी का मालिके निसाब वह शख्स है जो साढ़े बावन तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोना या उनमें से किसी एक की कीमत का सामाने तिजारत या सामाने गैरे तिजारत का मालिक हो या उनमें से किसी एक की कीमत भर के रुपया का मालिक हो और ममलूका ( जो उसकी मिलकियत हो ) चीजें हाजते असलीया से ज़ाइद हों ।

❓सवाल : – मालिके निसाब पर अपने नाम से ज़िन्दगी में सिर्फ एक बार कुर्बानी करना वाजिब है या हर साल ।

✍जवाब : – अगर हर साल मालिके निसाब है तो हर साल अपने नाम से कुर्बानी करना वाजिब है और अगर दूसरे की तरफ़ से भी करना चाहिता हो तो उसके लिए दूसरी कुर्बानी का इन्तिज़ाम करे ।

सवाल : – कुर्बानी करने का तरीका क्या है ।

जवाब : – कुर्बानी करने का तरीका यह है कि जानवर को बायें पहलू पर इस तरह लिटाए कि मुंह उसका किबला की तरफ़ हो और अपना दायां पांव उस के पहलू पर रख कर तेज़ छुरी लेकर यह दुआ पढ़े ।

اِنّ‌ِی وَجَّہْتُ وَجْہِیَ لِلَّذِیْ فَطَرَ السَّمٰوٰتِ وَلْاَرْضِ عَلٰٖ مِلَّۃِ اِبْرَا ھِیْمَ حَنِنْفًا وَّمَآ اَنَا مِنَ الْمُشْر‍ِ کِیْنَ قُلْ اِنَّ صَلَاتِیْ وَنُسُکِیْ وَمَحْیَایَ وَمَمَا تِیْ لِلّٰهِ رَبّ‌ِ الْعَا لَمِیْنَ۔لَاشَرِیْکَ لَهٗ وَبِذَا لِکَ اُمِرْتُ وَاَنَامِنَ الْمُسْلِمِنْنَ اَلَلّٰہُمَّ مِنْکَ وَلَکَ۔بِسْمِ اللّٰهِ َاَللّٰهُ اَکْبَرْ

“ इन्नी वज्जहतु वजहिय लिल्लजी फ़तरस्समावाति वलअरद अला मिल्लती इब्राहिमा हनीफवमा अना मिनल मुशरिकीन क़ुल इन्न सलाती व नुसुकी वमहयाय व ममाती लिल्लाहि रब्बिल आलमीन लाशरीक लहु व बिजालि क उमिरतु व अना मिनल मुस्लिमीन अल्लाहुम्म बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर “

पढ़ कर ज़बह करे फिर यह दुआ पढ़े

اَللّٰہُمَّ تَقَبَّلْ مِنّ‌ِی کَمَا تَقَبَّلْتَ مِنْ خَلِیْلِکَ اِبْرَھِیْمَ عَلَیْهِ الصَّلَاۃُ وَالسَّلَامُ وَحَبِیْبِکَ مُحَمْدٍ ضَلَّی اللّٰهُ تَعَالَ عَلَیْهِ وَسَلَّمَ

“ अल्लाहुम्म तकब्बल मिन्नी कमा तकब्बल त मिन खलीलि क इब्रहीम अलैहिस्सालातु वस्सलामु व हबीबि क मुहम्मदिन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ” अगर दूसरे की तरफ़ से कुर्बानी करे तो “ मिन्नी ” के बजाय “ मिन ” कह कर उसका नाम ले ।

❓सवाल : – साहिबे निसाब अगर किसी वजह से अपने नाम कुर्बानी न कर सका और कुर्बानी के दिन गुजर गए तो उसके लिए क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – एक बकरी की कीमत उस पर सदका करना वाजिब ।

* अनवारे शरिअत, सफा 105/106*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 50)
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ईद व बक़रईद का बयान ( भाग 2 )

❓सवाल : – ईदुल फित्र के दिन कौन कौन से काम मुस्तहब हैं ।

✍जवाब : – हजामत बनवाना , नाखुन तरशवाना , गुस्ल करना , मिस्वाक करना , अच्छे कपड़े पहनना , खुश्बू लगाना , सुबह की नमाज मुहल्ला की मस्जिद में पढ़ना , ईदगाह सवेरे जाना , नमाज़ से पहले सदक़ये फित्र अदा करना , ईदगाह तक पैदल जाना , दूसरे रास्ते से वापस आना , नमाज के लिए जाने से पहले ताक यानी तीन या पांच या सात खजूरै खा लेना और खजूरौं न हों तो कोई मीठी चीज़ खाना , खुशी जाहिर करना , आपस में मुबारकबाद देना और ईदगाह इत्मिनान व विकार के साथ नीचे निगाह किए हुए जाना । यह सब बातें ईदुलफित्र के दिन मुस्तहब

❓सवाल : – ईदुल अज़हा के तमाम अहकाम ईदुलफित्र की तरह हैं या कुछ फर्क है ।

✍जवाब : – ईदुलफ़ित्र की तरह हैं सिर्फ बाज़ बातों में फर्क है और वह यह हैं।

( 1 ) ईदुलअज़हा में मुस्तहब यह है नमाज़ अदा करने से पहले कुछ न खाए अगरचे कुर्बानी न करनी हो और अगर खलिया तो कराहत नहीं।

( 2 ) ईदुलअज़हा के दिन ईदगाह के रास्ता में बुलन्द आवाज़ से तकबीर कहता हुआ जाए।

( 3 ) कुर्बानी करनी हो तो मुस्तहब यह है कि पहली से दसवीं ज़िलहिज्जा तक न हजामत बनवाये और न नाखुन तरशवाये।

( 4 ) नवीं ज़िलहिज्जा की फ़ज़्र से तेरहवीं की अस्र तक हर नमाजे फ़र्ज़ पंजगाना के बाद जो जमाअत मुस्तहब्बा के साथ अदा की गई हो एक बार बुलन्द आवाज़ से तकबीर कहना वाजिब है और तीन बार अफ़ज़ल । इसे तकबीरे तशरीक कहते हैं वह यह है ।

“ अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर लाइलाह इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर व लिल्लाहिलहम्दु “

* अनवारे शरिअत, सफा 103/104/105*

* बाकि अगले पोस्ट में।*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 49)
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ईद व बक़रईद का बयान

❓सवाल :- ईद व बक़रईद की नमाज़ वाजिब है या सुन्नत?

✍जवाब :- ईद व बक़रईद की नमाज़ वाजिब है मगर इनके वाजिब और जाइज़ होने की वही शर्त है जो जुमा के लिए है। सिर्फ फर्क इतना यह है कि जुमा का खुतबा नमाज़ से पहले है और ईदैन मे सुन्नत दूसरा फर्क यह है कि जुमा का खुतबा नमाज़ से पहले है और ईदैन का खुतबा नमाज़ के बाद और तीसरा फर्क यह है की ईदैन मे अज़ान व इक़ामत नहीं है सिर्फ दो बार “अस्सलातु जामिअह” कहने की इजाज़त है।

❓सवाल :- ईद व बक़रईद की नमाज़ का वक़्त कब से कब तक है।

✍जवाब :- ईद व बक़रईद की नमाज़ का वक़्त एक नेज़ा आफताब (सूरज) बुलन्द होने के बाद से जवाल के पहले तक है।

❓सवाल : – ईद की नमाज़ पढ़ने का तरीका क्या है ।

✍जवाब : – पहले इस तरह नीयत करे । नीयत की मैंने दो रक्अत नमाज़ वाजिब ईदुलफ़ित्र या ईदुल अज़हा की छ : तकबीरों के साथ अल्लाह तआला के लिए ( मुक़तदी इतना और कहे पीछे इस इमाम के ) मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ के फिर कानों तक हाथ उठाये और अल्लाहु अकबर कह कर हाथ बांध ले फिर सना पढ़े फिर कानों तक हाथ ले जाए और अल्लाहु अकबर कहता हुआ हाथ छोड़ दे । फिर हाथ उठाए और अल्लाहु अकबर कहता हुआ हाथ छोड़ दे फिर तीसरी बार हाथ उठाए और अल्लाहु अकबर कह कर हाथ बांध ले ।

इसके बाद इमाम आहिस्ता अऊज़ बिल्लाह व बिसमिल्लाह पढ़कर बुलन्द आवाज़ से अलहम्दु के साथ कोई सूरत पढ़े फिर रुकू और सजदे से फ़ारिग होकर दूसरी रक्अत में पहले अलहम्दु के साथ कोई सूरत पढ़े फिर तीन बार कानों तक हाथ ले जाए और हर बार अल्लाहु अकबर कहे और किसी मर्तबा हाथ न बांधे और चौथी बार बगैर हाथ उठाये अल्लाहु अकबर कहता हुआ रुकू में जाए और बाकी नमाज़ दूसरी नमाज़ों की तरह पूरी करे । सलाम फेरने के बाद दो खुतबे इमाम पढ़े फिर दुआ मागे खुतबये ऊला ( पहला खुतबा ) शुरू करने से पहले इमाम मिमबर पर खड़ा होकर 5 बार आहिस्ता अल्लाहु अकबर कहे कि यही सुन्नत है ।

* अनवारे शरिअत, सफा 102/103*

* बाकि अगले पोस्ट में।*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 48)
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जुमा का बयान

❓सवाल : – जुमा जाइज़ होने की दूसरी शर्त क्या हैं ।

✍जवाब : – दूसरी शर्त यह है कि बादशाह या उसका नायब जुमा कायम करे । और अगर इस्लामी हुकूमत न हो तो सबसे बड़ा सुन्नी सही अकीदा रखने वाला आलिम काइम करे कि बगैर उसाकी इजाज़त के जुमा नहीं कायम हो सकता । और अगर यह भी न हो तो आम लोग जिस को इमाम बनाएं वह कायम करे ।

❓सवाल : – जुमा जाइज़ होने की तीसरी और चौथी शर्त क्या है ।

✍जवाब : – तीसरी शर्त जुहर के वक़्त का होना है इसलिए वक़्त से पहले या बाद में पढ़ी न हुई या दरमियाने नमाज़ में अस्र का वक़्त आ गया जुमा बातिल हो गया जुहर की क़ज़ा पढ़े । और चौथी शर्त यह है कि जुहर के वक़्त में नमाज़ से पहले खुतबा हो जाये।

❓सवाल : – जुमा के खुतबा में कितनी बातें सुन्नत हैं ।

✍जवाब : – उन्नीस ( 19 ) बातें सुन्नत हैं खुतबा पढ़ने वाले का पाक होना , खड़े होकर खुतबा पढ़ना , खुतबा से पहले खुतबा पढ़ने वाले का बैठना खुतबा पढ़ने वाले का मिमबर पर होना , और सुनने वालों की तरफ़ मुंह और किबला की तरफ़ पीठ होना , हाज़िर रहने वालों का खुतबा पढ़ने वाले की तरफ़ मुतवज्जेह होना , खुतबा से पहले अऊजु बिल्ला आहिस्ता पढ़ना , इतनी बुलन्द आवाज़ से खुतबा पढ़ना कि लोग सुनें । लफ़्ज़ अलहम्दु से शुरू करना , अल्लाह तआला की सना करना , अल्लाह तआला की वहदानीयत ( इकताई ) और हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम की रिसालत की गवाही देना , हुजूर पर दुरूद भेजना , कम से कम एक आयत की तिलावत करना , पहले खुतबा में वाज व नसीहत होना , दूसरे में हम्द व सना , शहादत और दुरुद का इआदा करना , दूसरे में मुसलमानों के लिए दुआ करना , दोनों खुतबों का हल्का होना , और दोनों खुतबों के बीच तीन आयत की मिकदार बैठना ।

❓सवाल : – उर्दू में खुतबा पढ़ना कैसा है ।

✍जवाब : – अरबी के अलावा किसी दूसरी जबान में पूरा खुतबा पढ़ना या अरबी के साथ किसी दूसरी ज़बान को मिलाना दोनों बातें सुन्नते मुतावारिसा के खिलाफ़ और मकरूह हैं ।

❓सवाल : – खुतबा की अज़ान इमाम के सामने मस्जिद के अन्दर पढ़ना सुन्नत है या बाहर ।

✍जवाब : – खुतबा की अज़ान इमाम के समाने मस्जिद के बाहर पढ़ना सुन्नत है कि हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम और सहाबयकिराम के जमाना में खुतबा पढ़ने वाले के सामने मस्जिद के दरवाज़ा ही पर हुआ करती थी जैसा कि हदीस की मशहूर किताब अबूदाऊद जिल्द अव्वल सफा 162 में है कि हज़रते साइब यजीद रदीयाल्लाहु तआला अनहु से रिवायत है उन्होंने फ़रमाया कि जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जुमा के रोज़ मिमबर पर तशरीफ़ रखते तो हुजूर के सामने मस्जिद के दरवाजे पर अज़ान होती और ऐसा ही हज़रते अबू बक्र उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा के ज़माने में ।

इसी लिए फ़तावा काज़ी खां , आलम गीरी , बहरुर्राइक और फ़तहु – ल क़दीर वगैरा में मस्जिद के अन्दर अज़ान देने को मना फ़रमाया और तहतावी अलामराक़िल फलाह ने मकरूह लिखा ।

❓सवाल : – जुमा जाइज़ होने की पांचवी और छठी शर्त क्या है ।

✍जवाब : – पांचवी शर्त जमाअत का होना है जिसके लिए इमाम के अलावा कम से कम तीन मर्द का होना जुरूरी है । और छठी शर्त इज़्नेआम है इसका मतलब यह है कि मस्जिद का दरवाज़ा खोल दिया जाए ताकि जिस मुसलमान का जी चाहे आये किसी की रोक टोक न हो ।

 

* अनवारे शरिअत, सफा 99/100/101/102*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 47)
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जुमा का बयान

❓सवाल : – जुमा की नमाज़ फर्ज है या वाजिब ।

✍जवाब : – जुमा की नमाज़ फ़र्ज़ है और उसकी फ़र्जीयत जुहर से ज़्यादा मुअक्कद है ।

❓सवाल : – जुमा फर्ज होने की कितनी शरतें हैं ?

✍जवाब : – जुमा फर्ज होने को निम्नलिखित ग्यारह ( 11 ) शरते हैं।

( 1 – 2 ) शहर में मुकीम और आज़ाद होना इसलिए मुसाफ़िर और गुलाम पर जुमा फर्ज नहीं ।

( 3 ) सेहत यानी ऐसे मरीज़ पर जुमा फर्ज नहीं जो मस्जिद तक न जा सके ।

( 4 – 5 – 6 ) मर्द और आकिल बालिग होना यानी औरत , पागल , और नाबालिग पर जुमा फर्ज नहीं ।

( 7 – 8 ) अंखियारा होना और चलने पर कादिर होना इसलिए अंधे , लुंजे , और फालिज वाले पर कि जो मस्जिद तक न जा सकता हो जुमा फ़र्ज़ नहीं ।

( 9 ) कैद में न होना मगर जबकि किसी ( दैन ) क़र्ज़ की वजह से कैद किया गया हो और अदा करने पर कादिर हो तो फ़र्ज़ है ।

( 10 ) हाकिम या चोर वगैरा किसी ज़ालिम का ख़ौफ़ न होना ।

( 11 ) बारिश या आंधी वगैरा का इस कदर न होना कि जिससे नुकसान का क़वी अदेशा ( सख़्त ख़तरा ) न हो ।

❓सवाल : – जिन लोगों पर जुमा फ़र्ज़ नहीं है अगर वह लोग जुमा में शरीक हो जाएं तो उनकी नमाज़ हो जाएगी या नहीं ।

✍जवाब : – हो जाएगी यानी जुहर की नमाज़ उनके ज़िम्मे से उतर जाएगी ।

❓सवाल : – जुमा जाइज़ होने के लिए कितनी शरते हैं ।

✍जवाब : – जुमा जाइज़ होने के लिए छ : ( 6 ) शरतें हैं कि उनमें से अगर एक भी नहीं पाई गई तो जुमा होगा ही नहीं ।

❓सवाल : – जुमा जाइज़ होने की पहली शर्त क्या है ।

✍जवाब : – जुमा जाइज़ होने की पहली शर्त मिस्र या फ़नाये मिस्र होना है ।

❓सवाल : – मिस्र और फ़नाये मिस्र किसे कहते हैं ।

✍जवाब : – मिस्र वह जगह है कि जिसमें कई कूचे ( गली ) और बाज़ार हों और वह ज़िला या तहसील हो कि उसके मुतअल्लिक देहात गिने जाते हों । और मिस्र के आस पास की जगह जो मिस्र की मसलहतों के लिए हो उसे फ़नाए मिस्र कहते हैं जैसे स्टेशन कबरस्तान वगैरा ।

❓सवाल : – क्या गांव में जुमा की नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं है ।

✍जवाब : – नहीं । गांव में जुमा की नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं लेकिन जहां कायम हो बन्द न किया जाए कि अवाम जिस तरह भी अल्लाह व रसूल का नाम ले गनीमत्त है ।

( फ़तावा रज़वीया )

❓सवाल : – गांव में जुमा की नमाज़ पढ़ने से उस दिन की जुहर नमाज़ साक़ित होती है या नहीं ।

✍जवाब : – नहीं । गांव में जुमा की नमाज़ पढ़ने से उस दिन की जुहर की नमाज़ नहीं साक़ित होती ।

❓सवाल : – कुछ लोग गांव में जुमा पढ़ने के बाद चार रक्अत इहतियातु ज्जुहर पढ़ते हैं क्या यह सही है ।

✍जवाब : – नहीं बल्कि गांव में इस के बजाय चार रक्अत जुहर फ़र्ज़ पढ़ना जरूरी है अगर नहीं पढ़ेगा तो गुनाहगार होगा ।

* अनवारे शरिअत, सफा 97/98/99*

* बाकी अगले पोस्ट में*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 46)
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मुसाफिर की नमाज़ का बयान

❓सवाल : – मुसाफिर किसे कहते हैं ?

✍जवाब : – शरीअत में मुसाफिर वह शख्स है जो तीन रोज़ की राह जाने के इरादा से बस्ती ( अपने रहने के स्थान ) से बाहर हुआ ।

❓सवाल : – मील के हिसाब से तीन रोज़ की राह की मिकदार कितनी है ।

✍जवाब : – खुश्की में तीन रोज़ के राह की मिकदार 57 3 / 8 मील है ( यानी तकरीबन 92 किलो मीटर )

❓सवाल : – अगर कोई शख्स मोटर , रेलगाड़ी या हवाई जहाज़ वगैरा से तीन दिन की राह थोड़े वक़्त में ले कर ले तो मुसाफ़िर होगा या नहीं ।

✍जवाब : – मुसाफिर हो जाएगा ख़्वाह कितनी ही जल्दी तैय करे ।

❓सवाल : – मुसाफ़िर पर नमाज के बारे में क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – मुसाफ़िर पर वाजिब है कि कस्र करे यानी जुहर , अस्र और इशा चार रक्अत वाली फर्ज़ नमाज़ को दो रक्अत पढ़े कि उसके हक़ में दो ही रक्अत पूरी नमाज़ है ।

❓सवाल : – अगर किसी ने क़सदन ( जानबूझ कर ) चार ही पढ़ी तो क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – अगर जान बूझ कर चार पढ़ी और दोनों कादा ( बैठक ) किया तो फ़र्ज़ अदा हो गया और आखरी दो रक्अतें नफ्ल हो गई मगर गुनाहगार व मुस्तक्केिनार हुआ तौबा करे और दो रक्अत पर कादा न किया तो फ़र्ज़ अदा न हुआ ।

❓सवाल : – फ़ज़्र , मगरिब और वित्र में कस्र है कि नहीं है ।

✍जवाब : – नहीं फ़ज़्र , मगरिब , और वित्र में क़स्र नहीं है ।

❓सवाल : – सुन्नतों में क़स्र है या नहीं । जवाब : – सुन्नतों में क़स्र नहीं । अगर मौका हो तो पूरी पढ़े वर्ना मुआफ हैं ।

 

❓सवाल : – मुसाफ़िर किस वक़्त से नमाज़ में कस्र शुरू करे ।

✍जवाब : – मुसाफिर जब बस्ती की आबादी से बाहर हो जाए तो उस वक़्त से नमाज़ में कस्र शुरू करे ।

❓सवाल : – बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन पर कस्र करेगा या नहीं ।

✍जवाब : – अगर आबादी से बाहर हों और तीन दिन की राह तक सफर का इरादा भी हो तो बस स्टैण्ड और रेलवे स्टेशन पर कस्र करेगा वर्ना नहीं ।

❓सवाल : – अगर दो ढाई दिन की राह के इरादा से निकला वहां पहुंच कर फिर दूसरी जगह का इरादा हुआ वह भी तीन दिन से कम का रास्ता है तो वह श्राद्ध मुसाफिर होगा या नहीं ।

✍जवाब : – वह शख्स शरअन मुसाफ़िर न होगा उस वक़्त तक कि जहां से चले वहां से तीन दिन की राह का इकट्ठे इरादा न करे यानी अगर दो दो ढाई ढाई दिन की राह के इरादा से चलता रहा तो इसी तरह अगर सारी दुनियां घूम आए मुसाफिर न होगा ।

❓सवाल : – मुसाफिर कब तक क़स्र करता रहे ।

✍जवाब : – मुसाफिर जब तक किसी जगह पन्द्रह ( 15 ) दिन या इससे ज़्यादा ठहरने की नीयत न करे या अपनी बस्ती में न पहुंच जाए कस्र करता रहे ।

❓सवाल : – मुसाफिर अगर मुकीम के पीछे नमाज़ पढ़े तो क्या करे ।

✍जवाब : – मुसाफिर अगर मुक़ीम के पीछे नमाज़ पढ़े तो पूरी पढ़े कस्र न करे ।

❓सवाल : – मुक़ीम अगर मुसाफ़िर के पीछे नमाज़ पढ़े तो क्या करे ।

✍जवाब : – मुकीम अगर मुसाफ़िर के पीछे पढ़े तो इमाम के सलाम फेर देने के बाद अपनी बाकी दो रक्अतें पढ़े और उन रक्अतों में किराअत बिल्कुल न करे बल्कि सूरये फ़ातिहा पढ़ने की मिक़दार चुप चाप खड़ा रहे ।

 

* अनवारे शरिअत, सफा 95/96/97*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 45)
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सजदए तिलावत का बयान

❓सवाल : – सजदए तिलावत किसे कहते हैं ।

✍जवाब : – कुरआन में चौदा मुक़ामात ( जगह ) ऐसे हैं कि जिन के पढ़ने या सुनने से सजदा करना वाजिब होता है उसे सजदए तिलावत कहते हैं ।

❓सवाल : – सजदए तिलावत का तरीका है ।

✍जवाब : – सजदए तिलावत का मसनून तरीका यह है की खड़ा होकर अल्लाहु अकबर कहता हुआ सजदा में जाए और कम से कम तीन बार सुबहान रब्बियल अअ़ला कहे फिर अल्लाहु अकबर कहता हुआ खड़ा हो जाए बस ।नसमें अल्लाहु अकबर कहते हुए न हाथ उठाना है और न इसमें तशहहुद है और न सलाम ।

❓सवाल : – अगर बैठकर सजदा किया तो सजदा अदा होगा या नहीं ।

✍जवाब : – अदा हो जाएगा मगर मसनून यही है कि खड़ा हो कर सजदा में जाए और सजदा के बाद फिर खड़ा हो ।

❓सवाल : – सजदए तिलावत के शाराइत क्या हैं ।

✍जवाब : – सजदए तिलावत के लिए तहरीमा के अलावा वह तमाम शर्तें हैं जो नमाज़ के लिए हैं मसलन ( जैसे ) तहारत , सत्रे औरत , इसतिकबाले किबला और नीयत वगैरा ।

❓सवाल : – सजदए तिलावत की नीयत किस तरह की जाती है ।

✍जवाब : – नीयत की मैंने सजदए तिलावत की अल्लाह तआला के वास्ते मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के अल्लाहु अकबर ।

❓सवाल : – उर्दू जुबाना में आयते सदजा का तर्जुमा पढ़ा तो सजदा वाजिब होगा या नहीं ।

✍जवाब : – उर्दू जुबान या किसी जुबान में आयते सजदा का तर्जुमा पढ़ने और सुनने से भी सजदा वाजिब होता है ।

❓सवाल : – क्या आयते सजदा पढ़ने के बाद फ़ौरन सजदा करना वाजिब होता है ।

✍जवाब : – अगर आयते सजदा नमाज़ के बाहर पढ़ी है तो फौरन सजदा कर लेना वाजिब नहीं हां बेहतर है कि फौरन कर ले और वजू हो तो ताखीर मकरूह तनजीही है ।

❓सवाल : – अगर नमाज़ में आयते सजदा पढ़ी तो क्या हुक्म है ।

जवाब : – अगर नमाज़ में आयते सजदा पढ़ी तो फौरन सजदा कर लेना वाजिब है । तीन आयत से ज्यादा की ताखीर करेगा तो गुनाहगार होगा । और अगर फौरन नमाज़ का सजदा कर लिया यानी आयते सजदा के बाद तीन आयत से ज्यादा न पढ़ा और रुकू करके सजदा कर लिया तो अगरचे सजदए तिलावत की नीयत न हो सजदा अदा हो जाएगा ।

( बहारे शरीअत )

❓सवाल : – एक मज्लिस में सजदा की एक आयत को कई बार पढ़ा तो एक सजदा वाजिब होगा या कई सजदा ।

✍जवाब : – एक मज्लिस में सजदा की एक आयत को कई बार – बार पढ़ने या सुनने से एक ही सजदा वाजिब होता है ।

❓सवाल : – मज्लिस में आयत पढ़ी या सुनी और सजदा कर लिया फिर उसी मज्लिस में वही आयत पढ़ी या सुनी तो दूसरा सजदा वाजिब होगा या नहीं ।

✍जवाब : – दूसरा सजदा नहीं वाजिब होगा वही पहला सजदा काफ़ी है ।

❓सवाल : – मज्लिस बदलने और न बदलने की सूरतें क्या हैं ?

जवाब – दो एक लुकमा खाना , दो एक घूंट पीना , खड़ा हो जाना , दो एक कदम चलना , सलाम का जवाब देना , दो एक बात करना , और मस्जिद या मकान के एक गोशा से दूसरे गोशा की तरफ चलना इन तमाम सूरतों में मज्लिस न बदलेगी । हां अगर मकान बड़ा है जैसे शाही महल तो ऐसे मकान में एक गोशा से दूसरे में जाने से बदल जाएगी , और तीन लुकमा खाना , तीन घूंट पीना , तीन कलिमे बोलना , तीन क़दम मैदान में चलना और निकाह या खरीदो फरोख्त करना इन तमाम सूरतों में मज्लिस बदल जाएगी ।

 

* अनवारे शरिअत, सफा 92/93/94*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 44)
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बीमार की नमाज़ का बयान

❔सवाल : – अगर बीमारी के सबब खड़े होकर नमाज़ नहीं पढ़ सकता है तो क्या करे ?

✍जवाब : – अगर खड़े होकर नमाज़ नहीं पढ़ सकता कि मर्ज बढ़ जाएगा या देर में अच्छा होगा या चक्कर आता है या खड़े होकर पढ़ने से पेशाब का क़तरा आएगा या बहुत शदीद दर्द नाक़ाबिले बर्दाश्त हो जाएगा तो इन सब सूरतों में बैठ कर नमाज़ पढ़े ।

❔सवाल : – अगर किसी चीज़ की टेक लगाकर खड़ाहो सकता है तो इस सूरत में क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – अगर खादिम ( नौकर ) या लाठी या दीवार वगैरा पर टेक लगाकर खड़ा हो सकता है तो फ़र्ज़ है कि खड़ा होकर पढ़े । इस सूरत में अगर बैठ कर नमाज़ पढ़ेगा तो नहीं होगी ।

❔सवाल : – अगर कुछ देर खड़ा हो सकता है तो उसके लिए क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – अगर कुछ देर भी खड़ा हो सकता है अगरचे इतना ही कि खड़ा होकर अल्लाहु अकबर कहले तो फ़र्ज़ है कि खड़ा होकर उतना कहे फिर बैठे वर्ना नमाज़ नहीं होगी ।

❔सवाल : – बीमारी के सबब अगर रुकू सजदा भी न कर सकता हो तो क्या करे ।

✍जवाब : – ऐसी सूरत में रुकू सजदा इशारा से करे मगर रुकू के इशारा से सजदा के इशारा में सर को ज्यादा झुकाए ।

❔सवाल : – अगर बैठ कर भी नमाज़ न पढ़ सकता हो तो क्या करे ?

✍जवाब : – ऐसी सूरत में लेट कर नमाज़ पढ़े इस तरह कि चित लेट कर किबला की तरफ़ पांव करे मगर पांव न फैलाए बल्कि घुटने खड़े रखे और सर के नीचे तकिया वगैरा रख कर जरा ऊँचा करले और रुकू सजदा सर झुका कर इशरा से करे यह सूरत अफ़ज़ल है । और यह भी जाइज़ है कि दाहिने या बाए करवट लेटकर मुंह किबला की तरफ़ करे ।

❔सवाल : – अगर सर से इशारा भी न हो सके तो क्या करे ?

✍जवाब : – अगर सर से भी इशारान हो सके तो नमाज़ साक़ित हो जाती है फिर अगर नमाज़ के छ : ( 6 ) वक़्त इसी हालत में गुज़र जाएं तो कजा भी साक़ित हो जाती है ।

* अनवारे शरिअत, सफा 90/91/92*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 43)
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सजदये सह व का बयान

❓सवाल : – रुकू , सजदा या कादा में भूल कर कुरआन पढ़ दिया तो क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – इस सूरत में भी सजदये सह व् वाजिब है ।

❓सवाल : – अगर फ़र्ज़ का कादए अखीरा ( पिछली बैठक ) नहीं किया और भूल कर खड़ा हो गया तो क्या करे ।

❓जवाब : – जब तक उस रक्अत का सजदा न किया हो लौट आए और अत्तहीयात पढ़ कर दाहिनी तरफ़ सलाम फेरे और सजदये सह व् करे । और अगर उस रक्अत का सजदा कर लिया तो सजदा से सर उठाते ही वह फ़र्ज़ नफ्ल हो गया इसलिए अगर चाहे तो अलावा मगरिब के दूसरी नमाज़ों में एक रक्अत और मिलाए ताकि रक्अत ताक़ न रहे ।

❓सवाल : – अगर सुन्नत और नफ्ल का कादा ( बैठक ) न किया और भूल कर खड़ा हो गया तो क्या करे ।

✍जवाब : – सुन्नत और नफ्ल का हर कादा बैठक ) कादए अखीरा है यानी फर्ज है । अगर कादा न किया और भूल कर खड़ा हो गया तो जब तक उस रक्अत का सजदा न करे लौट आए और सजदये सह करे ।

❓सवाल : – अगर कादए अखीरा ( पिछली बैठक ) में अत्तहीयातु व रसूलुहु तक पढ़ने के बाद भूल कर खड़ा हो गया तो क्या करे ।

✍जवाब : – अगर बक़द्रे तशहहुद कादए अखीरा करने के बाद भूल कर खड़ा हो गया तो जब तक उस रक्अत का सजदा न किया हो लौट आए और दोबारा अत्तहीयात पढ़े बगैर सजदए सह् व् करे ! फिर तशहहुद वगैरा पढ़ कर सलाम फेर दे ।

❓सवाल : – कादयेऊला ( पहली बैठक ) में भूल कर दूरूद शरीफ़ भी पढ़ लिया तो क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – अगर “ अल्लाहुम्म सल्लि अलामुहम्मदिन ” या ” अल्लाहुम्म सल्लि अला सैयिदेना ” तक पढ़ा या इस से ज़्यादा पढ़ा तो सजदए सह व् वाजिब है और अगर उससे कम पढ़ा तो नहीं । मगर यह हुक्म सिर्फ़ फ़र्ज , वित्र और जुहर व जुमा की पहली चार रक्अत वाली सुन्न्तों के लिए है रहे दीगर सुनन व नवाफिल तो उनके कादएऊला में भी दुरूद शरीफ पढ़ने का हुक्म ।

❓सवाल : – जहरी नमाज़ में भूलकर आहिस्ता पढ़ दिया या सिर्री नामाज़ में जहर से पढ़ दिया तो क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – अगर जहरी ( आवाज़ से पढ़ने वाली ) नमाज़ में इमाम ने भूल कर कम से कम एक आयत आहिस्ता पढ़ दी या सिरी यानी जिसमें किराअत आहिस्ता पढ़ी जाती है ऐसी नमाज़ में जह र से पढ़ दिया तो सजदए सह व् वाजिब है और अगर एक कलिमा पढ़ा तो मुआफ़ है और मुनफ़रिद ( अकेला नमाज़ पढ़ने वाला ने सिर्री नमाज़ में एक आयत जह र से पढ़ी तो सजदए सह व वाजिब है और जह र में आहिस्ता पढ़ी तो नहीं ।

❓सवाल : – किराअत वगैरा किसी मौका पर ठहर कर सोचने लगा तो क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – अगर एक रुक्न यानी तीन बार सुब्हानल्लाह कहने को मिकदार वक्फा ( ठहरना ) हुआ तो सजदए सह व वाजिब ।

❓सवाल : – जिस पर सजदए सह् व होना वाजिब था अगर सह व होना याद न था और नमाज़ खत्म करने की नीयत से सलाम फेर दिया तो क्या करे ।

✍जवाब : – अगर सह व होना याद न था और सलाम फेर दिया तो अभी नमाज़ से बाहर नहीं हुआ इसलिए जब तक कलाम वगैरा कोई फेल ( कार्य ) मनाफीए नमाज़ ( जो नमाज़ को फ़ासिद करे ) न किया हो सजदा करे और फिर तशह हुद वगैरा पढ़ कर सलाम फेर दे ।

* अनवारे शरिअत, सफा 88/89/90*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 42)
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सजदये सह व का बयान

❓सवाल : – सजदये सह व किसे कहते हैं ।

✍जवाब : – सह व के माना हैं भूलने के । कभी नमाज़ में भूल से कोई खास खराबी पैदा हो जाती है उस खराबी को दूर करने के लिए कादए अख़ीरा में दो सजदे किए जाते हैं इनको सजदये सह व कहते हैं ।

❓सवाल : – सजदये सह व का तरीका क्या है ।

✍जवाब : – सजदये सह व का तरीका यह है कि आखिरी कादा ( बैठक ) में अत्तहीयतु व रसूलुहू तक पढ़ने के बाद सिर्फ दाहिनी तरफ़ सलाम फेर कर दो सजदे करे फिर तशहहुद वगैरा पढ़ कर सलाम फेर दे ।

❓सवाल : – किन बातों से सजदये सह व् वाजिब होता है ।

✍जवाब : – जो बातें कि नमाज़ में वाजिब हैं उनमें से किसी एक के भूल कर छूट जाने से सजदये सह व् वाजिब होता है । जैसे फ़र्ज़ की पहली या दूसरी रक्अत में अलहम्दु या सूरत पढ़ना भूल गया या सुन्नत और नफ़्ल की किसी रक्अत में अलहम्दु या सूरत पढ़ना भूल गया या अलहम्दु से पहले सूरत पढ़ दी तो इन सूरतों में सजदये सह व् करना वाजिब होता है ।

❓सवाल : – फ़र्ज़ और सुन्नत के छूट जाने से सजदये सह व् वाजिब होता है या नहीं ।

✍जवाब : – फ़र्ज़ छूट जाने से नमाज़ फ़ासिद हो जाती है । सजदये सह व् से उसकी तलाफ़ी नहीं हो सकती इसलिए फिर से पढ़ना पड़ेगा । और सुन्नत व मुसतहब जैसे तऔउज़ तसमिया , सना आमीन और तकबीरात इन्तिकाल के छूट जाने से सजदये सह व वाजिब नहीं होता बल्कि नमाज़ हो जाती है मगर दोबारा पढ़ना मुसतहब है ।

❓सवाल : – किसी वाजिब को क़सदन ( जान बूझकर ) छोड़ दिया तो सजदये सह व से तलाफ़ी होगी या नहीं ।

✍जवाब : – किसी वाजिब को क़सदन ( जान बूझकर ) छोड़ दिया तो सजदये सह व् से उस नुक्सान की तलाफ़ी नहीं होगी बल्कि नमाज़ को दोबारा पढ़ना वाजिब होगा । इसी तरह अगर भूलकर किसी वाजिब को छोड़ दिया और सजदये सह व् न किया जब भी नमाज़ का दोबारा पढ़ना वाजिब है ।

❓सवाल : – एक नमाज़ में कई वाजिब छूट गए तो क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – इस सूरत में भी सह् व् के वही दो सजदे काफ़ी हैं ।

❓सवाल : – फ़र्ज़ या वित्र में कादये ऊला ( पहली बैठक ) भूल कर तीसरी रक्अत के लिए खड़ा हो रहा था कि याद आ गया तो इस सूरत में क्या करे ।

✍जवाब : – अगर अभी सीधा नहीं खड़ा हुआ है तो बैठ जाए और सजदये सह् व् न करे । और अगर सीधा खड़ा हो गया तो न लौटे और आखिर में सजदये सह व् करे और अगर लौटा तो इस सूरत में भी सजदये सह व वाजिब होता है ।

 

* अनवारे शरिअत, सफा 86/87*

* बाकी अगले पोस्ट में*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 41)
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-क़ज़ा नमाज़ का बयान-

❓सवाल : – अगर पांच या इससे कम नमाजै कज़ा हों तो उन्हें कब पढ़ना चाहिए ।

✍जवाब . – जिस शख्स की पांच या उससे कम नमा कजा हों वह साहबे तरतीब है । उस पर लाज़िम है कि वक़्ती नमाज़ से पहले क़ज़ा नमाजो बित्ततरतीब पढ़े अगर वक़्त में गुंजाइश होते हुए वस्ती नमाज़ पहले पढ़ली तो न हुई इस मसला की मज़ीद तफ़सील बहारे शरीअत में देखनी चाहिए ।

❓सवाल . – अगर कोई नमाज़ क़ज़ा हो जाए जैसे फ़ज़्र की नमाज़ तो नीयत किस तरह करनी चाहिए ।

✍जवाब : – जिस रोज़ और जिस वक़्त की नमाज़ क़ज़ा हो उस रोज़ और उस वक़्त की नीयत क़ज़ा में ज़रूरी है । जैसे अगर जुमा के रोज़ फ़ज़्र की नमाज़ क़ज़ा हो गई तो इस तरह नीयत करे । नीयत की मैने दो रक्अत नमाज़ क़ज़ा जुमा की फर्ज फज्र की अल्लाह त़आला के लिए मुंह मेरा काबा शरीफ के अल्लाहु अकबर इसी पर दुसरी कज़ा नामाजों की नीयतो को समझा लेना चाहिए।

❓सवाल : – अगर महीना दो महीना या दो साल की नमाज़ कजा हो जाए तो नीयत किस तरह करनी चाहिए ।

✍जवाब : – ऐसी सूरत में जो नमाज़ जैसे जुहर की कज़ा पढ़नी है तो इस तरह नीयत करे । नीयत की मैंने चार रक्अत नमाज़ कज़ा जो मेरे ज़िम्मे बाकी है उनमे से पहले जुहर फर्ज की अल्लाह ताआला के लिए मुह मेरा तरफ़ काबा शरीफ के अल्लाहु अकबर । और मगरिब की पढ़नी हो तो यूं नीयत करे नीयत की मैंने तीन रकअत नमाज़ क़ज़ा जो मेरे ज़िम्मे बाकी है उनमें से पहले मगरिब फ़र्ज़ की अल्लाह तआला के लिए मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के अल्लाहु अकबर । इसी तरीके पर दूसरी कज़ा नमाज़ों की नीयतों को समझना चाहिए ।

❓सवाल : – क्या क़ज़ा नमाज़ों की रक्अतें भी खाली और भरी यानी बगैर सूरत और सूरत के साथ पढ़ी जाती है ।

✍जवाब : – हां जो रकअतें अदा में सूरत के साथ पढ़ी जाती हैं वह क़ज़ा में भी सूरत के साथ पढ़ी जाती हैं और जो रक्अते अदा में बगैर सूरत के पढ़ी जाती है वह कजा में भी बगैर सूरत के पढ़ी जाती हैं ।

❓सवाल : – बाज़ लोग शबे कद्र या रमजान के आखिरी जुमा को कजाए उम्री के नाम से दो या चार रक्अत पढ़ते हैं और यह समझते हैं कि उम्र भर की कजा इसी एक नमाज़ से अदा हो गई तो उसके लिए क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – यह ख्याल बातिल है । तावक़्ते कि हर एक नमाज़ की कज़ा अलग अलग न पढ़ेंगे तो छुटकारा न पाएंगे ।

* अनवारे शरिअत, सफा 84/85*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 40)
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-क़ज़ा नमाज़ का बयान-

सवाल : – अदा और कज़ा किसे कहते हैं ।

✍जवाब : – किसी इबादत को उसके वक़्ते मुकर्ररह पर करने को अदा करते हैं और वक़्त गुज़र जाने के बाद अमल करने को कज़ा कहते हैं ।

❓सवाल : – किन नमाज़ों की कज़ा ज़रूरी है ।

✍जवाब : – फर्ज नमाज़ों की कज़ा फ़र्ज़ है , वित्र की कज़ा वाजिब है और फ़ज्र की सुन्नत अगर फर्ज के साथ क़ज़ा हो और ज़वाल से पहले पढ़े तो फर्ज के साथ सुन्नत भी पढ़े और जवाल के बाद पढ़े तो सुन्नत की क़ज़ा नहीं और जुहर वा जुमा के पहले की सुन्नतें कज़ा हो गई और फ़र्ज़ पढ़ली अगर वक़्त खत्म हो गया हो तोइन सुन्नतों की कज़ा नहीं और अगर वक़्त बाक़ी है तो पढ़ें और अफ़ज़ल यह है कि पिछली सुन्नतें पढ़ने के बाद उनको पढ़े ।

❓सवाल : – छूटी हुई नमाज़ किस वक़्त पढ़नी चाहिए ।

✍जवाब : – छ : ( 6 ) या उससे ज्यादा छूटी हुई नमाजें पढ़ने के लिए कोई वक़्त मुकर्रर नहीं है हां जल्द पढ़ना चाहिए ताखीर देरी ) नहीं करना चाहिए और उम्र में जब भी पढ़ेगा छुटकारा पा जायेगा लेकिन सूरज निकलने सूरज डूबने और ज़वाल के वक्त क़ज़ा नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं ।

 

* अनवारे शरिअत, सफा 83/84*

बाक़ी अगले पोस्ट में

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 39)
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तरावीह का बयान

❓सवाल : – तरावीह सुन्नत है या नफ्ल ।

✍जवाब : – तरीवीह मर्द व औरत सब के लिए सुन्नते मुअक्किदा है । उसका छोड़ना जाइज़ नहीं ।

❓सवाल : – तरावीह की कितनी रक्अतें हैं ।

✍जवाब : – तरावीह की बीस ( 20 ) रक्अते हैं ।

❓सवाल : – बीस रक्अतें तरावीह में क्या हिकमतें है ।

✍जवाब : – बीस रक्अत तरावीह में हिकमत यह है कि सुन्नतों से फ़राइज़ और वाजिबात की तकमील होती है और सुबह से शाम तक फ़र्ज व वाजिब कुल बीस रक्अतें हैं तो मुनासबि हुआ कि तरावीह भी बीस ( 20 ) रक्अतें हो ताकि मुकम्मल करने वाली सुन्नतों की रक्अत और जिनकी तकमील होती है यानी फ़र्ज़ व वाजिब की रक्अत की तादाद बराबर हो जाए ।

❓सवाल : – तरावीह की बीस रक्अतें किस तरह पढ़ी जाएं ।

✍जवाब : – बीस रक्अतें दस सलाम से पढ़ी जाएं यानी हर दो रक्अत पर सलाम फेरे और हर तरावीह यानी चार रक्अत पर इतनी देर बैठना मुसतहब है कि जितनी देर में चार रक्अतें पढ़ी।

❓सवाल : – तरावीह की नीयत किस तरह की जाए ।

✍जवाब : – नीयत की मैंने दो रक्अत नमाज़ तरावीह सुन्नत रसूलुल्लाह की अल्लाह तआला के लिए ( मुक़तदी इतना और कहे पीछे इस इमाम के ) मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के अल्लाहु अकबर ।

❓सवाल : – तरावीह की हालत में चुपका बैठा रहे या कुछ पढ़े ।

✍जवाब : – इखतियार है चाहे चुपका बैठा रहे चाहे कालमह या दुरूद शरीफ़ पढ़े और आम तौर से यह दुआ पढ़ी जाती है । ” सुबहा न जिलमुल्किवल मलकूति सुबहा न जिला इज्जति वल अजमति वल हैबति वल कुदरति वल किबरियाइ वल जबरूत । सुबहा नलमलिकिल हैयिल्लजी ला यनामु वलायमूत । सुब्बूहुन कुहूसुन रब्बुना व रब्बुल मलाइकति वर्रूह “

❓सवाल : – तरावीह जमाअत से पढ़ना कैसा है ।

✍जवाब : – तरावीह जमाअत से पढ़ना सुन्नते किफ़ाया है । यानी अगर मस्जिद में तरावीह की जमाअत न हुई तो मुहल्ला के सब लोग गुनाहगार हुए और अगर कुछ लोगों ने मस्जिद में जमाअत से पढ़ ली तो सब लोग छुटकारा पा गए ।

❓सवाल : – तरावीह में कुरआन मजीद खत्म करना कैसा है ।

✍जवाब : – पूरे महीने की तरावीह में एक बार कुरआन मजीद खत्म करना सुन्नते मुअक्कदा है । और दो बार खत्म करना अफ़ज़ल है और तीन बार खत्म करना मजीद ( ज्यादा ) रखत है बशर्ते कि मुक़तदियों को तकलीफ़ न हो मगर एक बार खत्म करने में मुक़तदियों का लिहाज़ नहीं किया जाएगा ।

❓सवाल : – बिला उज़्र ( मजबूरी ) बैठ कर तरावीह पढ़ना कैसा है ।

✍जवाब : – बिला उज्र बैठ कर तरावीह पढ़ना मकरूह है बल्कि बाज़ फुकहाये किराम के नज़दीक तो नमाज़ होगी ही नहीं।

( बहारे शरीअत )

❓सवाल : – बाज़ लोग शुरू रक्अत से शरीक नहीं होते बल्कि जब इमाम रुकू में जाने लगता है तो शरीक होते हैं उनके लिए क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – नाजाइज़ है ऐसा हरगिज नहीं करना चाहिए कि इसमे मुनाफ़िक़ों से मुशाबत पाई जाती है।

 

* अनवारे शरिअत, सफा 80/81/82/83*

तालिबे दुआ-ए- मग़फिरत एडमिन

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 37)
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तहीयतुलवज़ू*_

मुस्लिम शरीफ़ में है कि नबीये करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जो शख्स वजू करे और अच्छा वजू करे और ज़ाहिर व बातिन से मुतवज्जेह होकर दो रक्अत ( नमाज़ तहीयतुलवजू ) पढ़े उसके लिए जन्नत वाजिब हो जाती है ।

नमाजे इशराक़

तिर्मिज़ शरीफ़ में है कि हुजूर अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि जो फ़ज़्र की नमाज़ जमाअत से पढ़ कर खुदा का ज़िक्र करता रहे यहां तक कि सूरज बुलन्द हो जाए फिर दो रक्अत ( नमाज़े इशराक़ ) पढ़े तो उसे पूरे हज और उमरा का सवाब मिलेगा ।

नमाजे चाश्त

चाश्त की नमाज़ मुसतहब है कम से कम दो और ज्यादा से ज्यादा बारह ( 12 ) रक्अतें हैं तिर्मिज़ी और इब्ने माज़ा में है कि हुजूर अलैहिस्सलाम ने फरमाया जो चाश्त की दो रक्अतों पर मुहाफ़ज़त करे उसके गुनाह बख्या दिए जाएंगे अगरचे समुन्दर के झाग बराबर हो ।

नमाजे तहज्जुद

तहज्जुद की नमाज़ का वक़्त इशा की नमाज के बाद सो कर उठे उस वक़्त से तुलूये सुबह सादिक़ तक है तहज्जुद की नमाज़ कम से कम दो रक्अत है और हुजूर अलैहिस्सालाम से आठ तक साबित है । हदीस शरीफ़ में इस नमाज़ की बड़ी फजीलत ( बड़ाई ) आई है नसई और इब्ने माजा ने अपनी सुनन में रिवायत की कि रसूलुल्लाह सलल्लाहु अलैहिवसल्लम ने फ़रमाया जो शख्स रात में बेदार हो ( जागे ) और अपने अहल को जगाए फिर दोनों दो – दो रक्अत पढ़ें तो कसरत से याद करने वालों में लिखे जायेंगे ।

* अनवारे शरिअत, सफा 77/78*

तालिबे दुआ-ए- मग़फिरत एडमिन

बाकि अगले पेस्त में

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 36)
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सुन्नत और नफ्ल का बयान

❓सवाल : – कितनी नमाज़े‌ सुन्नते मुअक्कदा हैं।

✍जवाब : – दो रक्अत फ़ज़्र के फ़र्ज़ से पहले , चार रक्अत जुहर के फ़र्ज़ से पहले और दो रक्अत जुहर फ़र्ज़ के बाद , दो रक्अत मगरिब फ़र्ज के बाद , दो रक्अत इशा फ़र्ज़ के बाद , चार रक्अत जुमा फ़र्ज़ से पहले और चार रक्अत रक्अत जुमा फ़र्ज़ के बाद , इन सुन्नतों को “ सुन्ननतुलहुदा ” भी कहा जाता है ।

❓सवाल : – कितनी नमाजें सुन्नते गैर मुअक्कदा हैं ।

✍जवाब : – चार रक्अत अस्र के फ़र्ज़ से पहले , चार रक्अत इशा फ़र्ज़ के पहले , जुहर फ़र्ज़ के बाद दो के बजाय चार इसी तरह इशां फर्ज़ के बाद दो के बजाय चार रक्अत , मगरिब के बाद छ : ( 6 ) रक्अत सलातुल अव्वाबीन , दो रक्अत तहीयतुल मस्जिद , दो रक्अत तहीयतुल वज़ु दो रक्अत नमाजे इशराक़ कम से कम दो रक्अत नमाजे चाश्त और ज्यादा से ज़्यादा बारह ( 12 ) रक्अत , कम से कम दो रक्अत नमाज़े तहज्जुद और ज्यादा से ज्यादा आठ रक्अत , सलातुत्तसबीह , नमाजे इसतिखारा और नमाजे हाजत वगैरा इन सुन्नतों को सुननुज्जवाइद और कभी मुसतहब भी कहते हैं ।

❓सवाल : – जमाअत खड़ी होने के बाद किसी सुन्नत का शुरू करना जाइज़ है या नहीं ।

✍जवाब : – जमाअत खड़ी हो जाने के बाद फज्र की सुन्नत के अलावा किसी सुन्नत का शुरू करना जाइज़ नहीं । अगर यह जाने कि फर्ज की सुन्नत पढ़ने के बाद जमाअत मिल जाएगी अगरचे क़ादा ( बैठक ) ही में शामिल होगा तो सुन्नत पढ़ ले मगर सफ़ ( लाइन ) के बराबर खड़े होकर पढ़ना जाइज़ नहीं बल्कि सफ़ ( लाइन ) से दूर हट कर पढ़े ।

❓सवाल : – किन वक़्तों में नफ़्ल नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं ।

✍जवाब : – तुलू व गुरुब ( निकलना सूरज का और डूबना सूरज का ) और दोपहर इन तीनों वक़्तों में कोई नमाज़ जाइज़ नहीं । न फ़र्ज़ न वाजिब और न नफ्ल । हां अगर उस रोज़ अस्र की नमाज़ नहीं पढ़ी है तो सूरज डूबने के वक़्त पढ़ले । और तुलूए फ़ज़्र से तुलूए आफ़ताब ( सूरज ) के दरमियान सिवाय दो रक्अत सुन्नते फ़ज़्र के तहीयतुल मस्जिद और तहीयतुलवजू वगैरा कोई नफ्ल जाइज़ नहीं और नमाजे अस्र से मगरिब की फ़र्ज़ पढ़ने के दरमियान नफ्ल मना है और खुतबा के वक़्त और और नमाज़े ईदैन से पेश्तर ( पहले ) नफ़्ल मकरूह है । चाहे घर में पढ़े या ईदगाह व मस्जिद में और नमाजे ईंदैन के बाद भी नफ्ल मकरूह है जब कि ईदगाह या मस्जिद में पढ़े घर में पढ़ना मकरूह नहीं।

❓सवाल : – नफ़्ल नमाज़ बैठ कर पढ़ सकते हैं या नहीं ।

✍जवाब : – बैठ कर पढ़ सकते हैं मगर जबकि कुदरत ( ताकत ) हो तो खड़े होकर पढ़ना अफ़ज़ल है ।

* अनवारे शरिअत, सफा 75/76/77*

तालिबे दुआ-ए- मग़फिरत एडमिन

बाकि अगले पेस्त में

जारी रहेगा इंशाअल्लाह…..
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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 35)
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वित्र का बयान

❓सवाल : – वित्र किस तरह पढ़ी जाती है।

✍जवाब : – नमाजे वित्र भी उसी तरह पढ़ी जाती है जिस तरह और नमाज़ पढ़ी जाती है । लेकिन वित्र की तीसरी रक्अत में अलहम्दु और सूरत पढ़ने के बाद कानों तक दोनों हाथ ले जाये और अल्लाहु अकबर कहता हुआ हाथ वापस लाए और नाफ़ ( ढोंडी ) के नीचे बांध ले । फिर दुआए कूनूत पढ़े फिर उसके बाद और नमाजों की तरह रुकु और सजदा वगैरा करके सलाम फेर दे ।

नोट : -दुआएं कुनूत निचे फोटो में है

❓सवाल : – जिस शख्स को दुआए कुनूत याद न हो वह क्या पढ़े।

✍जवाब : – जिस शख्स को दुआए कुनूत याद न हो वह यह दुआ पढ़े ।

* “ अल्लाहुम्म रब्बना आतिना फ़िहुनयां हस नतौं वफ़िल आखिरति हस नतौं वक़िना अज़ाबन्नार “*

❓सवाल : – अगर दुआए कुनूत न पढ़े तो क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – अगर दुआए कुनूत क़सदन ( जान बूझ ) कर न पढ़े तो नमाज़े वित्र फिर से पढ़े और अगर भूल कर न पढ़े तो आखिर में सजदए सहव करे ।

❓सवाल : – अगर दुआए कुनूत पढ़ना भूल जाए और रुकु में याद आए तो क्या करे ।

✍जवाब : – अगर दुआए कुनूत पढ़ना भूल जाए और रुकू में याद आए तो न कियाम की तरफ़ लौटे और न रुकू में पढ़े बल्कि आखिर में सजदये सहव करे ।

 

* अनवारे शरिअत, सफा 74/75*

तालिबे दुआ-ए- मग़फिरत एडमिन

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 34)
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नमाज़ के मकरूहात

❓सवाल : – नमाज़ के अन्दर जो बातें मकरूह हैं उन्हें बताइए ।

✍जवाब : – कपड़े , बदन या दाढ़ी के साथ खेलना कपड़ा समेटना जैसे सजदा में जाते वक़्त आगे या पीछे से उठाना , कपड़ा लटकाना यानी सर या मोढे पर इस तरह डालना कि दोनों कनारें लटकते हों , किसी आसतीन का आधी कलाई से ज्यादा चढ़ाना । दामन समेट कर नमाज़ पढ़ना , शिद्दत का ( ज़ोरदार ) पाख़ाना पेशाब मालूम होते वक़्त या गल्बये रियाह के वक़्त नमाज़ पढ़ना मर्द का जूढ़ा बांधे हुए नमाज़ पढ़ना , उंगलियां चटकाना , उंगलियों की कैंची बांधना , कमर पर हाथ रखना , इधर उधर मुंह फेर कर देखना , आसमान की तरफ निगाह उठाना । तशहहुद या सजदों के दरमियान कुत्ते की तरह बैठना , मर्द का सजदा में कलाइयों का बिछाना , किसी शख्स के मुंह के सामने नमाज़ पढ़ना , कपड़े में इस तरह लिपट जाना कि हाथ भी बाहर न हो । पगड़ी इस तरह बांधना कि बीच सर पर न हो नाक और मुंह को छिपाना बे ज़रूरत खंकार निकालना

बिलकस्द जमाही लेना और खुद आए तो हर्ज नहीं , जिस कपड़े पर जानदार की तस्वीर ( फोटो ) हो उसे पहन कर नमाज़ पढ़ना , तस्वीर का नमाजी के सर पर यानी छत में होना या लटका होना या सजदा करने की जगह में होना कि उस पर सजदा वाके हो , नमाज़ी के आगे या दाहिने या बायें या पीछे तस्वीर का होना जब कि लटकी हो या नसब हो या दीवार वगैरा में मनकूश हो ( दीवार पर खोद कर या वैसे ही किसी जानदार की तस्वीर बनी होना ) उलटा कुरआन मजीद पढ़ना , किसी वाजिब को तर्क करना ( छोड़ना ) कियाम के अलावा किसी और मौका पर कुरआन पढ़ना रुकु में किराअत को खत्म करना , इमाम से पहले मुक़तदी का रुकु व सुजूद वगैरा में जाना या उससे पहले सर उठाना यह तमाम बातें मकरूह तहरीमी हैं ।

* अनवारे शरिअत, सफा 72/73*

तालिबे दुआ-ए- मग़फिरत एडमिन

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 33)
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नमाज़ फ़ासिद करने वाली चीजें

❓सवाल : – किन चीज़ों से नमाज़ फ़ासिद हो जाती है ।

जवाब : – कलाम करने से ख़्वाह अमदन ( जानबूझकर ) हो या ग़लती या भूल कर । अपनी खुशी से बात करे या किसी के मजबूर करने पर बहर सूरत नमाज़ जाती रहेगी । ज़बान से किसी को सलाम करे जान कर या भूल कर नमाज़ फ़ासिद हो जाएगी इसी तरह जुबान से सलाम का जवाब देना भी नमाज़ को फ़ासिद कर देता है । किसी की छींक के जवाब में “ यरहमुकल्लाह ” कहा या खुशी की खबर सुन कर जवाब में “ अलहम्दुलिल्लाह ” कहा या तअज्जुब में डालने वाली खबर सुन कर जवाब में ” सुबहानल्लाह ” कहा या बुरी खबर सुन कर जवाब में “ इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिअून ” कहा तो इन तमा मशक्लों में नमाज़ जाती रहेगी । लेकिन अगर खुद उसी को छींक आई तो हुक्म है कि चुप रहे और अगर “ अलहम्दुलिल्लाह ” कह लिया तो भी नमाज़ में हरज नहीं । नमाज़ पढ़ने वाले ने अपने इमाम के अलावा दूसरे को लुक्मा दिया ( याद दिलाया ) तो नमाज़ फ़ासिद हो गई ।

इसी तरह अपने मुक़तदी के अलावा दूसरे का लुक्मा लेना भी नमाज़ को फ़ासिद कर देता है । और गलत लुक्मा देने से लुक्मा देने वाले की नमाज़ जाती रहती है । ” अल्लाहु अकबर ” की अलिफ़ को खेंच कर “ आललाहु अकबर ” या आकबर या अकबार कहना नमाज़ को फ़ासिद कर देता है इसी तरह “ अल्लाहु अकबर ” की ‘ र ‘ को ‘ द ‘ पढ़ने से नमाज़ फ़ासिद हो जाती है और ” नस्तीन ” को ” नस्तासीन ” पढ़ने से नमाज़ जाती रहती है । और अनअम्त की त को ज़बर के बजाय ज़ेर या पेश पढ़ने से नमाज़ फ़ासिद हो जाती है । आह , ओह , उफ़ तुफ़ दर्द या मुसीबत की वजह से कहे या आवाज़ के साथ रोए और हुरूफ़ ( अक्षर ) पैदा हुए तो इन सब सूरतों में नमाज़ जाती रहेगी । लेकिन अगर मरीज की जुबान से बे इखतियार “ आह ” या “ ओह ” निकले तो नमाज़ फ़ासिद न हुई इसी तरह छींक , खांसी , जमाही , और डेकार में जितने हुरूफ़ मजबूरन निकलते हैं मुआफ़ हैं । दातों के अन्दर खाने की कोई चीज़ रह गई थी उस को निगल गया अगर चने से कम है तो नमाज़ मकरूह हुई और चने के बराबर है तो फ़ासिद हो गई । औरत नमाज़ पढ़ रही थी बच्चा ने उसकी छाती चूसी अगर दूध निकल आया तो नमाज़ जाती रही । नमाज़ी के आगे से गुज़रना नमाज़ को फ़ासिद नहीं करता ख्वाह गुज़रने वाला मर्द हो या औरत मगर गुज़रने वाला सख्त गुनाहगार होता है । हदीस शरीफ़ में है कि नमाज़ी के आगे से गुजरने वाला अगर जानता कि इस पर क्या गुनाह है तो ज़मीन में धंस जाने को गुज़रने से अच्छा जानता ।

* अनवारे शरिअत, सफा 70/71/72*

तालिबे दुआ-ए- मग़फिरत एडमिन

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 32)
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जमाअत और इमामत का बयान

❓सवाल : – जमाअत फ़र्ज़ है या वाजिब ।

✍जवाब : – जमाअत वाजिब है , जमाअत के साथ एक नमाज़ पढ़ने से सत्ताइस ( 27 ) नमाज़ों का सवाब मिलता है । बगैर उज्र एक बार भी छोड़ने वाला गुनाहगार और छोड़ने की आदत कर लेने वाला फ़ासिक है ।

❓सवाल : – जमाअत छोड़ने के उज्र क्या क्या हैं ।

✍जवाब : – अंधा या अपाहिज होना , इतना बूढ़ा या बीमार होना कि मस्जिद तक जाने से मजबूर हो , सख्त बारिश या शदीद कीचड़ का हाइल होना , आधी या सख्त अंधेरी या सख्त सर्दी का होना और पाखाना व पेशाब की सख्त हाजत ( ज़रूरत ) होना वगैरा ।

❓सवाल : – इमामत का सब से ज्यादा हक़दार कौन है ।

✍जवाब : – इमामत का सबसे ज़्यादा हक़दार वह शख्स है जो नमाज़ व तहारत के अहकाम सब से ज़्यादा जानता हो । फिर वह शख्स जो तजवीद यानी किराअत की जानकारी ज़्यादा रखता हो । अगर कई शख़्स इन बातों में बराबर हो तो वह शख़्स ज़्यादा हक़दार है जो ज़्यादा मुत्तकी हो अगर इस में भी बराबर हों तो ज़्यादा उम्र वाला फिर जिस के अखलाक़ ज्यादा अच्छे हों फिर ज़्यादा तहज्जुद गुज़ार । गरजे कि चन्द आदमी बराबर हो तो उन में जो शरी तरजीह रखता हो वही ज़्यादा हकदार है ।

❓सवाल : – किन लोगों को इमाम बनाना गुनाह है ।

✍जवाब : – फ़ासिके मोलिन जैसे शराबी , जुआरी , ज़िनाकार , सूदखोर , चुगलखोर और दाढ़ी मुंडाने वाला या कटा कर एक मुश्त ( मुट्ठी ) से कम रखने वाला और वह बद मज़हब कि जिस की बद मज़हबी हद्दे कुफ्र को न पहुंची हो । उन लोगों को इमाम बनाना गुनाह है । और उनके पीछे नमाज़ मकरूह तहरीमी वाजिबुल इआदा है ।

❓सवाल : – वहाबी देवबन्दी के पीछे नमाज़ पढ़ना कैसा है ।

✍जवाब : – वहाबी देवबन्दी के अक़ीदे कुफ्री हैं मस्लन उन लोगों का अकीदा यह है कि जैसा इल्म हुज़र सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को हासिल है ऐसा इल्म तो बच्चों , पागलों और जानवरों को भी हासिल है जैसा कि उनके पेशवा मोलवी अशरफ़ अली थानवी ने अपनी किताब हिफ्ज़ल ईमान में सफहा न , 8 पर हुज़र अलैहिस्सातु वस्सलाम के लिए कुल इलमे गैब का इन्कार करते हुए सिर्फ बाज़ इलमे गैब के बारे में यूं लिखा है कि “ इस में हुज़ूर की क्या तखसी है ऐसा इल्म तो जैद व उमर बल्कि हर सबी ( बच्चा ) मजनून बल्कि जमीअ़ हैवानात व बहायम के लिए भी हासिल है ” मआज़ अल्लाहि रब्बिल आलमीन ।

इसी तरह उनके पेशवाओं की किताबों में बहुत से कुफ्री अक़ीदे हैं जिन्हें वह हक़ मानते हैं इसलिए उनके पीछे नमाज़ पढ़ना नाजायज़ व गुनाह है अगर किसी ने ग़लती से पढ़ ली हो तो फिर से पढ़े अगर दोबारा नहीं पढ़ेगा तो गुनाहगार होगा ।

( बहारे शरीअत )

❓सवाल : – किन लोगों को इमाम बनाना मकरूह है ।

_*✍जवाब : – गंवार , अंधे , वलदुजिना , अमरद , कोढ़ी , फ़ालिज की बीमारी वाले , बर्स ( कोढ़ ) वाला जिस का बर्स ज़ाहिर हो । इन सबको इमाम बनाना मकरूह तनजीही है और कराहत उस वक़्त है जबकि जमाअत में और कोई उनसे बेहतर हो और अगर वही मुस्तहिक्के इमामत है तो कराहत नहीं । और अंधे की इमामत में तो खफ़ीफ़ कराहत है ।

( बहारे शरीअत )

* अनवारे शरिअत, सफा 68/69/70*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 31)
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किराअत का बयान

❓सवाल : – अगर सूरए फ़ातिहा पढ़ने के बाद सूरत मिलाना भूल जाए और रुकु में याद आए तो क्या करे ।

✍जवाब : – अगर सूरत मिलाना भूल जाए फिर रुकु में याद आए तो खड़ा हो जाए और सूरत मिलाए फिर रुकु करे और आखिर में सजदए सहव करे ।

❓सवाल : – फ़र्ज़ की पहली दो रक्अत में सूरत मिलाना भूल जाए तो क्या करे ।

✍जवाब : – फ़र्ज़ की पहली दो रक्अतों में सूरत मिलाना भूल जाए और रुकु के बाद याद आए तो पिछली दो रक्अतों में पढ़े और सजदए सहव करे और मगरिब की पहली दो रक्अतों में भूल जाए तो तीसरी में पढ़े और एक रक्अत की सूरत जाती रही । आखिर में सजदए सहव करे ।

❓सवाल : – अगर फ़र्ज़ की पहली दो रक्अतों में से किसी एक में | सूरत मिलाना भूल जाए और रुकु के बाद याद आए तो क्या करे ।

✍जवाब : – तीसरी या चौथी में सूरए फ़ातिहा के साथ सूरत मिलाए और सजदए सहव करे ।

❓सवाल : – अगर सुन्नत या नफ्ल में सूरत मिलाना भूल जाए और रुकु के बाद सजदा वगैरा में याद आए तो क्या करे ।

✍जवाब : – अख़ीर में सजदए सहव करे ।

❓सवाल : – पहली रक्अत में जो सूरत पढ़ी फिर उसी को दूसरी रक्अत में भूल कर शुरू कर दी तो क्या करे ।

✍जवाब : – फिर उसी सूरत को शुरू कर दी तो उसी को पढ़े और क़सदन ( जान बूझकर ) ऐसा करना मकरूह तनजीही है हां अगर दूसरी याद न हो तो हर्ज नहीं ।

❓सवाल : – दूसरी रक्अत में पहली वाली से ऊपर की सूरत पढ़ी यानी पहली में कुल या अय्युहल काफ़िरून और दूसरी में “ इन्ना आतैना ” पढ़ी तो क्या हुक्म है ।

✍जवाब : – दूसरी रक्अत में पहली वाली से ऊपर की सूरत या आयत पढ़ना मकरूह तहरीमी और गुनाह है मगर भूल कर ऐसा हो तो न गुनाह है और न सजदए सहव ।

❓सवाल : – भूल कर दूसरी रक्अत में ऊपर की सूरत शुरू कर दी फिर याद आया तो क्या करे ।

✍जवाब : – जो शुरू कर चुका है उसी को पूरी पढ़े अगरचे अभी एक ही हर्फ पढ़ा हो ।

❓सवाल : – पहली में “ अलम त र कैफ़ ” और दूसरी में ” लिइलाफ़ि ” छोड़ कर “ अरऐतल्लजी ” पढ़ना कैसा है ।

✍जवाब : – दूसरी में एक छोटी सूरत छोड़ कर पढ़ना मना है और भूल कर शुरू कर दी तो उसी को खत्म करे छोड़ने की इजाजत नहीं ।

 

* अनवारे शरिअत, सफा 66/67/68*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 28)
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*नमाज़ के फ़राइज़*

❓सवाल : – नमाज़ में कितनी चीजें फ़र्ज़ हैं ।

✍जवाब : – नमाज़ में छ : ( 6 ) चीजें फर्ज हैं ।

( 1 ) क़ियाम ।

( 2 ) किराअत ।

( 3 ) रुकू ।

( 4 ) सज्दा ।

( 5 ) कादये अख़ीरा ।

( 6 ) खुरुजबिसुनअिही ।

❓सवाल : – क़ियाम फ़र्ज़ है इसका क्या मतलब है ।

✍जवाब : – इसका मतलब यह है कि खड़े हो कर नमाज़ अदा करना ज़रूरी है अगर किसी ने बगैर उज़्र बैठ कर नमाज़ पढ़ी तो न हुई । ख्वाह औरत हो या मर्द । हां नफ्ल नमाज़ बैठ कर पढ़ना जाइज है ।

❓सवाल : – किराअत फ़र्ज़ है इसका क्या मतलब है ।

✍जवाब : – इसका मतलब यह है कि फर्ज की दो रकअतों में और वित्र सुन्नत और नफ़्ल की हर रक्अतों में कुरआन शरीफ़ पढ़ना जरूरी है तो अगर किसी ने इनमें कुरआन न पढ़ा तो नमाज़ न होगी ।

❓सवाल : – कुरआन मजीद आहिस्ता पढ़ने का अदना ( कम ) दर्जा क्या है ।

✍जवाब : – आहिस्ता पढ़ने का अदना दर्जा यह है कि खुद सुने अगर इस क़दर आहिस्ता पढ़ा कि खुद न सुना तो नमाज़ न होगी ।

❓सवाल : – रुकू का अदना ( कम ) दर्जा क्या है ।

✍जवाब : – रुकू का अदना दर्जा यह है कि हाथ घुटने तक पहुंच जाए और पूरा रुकू यह है कि पीठ सीधी बिछादे और सर पीठ के बराबर रखे ऊँचा नीचा न रखे ।

❓सवाल : – सजदा की हक़ीक़त क्या है ।

✍जवाब : – पेशानी ज़मीन पर जमना सजदा की हक़ीक़त है । और पांव की एक उंगली का पेट ज़मीन से लगना शर्त है तो अगर किसी ने इस तरह सजदा किया कि दोनों पांव ज़मीन से उठे रहे तो नमाज़ न हुई बल्कि अगर सिर्फ उंगली की नोक ज़मीन से लगी जब भी नमाज़ न हुई ।

( बहारे शरीअत )

__❓सवाल : – कितनी उंगलियों का पेट जमीन से लगना वाजिब है ।_

✍जवाब : – दोनों पांव की तीन – तीन उंगलियों का पेट ज़मीन से लगना वाजिब है ।

❓सवाल : – कादए अखीरा का क्या मतलब है ।

✍जवाब : – नमाज़ की रक्अतें पूरी करने के बाद अत्तहीयातु व रसूलुहू तक पढ़ने की मिकदार तक बैठना फ़र्ज़ है ।

❓सवाल : – खुरुजबिसुनअिही किसे कहते हैं ।

✍जवाब : – कादये अखीरा के बाद क़सदन मनाफ़ीये नमाज़ कोई काम करने को खुरूजबिसुनअिही कहते हैं । लेकिन सलाम के अलावा कोई दूसरा मनाफ़ी क़सदन पाया गया तो नमाज़ का दोबारा पढ़ना वाजिब है ।

* अनवारे शरिअत, सफा 61/62*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 27)
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-इस्तिलाहाते शरीया का बयान-

❓सवाल : – फ़र्ज़ और वाजिब किसे कहते हैं ।

✍जवाब : – फ़र्ज वह काम है कि उसको जान बूझकर छोड़ना सख्त गुनाह और जिस इबादत के अन्दर वह हो बगैर उसके वह इबादत दुरुस्त न हो ।

और वाजिब वह काम है कि उसको जान बूझकर छोड़ना गुनाह और नमाज़ में कस्दन छोड़ने से नमाज़ का दोबारा पढ़ना ज़रूरी और भूल कर छूट जाए तो सजदयेसह् व लाज़िम ।

❓सवाल : – सुन्नते मुअक्कदा और गैर मुअक्कदा किसे कहते हैं ।

✍जवाब : – सुन्न्ते मुअक्कदा वह काम है कि जिस का छोड़ना बुरा और करना सवाब है और इत्तिफ़ाक़न छोड़ने पर अिताब और छोड़ने की आदत कर लेने पर मुस्तहिक्के अज़ाब ।

और सुन्नते गैर मुअक्कदा वह काम है कि उसका करना सवाब और न करना अगरचे आदतन हो अिताब नहीं मगर शरअन ना पसन्द हो ।

❓सवाल : – मुस्तहब और मुबाह किसे कहते हैं ।

✍जवाब : – मुस्तहब वह काम है कि जिसका करना सवाब और न करने पर कुछ गुनाह नहीं ।

और मुबाह वह काम है कि जिसका करना और न करना बराबर हो ।

❓सवाल : – हराम और मकरूह तहरीमो किसे कहते हैं ।

✍जवाब : – हराम वह काम है कि जिसका एक बार भी जान बूझ कर करना सख्त गुनाह है । और उससे बचना फ़र्ज़ और सवाब है ।

और मकरुह तहरीमी वह काम है कि जिसके करने से इबादत नाक़िस हो जाती है और करने वाला गुनाहगार होता है अगरचे उसका गुनाह हराम से कम है ।

❓सवाल : – मकरुह तंजीही और खिलाफे औला किसे कहते हैं ।

✍जवाब : – मकरुह तंजीही वह काम है कि जिस का करना शरीअत को पसन्द न हो और उससे बचना बेहतर और सवाब हो ।

और खिलाफे औला वह काम है कि जिसका न करना बेहतर है और करने में कोई मुज़ाईका ( हर्ज ) और अिताब नहीं।

 

* अनवारे शरिअत, सफा 59/60/61*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 26)
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नमाज़ की शर्ते

❓सवाल : – नमाज़ की शर्ते कितनी हैं ।

✍जवाब : – नमाज़ की शर्ते छ : ( 6 ) हैं जिनके बगैर नमाज़ सिरे से होती ही नहीं ।

( 1 ) तहारत यानी नमाज़ी के बदन , कपड़े और उस जगह का पाक होना कि जिस पर नमाज़ पढ़े ।

( 2 ) सत्रे औरत यानी मर्द को नाफ़ से घुटनों तक छुपाना और औरत को सिवाये चेहरा , हथेली और कदम के पूरा बदन छुपाना । औरत अगर इतना बारीक दुपट्टा ओढ़ कर नमाज़ पढ़े कि जिस से बाल की स्याही चमके तो नमाज़ न होगी जब कि उस पर कोई ऐसी चीज़ न ओढ़े कि जिस से बाल का रंग छुप जाय |

( आलमगीरी )

( 3 ) इस्तिक्बाले किबला यानी नमाज़ में किबला की तरफ़ मुंह करना । अगर किबला की सम्त में शुब्हा हो तो किसी से दर्याफ्त करले अगर कोई दूसरा मौजूद न हो तो गौरो फिक्र के बाद जिधर दिल जमे उसी तरफ मुंह करके नमाज़ पढ़ले ।
फिर अगर बादे में मालूम हुआ कि क़िब्लादूसरी सम्त था तो कोई हर्ज नहीं नमाज़ हो गई ।

( 4 ) वक़्त लिहाज़ा वक़्त से पहले नमाज़ पढ़ी तो न हुई जिसका बयान तफ़सील के साथ पहले गुज़र चुका है ।

( 5 ) नीयत यानी दिल के पक्के इरादा के साथ नमाज़ पढ़ना ज़रूरी है और ज़बान से नीयत के अलफ़ाज़ कह लेना मुस्तहब है इस में अरबी की कुछ तख़सीस नहीं उर्दू वगैरा में भी हो सकती है । और यूं कहे नीयत की मैंने नीयत करता हूं न कहे ।

( 6 ) तकबी रे तहरीमा यानी नमाज़ के शुरू में अल्लाहु अकबर कहना शर्त है।

* अनवारे शरिअत, सफा 58/59*

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 25)
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औरतों के लिए नमाज़ के मखसूस मसाइल

औरतें तकबीरे तहरीमा के वक़्त कानों तक हाथ न उठायें बल्कि मोढे तक उठायें हाथ नाफ के नीचे न बांधे बल्कि बाई हथेली सीना पर छाती के नीचे रख कर उसकी पीठ पर दाहिनी हथेली रखें । रुकू में ज्यादा न झुकें बल्कि थोड़ा झुकें यानी सिर्फ इस कदर कि हाथ घुटनों तक पहुंच जाए , पीठ सीधी न करें और घुटनों पर ज़ोर न दें बल्कि महज़ हाथ रख दें और हाथों की उंगलियां मिली हुई रखें और पांव कुछ झुका रखें मर्दो की तरह खूब सीधा न कर दें । औरतें सिमट कर सजदा करें यानी बाजू करवटों से मिला दें । और पेट रान से और रान पिंडलियों से पिंडलियां जमीन से । और कादा ( बैठक ) में बाए कदम पर न बैठे बल्कि दोनों पांव दाहिनी जानिब निकाल दें और बाए सुरीन ( पुट्ठा ) पर बैठे । औरतें भी खड़ी होकर नमाज़ पढ़ें । फ़र्ज़ और वाजिब जितनी नमाजें बगैर उज्र बैठकर पढ़ चुकी हैं उनकी कज़ा करें और तौबा करें । औरत मर्द की इमामत हरगिज़ नहीं कर सकती और सिर्फ औरतें जमाअत करें यह मकरूह तहरीमी और नाजायज़ है । औरतों पर जुमा और ईंदैन की नमाज़ वाजिब नहीं ।

* अनवारे शरिअत, सफा 57/58*

तालिबे दुआ-ए- मग़फिरत एडमिन

जारी रहेगा इंशाअल्लाह…..
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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 24)
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नमाज़ पढ़ने का तरीका

❓सवाल : – नमाज़ पढ़ने का तरीका क्या है ।

✍……जवाब : – नमाज़ पढ़ने का तरीका यह है कि बा वजू किबला रूख दोनों पांव के पंजों में चार उंग्गल का फ़ासिला करके खड़ा हो और दोनों हाथ कान तक ले जाए कि अंगूठे कान की लौ से छू जाएं इस हाल में कि हथेलियां किबला रुख हों फिर नीयत करके अल्लाहु अकबर कहता हुआ हाथ नीचे लाकर नाफ के नीचे बांध ले और सना पढ़े ।

سٌبْحَاْ نَکَ اَلْلّٰہُمَّ وَ بِحَمْدِکَ وَتَبَارَکَ اسْمُکَ وَتَعَالٰی جَدُّکً وَلَا اِلٰهَ غَیْرُکَ

सुबहा न क अल्लाहुम्म व बिहन्दि क व तबा र कसमु क व तआला जद्दु क व लाइलाह गैरु क

फिर तऔउज़ यानी अऊजु बिल्लाहि मिनश्शैता निरजीम फिर तसमियह यानी बिस्मिल्लाहिर्रहमानिरहीम पढ़ कर अलहम्दु पढ़े आमीन आहिस्ता कहे उसके बाद कोई सूरत या तीन आयतें पढ़े या एक आयत जो कि छोटी तीन आयतों के बराबर हो । अब अल्लाहु अकबर कहता हुआ रुकू में जाए और घुटनों को हाथ से पकड़ ले इस तरह कि हथेलियां घुटने पर हों । उंगलियां खूब फैली हों । पीठ बिछी हो और सर पीठ के बराबर हो ऊँचा नीचा न हो और कम से कम तीन बार (سُبْحَانَ رَبَِّی الْعَظِم)“ सुब्हान रब्बियल अज़ीम ” जिनको (सुब्हान रब्बियल अज़ीम) मख़रज के साथ पढ़ना न आता हो वो ”सुब्हान रब्बियल करीम” कहे फिर (سَمِعَ اللّٰهّ لِمَنْ حَمِدَہ) “समि अल्लाहु मिन हमिदह” कहता हुआ सीधा खड़ा हो जाए और अकेले नमाज़ पढ़ता हो तो उसके बाद (رَبَّنَا لَکَ الْحَمْد) “ रब्बना लकल हम्दु ” कहे फिर अल्लाहु अकबर कहता हुआ सजदा में जाए इस तरह कि पहले घुटने ज़मीन पर रखे फिर हाथ फिर दोनों हाथों के बीच में नाक फिर पेशानी रखे इस तरह कि पेशानी और नाक की हड्डी ज़मीन पर जमाए और बाज़ओं को करवटों और पेट को रानों और रानों को पिंडलियों से जुदा रखे और दोनों पांव की सब उंगलियों के पेट किबलारू जमे हों । और हथेलियां बिछी हों और उंगलियां किबला को हों और कम से कम तीन बार (سُبْحَا نَ رًبِّیَ الْاَعْلٰی) “ सुबहान रब्बियल अअ़ला ” कहे फिर सर उठाए फिर हाथ । और दाहिना कदम खड़ा करके उसकी उंगलियां किबलारुख करे और बांया क़दम बिछा कर उस पर खूब सीधा बैठ जाए और हथेलियां बिछा कर रानों पर घुटनों के पास रखे फिर अल्लाहु अकबर कहता हुआ सजदा में जाए ओर पहले की तरह सजदा करके फिर सर उठाए फिर हाथ को घुटनों पर रख कर पंजों के बल खड़ा हो जाए अब सिर्फ बिस्मिल्ला हिर्रहमानिर्रहीम पढ़ कर क़िराअत शुरू करे फिर पहले की तरह रुकू सजदा करके बायां कदम बिछा कर बैठ जाए और तशहहुद पढ़े

اَتَّحِیَّاتَ لِلّٰهِ وَالصَّلَوٰتُ وَالطَّیّبَاتُ اَلسَّلَامُ عَلَیْکَ اَیُّہَا النَّبِیُّ وَرَحْمَۃُ اللّٰهِ وَبَرَکَاتُهٗ۔ اَلسَّلَامُ عَلَیْنَا وَعَلٰی عِبَا دِ اللّٰهِ الصّٰلِحِیْن۔ اَشْہَدُ اَنْ لَّآ اِلٰهَ اِلَّا اللّٰهُ وَاَشْہَدُ اَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُ ہٗ وَرَسُولُهٗ

“ अत्तही यातुलिल्लाहि वस्सलवातु वत्तय्यिबातु अस्सलामु अलैक अय्युहन्नबीयू व रहमतुल्लाहि व बर कातुहु अस्सलामु अलैना वअला अबादिल्ला हिस्सालिहीन अशहदु अललइलाह इल्लाहु व अश्हदु अन्न मुहम्मदन अब्दुहु व रसूलहु

” तशहहुद पढ़ते हुए जब कलिमए ” ला ” के करीब पहुंचे तो दाहिने हाथ की बीच की उंगली और अंगूठे का हल्का बनाए और छंगुलिया और उसके पास वाली को हथेली से मिलादे और लफ्जे “ ला ” पर कलिमह की उंगली उठाए मगर उसको हिलाए नहीं । और कलिमए “ इल्ला ” पर गिरा दे और सब उंगलियां फौरन सीधी कर ले अब अगर दो से ज्यादा रक्अत पढ़नी है तो उठ खड़ा हो और इसी तरह पढ़े मगर फ़र्जो की उन रक्अतों में अलहम्दु के साथ सूरत मिलाना ज़रूरी नहीं अब पिछला कादा ( बैठक ) जिसके बाद नमाज खत्म करेगा उस में तशहहुद के बाद दुरुद | शरीफ़ पढ़े ।

“ अल्लाहुम्म सल्लिअला सैय्यिदिना मुहम्मदिं वअला आलि सैय्यिदिना मुहम्मदिन कमा सल्लै त अला सय्यिदिना इब्राहीम वअला आलि सय्यिदिना इब्राहीम इन्न क हमीदुम्मजीद । अल्लाहुम्म बारिक अला सय्यिदिना मुहम्मदिव्वअला आलि सय्यिदिना मुहम्मदिन कमा बारक त अआ सय्यिदिना इब्राहीम व अला आलि सय्यिदिना इब्राहीम इन्न क हमीदुम्मजीद ।

फिर दुआए मासूरा पढ़े

“ अल्लाहुम्मग फिरली वलिवालिदय्य वलिमन तवाल दवलिजमीअिल मूमिनी न वलमूमिनाति वल मुसलमीन वल मुसलमातिल अहयाइ मिनहुम वल अम्वाति इन्नक मुजीबुद्दअवाति बिरह् मति क या अरहम हिमीन ।

” या कोई और दूसरी दुआए मासूरा पढ़े । इसके बाद दाहिने मोढे की तरफ मुंह करके अस्सलामु अलैकुम व रमतुल्लाह कहे फिर बांए तरफ़ । अब नमाज़ पूरी हो गयी ।

नमाज़ के बाद की दुआ
“ अल्लाहुम्म अन्तस्सलाम वमिन कस्सलाम वइलै क यराजिउ स्सलाम फ़हैयिना रब्बना बिस्सलाम वअदखिल ना दारस्सलाम व तबारक त रब्ब्ना वतआलै त या जलजलालि वल इकराम ।

 

* अनवारे शरिअत, सफा 54/55/56/57*

तालिबे दुआ-ए- मग़फिरत एडमिन

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    अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 23)
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तादादे रक्आत और नीयत का बयान

❓सवाल : – अगर नीयत के अलफ़ाज़ भूल कर कुछ के कुछ जुबान से निकल गए तो नमाज़ होगी या नहीं ।

जवाब : – नीयत दिल के पक्के इरादा को कहते हैं यानी नीयत में जुबान का एतबार नहीं तो अगर दिल में मसलन ज़ुहर का इरादा किया और ज़बान से लफ्जे अस्र निकल गया तो जुहर की नमाज़ हो जाएगी ।

❓सवाल : – कज़ा नमाज़ की नीयत किस तरह करनी चाहिए ।

जवाब : – जिस रोज़ और जिस वक़्त की नमाज़ कजा हो उस रोज़ और उस वक़्त की नीयत क़जा में ज़रूरी है मसलन अगर जुमा के रोज़ फज्र की नमाज़ कज़ा हो गई तो इस तरह नीयत करे कि नीयत की मैंने दो ( 2 ) रकअत नमाजे कज़ा जुमा के फ़ज़्र फ़र्ज़ की अल्लाह तआला के लिए मुह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के अल्लाहु अकबर ।

❓सवाल : – अगर कई साल की नमाजें क़ज़ा हों तो नीयत कैसे करे ।

जवाब : – ऐसी सूरत में जो नमाज़ मसलन ज़ुहर की क़ज़ा पढ़नी है तो इस तरह नीयत करे नीयत की मैंने चार ( 4 ) रक्अत नमाज़ क़ज़ा जो मेरे ज़िम्मे बाकी है उनमें से पहले ज़ूहर फ़र्ज़ की अल्लाह तआला के लिए मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ के अल्लाहु अकबर । इसी पर दूसरी क़ज़ा नमाज़ों की नीयतों को कियास करना चाहिए ।

❓सवाल : – पांच वक़्त की नमाज़ों में कुल कितनी रक्अत कजा पढ़ी जाएगी ।

जवाब : – बीस ( 20 ) रक्अत

दो ( 2 ) रक्अत फ़ज़ू
चार ( 4 ) रक्अत ज़ुहर
चार ( 4 ) रक्अत अस्र
तीन ( 3 ) रक्अत मगरिब
चार ( 4 ) रक्अत इशा और
तीन ( 3 ) रक्अत वित्र

खुलासा यह कि फ़र्ज़ और वित्र की कज़ा है सुन्नत नमाज़ों की कज़ा नहीं।

अनवारे शरिअत, सफा 53/54

️तालिबे दुआँ-ए- मग़फिरत एडमिन

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 22)
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तादादे रक्आत और नीयत का बयान

_*❓सवाल : – अस्र के वक़्त कुल कितनी रक्अत नमाज़ पढ़ी जाती।*

जवाब : – आठ रक्अत पहले चार रक्अत सुन्नत फिर चार रक्अत फ़र्ज़ ।

❓सवाल : – चार रक्अत सुन्नत की नीयत किस तरह की जाएगी ।

जवाब : – नीयत की मैंने चार रक्अत नमाज़ सुन्नत अस्र की अल्लाह तआला के लिए सुन्नत रसूलुल्लाह की मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के अल्लाहु अकबर ।

❓सवाल : – फिर चार रक्अत फ़र्ज़ की नीयत कैसे करे ।

जवाब : – नीयत की मैंने चार रक्अत नमाज़ फ़र्ज़ अस्त्र की अल्लाह तआला के लिए ( मुक़तदी इतना और कहे पीछे इस इमाम के ) मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के अल्लाहु अकबर ।

❓सवाल : – मगरिब के वक़्त कुल कितनी रक्अत नमाज़ पढ़ी जाती।

❓जवाब : – सात ( 7 ) रक्अत । पहले तीन रक्अत फ़र्ज़ फिर दो रक्अत सुन्नत फिर दो रक्अत नफ़्ल ।

सवाल : – तीन ( 3 ) रक्त फ़र्ज़ की नीयत किस तरह की जाएगी ।

जवाब : – नीयत की मैंने तीन रक्अत नमाज़ फ़र्ज़ मगरिब की | अल्लाह तआला के लिए ( मुक़तदी इतना और कहे पीछे इस इमाम के ) मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के अल्लाहु अकबर ।

❓सवाल : – और दो रक्अत सुन्नत की नीयत कैसे करे ।

जवाब : – नीयत की मैंने दो रक्अत नमाज़ सुन्नत मगरिब की अल्लाह तआला के लिए सुन्नत रसूलुल्लाह की मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के अल्लाहु अकबर ।

❓सवाल : – फिर दो रक्अत नफ्ल की नीयत कैसे करे ।

जवाब : – नीयत की मैंने दो रक्अत नमाज़ नफ्ल अल्लाह तआला के लिए मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के अल्लाहु अकबर ।

❓सवाल : – इशा के वक़्त कुल कितनी रक्अत नमाज़ पढ़ी जाती है ।

जवाब : – सत्तरह ( 17 ) रक्अत । पहले चार रक्अत सुन्नत , फिर चार रक्अत फर्ज , फिर दो रक्अत सुन्नत , फिर दो रक्अत नफ़्ल । इसके बाद फिर तीन रक्अत वित्र वाजिब फिर दो रक्अत नफ्ल ।

❓सवाल : – चार रक्अत सुन्नत की नीयत किस तरह की जाएगी ।

जवाब : – नीयत की मैंने चार ( 4 ) रक्अत नमाज़ सुन्नत इशा की अल्लाह तआला के लिए सुन्नत रसूलुल्लाह की मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के अल्लाहु अकबर ।

❓सवाल : – फिर चार ( 4 ) रक्अत फ़र्ज़ की नीयत कैसे करे ।

जवाब : – नीयत की मैंने चार ( 4 ) रक्अत नमाज़ फ़र्ज़ इशा की अल्लाह तआला के लिए मुक़तदी इतना और कहे ( पीछे इस इमाम के ) मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के अल्लाहु अकबर ।

❓सवाल : – फिर दो ( 2 ) रक्अत सुन्नत की नीयत किस तरह की जाएगी ।

जवाब : – नीयत की मैंने दो ( 2 ) रक्अत नमजा सुन्नत इशा की अल्लाह तआला के लिए सुन्नत रसूलुल्लाह की मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ के अल्लाहु अकबर ।

❓सवाल : – फिर दो रक्अत नफ्ल की नीयत किस तरह की जाएगी ।

जवाब : – नीयत की मैंने दो ( 2 ) रक्अत नमजा नफ्ल की अल्लाह तआला के लिए मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के अल्लाहु अकबर ।

❓सवाल : – वित्र की नीयत किस तरह की जाएगी ।

जवाब : – नीयत की मैंने तीन ( 3 ) रकअत नमाज वाजिब वित्र की अल्लाह तआला के लिए मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के अल्लाहु अकबर ।

❓सवाल : – फिर दो ( 2 ) रक्झत नफ़्ल की नीयत कैसे करे ।

जवाब : – नीयत की मैंने दो ( 2 ) रक्अत नमाज़ नफ्ल अल्लाह तआला के लिए मुंह मेरा तरफ़ काबा शरीफ़ के अल्लाहु अकबर ।

 

बाकी अगले पोस्ट में

अनवारे शरिअत, सफा 50/51/52

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जारी रहेगा…..
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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 20)
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अज़ान व इकामत का बयान

❓सवाल : – अज़ान कहना फर्ज है या सुन्नत ।

जवाब : – फर्ज नमाजों को जमाअत के साथ मस्जिद में अदा करने के लिए अज़ान कहना सुन्नते मुअक्कदा है मगर उस का हुक्म मिसल वाजिब के है यानी अगर अज़ान न कहीं गई तो वहां के सब लोग गुनाहगार होंगे ।

❓सवाल : – अज़ान किस वक़्त कहनी चाहिए ।

जवाब : – जब नमाज़ का वक़्त हो जाए तो अज़ान कहनी चाहिए । वक़्त से पहले जाइज़ नहीं अगर वक़्त से पहले कही गई तो वक़्त होने पर लौटाई जाए ।

❓सवाल : – फर्ज़ नमाज़ों के अलावा और भी किसी वक़्त अज़ान कही जाती है ।

जवाब : – हां , बच्चे और मगमूम ( फिक्रमन्द ) के कान में , मिरगी वाले गज़बनाक और बदमिजाज़ आदमी या जानवर के कान में , सख्त लड़ाई और आग लगने के वक़्त , मय्यत को दफ़न करने के बाद । जिन्न की सरकशी के वक्त और जंगल में जब रास्ता | भूल जाए और कोई बताने वाला न हो इन सूरतों में अज़ान | कहना मुसतहब है।

*( बहारे शरीअत , शामी जिल्द अव्वल सफ़ा 258 ) *

❓सवाल : – अज़ान का बेहतर तरीका क्या है ।

जवाब : – मस्जिद के सहन से बाहर किसी बुलन्द जगह पर किबला की तरफ मुंह करके खड़ा हो और कलिमह की दोनों उंगलियों को कानों में डालकर बुलंद आवाज़ से अज़ान के कलिमात को ठहर ठहर कर कहे जल्दी न करे और हय्य अलस्सलाह कहते वक़्त दाहिनी जानिब और हय्य अललफ़लाह कहते वक़्त बाएं जानिब मुंह फेरे ।

❓सवाल : – अज़ान के जवाब का क्या मसला है ।

जवाब : – अज़ान के जवाब का मसअला यह है कि अज़ान कहने वाला जो कलिमह तो सुनने वाला भी वही कलिमह कहे कहे मगर हय्य अलस्सलाह और हय्य अललफलाह के जवाब में लाहौल वला कूवत इल्ला बिल्लाह कहे और बेहतर यह है कि दोनों कहे । और फ़ज़र की अज़ान में अस्सलातु खैरूम मिनन्नौम के जवाब में सदा त व बरर त व बिलहक्कि नतक त कहे ।

❓सवाल : – खुतबा की अज़ान का जवाब देना कैसा है ।

जवाब : – खुतबा की अज़ान का जुबान से जवाब देना मुक्तदियों को जाइज़ नहीं ।

❓सवाल : – तकबीर यानी इक़ामत कहना कैसा है ।

जवाब : – इक़ामत कहना भी सुन्नते मुअक्कदा है उसकी ताकीद अज़ान से ज़्यादा है ।

❓सवाल : – क्या अज़ान कहने वाला ही इकामत कहे दूसरा न कहे ।

जवाब : – हां , अज़ान कहने वाला ही इकामत कहे । उसकी इजाज़त के बगैर दूसरा न कहे अगर बगैर इजाज़त दूसरे ने कही और अज़ान देने वाले को नागवार हो तो मकरूह है ।

❓सवाल : – अज़ान व इक़ामत के दरमियान सलात पढ़ना कैसा है ।

जवाब : – सलात पढ़ना यानी “ अस्सलातु वस्सलामु अलै क या रसूलल्लाह ” कहना जाइज़ व मुसतहसन है इस सलात का नाम इस्तिलाहे शरा में तसवीब है और तसवीव नमाजें मगरिब के अलावा बाक़ी नमाज़ों के लिए मुसतहसन है।

( आलम गीरी )

_*तमबीह ( 1 ) जो अज़ान के वक़्त बातों में मशगूल रहे उस पर मआजल्लाह ख़ातिमा बुरा होने का खौफ़ है

( बहारे शरीअत फ़तावा रज्वीया )

( 2 ) जब अज़ान खत्म हो जाए तो मुअज्जिन और अज़ान सुनने वाले दुरूद शरीफ़ पढ़ें फिर अज़ान के बाद की यह दुआ पढ़ें । दुआ निचे फोटो में है।

( 3 ) जब मुअज्जिन “ अश्हदु अन्न मुहम्मद सूलुल्लाह ” कहे तो सुनने वाला दुरूद शरीफ पढ़े और मुसतहब है कि अगूंठों को चूमकर आंखों से लगाले और कहे “ कुर्रतु ऐ नीबि क या रसूलल्लाहि अल्लाहुम्म मत्तिअनी बिस्समझि वलबसरि “।

( बहारे शरीअत , शामी )

अनवारे शरिअत, सफा 45/46/47/48

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 19)
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⏲️मकरूह वक़्तो का बयान

❓सवाल : – क्या रात और दिन में कुछ वक़्त ऐसे भी हैं जिन में नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं ।

जवाब : – जी हां सूरज निकलने के वक़्त , सूरज डूबने के वक़्त और दोपहर के वक़्त किसी किस्म की कोई नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं । हां अगर उस दिन अस्र की नमाज़ नहीं पढ़ी है तो सूरज डूबने के वक़्त पढ़ ले मगर इतनी देर करना सख्त गुनाह है ।

❓सवाल : – सूरज निकलने के वक़्त कितनी देर नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं ?

जवाब : – जब सूरज का कनारा जाहिर हो उस वक़्त से लेकर तकरीबन बीस मिनट तक नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं ।

❓सवाल : – सूरज डूबने के वक़्त कब से कब तक नमाज़ पढ़ना जाइज़ नहीं है ।

जवाब : – जब सूरज पर नज़र ठहरने लगे उस वक़्त से लेकर डूबने तक नमाज़ पढ़ना नहीं जाइज़ है और यह वक़्त भी तक़रीबन बीस ( 20 ) मिनट है ।

❓सवाल : – दोपहर के वक़्त कब से कब तक नमाज़ पढ़ना जाइज नहीं ।

जवाब : – ठीक दोपहर के वक़्त तक़रीबन चालीस ( 40 ) पचास ( 50 ) मिनट तक नमाज़ पढ़ना जाइज़ नही ।

❓सवाल : – मकरूह वक़्त में नमाज़े जनाज़ा पढ़ना कैसा है ।

जवाब : – अगर मकरूह वक़्तो में जनाज़ा लाया गया तो उसी वक़्त पढ़ें कोई कराहत नहीं । कराहत उस सूरत में है कि पहले से जनाज़ा तैयार मौजूद है और ताखीर की यहां तक कि वक़्ते कराहत आ गया।

( बहारे शरीअत , आलमगीरी )

❓सवाल : – इन मकरूह वक़्तो में कुरआन शरीफ़ पढ़ना कैसा है ।

जवाब : – इन मकरूह वक़्तो में कुरआन शरीफ न पढ़े तो बेहतर है और पढ़े तो कोई हर्ज नहीं ।

( अनवारूल हदीस )

 

अनवारे शरिअत, सफा 44/45

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 18)
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नमाज़ के वक़्तो का बयान⏲️

❓सवाल : – दिन व रात में कुल कितनी नमाजें फर्ज हैं ।

जवाब : – दिन व रात में कुल पांच नमाजें फर्ज है । फज्र , जुहर , अस्र , मगरिब , और इशा ।

❓सवाल : – फज्र का वक़्त कब से कब तक है ।

जवाब : – उजाला होने से फ़ज़्र का वक़्त शुरू होता है और सूरज निकलने से पहले तक रहता है लेकिन खूब उजाला होने पर पढ़ना मुसतहब है ।

❓सवाल : – जुहर का वक़्त कब से कब तक रहता है ।

जवाब : – ज़ुहर का वक़्त सूरज ढलने के बाद शुरू होता है और ठीक दोपहर के वक़्त किसी चीज़ का जितना साया होता है उसके अलावा उसी चीज़ का दोगुना साया हो जाए तो ज़ुहर का वक़्त खत्म हो जाता है । मगर छोटे दिनों में अव्वले वक़्त और बड़े दिनों में आखिरे वक़्त पढ़ना मुसतहब है ।

❓सवाल : – अस्र का वक़्त कब से कब तक रहता है ।

जवाब : – ज़ुहर का वक़्त खत्म हो जाने से अस्र वक़्त शुरू हो जाता है और सूरज डूबने से पहले तक रहता है , मगर अस्त्र में ताखीर हमेशा मुसतहब है लेकिन न इतनी ताखीर कि सूरज | की टिकिया में जार्दी आ जाए ।

❓सवाल : – मगरिब का वक़्त कब से कब तक रहता है ।

जवाब : – मगरिब का वक़्त सूरज डूबने के बाद से शुरू हो जाता है , और उत्तर दक्खिन फैली हुई सफ़ेदी के गायब होने से पहले तक रहता है । मगर अव्वल वक्त पढ़ना मुसतहब और ताख़ीर मकरूह है ।

❓सवाल : – इशा का वक़्त कब से कब तक रहता है ।

जवाब : – इशां का वक़्त उत्तर दक्खिन फैली हुई सफेदी के गायब होने से शुरू होता है और सुबह उजाला होने से पहले तक रहता है लेकिन तिहाई रात तक ताखीर मुसतहब और आधी रात तक मुबाह और आधी रात के बाद मकरूह है ।

अनवारे शरिअत, सफा 42/43/44

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 17)
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हैज़ , निफ़ास और जनाबत का बयान

❓सवाल : – हैज़ और निफ़ास किसे कहते हैं ।

जवाब : – बालिगा औरत के आगे के मक़ाम से जो खून आदी तौर पर निकलता है और बीमारी या बच्चा पैदा होने के सबब से न हो तो उसे हैज़ कहते हैं , उसकी मुद्दत कम से कम तीन दिन और ज्यादा से ज्यादा दस दिन है , इससे कम या ज्यादा हो तो बीमारी यानी इसतिहाज़ा है , और बच्चा पैदा होने के बाद जो खून आता है उसे निफ़ास कहते हैं , निफ़ास में कमी की जानिब कोई मुद्दत मुकर्रर नहीं और ज्यादा से ज़्यादा उसका ज़माना चालीस दिन है चालीस दिन के बाद जो खून आए वह इसतिहाज़ा है ।

❓सवाल : – हैज़ व निफ़ास का हुक्म क्या है ?

जवाब : – हैज़ व निफ़ास की हालत में रोज़ा रखना और नमाज़ पढ़ना हराम है उन दिनों में नमाजें मुआफ़ हैं उनकी कज़ा भी नहीं मगर रोज़ों की कज़ा और दिनों में रखना फ़र्ज़ है और हैज़ व निफ़ास वाली औरत को कुरआन मजीद पढ़ना हराम है ख्वाह देख कर पढ़े या जुबानी और उसका छूना अगरचे उसकी जिल्द | या हाशिया को हाथ या उंगली की नोक या बदन का कोई हिस्सा लगे सब हराम है । हां जुजदान में कुरआन मजीद हो तो उस | जुज़दान के छूने में हर्ज नहीं I

❓सवाल : – जिसे इहतिलाम हुआ और ऐसे मर्द व औरत कि जिन पर गुस्ल फ़र्ज़ है उनके लिए क्या हुक्म है ।

जवाब : – ऐसे लोगों को गुस्ल किए बगैर नमाज़ पढ़ना , कुरआन मजीद देख कर या जुबानी पढ़ना उसका छूना और मस्जिद में जाना हराम है ।

❓सवाल : – क्या जिस पर गुस्ल फ़र्ज़ हो वह मस्जिद में नहीं जा सकता ।

जवाब : – जिस पर गुस्ल फर्ज हो उसे मस्जिद के उस हिस्सा में जाना हराम है कि जो दाखिले मस्जिद है यानी नमाज़ के लिए बनाया गया है और वह हिस्सा कि जो फनाए मस्जिद है यानी इसतिंजा खाना , गुस्ल खाना और वजू गाह वगैरा तो उस जगह जाने में कोई हर्ज नहीं बशर्ते कि उनमें जाने का रास्ता दाखिले मस्जिद से होकर न गुज़रता हो ।

❓सवाल : – ऐसे मर्द व औरत कि जिन पर गुस्ल फ़र्ज़ है वह कुरआन की तालीम दे सकते हैं या नहीं ।

जवाब : – ऐसे लोग एक एक कलिमह सांस तोड़ तोड़ कर पढ़ा सकते हैं और हिज्जे कराने में कोई हर्ज नहीं ।

❓सवाल : – बे वजू कुरआन शरीफ़ छूना व पढ़ना जाइज़ है या नहीं ।

जवाब : – बे वजू कुरआन शरीफ छूना हराम है बेगैर छुए जुबानी या देखकर पढ़े तो कोई हर्ज नहीं ।

❓सवाल : – बे वजू पारये अम्म या किसी दूसरे पारह का छूना कैसा ।

जवाब : – बे वजू पारये अम्म या किसी दूसरे पारह का छूना भी हराम है ।

अनवारे शरिअत, सफा 40/41/42

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 16)
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नजासत का बयान

❓सवाल : – नजासत की कितनी किस्में हैं ।

जवाब : – नजासते हक़ीकीया की दो किस्में है । नजासते गलीज़ा , नजासते खफ़ीफ़ा ।

सवाल : – नजासते गलीज़ा क्या चीजें हैं ।

जवाब : – इन्सान के बदन से ऐसी चीज निकले कि उससे वजू या गुस्ल वाजिब हो जाता हो तो वह नजासते गलीज़ा है जैसे पाखाना , पेशाब , बहता खून , पीप , मुंह भर है और दुखती आंख का पानी वगैरा , और हराम चौपाये जैसे कुत्ता , शेर , लोमड़ी , बिल्ली , चूहा , गधा , खच्चर , हाथी और सूअर वगैरा का पाख़ाना पेशाब और घोड़े की लीद और हर हलाल चौपाये का पाखाना जैसे गाय भैंस का गोबर बकरी और ऊंट की मेंगनी , मुर्गी और बतख की बीट , हाथी के सूंड की रतूबत और शेर कुत्ता वगैरा दरिन्दे चौपायों का लुआब यह सब नजासते गलीज़ा है । और दूध पीता लड़का हो या लड़की उनका पेशाब भी नजासते गलीज़ा है ।

( बहारे शरीअत )

❓सवाल : – नजासते खफ़ीफ़ा क्या चीजें हैं ।

जवाब : – जिन जानवरों का गोश्त हलाल है जैसे गाय , बैल भैंस बकरी और भेड़ वगैरा इनका पेशाब नीज़ घोड़े का पेशाब , और जिस परिन्द का गोश्त हराम हो जैसे कौआ , चील , शिकरा , बाज़ और बहरी वगैरा की बीट यह सब नजासते खफ़ीफ़ा हैं ।

❓सवाल:- नजासते गलीज़ा बदन‌ या कपड़े पर लग जाए तो क्या हुक्म है।

जवाब : – अगर नजासते गलीज़ा एक दिरहम से ज़्यादा लग जाए तो उसका पाक करना फ़र्ज़ है कि बगैर पाक किए नमाज़ पढ़ ली तो नमाज़ होगी ही नहीं , और अगर नजासते गलीज़ा एक दिरहम के बराबर लग जाए तो उसका पाक करना वाजिब है कि बगैर पाक किए पढ़ ली तो नमाज मकरूह तहरीमी हुई यानी ऐसी नमाज़ का दोबारा पढ़ना वाजिब है और अगर नजासते गलीजा एक दिरहम से कम लगी है तो उसका पाक करना सुन्नत है । कि बगैर पाक किए नमाज़ पढ़ ली तो हो गई मगर ख़िलाफ़े सुन्नत हुई ऐसी नमाज़ का दोबारा पढ़ना बेहतर है ।

( बहारे शरीअत )

_*❓सवाल : – अगर नजासते खफ़ीफ़ा लग जाए तो उसका क्या हुक्म है ।

जवाब : – नजासते खफ़ीफ़ा कपड़े या बदन के जिस हिस्सा में लगी है अगर उसकी चौथाई से कम है । मसलन दामन में लगी है तो दामन की चौथाई से कम है या आसतीन में लगी है तो उसकी चौथाई से कम में लगी है या हाथ में हाथ की चौथाई से कम लगी है तो मुआफ़ है और अगर पूरी चौथाई में लगी हो तो बगैर धोए नमाज़ न होगी ।

❓सवाल : – अगर कपड़े में नजासत लग जाए तो कितनी बार धोने से पाक होगा ।

जवाब : – अगर नजासत दलदार है जैसे पाखाना और गोबर वगैरह तो उसके धोने में कोई गिनती मुकर्रर नहीं बल्कि उसको दूर करना ज़रूरी है अगर एक बार धोने से दूर हो जाए तो एक ही मर्तबा धोने से पाक हो जाएगा और अगर चार पांच मर्तबा धोने से दूर हो तो चार पांच मर्तबा धोना पड़ेगा । हां अगर तीन मर्तबा से कम में नजासत दूर हो जाए तो तीन बार पूरा कर लेना बेहतर है , और अगर नजासत पतली हो जैसे पेशाब वगैरा तो तीन मर्तबा धोना और तीनों मर्तबा कवत के साथ निचोड़ने से कपड़ा पाक हो जाएगा।

अनवारे शरिअत, सफा 38/39/40

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 15)
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⛲कुयें का बयान

❓सवाल : – कुआं कैसे नापाक हो जाता है ।

जवाब : – कुएं में आदमी , बैल , भैंस या बकरी गिर कर मर जाए या किसी किस्म की कोई नापाक चीज़ गिर जाए तो कुआं नापाक हो जाता है ।

❓सवाल : – कुएं में अगर कोई जानवर गिर जाए और जिन्दा निकाल लिया जाए तो कुआं नापाक होगा या नहीं ।

जवाब : – अगर कोई ऐसा जानवर गिर गया कि उसका झूटा नापाक है जैसे कुत्ता और गीदड़ वौरा तो कुआं नापाक हो जाएगा । और अगर वह जानवर गिरा कि जिस का झूटा नापाक नहीं जैसे गाय और बकरी वगैरा और उनके बदन पर नजासत भी न लगी हो तो गिर कर ज़िन्दा निकल आने की सूरत में जब तक उनके पाखाना पेशाब कर देने का यक़ीन न हो कुआं नापाक न होगा ।

❓सवाल : – कुआं अगर नापाक हो जाए तो कितना पानी निकाला जाएगा ।

जवाब : – अगर कुएं में नजासत पड़ जाए या आदमी , बैल , भैंस , बकरी या इतना ही बड़ा कोई दूसरा जानवर गिर कर मर जाए या दो बिल्लियां मर जाएं या मुर्गी और बतख की बीट गिर जाए या मुर्गा , मुर्गी बिल्ली , चूहा , छिपकली या और कोई बहते हुए खून वाला जानवर कुएं में गिर कर फूल जाए या फट जाए या ऐसा जानवर गिर जाए कि जिस का झूटा नापाक है अगरचे ज़िन्दा निकल आए जैसे सूअर और कुत्ता वगैरा तो इन सब सूरतों में कुल पानी निकाला जाएगा ।

❓सवाल : – अगर चूहा या बिल्ली कुएं में में गिर कर मर जाए और फूलने फटने से पहले निकाल ली जाए तो क्या हुक्म है ।

जवाब : – चूहा , छछूदर , गौरय्या चिड़या , छिपकली , गिरगिट या इनके बराबर या इनसे छोटा कोई बहते हुए खून वाला जानवर कुएं में गिर कर मर जाए और फूलने फटने से पहले निकाल लिया जाए , तो बीस डोल से तीस डोल तक पानी निकाला जाएगा । और अगर बिल्ली , कबूतर , मुर्गी या इतना ही बड़ा कोई दूसरा जानवर कुएं में गिर कर मर जाए और फूले फटे नहीं तो चालिस से साठ डोल तक पानी निकाला जाएगा ।

❓सवाल : – डोल कितना बड़ा होना चाहिए ।

जवाब : – जो डोल कुएं पर पड़ा रहता है वही डोल मुतबर है और अगर कोई डोल खास न हो तो ऐसा डोल होना चाहिए कि जिसमें तकरीबन सवा पांच किलो पानी आ जाए ।

❓सवाल : – कुएं का पानी पाक हो जाने के बाद कुआं की दीवार और डोल रस्सी भी पाक करना पड़ेगा या नहीं ।

जवाब : – कुआं की दीवार और डोल रस्सी नहीं पाक करना पड़ेगा , पानी पाक होने के साथ यह सब चीजें भी पाक हो जाएंगी

 

अनवारे शरिअत, सफा 36/37/38

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 14)
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पानी और जानवरों के झूटे का बयान

❓सवाल : – किन पानियों से वज़ू करना जाइज़ है ।

“जवाब : – बरसात का पानी , नदी , नाले , चश्मे , समुन्दर , दरया और कुयें का पानी , पिघली हुई बर्फ या ओले का पानी , तालाब या बड़े हौज़ का पानी , इन सब पानियों से वज़ू करना जाइज़ है ।”

❓सवाल : – किन पानियों से वज़ू करना जाइज़ नहीं ।

“जवाब : – फल और दरख्त का निचोड़ा हुआ पानी या वह पानी कि जिसमें कोई पाक चीज़ मिल गई और नाम बदल गया जैसे शर्बत , शोरबा , चाय वगैरा या बड़े हौज़ और तालाब का ऐसा पानी कि जिसका रंग या बू या मजा किसी नापाक चीज के मिल जाने से बदल गया और छोटे हौज़ या घड़े का वह पानी कि जिसमें कोई नापाक चीज़ गिर गई हो या ऐसा जानवर मर गया हो कि जिसमें बहता हुआ खून हो अगर पानी का रंग या बू या मज़ा न बदला हो और वह पानी कि जो वजू या गुस्ल का धोवन है । इन सब पानियों से वज़ करना जाइज़ नहीं ।”

❓सवाल : – क्या वज़ू और गुस्ल के पानी में कुछ फर्क है ।

“जवाब : – नहीं , जिन पानियों से वज़ू जाइज़ है उनसे गुस्ल भी जाइज़ है और जिन पानियो मे वज़ू नाजाइज़ है गुस्ल भी नाजाइज़ है ।

❓सवाल : – किन जानवरों का झूठा पाक है ।

“जवाब : – जिन जानवरों का गोश्त खाया जात है उनका झूटा पाक है । जैसे गाय , बैल , भैंस , बकरी , कबूतर और फाख्ता वगैरा ।”

❓सवाल : – किन जानवरों का झूटा मकरूह है ।

“जवाब : – घर में रहने वाले जानवर जैसे बिल्ली , चूहा , सांप , छिपकली और उड़ने वाले शिकारी जानवर से शिकरा , बाज़ , बहरी , चील और कौआ वगैरा । और वह मुर्गी जो छूटी फिरती हो और नजासत पर मुंह डालती हो और वो गाय जिसकी आदत गलीज़ खाने की हो इन सब का झूटा मकरूह है ।”

❓सवाल : – किन जानवरों का झूटा नापाक है ।

“जवाब : – सूअर , कुत्ता , शेर , चीता , भेड़िया , हाथी , गीदड़ और दूसरे शिकारी चौपाये का झूटा नापाक है ।”

अनवारे शरिअत, सफा 34/35

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 13)
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इसतिनजा का बयान

सवाल : – इसतिनजा का तरीका क्या है ?

जवाब : – पेशाब के बाद इसतिनजा करने का तरीका यह है कि पाक मिट्टी , कंकर या फटे पुराने कपड़े से पेशाब सुखाये फिर पानी से धो डाले और पाखाना के बाद इसतिनजा करने का तरीका यह है कि मिट्टी , कंकर या पत्थर के तीन , पांच या सात टुकड़ों से पाखाना की जगह साफ़ करले फिर पानी से धो डाले ।

सवाल : – इसतिनजा का ढेला और पानी किस हाथ से इस्तेमाल करना चाहिए ?

जवाब : – बाएं हाथ से

सवाल : – किन चीजों से इसतिनजा करना मना है ?

जवाब : – किसी किस्म का खाना , हड्डी , गोबर लीद , कोयला , और जानवर का चारा , इन सब चीजों से इसतिनजा करना मना हैं।

सवाल : – किन जगहों पर पेशाब पाखाना करना मना है ।

जवाब : – कुएं या हौज़ या चश्मा के किनारे , पानी में अगरचे बहता हुआ हो , घाट पर , फलदार दरख्त के नीचे , ऐसे खेत में कि जिसमें खेती मौजूद हो , साया में जहां लोग उठते बैठते हों , मस्जिद या ईदगाह के पहलू में , कब्रिस्तान या रास्ते में , जिस जगह जानवर बंधे हों और जहां वजू या गुस्ल किया जाता हो इन सब जगहों में पाखाना पेशाब करना मना है ।

सवाल : – पाखाना या पेशाब करते वक़्त मुंह किस तरफ़ होना चाहिए ।

जवाब : – पाखाना या पेशाब करते वक़्त किबला की तरफ मुंह | या पीट करना मना है हमारे मुल्क में उत्तर या दक्खिन जानिब मुंह करना चाहिए ।

अनवारे शरिअत, सफा 33/34

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 12)
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तयम्मुम का बयान

सवाल : – तयम्मुम करने का तरीका क्या है ।

जवाब : – तयम्मुम करने का तरीका यह है कि अव्वल दिल में नीयत करे फिर दोनों हाथ की उंगलियां कुशादा करके ज़मीन पर मारे और ज्यादा गर्द लग जाए तो झाड़ ले फिर उससे सारे मुंह का मसह करे फिर दोबारा दोनों हाथ ज़मीन पर मारकर दाहिने हाथ को बाएं हाथ से और बाएं हाथ को दाहिने हाथ से कुहनियों समेत मले ।

सवाल : – जुबान से तयम्मुम की नीयत अदा करते वक़्त क्या कहे ।

जवाब : – यह कहे नीयत की मैंने तयम्मुम की अल्लाह तआला का तकर्रुब हासिल करने के लिए ।

सवाल : – तयम्मुम का यह तरीका वज़ू के लिए है या गुस्ल के लिए ।

जवाब : – तयम्मुम का यही तरीका वज़ू और गुस्ल दोनों के लिए ।

सवाल : – तयम्मुम में कितनी बातें फर्ज हैं ।

जवाब : – तयम्मुम में तीन बातें फर्ज हैं , नीयत करना , पूरे मुंह पर हाथ फेरना , दोनों हाथों का कुहनियों समेत मसह करना , अगर अंगूठी पहने हो तो उसके नीचे हाथ फेरना फर्ज़ है । और औरत अगर चूड़ी या ज़ेवर पहने हो तो उसे हटा कर हर हिस्सा पर हाथ फेरना फ़र्ज़ है ।

सवाल : – किन चीजों से तयम्मुम करना जाइज़ है ।

जवाब : – पाक मिट्टी , पत्थर , रेत , मुलतानी मिट्टी , गेरु , कच्ची या पक्की ईंट , मिट्टी और ईंट पत्थर या चूना की दीवारों से तयम्मुम करना जाइज़ है ।

सवाल : – किन चीजों से तयम्मुम करना जाइज़ नहीं ।

जवाब : – सोना , चांदी , तांबा , पीतल , लोहा , लकड़ी , अलमूनियम , जस्ता , कपड़ा , राख , और हर किस्म के ग़ल्ला से तयमुम करना जाइज़ नहीं । यानी जो चीजें आग में पिघल जाती हैं या जलकर राख हो जाती हैं उन चीजों से तयम्मुम करना जाइज़ नहीं ।

सवाल : – तयम्मुम करना कब जाइज़ है ।

जवाब : – जब पानी पर कुदरत न हो तो तयम्मुम करना जाइज़ है ।

सवाल : – पानी पर कुदरत न होने की क्या सूरत है ।

जवाब : – पानी पर कुदरत न होने की यह सूरत है कि ऐसी बीमारी हो कि वज़ू या गुस्ल से उसके ज्यादा हो जाने का सहीह अन्देशा हो या ऐसे मुकाम पर मौजूद हो कि वहां चारों तरफ़ एक एक मील तक पानी का कहीं पता न हो या इतनी सरदी हो कि पानी के इस्तेमाल से मर जाने या बीमार हो जाने का कवी अन्देशा हो या कुआं मौजूद है मगर डोल व रस्सी नहीं पाता है । इनके अलावा पानी पर कुदरत न होने की और भी सूरतें हैं जो बहारे शरीअत वगैरा बड़ी किताबों से मालूम की जा सकती हैं ।

सवाल : – किन चीजों से तयम्मुम टूट जाता है ।

जवाब : – जिन चीजों से वज़ टूट जाता है या गुस्ल वाजिब होता है उनसे तयम्मुम भी टूट जाता है । अलावा इनके पानी पर कुदरत हो जाने से भी तयम्मुम टूट जाता है ।

अनवारे शरिअत, सफा 30/31/32

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 11)
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गुस्ल का बयान

सवाल : – गुस्ल करने का तरीका क्या है ।

जवाब : – गुस्ल करने का तरीका यह है कि पहले गुस्ल की नीयत करके दोनों हाथ गट्टों तक तीन बार धोए फिर इसतिनजा की जगह धोए उसके बाद बदन पर अगर कहीं नजासते हक़ीक़ीया यानी पेशाव या पाखाना वगैरह हो तो उसे दर करे फिर नमाज जैसा वज़ू करे मगर पाव न धोए हा अगर चौकी या पत्थर वगैरह ऊँची चीज़ पर नहाए तो पांव भी धोले । इसके बाद बदन पर तेल की तरह पानी चुपड़े फिर तीन बार दाहिने कंधे पर पानी बहाए और फिर तीन बार बायें कंधे पर फिर सर पर और तमाम बदन पर तीन बार पानी बहाए तमाम बदन पर हाथ फेरे और मले फिर नहाने के बाद फौरन कपड़ा पहन ले ।

सवाल : – गुस्ल में कितनी बातें फ़र्ज़ हैं ?

जवाब : – गुस्ल में तीन बातें फ़र्ज़ हैं कुल्ली करना , नाक में सख्त हड्डी तक पानी चढ़ाना , तमाम ज़ाहिर बदन पर सर से पांव तक पानी बहाना ।

सवाल : – गुस्ल में कितनी बातें सुन्नत हैं ?

जवाब : – गुस्ल में यह बातें सुन्नत हैं । गुस्ल की नीयत करना दोनों हाथ गट्टों तक तीन बार धोना । इसतिनजा की जगह धोना । बदन पर जहां कहीं नजासत हो उसे दूर करना । नमाज़ जैसा वज़ू करना । बदन पर तेल की तरह पानी चुपड़ना । दाहिने मोढे फिर बांए मोढे फिर सर पर और तमाम बदन पर तीन बार पानी बहाना तमाम बदन पर हाथ फेरना और मलना । नहाने में किबला रुख न होना और कपड़ा पहन कर नहाना हो तो कोई हर्ज नहीं । ऐसी जगह नहाना कि कोई न देखे । नहाते वक़्त किसी किस्म का कलाम न करना । कोई दुआ न पढ़ना । औरतों को बैठकर नहाना । नहाने के बाद फौरन कपड़ा पहन लेना ।

सवाल : – किन सूरतों में गुस्ल करना फ़र्ज़ है ।

जवाब : – मनी का अपनी जगह से शहवत के साथ जुदा होकर उज्व से निकलना , इहतिलाम , हशफ़ा यानी सरे ज़कर का औरत के आगे या पीछे या मर्द के पीछे दाखिल होना दोनों पर गुस्ल फर्ज करता है । हैज़ से फारिग होना । निफ़ास का खत्म होना ।

सवाल : – किन वक़्तों में गुस्ल करना सुन्नत है ।

जवाब : – जुमा , ईद , बकराईद अर्फा के दिन और इहराम बांधते वक़्त नहाना सुन्नत है ।

सवाल : – किन सूरतों में गुस्ल करना मुसतहब है ।

जवाब : – वकूफे अर्फात , वकूफे मुजदलफ़ा , हाज़रीये हरम , हाज़रीये सरकारे आज़म सल्लल्लाहु तआला अलैहिवसल्लम तवाफ़ , दुखूलेमिना , तीनों दिन जमरों पर कंकरियां मारने के लिए , शबेबराअत , शवे क़द्र , अर्फात की रात , मजलिसे मीलाद शरीफ़ और दीगर मजलिसे खैर की हाज़िरी के लिए , मुर्दा नहलाने के बाद , मजनून को जुनून जाने के बाद , गशी से इफ़ाका के बाद , नशा जाते रहने के बाद , गुनाह से तौबा करने के लिए , नया कपड़ा पहनने के लिए , सफ़र से वापसी के बाद , इसतिहाज़ा बन्द होने के बाद । नमाजे कुसूफ , खुसूफ , इसतिसका , खौफ , तारीकी और सख्त आंधी के लिए , बदन पर नजासत लगी हो और यह मालूम न हो कि किस जगह है । इन सब सूरतों में गुस्ल करना मुस्तहब है ।

अनवारे शरिअत, सफा 28/29/30

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 10)
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वज़ू का बयान

सवाल : – वज़ू करने का तरीका क्या है ।

जवाब : – वजू करने का तरीका यह कि पहले तसमिया ( बिस्मिल्लह ) पढ़े फिर मिसवाक करे अगर मिसवाक न हो तो उंगली से दांत मसले फिर दोनों हाथों को गट्टों तक तीन बार धोए पहले दाहिने हाथ पर पानी डाले फिर बाएं हाथ पर दोनों हाथों को एक साथ न धोए फिर दाहिने हाथ से तीन बार कुल्ली करे फिर बाएं हाथ की छोटी उंगली से नाक साफ करे और दाहिने हाथ से तीन बार नाक में पानी चढ़ाए फिर पूरा चेहरा धोए यानी पेशानी पर बाल उगने की जगह से ढोड़ी के नीचे तक और एक कान की लौ से दूसरे कान की लौ तक हर हिस्सा पर तीन बार पानी बहाए इसके बाद दोनों हाथ कुहनियों समेत तीन बार धोए उंगलियों की तरफ से कुहनियों के ऊपर तक पानी डाले कुहनियों की तरफ़ से न डाले फिर एक बार दोनों हाथ से पूरे सर का मसह करे फिर कानों का और गर्दन का एक एक बार मसह करे फिर दोनों पांव टखनों समेत तीन बार धोए ।

सवाल : – धोने का क्या मतलब क्या है ।

जवाब : – धोने का मतलब यह है कि जिस चीज़ को धोवो उसके हर हिस्सा पर पानी बह जाए ।

सवाल : – अगर कुछ हिस्सा भीग गया मगर उस पर पानी नहीं बहा तो वज़ू होगा या नहीं ।

जवाब : – इस तरह वज़ू हरगिज़ न होगा भीगने के साथ हर हिस्सा पर पानी बह जाना ज़रूरी है ।

सुवाल : – वज़ू में कितनी चीजें फ़र्ज़ हैं ।

जवाब : – वज़ू में चार चीजें फ़र्ज़ हैं । (1)अव्वल मुंह धोना यानी बाल निकलने की जगह से ठोड़ी के नीचे तक और एक कान की लौ से दूसरे कान की लौ तक

(2)दूसरा कुहनियों समेत दोनों हाथ धोना

(3)तीसरा चौथाई सर का मसह करना यानी भीगा हुआ हाथ फेरना

(4)चौथा दोनों पांव टखनों समेत धोना ।

सवाल : – वज़ू में सुन्नतें कितनी हैं ।

जवाब : – वज़ू में सुन्नतें सोलह हैं नीयत करना , तस्मिया पढ़ कर शुरु करना , दोनों हाथों को गट्टों तक तीन बार धोना , मिसवाक करना , दाहिने हाथ से तीन बार कुल्लियां करना दाहिने हाथ से तीन बार नाक में पानी चढ़ाना , बाएं हाथ से नाक साफ़ करना , दाढ़ी का खिलाल करना , हाथ पांव की उंगलियों का खिलाल करना हर उज़्व को तीन तीन बार धोना , पूरे सर का एक बार मसह करना , कानों का मसह करना , तरतीब से वज़ू करना , दाढ़ी के जो बाल मुंह के दायरे के नीचे हैं उनका मसह करना , आज़ा को पैदर पै धोना , हर मकरुह बात से बचना ।

सवाल : – वज़ू में कितनी बातें मकरुह हैं ।

जवाब : – वज़ू में इक्कीस बातें मकरुह हैं । औरत के गुस्ल या वज़ू के बचे हुए पानी से वज़ू करना । वजू के लिए नजिस जगह बैठना , नजिस जगह वजू का पानी गिराना , मस्जिद के अन्दर वजू करना , वजू के आज़ा से बरतन में क़तरे टपकाना , पानी में रींठ या खंकार डालना । किबला की तरफ़ थूक या खंकार डालना या कुल्ली करना । बेज़रूरत दुनियां की बातें करना , ज़रूरत से ज़्यादा पानी खर्च करना , पानी इस कदर कम खर्च करना कि सुन्नत अदा न हो , मुंह पर पानी मारना , मुंह पर पानी डालते वक़्त फूंकना , सिर्फ एक हाथ से मुंह धोना , गले का मसह करना , बाए हाथ से कुल्ली करना या नाक में पानी डालना , दाहिने हाथ से नाक साफ़ करना , अपने लिए कोई लोटा वगैरह खास कर लेना , तीन नए पानियों से तीन बार सर का मसह करना जिस कपड़े से इसतिनजा का पानी खुश्क किया हो उससे आज़ाए वुजू पोंछना , धूप के गर्म पानी से वजू करना , किसी सुन्न्त को छोड़ देना ।

सवाल : – किन चीजों से वजू टूट जाता है ।

जवाब : – पाखाना या पेशाब करना , पाख़ाना पेशाब के रास्ते से किसी और चीज़ का निकलना , पाखाना के रास्ते से हवा का निकल जाना , बदन के किसी मुकाम से खून या पीप निकलकर ऐसी जगह बहना कि जिसका वजू या गुस्ल में धोना फ़र्ज़ है , खाना पानी या सफ़रा की मुंह भर कै आना , इस तरह सो जाना कि जिस्म के जोड़ ढीले पड़ जाएं , बेहोश होना जुनून होना , गशी होना , किसी चीज़ का इतना नशा होना कि चलने में पांव लड़खड़ाएं , रुकू और सज्दा वाली नमाज़ में इतनी ज़ोर से हंसना कि आस पास वाले सुनें , दुखती आंख से आंसू बहना , इन तमाम बातों से वज़ टूट जाता है ।

अनवारे शरिअत, सफा 25/26/27/28

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 09)
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सवाल : – बिदअत किसे कहते हैं । और उसकी कितनी किस्में हैं।

_*जवाब : – इसतिलाहे शरा ( इस्लामी बूली ) में बिदअत ऐसी चीज़ के ईजाद करने को कहते हैं जो हुज़र अलैहिस्सलाम के ज़ाहिरी ज़माना में न हो ख्वाह वह चीज़ दीनी हो या दुनियावी

( अशिअतुल्लमआत जिल्द अव्वल सफा 125 )

और बिदअत की तीन किस्में हैं ।

(1)बिदअते हसना
(2)बिदअते सय्येआ
(3)बिदअते मुबाहा

बिदअते हसना वह बिदअत है जो कुरान व हदीस के वसूल व कवाइद के मुताबिक़ हो और उन्हीं पर कियास किया गया हो उस की दो किस्में हैं । अव्वल बिदअतेवाजिबा जैसे कुरान व हदीस समझने के लिए इल्मे नहू का सीखना और गुमराह फ़िरके मसलन खारजी , राफ़जी , कादियानी और वहाबी वगैरा पर रद के लिए दलाइल कायम करना ।

दोम बिदअते मुसतहब्बा जैसे मदरसों की तामीर और हर वह नेक काम जिसका रवाज इबतिदाए ज़माना में नहीं था जैसे अज़ान के बाद सलात पुकारना , दुरै मुखतार बाबुल अज़ान में हैं कि अज़ान के बाद अस्सलातु वस्सल्लमु अलैक या रसूलल्लाह पुकारना , माहे रबीउल आख़र सन् 781 हिजरी में जारी हुआ और यह बिदअते हसना है ।

सवाल : – बिदअते सयएआ किसे कहते हैं । और उसकी कितनी किस्में हैं !

जवाब : – बिदअते सय्येा वह बिदअत है जो कुरान व हदीस के उसूल व कवाइद के मुखालिफ़ हो।

( अशिअतुल्लम आतजिल्द अव्वल सफ़ा 125 )

_*उसकी दो किस्में हैं । अव्वल बिदअते मुहर्रमा जैसे हिन्दुस्तान की मुख्वजा ताजियादारी

( फतावा अजीजिया रिसाला ताज़ियादारी आला हज़रत )

और जैसे अहलेसुन्नत व जमाअत के खिलाफ़ नए अक़ीदा वालों के मजाहिब

( अशिअतुल्लमआत जिल्द अव्वल सफा 125 )

दोम बिदअते मकरुहा जैसे जुमा व ईंदैन का खुतबा गैरे अरबी में पढ़ना ।

सवाल : – बिदअते मुबाहा किसे कहते हैं ।

जवाब : – जो चीज़ हुजूर अलैहिस्सलाम के ज़ाहिरी ज़माना में न हो और जिसके करने न करने पर सवाब व अज़ाब न हो उसे बिदअते मुबाहा कहते हैं।

( अशिअ तुल्लमआत जिल्द अव्वल सफा 125 }

जैसे खाने पीने में कुशादगी इख़तियार करना और रेल गाड़ी वगैरा में सफर करना ।

सवाल : – हदीस शरीफ़ में है कि हर बिदअत गुमराही है तो इससे कौन सी बिदअत मुराद है ।

जवाब : – इस हदीस शरीफ़ से सिर्फ बिदअते सय्येआ मुराद है।

(देखिए मिरकात शरह मिशकात जिल्द अव्वल सफा 179 और | अशिअतुल्लमलात जिल्द अव्वल सफा 125 )

इसलिए कि अगर | बिदअत की तमाम किस्में मुराद ली जाएं जैसे कि जाहिरे हदीस से मफहूम होता है तो फिकह , इल्मे कलाम और सर्फ व नहू व वगैरा की तदवीन और उनका पढ़ना पढ़ाना सब जलालत व गुमराही हो जाएगा ।
सवाल : – क्या बिदअत का हसना और सय्येआ होना हदीस शरीफ से भी साबित है ।

जवाब : – हां बिदअत का हसना और सय्येआ होना हदीस से भी साबित है तिरमिज़ी शरीफ़ में है कि हज़रते उमर फारूके आज़म रज़ियल्लाहु तआला अनहू ने तरावीह की बाकायदा जमाअत काइम करने के बाद फ़रमाया कि यह बहुत अच्छी बिदअत है।*_

( मिशकात सफा 115 )

और मुस्लिम शरीफ़ में हज़रते जरीर रज़ियल्लाहु अनहू से रिवायत है कि रसूले करीम अलैहिस्सलातु वस्सलाम ने फ़रमाया कि जो इस्लाम में किसी अच्छे तरीका को राइज करेगा तो उसको अपने राइज करने का भी सवाब मिलेगा और उन लोगों के अमल करने का भी सवाब मिलेगा जो उसके बाद उस तरीका पर अमल करते रहेंगे और अमल करने वालों के सवाब में कोई कमी भी न होगी
और जो शख्स मज़हबे इस्लाम में किसी बुरे तरीका को राइज करेगा तो उस शख्स पर उस के राइज करने का भी गुनाह होगा और उन लोगों के अमल करने का भी गुनाह होगा जो उसके बाद उस तरीका पर अमल करते रहेंगे और अमल करने वालों के गुनाह में कोई कमी भी न होगी।

( मिशकात सफा 33 )

सवाल : – क्या मीलाद शरीफ़ की महफ़िल मुनअक़िद करना बिदअते सय्येआ है ।

जवाब : – मीलाद शरीफ़ की महफ़िल मुनअक़िद करना उस में हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम की पैदाइश के हालात और दीगर फ़जाइल व मनाकिब बयान करना बरकत का बाइस है । उसे बिदअते सय्येआ कहना गुमराही व बदमज़हबी है ।

सवाल : – क्या हुजूर अलैहिस्सलाम के ज़माने में मय्यत का तीजा होता था ।

जवाब : – मय्यत का तीजा और इसी तरह दसवां , बीसवां और चालीसवां वगैरह हुजूर अलैहिस्सलातु वस्सलाम के ज़ाहिरी जमाना में नहीं होता था बल्कि यह सब बाद की ईजाद हैं और बिदअते हसना हैं इसलिए कि इनमें मय्यत के ईसाले सवाब के लिए कुरान ख्वानी होती है । सदक़ा खैरात किया जाता है और गुरबा व मसाकीन को खाना खिलाया जाता है और यह सब सवाब के काम हैं । हां इस मौक़ा पर दोस्त व अहबाब और अज़ीज़ व अकारीब की दावत करना ज़रूर बिदअते सय्येआ है।

( शामी जिल्द अव्वल सफा स. 629 फ़तहुल क़दीर जिल्द दोम सफा 102 )

अनवारे शरिअत, सफा 21/22/23/24

️तालिबे दुआँ:- क़मर रज़ा ह़नफ़ी

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 08)
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सवाल : – शिर्क किसे कहते हैं ?

जवाब : – खुदायेतआला की ज़ात व सिफ़ात में किसी को शरीक ठहराना शिर्क है । ज़ात में शरीक ठहराने का मतलब यह है कि दो या दो से ज़ियादा खुदा माने जैसे ईसाई कि तीन खुदा मान कर मुश्रिक हुए और जैसे हिन्दू कि कई खुदा मानने के सबब मुश्रिक हैं । और सिफ़ात में शरीक ठहराने का मतलब यह है कि खुदायेतआला की सिफ़त की तरह किसी दूसरे के लिए कोई सिफ़त साबित करे मसलन सुनना और देखना वगैरा जैसा कि खुदायेतआला के लिए बगैर किसी के दिए जाती तौर पर साबित है उसी तरह किसी दूसरे के लिए सुनना और देखना वगैरा जाती तौर पर माने कि बगैर खुदा के दिए उसे यह सिफ़तें खुद हासिल हैं तो शिर्क है और अगर किसी दूसरे के लिए अताई तौर पर माने कि खुदाये तआला ने उसे यह सिफ़तें अता की हैं तो शिर्क नहीं जैसा कि अल्लाहताला ने खुद इन्साफ़ के बारे में पारा 29 रुकू 19 में फ़रमाया जिसका तर्जमा यह है कि हमने इन्सान को सुनने वाला , देखने वाला बनाया ।

सवाल : – कुफ्र किसे कहते हैं ?

जवाब : – ज़रूरियाते दीन में से किसी एक बात का इन्कार करना कुफ़्र है ज़रूरियाते दीन बहुत हैं उनमें से कुछ यह है खुदायेतआला को एक और वाजिबुलवजूद मानना , उसकी ज़ात व सिफ़ात में किसी को शरीक न समझना , जुल्म और झूट वगैरा तमाम उयूब से उसको पाक मानना , उसके मलाइका और उसकी तमाम किताबों को मानना , कुरान मजीद की हर आयत को हक समझना , हुज़र सैय्यिदे आलम सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम और तमाम अंबियायेकिराम की नबूवत को तस्लीम करना उन सबको अज़मत वाला जानना , उन्हें ज़लील और छोटा न समझना उनकी हर बात जो क़तई और यक़ीनी तौर पर साबित हो उसे हक़ जानना हुजूर अलैहिस्सलाम को खातमुन्नबीयीन मानना उनके बाद किसी नबी के पैदा होने को जाइज़ न समझना , कियामत हिसाब व किताब और जन्नत व दोज़ख़ को हक़ मानना , नमाज़ व रोज़ा और हज व ज़कात की फ़रज़ीयत को तस्लीम करना , जिना , चोरी और शराब नोशी वगैरा हराम क़तई की हुरमत का इतिक़ाद करना और काफ़िर को काफ़िर जानना वगैरा ।

सवाल : – किसी से शिर्क या कुफ्र हो जाए तो क्या करे ?

जवाब : – तौबा और तजदीदे ईमान करे बीवी वाला हो तो तजदीदे निकाह करे और मुरीद हो तो तजदीदे बैअत भी करे ।

सवाल : – शिर्क और कुफ्र के अलावा कोई दूसरा गुनाह हो जाए तो मुआफ़ी की क्या सूरत है ?

जवाब : – तौबा करे खुदायेतआला की बारगाह में रोये गिड़गिड़ाये अपनी गलती पर नादिम व पशीमा हो और दिल में पक्का झहद करे कि अब कभी ऐसी गलती न करूंगा सिर्फ जुबान से तौबा तौबा कह लेना तौबा नहीं है ।

सवाल : – क्या हर किस्म का गुनाह तौबा से मुआफ़ हो सकता है !

“जवाब : – जो गुनाह किसी बन्दा की हक़तलफ़ी से हो मसलन किसी का माल गसब कर लिया , किसी पर तहमत लगाई या जुल्म किया तो इन गुनाहों की मुआफ़ी के लिए ज़रूरी है कि पहले उस बन्दे का हक़ वापस किया जाए या उससे मुआफ़ी मांगी जाए फिर खुदायेतझाला से तौबा करे तो मुआफ हो सकता है । और जिस गुनाह का तअल्लुक़ किसी बन्दा की हक़तलफ़ी से नहीं है बल्कि सिर्फ खुदायेतआला से है उसकी दो किस्में हैं एक वह जो सिर्फ तौबा से मुआफ़ हो सकता है जैसे शराब नोशी का गुनाह और दूसरे वह जो सिर्फ तौबा से मुआफ नहीं हो सकता है जैसे नमाजों के न पढ़ने का गुनाह इसके लिए ज़रूरी है कि वक़्त पर नमाज़ों के अदा न करने का जो गुनाह हुआ उससे तौबा करे और नमाजों की कज़ा पढ़े अगर आखिरे उम्र में कुछ कज़ा रह जाए तो उनके फ़िदयह की वसीयत कर जाए ।*

अनवारे शरिअत, सफा 18/19)20/21

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 07)
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सवाल : – तक़दीर किसे कहते हैं ?

जवाब : – दुनियां में जो कुछ होता है और बन्दे
जो कुछ भलाई बुराई करते हैं खुदायेतआला ने उसे अपने इल्म के मुआफ़िक पहले से लिख लिया है उसे तक़दीर कहते हैं ।

सवाल : – क्या अल्लाहतआला ने जैसा हमारी तक़दीर में लिख दिया है हमें मजबूरन वैसा करना पड़ता है ?

जवाब : – नहीं अल्लाहतआला के लिख देने से हमें मजबूरन वैसा करना नहीं पड़ता है बल्कि हम जैसा करने वाले थे अल्लाह तआला ने अपने इल्म से वैसा लिख दिया अगर किसी की तकदीर में बुराई लिखी तो इस लिए कि वह बुराई करने वाला था अगर वह भलाई करने वाला होता तो खुदाये तआला उसकी तकदीर में भलाई लिखता खुलासह यह कि खुदायेतआला के लिख देने से बन्दा किसी काम के करने पर मजबूर नहीं किया गया । तक़दीर हक़ है उसका इन्कार करने वाला गुमराह बदमज़हब है ।

सवाल : – मरने के बाद जिन्दा होने का मतलब क्या है ?

जवाब : – मरने के बाद जिन्दा होने का मतलब यह है कि कियामत के दिन जब ज़मीन , आसमान , इन्सान और फ़रिश्ते वगैरा सब फ़ना हो जाएंगे तो फिर खुदायेतआला जब चाहेगा हज़रते इसराफ़ील अलैहिस्सलाम को जिन्दा फ़रमाएगा वह दोबारा सूर फूंकेंगे तो सब चीजें तो सब चीजें मौजूद हो जाएंगी । फ़रिश्ते और आदमी वगैरा सब ज़िन्दा हो जाएंगे मुरदे अपनी अपनी कबरों से उठेगे , हश्र के मैदान में खुदायेतआला के सामने पेशी होगी , हिसाब लिया जाएगा और हर शख्स को अच्छे बुरे कामों का बदला दिया जाएगा यानी अच्छों को जन्नत मिलेगी । और बुरों को जहन्नम में भेज दिया जाएगा हिसाब और जन्नत
व दोज़ख हक हैं उनका इन्कार करने वाला काफ़िर है ।

 

अनवारे शरिअत, सफा 16/17/18

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 06)
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सवाल : – क़ियामत किसे कहते हैं ?

जवाब : – क़ियामत उस दिन को कहते हैं जिस दिन हजरते इसराफ़ील अलैहिस्सलाम सूर फूंकेंगे सूर सींग के शक्ल की एक चीज़ है जिसकी आवाज़ सुनकर सब आदमी और तमाम जानवर मर जाएंगे ज़मीन , आसमान , चांद , सूरज और पहाड़ वगैरह दुनिया की हर चीज़ टूट फूट कर फ़ना हो जाएगी यहां तक कि सूर भी खत्म हो जाएगा और इसराफ़ील अलैहिस्सलाम भी फ़ना हो जाएंगे यह वाक़िअह मुहर्रम की दसवीं तारीख जुमा के दिन होगा ।

सवाल : – क़ियामत की कुछ निशानियां बयान कीजिए ?

जवाब : – जब दुनियां में गुनाह ज़्यादा होने लगे ‘ हराम ‘ कामों को लोग खुल्लमखुल्ला करने लगें मां बाप को तकलीफ़ दें और गैरों से मेल जोल रख्खें अमानत में खियानत करें “ ज़कात देना लोगों पर गिरां गुज़रे ” दुनियां हासिल करने के लिए इल्मेदीन पढ़ा जाए ” नाच गाने का रवाज ज्यादा हो जाए ” बदकार लोग कौम के पेशवा और लीडर हो जाएं चरवाहे वगैरह कम दर्जा के लोग बड़ी बड़ी बिल्डिंगों और कोठियों में रहने लगें तो समझ लो कि कियामत करीब आ गई है।

सवाल : – जो शख्स कियामत का इन्कार करे उसके लिए क्या | हुक्म है ?

जवाब : – कियामत काइम होना हक़ है उसका इन्कार करने वाला काफिर है ।

अनवारे शरिअत, सफा 15/16

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 05)
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सवाल : – हमारे नबी कौन हैं ? उनका कुछ हाल बयान कीजिए ?

जवाब : – हमारे नबी हज़रत मुहम्मद मुसतफा सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम हैं , जो 12 रबीउल अव्वल मुताबिक़ 20 अप्रैल सन् 571 ई. में मक्का शरीफ़ में पैदा हुए उनके वालिद का नाम हज़रते अब्दुल्लाह और वालिदा का नाम हज़रते आमिना है ( रज़ियल्लाहु तआला अनहुमा ) आप की ज़ाहिरी ज़िन्दगी तिरसठ ( 63 ) बरस की हुई तिरपन ( 53 ) बरस की उम्र तक मक्का शरीफ़ में रहे फिर दस साल मदीना तैयिबा में रहे 12 रबीउल अव्वल सन् 11 हिजरी मुताबिक़ 12 जून सन् 632 ई. में वफ़ात पाई , आपका मज़ारे मुबारक मदीना शरीफ़ में है । जो मक्का शरीफ़ से तकरीबन 320 किलो मीटर उत्तर है ।

सवाल : – हमारे नबी की कुछ खूबियां बयान कीजिए ?

जवाब : – हमारे नबी सैयिदुल अंबिया और नबीयुल अंबिया हैं | यानी अंबियाएकिराम के सरदार हैं और तमाम अंबिया हुजूर के उम्मती हैं । आप खातमुन्नबीईन हैं यानी आप के बाद कोई नबी नहीं पैदा होगा जो शख्स आप के बाद नबी होने को जाइज़ समझे वह काफ़िर है सारी मखलूकात खुदायेतआला की रज़ा चाहिती है और खुदायेतआला हुजूर की रज़ा चाहता है । हुजूर की फरमाबरदारी अल्लाहतआला की फरमाबरदारी है ज़मीन व आसमान की सारी चीजें आप पर जाहिर थी दुनियां के हर गोशे और हर कोने में कियामत तक जो कुछ होने वाला है हुज़र उसे इस तरह मुलाहिजा फरमाते हैं जैसे कोई अपनी हथेली देखे , ऊपर नीचे आगे और पीठ के पीछे यकसां देखते थे ।

आप के लिए कोई चीज़ आड़ नहीं बन सकती हुज़र जानते हैं कि ज़मीन के अन्दर कहां क्या हो रहा है । खुशू जो दिल की एक कैफियत का नाम है हुज़र उसे भी मुलाहजा फ़रमाते हैं , हमारे चलने फिरने उठने बैठने और खाने पीने वगैरा हर कौल व फेल की हुज़र को हर वक़्त खबर है ।

सवाल : – क्या हमारे नबी जिन्दा हैं ?

जवाब : – हमारे नबी और तमाम अंबियाये किराम अलैहिमुस्सलातु वस्सलाम जिन्दा हैं । हदीस शरीफ में है कि सरकारे अकदस सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम ने फ़रमाया कि खुदायेतआला ने ज़मीन पर अंबियाये किराम अलैहिमुस्सलाम के जिस्मों को खाना हराम फरमा दिया है । तो अल्लाह के नबी जिन्दा हैं रोज़ी दिये जाते हैं।

( मिश्कात )

सवाल : – जो शख्स अबियाए किराम के बारे में कहे कि मर कर मिट्टी में मिल गए तो उसके लिए क्या हुक्म है ?

जवाब : – ऐसा कहने वाला गुमराह बदमज़हब ख़बीस है ।

अनवारे शरिअत, सफा 13/14/15

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 04)
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सवाल : – रसूल और नबी कौन होते हैं ?

जवाब : – रसूल और नबी खुदयेतआला के बन्दे और इन्सान होते हैं । अल्लाह तआला ने उनको इन्सान की हिदायत के लिए दुनियां में भेजा है । वह बंदों तक खुदायेतआला का पैगाम पहुंचाते हैं । मुअजिज़े दिखाते हैं और गैब की बातें बताते हैं झूट कभी नहीं बोलते वह हर गुनाह से पाक साफ होते हैं । उनकी तादाद कुछ कम व बेश एक लाख चौबीस हज़ार या तकरीबन दो लाख चौबीस हज़ार है , सब से पहले नबी हज़रते आदम अलैहिस्सलाम हैं और सबसे आखिरी नबी हमारे पैगम्बर हज़रत मुहम्मद मुसतफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हैं ।

सवाल : – क्या हम हिन्दुओं के पेशवावों को नबी कह सकते हैं !

जवाब : – किसी शख्स को नबी कहने के लिए कुरआन व हदीस से सुबूत चाहिए और हिन्दुओं के पेशवावों के नबी होने पर कुरआन व हदीस से कोई सुबूत नहीं मिलता इस लिए हम उन्हें नबी नहीं कह सकते ।

अनवारे शरिअत, सफा 13

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 03)
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सवाल : – खुदाये तआला की किताबें कितनी हैं ?

जवाब : – खुदाये तआला की छोटी बड़ी बहुत सी किताबें नाज़िल हुई बड़ी किताब को किताब और छोटी को सहीफ़ह कहते हैं , उनमें चार किताबें बहुत मशहूर हैं अव्वल तौरेत जो हज़रते मूसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल हुई दूसरे ज़बूर जो हज़रते दाऊद अलैहिस्सलाम पर नाज़िल हुई और तीसरे इन्जील जो हज़रते ईसा अलैहिस्सलाम पर नाज़िल हुई चौथी कुरआन मजीद जो हमारे नबी सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर नाज़िल हुआ ।

सवाल : – पूरा कुरान मजीद एक दफ़ा नाज़िल हुआ या थोड़ा – थोड़ा ?

जवाब : – पूरा कुरान मजीद एक दफ़ा इकट्ठा नहीं नाज़िल हुआ बल्कि ज़रूरत के मुताबिक़ 23 तेईस बरस में थोड़ा – थोड़ा नाज़िल हुआ ।

सवाल : – क्या कुरान मजीद की हर सूरत और हर आयत पर ईमान लाना जरूरी है ?

जवाब : – हां कुरआन मजीद की हर सूरत पर ईमान लाना जरूरी है अगर एक आयत का भी इन्कार कर दे या यह कहे कि कुरआन जैसा नाज़िल हुआ था अब वैसा नहीं है , बल्कि घटा बढ़ा दिया गया है तो वह काफ़िर है ।

अनवारे शरिअत, सफा 12/13

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 02)
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सवाल : – फ़रिश्ते क्या चीज़ हैं ?

जवाब : – फ़रिश्ते इन्सान की तरह एक मखलूक हैं लेकिन वह नूर से पैदा किए गए हैं । न वह मर्द हैं । न औरत हैं न कुछ खाते हैं न कुछ पीते हैं । जितने काम खुदायेतआला ने उनके सिपुर्द किया है उसी में लगे रहते हैं । कुछ फ़रिश्ते बंदों का अच्छा बुरा अमल लिखने पर मुकर्रर हैं जिनको किरामन कातिबीन कहा जाता है । कुछ फ़रिश्ते कब्र में मुदों से सुवाल करने पर मुकर्रर हैं , जिनको मुनकर नकीर कहा जाता है । और कुछ फ़रिश्ते हुजूर | अलैहिस्सलातु वस्सलाम के दरबार में मुसलमानों के दुरुद व सलाम पहुंचाने पर मुकर्रर हैं , उनके अलावा और भी बहुत से काम हैं जो फ़रिश्ते अनजाम देते रहते हैं । उनमें चार फ़रिश्ते | बहुत मशहूर हैं , अव्वल हज़रते जिबरील अलैहिस्सलाम जो | अल्लाह तआला के अहकाम पैगम्बरों तक पहुंचाते थे दूसरे | हज़रते इसराफ़ील अलैहिस्सलाम जो कियामत के दिन सूर फूंकेंगे तीसरे हज़रते मीकाईल अलैहिस्सालाम जो पानी बरसाने और | रोजी पहुंचाने पर मुकर्रर हैं , और चौथे हज़रते इज़राईल | अलैहिस्सलाम जो लोगों की जान निकालने पर मुकर्रर हैं । जो शख्स यह कहे फ़रिश्ता कोई चीज़ नहीं या यह कहे कि फ़रिश्ता नेकी की कुवत का नाम है तो वह काफ़िर है ।

अनवारे शरिअत, सफा 11/12

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अनवारे शरिअत (पोस्ट न. 01)
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सवाल : – अल्लाह तआला के बारे में कैसा अक़ीदा रखना चाहिए ?

जवाब : – अल्लाह तआला एक है उसका कोई शरीक नहीं । आसमान व ज़मीन और सारी मखलूकात का पैदा करने वाला वही है । वही इबादत के लाइक है दूसरा कोई इबादत के लाइक नहीं है । वही सबको रोज़ी देता है । अमीरी गरीबी और इज़्ज़त व जिल्लत सब उसके इखतियार में है । जिसे चाहता है इज्जत देता है । और जिसे चाहता है जिल्लत देता है । उसका हर काम मे हिक़मत है । बंदो की समझ में आये या न आये वह हर कमाल व खूबी वाला है । झूट , दगा , खियानत , जुल्म जिहल वगैरह हर ऐब से पाक है । उसके लिए किसी ऐब का मानना कुफ्र है ।

_*सवाल : – क्या अल्लाह तआला को बुढ़ऊ कहना जाइज़ है ?

जवाब : – अल्लाह तआला की शान में ऐसा लफ्ज़ बोलना कुफ्र हैं।

सवाल : – बाज़ लोग कहते हैं कि “ ऊपर वाला जैसा चाहेगा वैसा होगा ” और कहते हैं ” ऊपर अल्लाह है नीचे तुम हो ” या इस तरह कहते हैं कि “ ऊपर अल्लाह नीचे पंच हैं।

जवाब : – यह सब जुमले गुमराही के हैं , मुसलमानों को इन से बचना निहायत ज़रूरी है ।

अनवारे शरिअत, सफा 10/11

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FRIDAY, MAY 1, 2020
हदीस की रोशनी में {पोस्ट न. 15}
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तबलीग जमाअत

✨अल – विदाई कलिमात✨

इस किताब के खातमा पर मैं आप से चन्द आखिरी कलिमात कह कर रुख्सत हो रहा हूँ । अपनी तलाश व जुस्तजू के बाद तबलीगी जमाअत से मुतअल्लिक जितनी हदीसें मेरी नज़र में थीं मैंने आपके सामने पेश कर दीं । अब उन पर पुरखुलूस जज्बे के साथ गौर फरमाएं ।

✨आप अगर तबलीगी जमाअत के साथ मुंसलिक हैं तो मैं आपकी नीयत पर हमला नहीं करूंगा । हो सकता है कि आख़िरत का शौक़ ही आपको इस तरफ़ खींच कर ले गया हो लेकिन क्या एक लम्हे के लिए आप यह सोचने की ज़हमत गवारा फरमाएंगे कि मैंने अपनी किताब ‘ तबलीगी जमाअत ” में तबलीगी जमाअत के खिलाफ जितने हकाइक पेश किए हैं क्या वह सब के सब यकलख्त गलत और बेबुनियाद हैं ? फर्ज कीजिए आपके तईं सारे इल्ज़ामात गलत हैं तो क्या इन हदीसों को भी आप गलत कह दीजिएगा जिन के ज़रिया तबलीगी जमाअत से अलाहिदगी में रसूले पाक की खुशनूदी का पता चलता है । बहरहाल आपके तई तबलीगी जमाअत में अगर कुछ खैर का हिस्सा है तो अज़रूए इंसाफ “ शर ” का हिस्सा उस से कहीं ज्यादा है । इसलिए थोड़े से खैर के लिए अपने आपको बहुत बड़े शर में मुब्तला कर देना न इस्लाम ही का मुतालबा है और न अक्ल ही का तकाज़ा ।

तबलीगी जमाअत का साथ देने में उख़रवी मुज़र्रत का यकीन न सही इस सवाल का एहतमाल तो ज़रूर है कि रसूल की निशानदेही के बावजूद तुम ने ऐसी जमाअत का साथ क्यों दिया ? लेकिन अलाहिदा रहने में कोई खतरा नहीं , न दुनिया का न आख़िरत का ।

✨इस किताब की आखिरी सतरें लिखते हुए मैं रूहानी इत्मीनान महसूस करता हूँ कि उम्मत को एक अज़ीम ख़तरा से अहादीसे पाक की रौशनी में आगाह करने का फर्ज मैंने अपने सर से उतार दिया अब अंजाम के लिए फैसले की ज़िम्मेदारी उन लोगों पर है जिनके हाथों में यह किताब है । दुआ है कि खुदाए कदीर इस किताब के ज़रिया अपने सादा लौह बन्दों को सलामती की मंज़िल की तरफ वापसी की तौफीक मरहमत फरमाए ।
आमीन !

वसल्लल्लाहु तआला अला सैय्यिदना मुहम्मदिन व आलेही व सहबेही अज्मईन ।

✍ मुसन्निफ़ : – हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।

The End

* तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 30/31/32*
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हदीस की रोशनी में {पोस्ट न. 14}
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तबलीग जमाअत

✨नुस्खेए शिफा✨

अच्छा ! सारी बहस जाने दीजिए कम अज़ कम हदीसों पर यकीन के नतीजे में इतना तो आप भी तस्लीम करेंगे कि अख़ीर ज़माने में एक जमाअत निकलेगी जो मज्कूरा बाला औसाफ की हामिल होगी अगर वह तबलीगी जमाअत नहीं तो फिर आप ही बताइए कि दूसरी वह कौन सी जमाअत है जिस में मासबक हदीसों की बयान करदह अलामतें पाई जा रही हैं ।

इसलिए जेहनी खल्जान का इलाज यह है कि तबलीगी जमाअत को सिर्फ रोज़ा , नमाज़ और चन्द ज़ाहिरी खूबियों के रुख से न देखिए बल्कि अहादीस में इस बेदीन जमाअत की जितनी अलामतें बयान की गई हैं इन सारी अलामतों के आईने में तबलीगी जमाअत का जाइज़ा लीजिए । रोज़ा , नमाज़ और दीनी दावत तो इन अलामतों का सिर्फ एक हिस्सा है । तस्वीर का सिर्फ एक रुख देख कर पूरी शख़्सियत का सरापा मालूम करना बहुत मुश्किल है ।

ज़मीर का फैसला

इन हालात में अब मोमिन का ज़मीर ही इसका फैसला . करेगा कि रसूले पाक साहिबे लौलाक सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की खुशनूदी तबलीगी जमाअत के साथ मुंसलिक होने में है या उस से इलाहिदा रहने में ? यह सवाल सिर्फ उन लोगों से है जिन्हें सिर्फ खुदा और रसूल की खुशनूदी का जज्बा तबलीगी जमाअत की तरफ खींच कर ले गया है बाकी रहे वह लोग जो किसी माद्दी मन्फअत की लालच या मज्हबी । शकावत के जज्बे में तबलीगी जमाअत के साथ हो गये हैं तो । उनके मुताअल्लिक मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि वह अपनी ख़्वाहिशे नफ्स की पैरवी में जितनी दूर जाना चाहें चले जाएं । एहतरामे नुबुव्वत के कानून की अब कोई ज़न्जीर उनके उठे हुए कदमों को नहीं रोक सकती लेकिन सिर्फ इतनी सच्चाई बरकरार रखें कि अपने नफ्स के शैतान की फरमांबरादरी करते वक़्त खुदा व रसूल की खुशनूदी का नाम न लिया करें । बहरहाल यह कहते हुए अब इस बहस का सिलसिला खत्म करता हूँ कि जिन औसाफ़ की वजह से लोग तबलीगी जमाअत पसन्द करते हैं । अफ्सोस की वही औसाफ़ हमें उस गरोह से भी रोशनास कराते हैं जिनकी निशानदेही आज से तक़रीबन चौदह सौ बरस पेश्तर खुदा के आखिरी पैग़म्बर ने फरमाई थी और अपनी वफादार उम्मत को ताकीद की थी कि जब उन निशानियों का कोई गरोह तुम्हें मिले तो तुम उस से दूर रहना अब जिस उम्मती को अपने रसूल की खुशनूदी अज़ीज़ हो वह तबलीगी जमाअत से दूर रहे और अपनी ख्वाहिशे नफ्स का गुलाम हो , उसे एक वफादार मोमिन की रविश अख्तियार करने पर कोई मज्बूर नहीं कर सकता ।

* तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 28/29/30*

जारी रहेगा इन्शाअल्लाह…..
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हदीस की रोशनी में {पोस्ट न. 13}
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तबलीग जमाअत

✨जेहन का आखिरी कांटा✨

कल इसके कि मज्कूरा बाला अहादीस की रौशनी में आप तबलीगी जमाअत के मुतअल्लिक कोई फैसला करें मुझे चन्द लम्हे के लिए इजाज़त दीजिए कि मैं आपके एहसास की नब्ज़ पर हाथ रख आप से एक बात कहूं । मैं महसूस करता हूँ कि तबलीगी जमाअत के खिलाफ कोई फैसला करते हुए आप को जो सबसे बड़ी उलझन पेश आएगी वह यह है कि एक ऐसी जमाअत जो लोगों को दीन की तरफ बुलाती है । नमाज़ और रोज़ा की खुद भी पाबन्द है और दूसरों को भी तरगीब देती है । लोगों को अच्छी बातों की तल्कीन करना जिस ने अपना मक्सदे हयात ठहरा लिया है उसे क्यों कर गुमराह और बेदीन करार दिया जा सकता है । अगर ऐसी दीन परवर जमाअत भी गुमराह और बेदीन है तो फिर दुनिया में दीनदार और हक परस्त कौन है ? मैं अर्ज करूंगा कि तकरीबन इसी तरह की कशमकश हजरत सैय्यदना अबू बक्र सिद्दीक और हज़रत सैयदना उमर फारूक रज़ि अल्लाहु तआला अन्हुमा को भी इस नौजवान नमाज़ी के मुतअल्लिक पेश आई थी जिसे कत्ल करने का हुक्म हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सादिर फरमाया था , वह भी यह सोच कर वापस लौट आए थे कि एक नमाज़ी को क्यों कत्ल किया जाए ।

और फिर जब हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने . सहाबा को खबर दी थी कि अखीर ज़माने में एक जमाअत निकलेगी जो कुरआन पढ़ेंगे । अच्छी बातों की तल्कीन करेंगे । नमाज़ व रोज़ा का एहतमाम उनके यहाँ सबसे ज़्यादा होगा और उसके बावजूद दीन से उनका कोई तअल्लुक न होगा तो उस वक़्त भी सहाब – ए – किराम के ज़हन में यह सवाल पैदा हुआ था कि किसी भी शख्स को दीनदार और पसन्दीदा करार देने के लिए यही जाहिरी अलामतें देखी जाती हैं । दिल के अन्दर कौन उतरता है और जब यही अलामतें बेदीन और मुन्हरिफ लोगों के लिए भी हुजूर करार दे रहे हैं तो फिर दीनदार नमाज़ी और बेदीन नमाज़ी के दर्मियान किस तरह इम्तियाज़ किया जाएगा ? गालिबन इसी हैरानी का नतीजा था कि उन्होंने सब कुछ सुन लेने के बाद फिर यह सवाल किया कि वमा सीमाहुम ? या रसूलुल्लाह ! उनकी खास अलामत क्या है ? मतलब यह था कि यही अलामतें तो खुदापरस्त और दीनदार मुसलमानों की भी हैं । कोई ऐसी अलामत बताइए जो इसी बेदीन और गुमराह जमाअत के साथ खास हो तो उसके जवाब में हुजूर ने इरशाद फरमाया था । सीमाहुम अत्तहलीक उनकी खास अलामत सर मुंडाना होगी ।

* तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 26/27/28*

जारी रहेगा इन्शाअल्लाह…..
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हदीस की रोशनी में {पोस्ट न. 12}
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तबलीग जमाअत

✨निशानियों की तलाश✨

( 11 ) हदीस नम्बर 6 – 13 में बताया गया है कि यह गरोह मुख्तलिफ नामों और मुख्तलिफ़ रंग व रूप के साथ हर दौर में मौजूद रहेगा । यहाँ तक कि उसका आखिरी दस्ता मसीहुद्दज्जाल के साथ निकलेगा । तबलीगी जमाअत पर यह दोनों हदीसें पूरी तरह मुन्तबिक होती हैं । क्योंकि तबलीगी जमाअत जिन अकाइदे बातिला की अलम बरदार है वह बिल्कुल वही हैं जिन्हें इब्ने अब्दुल – वहाब नज्दी , इब्ने तैमिया और इब्ने कैयिम से लेकर मोतज़िला और ख्वारिज तक हर दौर के बातिल परस्तों ने मुख़्तलिफ नामों , मुख्तलिफ जमाअतों और मुख्तलिफ रंग व रूप के साथ परवान चढ़ाया है । सिर्फ नाम नया है बाकी सारी गुमराहियां पुरानी हैं ।

यहीं से इस तावील का दरवाज़ा बन्द हो जाता है कि हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जिस जमाअत के जुहूर की खबर दी थी वह हज़रत अली रज़ि अल्लाहु अन्हु के जमाने में नीस्त व नाबूद हो गई क्योंकि यहां सवाल किसी मुतऐयन जमाअत का नहीं बल्कि उस काफिराना ज़ेहन का है जो इस वक़्त भी मौजूद था और नामों के इख्तिलाफ़ के साथ आज भी मौजूद है और बदलते हुए जुरूफ व अहवाल के मुताबिक खुरूज दज्जाल तक मौजूद रहेगा ।

( 12 ) हदीस नम्बर 11 – 12 में इस गरोह की एक निशानी यह भी बताई गई है कि यह अपने मिज़ाज व सरिश्त के लिहाज़ से बदतरीन लोग होंगे । तबलीगी जमाअत के हक में अगर आप इस निशानी की तस्दीक करना चाहते हों तो किसी पुख्ता कार तबलीगी जमाअत को टटोल कर देख लीजिए । निहायत खुश्क मिज़ाज , बद खू और मुतकब्बिर उसे आप पाएंगे । रूहानी शगुफ़्तगी , जौके लतीफ़ , गुदाज़ कल्ब और कैफे इश्क से वह यक्सर महरूम नज़र आएंगे बल्कि नज्दियों के हक में शकावते कल्ब की साफ व सरीह हदीस वारिद हुई है । तबलीगी जमाअत को भी इसी पर क्यास कर लीजिए ।

( 13 ) हदीस नम्बर 5 – 12 में इस गरोह की एक निशानी यह भी बताई गई है कि एक बार हक से मुन्हरिफ हो चुकने के बाद दोबारा हक़ की तरफ वापसी उनके लिए नामुम्किन हो जाएगी । तबलीगी जमाअत के हक में इस निशानी की तस्दीक करना चाहते हों तो किसी भी सरगरम तबलीगी जमाअत को जांच लीजिए । लाख आप कोशिश करेंगे कि वह अकीदे के फसाद से हट जाए । रसूले अरबी के गुस्ताखों का साथ न दे , मक्बूलाने हक की बारगाहों से अकीदत रखे लेकिन वह इश्क व ईमान की तरफ कभी पलट कर वापस नहीं आएगा ।

* तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 25/26*

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हदीस की रोशनी में {पोस्ट न. 11}
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तबलीग जमाअत

✨निशानियों की तलाश✨

( 9 ) हदीस नम्बर 13 में इस गरोह की एक निशानी यह भी बताई गई है कि वह सादा लौह बेसमझ और नौ उम्र लोगों पर मुश्तमिल होगा । तबलीगी जमाअत के हक में इस निशानी की तस्दीक करना चाहते हों तो उन के किसी भी इज्तिमा में । पहुंच जाइए वहाँ दो ही तरह के लोग आप को मिल जाएंगे । बहुत बड़ी तादाद इन कम पढ़े लिखे सादा लौह अवाम की नज़र आएगी जो अपनी खुश फहमी में दीन का काम समझ कर तबलीगी जमाअत के साथ हो गये हैं और दूसरा गरोह वह स्कूलों , कॉलेजों , मदरसों और मुस्लिम आबादी के उन पुरजोश नौजवानों का मिलेगा जो अपने मज्हबी जज्बे की तस्कीन का ज़रिया समझ कर तबलीगी जमाअत से वाबस्ता हैं । कोई अपनी सादा लौही और हिमाकत मआबी से फरेब का शिकार है । और कोई अपनी नौउम्री और ना तजरेबाकारी के सबब गलत फहमी में मुब्तला है । चेहरे का नकाब उलट कर किसी ने भी असल हकीकत से वाकफीयत भी पहुंचाने की कोशिश नहीं फरमाई है ।

( 10 ) हदीस नम्बर 14 में बताया गया है कि आख़िरी ज़माने में कीड़े मकोड़ों की तरह सिर्फ मुल्ले ही मुल्ले नज़र आएंगे और मस्जिदों को चौपाल बना लिया जाएगा । तजरेबात व मुशाहिदात के आईने में देखिए तो तबलीगी जमाअत इस पेशीनगोई की जीती जागती तस्वीर है । लातादाद ऐसे अफराद इस गरोह में फूट पड़े हैं जो तबलीगी निसाब की चन्द उर्दू किताबें पढ़ कर “ मौलाना ” बन गये हैं और बड़े – बड़े उलमा को भी अब वह खातिर में नहीं लाते जैसा कि उसका शिकवा अब इस गरोह के उलमा भी करने लगे हैं । मौलवी अब्दुर्रहीम शाह देवबन्दी के यह अल्फाज़ पढ़िए । “ गौर का मकाम है कि कोई शख्स बेगैर सनद के कम्पोंडर तक नहीं हो सकता मगर ( उन ) लोगों ने दीन को इतना आसान समझ लिया है कि जिस का जी चाहे वअज व तकरीर करने खड़ा हो जाए । किसी सनद की ज़रूरत नहीं , ऐसे ही मौका पर यह मिसाल खूब सादिक आती है ” नीम हकीम खतर – ए – जान ” नीम मुल्ला खतर – ए – ईमान ।

( उसूले दावत व तबलीग : स० 54 )

इस सिलसिले में मौसूफ की तकरीर का यह हिस्सा भी पढ़ने के काबिल है । “ मेरे बुजुर्गों ! जेब नावाकिफ लोग व ना अहल लोग मन्सबे खिताबत पर फाइज़ होंगे तो वह अपने मुबल्लिगे इल्म के मुताबिक ही नहीं बोलेंगे बल्कि अपने इल्म से आगे नुक्ते पैदा करेंगे उनको . इतनी जुरअत हो गई कि वह लोग अपने खिताबात में उलमा को तन्बीहात फरमाते हैं । ” और मस्जिदों का हाल क्या पूछते हैं कि तबलीगी जमाअत के उन खाना बदोशों की बदौलत अब वह मस्जिद के सिवा सब कुछ हैं । खाना पकाने , खाना खाने और लेटने सोने से लेकर ज़िन्दगी के दूसरे मशागिल तक सारे दुनियावी उम्र वहीं अंजाम पाते हैं । मस्जिदों की बेहुर्मती के ऐसे – ऐसे जिगर सोज़ हालात सुनने में आते हैं कि कलेजा फटने लगता है ।

* तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 23/24*

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हदीस की रोशनी में {पोस्ट न. 10}
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तबलीग जमाअत

✨निशानियों की तलाश✨

( 7 ) हदीस नम्बर 9 में इस गरोह की पहचान यह भी बताई गई है कि वह नमाज़ इतनी नुमाइशी पाबन्दी या इतने ज़ाहिरी एहतमाम व खुशू के साथ पढ़ेंगे कि दूसरे लोग अपनी नमाज़ों को उनकी नमाज़ों के मुकाबले में हकीर समझने लगेंगे तबलीगी जमाअत का यह वस्फ़ इतना ज़ाहिर है कि अब इसके मुतअल्लिक कुछ कहने सुनने की ज़रूरत नहीं मिसाल के तौर पर आपको ऐसे बेशुमार नमाज़ी मिलेंगे जिन्हें नमाज़ पढ़ते हुए चालीस पचास साल गुज़र गये लेकिन उन की पेशानी नुमाइशी सज्दों के निशान से बेदाग हैं और यहाँ तबलीगी जमाअत के नमाज़ियों को जुमा – जुमा आठ दिन भी नहीं हो पाते कि उनकी पेशानियाँ दागदार हो जाती हैं । अब उसकी वजह सिवाए उसके और क्या तलाश की जा सकती है कि यह लोग सज्दा नहीं करते , पेशानियों को सज्दों से दागा करते हैं ताकि मुसलमानों पर अपनी नमाज़ ख्वानी की धौंस जमाएं ।

( 8 ) हदीस नम्बर 9 , 10 , 15 में इस गरोह की एक पहचान यह भी बताई गई है कि अपनी नमाज़ व इबादत की निखवत में अपने सिवा सब को हिकारत की नज़र से देखना अपने से बड़े बड़ों को बरमला टोकते फिरना यहाँ तक कि अंबिया व औलिया की भी तन्कीस करना इस गरोह का जमाअती शिआर होगा । तबलीगी जमाअत के हक में इस निशानी की तस्दीक करना चाहते हों तो मौलवी अब्दुर्रहीम शाह देवबन्दी की तकरीर का यह हिस्सा पढ़िए । “ मैं हर जुमा को हज़रत मौलाना मुहम्मद यूसुफ साहब मरहूम की खिदमत में बराबर हाज़िर होता था और जमाअत के बेज़ाबता मुकर्रेरीन की शिकायत अर्ज करता कि मैं बहुत से मौकों पर खुद सुन चुका हूँ कि यह लोग उलमाए किराम और मदारिस का मुख्तलिफ अन्दाज़ से इस्तिफाफ़ “ तहकीर ” करते हैं । आप हज़रात को जल्द अज़ जल्द उसकी शिद्दत से रोक थाम करना चाहिए । उलमाए किराम को सख्त शिकायात हैं ।

( उसूले दावत व तबलीग : स० 43 )

दूसरी जगह मौसूफ ने मरदुम आज़ारे निखवत का मातम इन अल्फाज़ में किया हैं लिखते हैं । ” कुछ अजीब सी बात है कि जो तबलीगी जमाअत से जितना ज़्यादा करीब तर होता है वह उतना ही दूसरे उलमा से बईद तर होता चला जाता है । आखिर ऐसा क्यों ? और जिस ने दो चार चिल्ले दे दिए तो फिर उसकी तरक्कीए दरजात के क्या कहने , फिर तो वह उलमा की भी कोई हकीकत अपने सामने नहीं समझता ।

( उसूले दावत व तबलीग : स० 50 )

और तबलीगी जमाअत के लोगों में तन्कीसे अंबिया का जज़्बा पैदा करने की कोशिश देखना चाहते हों तो बानिए जमाअत मौलवी इल्यास साहब के एक ख़त का यह हिस्सा पढ़िए जिसे उन्होंने तबलीगी जमाअत के कारकुनों के नमा लिखा था , लिखते हैं । “ अगर हक तआला किसी से काम लेना नहीं चाहते तो चाहे अंबिया भी कितनी कोशिश करें तब भी ज़र्रा नहीं हिल सकता और अगर करना चाहें तो तुम जैसे ज़ईफ़ से भी वह काम ले लें जो अंबिया से भी न हो सके ।

( मकातीबे इल्यास : स० 107 )

* तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 20/21/22*

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हदीस की रोशनी में {पोस्ट न. 09}
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तबलीग जमाअत

✨निशानियों की तलाश✨

( 4 ) हदीस 12 , 13 में इस गरोह की एक पहचान यह भी बताई गई है कि ऊपर से बातें अच्छी करेंगे लेकिन अन्दर से अमल उसके खिलाफ होगा । कौल व फेअल का यह तजाद देखना चाहते हों तो तबलीगी जमाअत को देख लीजिए । बातों की हद तक वह कितने सरापा इख़्लास इस्लाम दोस्त और खुश नुमा नज़र आते हैं लेकिन किरदार देखिए तो अब तक लाखों खुश अक़ीदा मुसलमानों का ईमान गारत कर चुके हैं । तौहीद का नाम ले कर रिसालत की तन्कीस करना उस गरोह का जमाअती शिआर बन चुका है ।

( 5 ) हदीस 10 में इस गरोह की एक पहचान यह भी बताई गई है कि वह सिर्फ मुसलमानों का खून बहाएंगे । मुश्रिकीन से कोई छेड़ नहीं करेंगे । नज्दी गरोह के बारे में इस ख़बर की तस्दीक करना चाहते हों तो मौलाना मुहम्मद अली जौहर का यह मुन्सिफ़ाना बयान पढ़िए । पिछले सफ्हात में मौलाना हुसैन अहमद साहब का भी इसी तरह का बयान गुज़र चुका है । नज्द और नज्दियों का यही कारनामा है कि मुसलमानों के खून में उनके हाथ रंगे हैं और गालिबन उस वक़्त भी यमन के मुसलमानों पर जंग की तैयारी है ।

( मकालाते मुहम्मद अली , हिस्सा अव्वल स०37 )

तबलीगी जमाअत और नज्दी गरोह के दर्मियान चूंकि कोई खास फर्क नहीं है इसलिए यह निशानी तबलीगी जमाअत का अंजाम मालूम करने के लिए काफी है ।

( 6 ) हदीस नम्बर 11 , 12 में इस गरोह की एक ख़ास पहचान यह भी बताई गई है कि वह इल्तिज़ाम के साथ अपना सर मुंडाएंगे गोया यह फेअल उनका जमाअती शिआर बन जाएगा । अब इसकी तस्दीक के लिए अरब की मुस्तनद तारीख़ अल – फुतूहात अल – इस्लामिया के मुसन्निफ का यह बयान पढ़ लीजिए ।

✍…हुजूर अलैहिस्सलात वस्सलाम का यह फरमान कि उनकी खास निशानी सर मुंडाना है यह नज्दी गरोह के हक में बिल्कुल सराहत है क्योंकि यही लोग अपने मुत्तबईन को सर मुंडाने की हिदायत करते हैं । सरकार की बताई हुई यह निशानी ख्वारिज और गुज़िश्ता बद दीन फ़िर्को में से किसी फिर्के के अन्दर मौजूद नहीं थी । यह शिआर सिर्फ वहाबिया नज्दीया का है ।

( अलफ़तूहाते इस्लामिया जिल्द 2 स० 368 )

एक अजीब नुक़्ता

लफ्ज़ “ तहलीक की लुगवी तशरीह के सिलसिले में बहस व नज़र का एक गोशा बहुत ज्यादा काबिले तवज्जोह है और वह यह है कि तहलीक का तर्जमा आम तौर पर “ सर मुंडाना किया जाता है लेकिन देवबन्द की मोतमद किताब मिस्बाहुल – लुगात सफ : 148 में उसके हम माद्दह लफ्ज़ का तर्जमा “ चक्कर लगाना ” और “ हल्के में बैठना ” भी किया गया है । खालीयुज्ज़हन हो कर सोचिए तो यह दोनों तर्जमे तबलीगी जमाअत पर पूरी तरह फिट हो जाते हैं । एक तरफ तर्जमा अगर उनकी “ चलत फिरत ” को बताता है तो दूसरा तर्जमा उनके “ इज्तिमा ” की तरफ इशारा करता है ।

* तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 18/19/20*

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हदीस की रोशनी में {पोस्ट न. 08}
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तबलीग जमाअत

✨निशानियों की तलाश✨

( 1 ) हदीस 1 ता 8 में बताया गया है कि कुफ्र और शैतान के फिरने का मरकज़ मदीना के मश्रिकी सिम्त पर वाके होने वाला नज्द का खित्ता है । इसी मश्रिकी खित्ते से मुसलमान नाम का एक गरोह उठेगा जो कुरआन पढ़ेगा लेकिन कुरआन उसके हलक के नीचे नहीं उतरेगा । वह लोगों को कुरआन और दीन की तरफ बुलाएगा लेकिन दीन से उसका कोई तअल्लुक न होगा । अब तजुरबात की रौशनी में परख लीजिए कि सिवाए तबलीगी जमाअत के आज वह कौन सा गरोह है जिसका किनारा दिल्ली में है तो दूसरा कनारा नज्द के ” रियाज़ ” से मिलता है ।

( 2 ) हदीस 9 , 10 , 11 जुल – खुवैसरह नामी जिस गुस्ताखे रसूल का वाकया बयान किया गया है वहीं यह भी मजकूर है कि वह कबीला बनी तमीम का आदमी था और आखिरी ज़माने में ज़ाहिर होने वाला गरोह उसी की नस्ल से होगा । अब अरब के मुस्तनद मुअरॆखीन का एक ताज़ा इंकिशाफ़ मुलाहिजा फरमाइए । मशहूर मुअरिंख अल्लामा जैनी दहलान अपनी किताब में लिखते हैं ।

✨और सबसे ज्यादा वाजेह बात यह है कि इब्ने अब्दुल – वहाब नज्दी का सिलसिल – ए – नसब बनी तमीम से है इसलिए कुछ बईद नहीं है कि जुल – खुवैसरह तमीमी की नस्ल से हो जिसके मुतअल्लिक बुखारी शरीफ़ में हज़रत अबू सईद खुदरी रज़ि अल्लाहु अन्हु से एक हदीस भी मन्कूल है ।

( अदुरर : स० 151 )

✨अलावा अज़ी ख्वारिज के बारे में साहिबे लमआत ने लिखा है कि उन में से कोई भी जुल – खुवैसरह की नस्ल से नहीं था । उनकी इबारत के अल्फाज़ यह हैं लम यकुन फ़िल – ख्वारिज . कौम बिन नस्ल ज़िल – खुवैसरह

( हाशिया मिश्कात : स० 535 )

इसलिए यह मानना पड़ेगा कि हदीस 9 , 10 , 11 में ज़ाहिर होने वाले गरोह से नज्दी गरोह मुराद लेना हकीकते वाकया के ऐन मुताबिक़ है ।

( 3 ) हदीस नम्बर 12 में इस गरोह की पहचान यह भी बताई गई है कि वह लोगों को कुरआन और दीन की तरफ बुलाएंगे हालांकि दीन से उनका कुछ भी तअल्लुक न होगा । इस खबर की तस्दीक करना चाहते हों तो तबलीगी जमाअत के हल्काए दर्से कुरआन और उनके दावती इज्तिमाआत को देख लीजिए लोगों को दीन और कुरआन की तरफ़ बुलाते – बुलाते उनकी ज़बानें खुश्क हो जाती हैं लेकिन किसी रोज़न से झांक कर देखिए तो यह सारी नुमाइश महज़ इसलिए है कि दीन में फ़साद पैदा करें ।

* तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 17/18*

जारी रहेगा इन्शाअल्लाह…..
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हदीस की रोशनी में {पोस्ट न. 05}
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तबलीग जमाअत

बारहवीं हदीस

हज़रत अबू सईद खुदरी और हज़रत अनस बिन मालिक रज़ि अल्लाहु अन्हुमा से मिश्कात शरीफ में यह हदीस नकल की गई है । हुजूर अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया कि मेरी उम्मत में इख्तिलाफ व तफरीक का वाके होना मुकद्दर हो चुका है पर इस सिलसिले में एक गरोह निकलेगा जिसकी बातें बजाहिर दिलफ्रेब व खुशनुमा होंगी लेकिन किरदार गुमराह कुन और खराब होगा वह कुरआन पढ़ेंगे लेकिन उनके हलक के नीचे नहीं उतरेगा वह दीन से ऐसे निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार से निकल जाता है फिर दीन की तरफ लौटना उन्हें नसीब न होगा यहाँ तक कि तीर अपने कमान की तरफ लौट आए वह अपनी तबीअत व सरिश्त के लिहाज से बदतरीन मख्लूक होंगे वह लोगों को कुरआन और दीन की तरफ बुलाएंगे हालांकि दीन से उन का कुछ भी तअल्लुक न होगा जो उन से जंग करेगा वह खुदा का मुकर्रब तरीन बन्दा होगा । सहाबा ने फरमाया उनकी खास पहचान क्या होगी या रसूलुल्लाह ﷺ! फरमाया , सर मुंडाना ।

( मिश्कात शरीफ स० 308 )

तेरहवी हदीस

इस हदीस की खुसूसियत यह है कि असल हदीस बयान करने से पहले हदीस के रावी हज़रत अली रजि अल्लाहु अन्हु ने फरमाया है कि कसम खुदा की आसमान से जमीन पर गिर पड़ना मेरे लिए आसान है लेकिन हुजूर की तरफ कोई झूठी बात मन्सूब करना बहुत मुश्किल है उसके बाद असल हदीस का सिलसिला यूं शुरू होता है । फरमाते हैं । मैंने हुजूर अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह फरमाते हुए सुना कि अख़ीर ज़माने में नौ उम्र और कम समझ लोगों की एक जमाअत निकलेगी बातें वह बज़ाहिर अच्छी कहेंगे लेकिन ईमान उनके हलक के नीचे नहीं उतरेगा । वह दीन से ऐसे निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार से निकल जाता है ।

( बुखारी जिल्द 3 , स० 1024 )

चौदहवीं हदीस

हज़रत अबू नईम ने हुलिया में अबू अमामा बाहली रज़ि अल्लाहु अन्हु से नकल किया है कि हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया । अखीर ज़माने में कीड़े मकोड़ों की तरह हर तरफ “ मुल्लाने ” फूट पड़ेंगे । पस तुम में से जो शख्स वह ज़माना पाए तो उसे चाहिए कि वह उन से खुदा की पनाह मांगे ।( हुलिया )

✨इसी के साथ यह हदीस भी पढ़ लीजिए जो मिश्कात शरीफ में हज़रत हसन बसरी रज़ि अल्लाहु अन्हु से मरवी है । हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि लोगो ! एक ज़माना ऐसा भी आएगा जब किं लोग अपनी मस्जिदों में दुनिया की बातें करेंगे जब ऐसा ज़माना आ जाए तो तुम उनके सामने मत बैठना अल्लाह ऐसे लोगों से बेपर्वा है ।

( मिश्कात )

* तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 11/12/13*

जारी रहेगा इन्शाअल्लाह…..
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✍ मुसन्निफ़ : – हज़रत अल्लामा मौलाना अरशदुल क़ादरी रहमतुल्लाह अलैह ।
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हदीस की रोशनी में {पोस्ट न. 04}
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तबलीग जमाअत

नवीं हदीस

मिश्कात शरीफ़ में हज़रत अबू सईद खुदरी रज़ि अल्लाहु तआला अन्हु से मन्कूल है । वह कहते हैं कि हम लोग हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ख़िदमत में हाज़िर थे और हुजूर माले गनीमत तक़सीम फरमा रहे थे कि जुल – खुवैसरह नाम का एक शख्स , जो कबीला बनी तमीम का रहने वाला था आया और कहा ऐ अल्लाह के रसूल इंसाफ से काम लो । हुजूर ने फरमाया अफ़सोस तेरी जसारत पर मैं ही इंसाफ नहीं करूंगा तो और कौन इंसाफ़ करने वाला है । अगर मैं इंसाफ नहीं करता तो तू खाइब व खासिर हो चुका होता । हज़रत उमर से जब नहीं रहा गया तो उन्होंने अर्ज किया कि हुजूर मुझे इजाज़त दीजिए मैं उसकी गर्दन मार दूं । हुजूर ने फरमाया उसे छोड़ दो यह अकेला नहीं है उसके बहुत से साथी हैं जिनकी नमाज़ों और जिनके रोजों को देख कर तुम अपनी नमाजों और रोज़ों को हकीर समझोगे । वह कुरआन पढ़ेंगे लेकिन कुरआन उनके हलक के नीचे नहीं उतरेगा । ( इन सारी ज़ाहिरी खूबियों के बावजूद ) वह दीन से ऐसे निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार से निकल जाता है ।

( मिशकात स० 535 , बुखारी जि० 2 स0 1024 )

दसवीं हदीस

यही वाकया दूसरे सिलसिल – ए – रिवायत से मरवी है जिसके अल्फाज़ यह हैं । एक शख़्स आया जिसकी आंख धंसी हुई थीं , पेशानी उभरी हुई थी , दाढ़ी घनी थी , दोनों गाल फूले हुए थे और सर मुंडा हुआ था । उस ने ज़बान तअन दराज़ की ऐ मुहम्मद ! अल्लाह से डरो हुजूर ने फरमाया मैं ही नाफरमान हो जाऊंगा तो अल्लाह की फरमाबरदारी कौन करेगा । अल्लाह ने तो मुझे ज़मीन वालों पर अमीन बनाया है । लेकिन तुम मुझे अमीन नहीं समझते । इसी दर्मियान में एक सहाबी ने उसके कत्ल की इजाज़त चाही हुजूर ने उन्हें रोक दिया जब वह शख़्स चला गया तो फरमाया कि उसकी नस्ल से एक जमाअत पैंदा होगी जो कुरआन पढ़ेगी लेकिन कुरआन उसके हलक के नीचे नहीं उतरेगा वह दीन से ऐसे निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार से निकल जाता है वह मुसलमानों को कत्ल करेंगे और बुत परस्तों को छोड़ देंगे ।

( मिशकात शरीफ स० 535 )

ग्यारहवी हदीस

यही वाकया हज़रत शरीक इब्ने शिहाब रज़ि अल्लाहु अन्हु से भी मन्कूल है । उसमें उन्होंने उस गुस्ताख़ शख्स के मुतअल्लिक सरकारे रिसालत मआब का यह इरशाद नकल किया है । फिर हुजूर ने फरमाया कि आख़िरी ज़माने में एक गरोह निकलेगा गोया यह शख्स उसी गरोह का एक फ़र्द है । कुरआन पढ़ेंगे लेकिन कुरआन उनके हलक से नीचे नहीं उतरेगा । वह इस्लाम से ऐसे निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार से । उनकी खास पहचान “ सरमुंडाना है वह हमेशा गरोह दर गरोह निकलते रहेंगे यहाँ तक कि उनका आख़िरी दस्ता मसीहुद्दज्जाल के साथ निकलेगा जब तुम उन से मिलोगे तो उन्हें अपनी तबीअत व सरिश्त के लिहाज़ से बदतरीन पाओगे

( मिश्कात : स० 309 )

* तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 9/10/11*

जारी रहेगा इन्शाअल्लाह…..
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हदीस की रोशनी में {पोस्ट न. 03}
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तबलीग जमाअत

छठी हदीस

यही अल्लामा दहलान रहमतुल्लाहि अलैहि यह हदीस भी कुतुबे हदीस से अपनी किताब मरा में तख्रीज फरमाते हैं कि हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु तआला अलैहि व सल्लम ने इरशाद फरमाया । कुछ लोग मश्रिक की सिम्त से ज़ाहिर होंगे जो कुरआन पढ़ेंगे लेकिन कुरआन उनके हलक के नीचे नहीं उतरेगा जब उनका एक गरोह ख़त्म हो जाएगा तो वहीं से दूसरा गरोह जन्म लेगा यहाँ तक कि उनका आखिरी दस्ता दज्जाल के साथ उठेगा ।

( अद्दुररुस्सुन्नीया मत्बूआ तुर्की व मिस्र : स० 50 )

✨एक और सुराग✨

दयारे नज्द में बनू हनीफा का वही बद किस्मत कबीला है जहाँ से शैतान की सींग तुलअ हुई और जिस की खाक से ज़लज़लों और फित्नों ने जन्म लिया । अब तारीख़ की एक बड़ी ट्रेजडी मुलाहिजा फरमाइए कि यह दिल आज़ार कबीला शुरू से सरकारे रिसालत मआब सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की रूहानी अजीयत और तबई कराहियत का मूजिब रहा है अहादीस में इस कबीले का ज़िक्र इन अल्फाज़ में किया गया है ।

सातवीं हदीस

अल्लामा दहलान ने अपनी किताब में कुतुबे हदीस से सरकारे अक्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का इरशाद नकल किया है । कि रिसालत के इब्तिदाई अय्याम में हर मौसमे हज पर बाहर से आने वाले कबाइल के सामने में अपनी दावत पेश किया करता था । बनू हनीफा के जवाब से ज़्यादा कबीह और नापाक जवाब मुझे किसी कबीले ने नहीं दिया ।

( अदुररुस्सुन्नीया : स0 52 )

नोट : वाजेह रहे कि मसऊद आलम साहब नदवी की तस्रीह के मुताबिक वानू हनीफा का दूसरा नाम यमामा भी है ।

आठवीं हदीस

जामे तिर्मिज़ी में हज़रत इमरान इब्ने हसीन रज़ि अल्लाहु अन्हु से यह हदीस नकल की गई है । उन्होंने बयान किया कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तीन कबीलों को ताहयात नापसन्द फरमाते रहे । एक सकीफ , दूसरा बनी हनीफा , तीसरा बनी उमैया ।

*( तिर्मिज़ी )

✨पहली हदीस से लेकर आठवीं हदीस तक यह तमाम हदीसें नज्द के फित्ने को मुख्तलिफ़ ज़ावियों से समझने और बारगाहे रिसालत में इस खित्ते के मक्हर होने की जेहत को वाजेह करने के लिए बहुत काफी हैं । अब जेल की हदीसों में इस फित्ने के अलम बरदारों का और खद्दो खाल पढ़िए ।

* तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 8/9*

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हदीस की रोशनी में {पोस्ट न. 02}
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तबलीग जमाअत

दूसरी हदीस

सही मुस्लिम शरीफ़ में हज़रत अब्दल्ला इब्ने उमर रज़ि अल्लाहु तआला अन्हुमा से यह हदीस नकल की गई है । बयान करते हैं कि एक दिन हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उम्मुल – मुमिनीन हज़रत हफ्सा के दरवाजे पर खड़े थे वहाँ से मश्रिक की तरफ अपने दस्ते मुबारक से इशारा किया और फरमाया कि फित्ना की जगह यह है यहाँ से शैतान की सींग निकलेगी ।

( मुस्लिम शरीफ़ जिल्द 2 स० 394 )

रावी को शक है कि यह अल्फाज़ हुजूर ने दो बार कहे या तीन बार ।

तीसरी हदीस

यही हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रज़ि अल्लाहु अन्हुमा की रिवायत से फिर मुस्लिम शरीफ में है । बयान करते हैं कि हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मश्रिक की तरफ रुख करके फरमाया कि फित्ना यहाँ से उठेगा फ़ित्ना यहाँ से उठेगा ,फित्ना यहाँ से उठेगा यहां से शैतान की सींग निकलेगी ।

( मुस्लिम शरीफ : जिल्द 2 , स० 393 )

*चौथी हदीस *

फिर इन्हीं हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रज़ि अल्लाहु अन्हुमा से मुस्लिम शरीफ में तीसरी रिवायत नकल की गई है । बयान करते हैं कि एक दिन हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलाह व सल्लम सैय्यदा आइशा रजि अल्लाहु तआला अन्हा के हरम से बाहर तशरीफ़ लाए और मश्रिक की तरफ इशारा करते हुए फरमाया कि कुफ्र का मरकज़ यहाँ है जहाँ से शैतान की सींग निकलेगी ।

( मुस्लिम शरीफ़ किताबुल – फ़ितन , जिल्द 2 , स० 394 )

✨गौर फरमाइए ! इन तीनों हदीसों में सिर्फ मश्रिक की सिम्त ही का ज़िक्र नहीं है कि उस से नज्द का ख़ित्ता मुराद लेने में किसी एहतमाल की गुंजाइश निकल आए बल्कि उसके साथ हर जगह ( मिन हैसु यतलओ करनश्शैतान , शैतान की सींग निकलेगी ) का इज़ाफ़ा वाजेह तौर पर बता रहा है कि मश्रिक की सिम्त से कोई दूसरा इलाका नहीं बल्कि ख़ास नज्द मुराद है क्योंकि बुखारी शरीफ़ की हदीस में नज्द के नाम के साथ नज्द का यह वस्फ जिक्र किया गया है इसलिए हदीस की ज़बान में मश्रिकी सिम्त में वह खित्ता है जहाँ से शैतान की सींग निकलेगी नज्द के सिवा और कोई दूसरा ख़ित्ता नहीं हो सकता ।

पाँचवीं हदीस

सैय्यदी अल्लामा दहलान रहमतुल्लाहि अलैहि ने अपनी किताब अद्दुररुस्सुन्नीया में कुतुबे हदीस से हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह फरमान नकल किया है । कुछ लोग मश्रिक की सिम्त से ज़ाहिर होंगे जो कुरआन पढ़ेंगे लेकिन कुरआन उनके हलक के नीचे नहीं उतरेगा वह लोग दीन से ऐसे निकल जाएंगे जैसे तीर शिकार से निकल जाता है फिर वह दीन में पलट कर नहीं आएंगे । यहां तक कि तीर अपने कमान की तरफ लौट आए । उनकी खास अलामत सर मुंडाना होगी ।

* तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 6/7*

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हदीस की रोशनी में {पोस्ट न. 01}
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तबलीग जमाअत

पहली हदीस

हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रज़ि अल्लाहु तआला अन्हुमा से इमाम बुखारी ने यह हदीस नकल की है कि एक दिन हुजूरे अनवर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने शाम और यमन के लिए दुआ फरमाई जिस के अल्फाज़ यह हैं । . खुदावन्दा हमारे लिए शाम और यमन में बरकत नाज़िल फरमा ( दुआ करते वक़्त नज्द के कुछ लोग भी बैठे हुए थे ) उन्होंने अर्ज किया और हमारे नज्द में या रसूलुल्लाह ! उस पर हुजूर ने इरशाद फरमाया खुदावन्दा ! हमारे लिए हमारे शाम और यमन में बरकत नाज़िल फरमा । फिर दोबारा नज्द . के लोगों ने अर्ज किया और हमारे नज्द में या रसूलुल्लाह ! रावी का बयान है कि तीसरी मरतबा में हुजूर ने फरमाया वह जलज़लों और फित्नों की जगह है और् वहाँ से शैतान की सींग निकलेगी ।

( बुखारी शरीफ जिल्द 2 स० 1051 )

आम तौर पर “ करनिश्शैतान ” का तर्जमा “ शैतान की सींग किया जाता है लेकिन देवबन्द के मिस्बाहुल्लुगात में उसका तर्जमा “ शैतान की राय का पाबन्द ” भी किया गया है ।

बहरहाल इस हदीस से मालूम हुआ कि नज्द खैर व बरकत की जगह नहीं बल्कि फित्ना व शर की जगह है । क्योंकि रहमतुल – लिल – आलमीन की दुआए खैर से महरूम हो जाने के मानी ही यह हैं कि हमेशा के लिए इस खित्ते पर शकावत और बदबख़्ती की मुहर लग गई । अब वहां से किसी खैर की तवक्कू रखना तक्दीरे इलाही से जंग करना है ।

✨दूसरी बात यह मालूम हुई कि वहाँ की खाक से कोई ऐसा शख्स ज़रूर उठेगा जो शैतान की राय का पाबन्द होगा या जिस तरह सूरज की फैल जाने वाली पहली किरन को “ करनुशम्स ” कहते हैं इसी तरह शैतान का फित्ना भी वहाँ से सारे जहान में फैल जाएगा ।

✨इशार – ए – महसूस✨

नज्द व हिजाज़ का एटलस ( जुगराफ़ियाई नक्शा ) सामने – रखिए तो आपको वाजेह तौर पर नज़र आएगा कि नज्द का इलाका मदीना मुनव्वरा के बिल्कुल मशरिकी सिम्त में वाके है । मदीने से सरकारे मदीना ने जिन अल्फाज़ में उस सिम्त की तरफ इशारा किए हैं वह एक वफादार मोमिन को चौंका देने के लिए काफी हैं उससे अन्दाज़ा होता है कि निगाहे रिसालत पनाह में नज्द का फ़ित्ना उम्मत के लिए किस दरजा हौलनाक और ईमान शिकन था । अब इस उनवान पर जैल में हदीसों की कतार मुलाहिज़ा फरमाइए ।

* तबलीग जमाअत हदीस की रोशनी में सफा, 4/5*

जारी रहेगा इन्शाअल्लाह…..
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THURSDAY, APRIL 30, 2020

इस्लामी मालूमात 2 (पोस्ट न. 27)
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सवाल न . 185 : – सहाबा की एक जमाअत तीन दिन में कुरआन खत्म करती थी । हुफ्फाज़ और कुर्रा की इस्तेलाह में इसे क्या कहा जाता है ?

✍जवाब – मनाजिले फील ।

सवाल न , 186 – तौरेत . इंजील कौन सी जुबानों में नाजिल हुई ?

✍जवाब – तौरत सुरयानी जुबान में और इंजील इबरानी जुबान में ।

सवाल न . 187 – नमाजे जनाजा में कितने रूक्न है और वह क्या क्या है ?

✍जवाब – दो रूकन है ( 1 ) चार बार अल्लाहु अकबर कहना ( 2 ) कयाम ।

सवाल न . 188 – नमाजे जनाजा में कितनी चीजें सुन्नते मुअक्किदा है और वह क्या क्या हैं ?

✍जवाब : तीन ।

( 1 ) अल्लाह तआला की हम्द ओ सना शव।
( 2 ) नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर दुरूद ।
( 3 ) मय्यत के लिए दुआ ।

इस्लामी मालूमात हिस्सा अव्वल और हिस्सा दोम आप की दुआंओ से आज मुकम्मल पोस्ट हो गई है ।

* तालिबे दुआं -ए- मग़फीरत एडमीन टीम*
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इस्लामी मालूमात 2 (पोस्ट न. 26)
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सवाल न . 183 – जब सन् छ: हिजरीमै हुदैबिया के सुलहनामे में तहरीर किया जा चुका कि दस साल तक फरीकैन के बीच कोई जंग न होगी तो फिर आखिर ऐसा कौन सा सबब नमूदार हो गया कि सुलहनाने के दो ही साल बाद ताजदार दो आलम को हथियार उठाने की जरूरत पेश आई ?

✍जवाब – हुदैबिया के सुलहनामे में एक शर्त यह भी थी कि कबाइले अरब में से जो कुरैश के साथ मुआहिंदा करना चाहे वह कुरैश के साथ मुजाहिदा करे और जो हुजूरे अकरम के साथ मुआहिदा करना चाहे वह हुजूर से मुआहिदा करें । इसके पेशेनजर मक्के के करीब दो कबीले थे बनी बक़्र और बनी खुजाआ । बनी बक्र ने कुफ्फार कुरैश से और बनी खुजाआने हुजूरे अकरम से आपसी मदद का मुआहिदा कर लिया । इन दो कबीलों में अरों दराज से अदावत थी इसलिए कबीलए बनी बक्र ने बनी खुजाआ का कत्ले आम किया और कुरैश ने भी उनका साथ दिया । इस हादसे के बाद बनी खुजाआ के चालीस आदमी जो हुजूर के हलीफ बन चुके थे आपकी बारगाह में हाजिर हुए और अपने ऊपर कुफ्फारे कुरैश के जुल्म करने का जिक्र ब्यान क्या बनी खुजाआ पर हमला करना गोया सरकार पर हमला करने के बराबर था इसीलिए हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने बनी खुजाआ का साथ दिया और तलवार उठानी पड़ी ।

सवाल न . 184 – फतह मक्का के बाद हजरत अबू सुफियान क्या सोच रहे थे कि हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उनके सीने पर हाथ मारा ?

✍जवाब – अबू सुफयान ने दिल में कहा कि काश मैं फौज जमा करके दुबारा इनसे जंग करता जब हुजूर ने हाथ मारकर इरशाद फरमाया कि अगर तू ऐसा करेगा तो अल्लाह तआला तुझे जलील करेगा । दूसरी रिवायत यह है कि अबू सुफयान ने सोचा कि कौन सी ताकत इनके पास है जो ये हमेशा गालिब रहते हैं तब हुजूर ने सीने पर हाथ मारकर इरशाद फरमाया कि हम खुदा की ताकत गालिब हो जाते हैं ।

नोट : इस वाकिये से मालूम होता है कि हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इल्मे गैब जानते हैं और लोगों के दिलों के हालात भी अल्लाह की अता से जान लिया करते हैं ।

जारी रहेगा इन्शाअल्लाह…..
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