मुहम्मद ﷺ से वफ़ा

की मुहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैं
ये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं

मुह़म्मद नबीना बिनूरु हदीना
मि-म्मक्का ह़बीबी नूरु सताअल-मदीना
मिन स़ल्ला स़लातुह व-त्तह़्ली बिस़िफ़ातुह
या बख़्ति-ल्ली फी ज़ुल्लू माशी यश्फअ़ लहु ममातुह

उम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैं
इज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैं
इन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैं
सैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैं

रहमतें हैं तेरी अग़्यार के काशानों पर
बर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलामानों पर

यूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी हो
तुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी हो

की मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैं
ये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं

हम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़र
कहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं माबूद शजर
ख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इन्सां की नज़र
मानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकर

तुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तेरा
क़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तेरा

फ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैं
क्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैं

की मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैं
ये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं

मुह़म्मद नबीना बिनूरु हदीना
मि-म्मक्का ह़बीबी नूरु सताअल-मदीना
मिन स़ल्ला स़लातुह व-त्तह़्ली बिस़िफ़ातुह
या बख़्ति-ल्ली फी ज़ुल्लू माशी यश्फअ़ लहु ममातुह

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