ये नाज़ ये अंदाज़ हमारे नहीं होते

ये नाज़, ये अंदाज़, हमारे नहीं होते
झोली में अगर टुकड़े तुम्हारे नहीं होते

जब तक के मदीने से इशारे नहीं होते
रौशन कभी क़िस्मत के सितारे नहीं होते

बे-दाम ही बिक जाइए बाज़ार-ए-नबी में
इस शान के सौदे में ख़सारे नहीं होते

दामान-ए-शफ़ाअ’त में हमें कौन छुपाता
सरकार ! अगर आप हमारे नहीं होते

हम जैसे निकम्मों को गले कौन लगाता
सरकार ! अगर आप हमारे नहीं होते

मिलती न अगर भीक, हुज़ूर ! आप के दर से
इस ठाठ से मँगतों के गुज़ारे नहीं होते

ये निस्बत-ए-सरकार का एजाज़ है वर्ना
तूफ़ाँ से नमूदार किनारे नहीं होते

ख़ालिद ! ये तसद्दुक़ है फ़क़त ना’त का वर्ना
महशर में तेरे वारे-न्यारे नहीं होते

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