Best Islamic Stories

Best Islamic Stories

 

सबक्‌:- ये दुनिया बड़ी नापायदार है। इसकी खातिर लड़ना झगड़ना

अकलर्मदी का काम नहीं।

हिकायत नम्बर 940 थे सिबाती दुनिया

 

बनी इस्राईल के एक नोजवान आबिद के पास हजरत खिज्र अलेहिस्सलाम
आया करते थे। ये बात उस वक्त के बादशाह ने सुनी और उस आबिद को
बुलाया। और पूछा कया ये सच है के तुम्हारे पास हजरत खिज्र अलैहिस्सलाम
आया करते थे? उसने कहा के हाँ! बादशाह ने कहा। अब जब वो आयें तो
उन्हें मेरे पास ले आना। अगर ना लाओगे तो मैं तुम्हें कृत्ल कर दूंगा। चुनाँचे
खिज्र अलेहिस्सलाम एक रोज उसके पास तशरीफ लाए। तो उस आबिद्र ने
उनसे सारा वाकेया बयान कर दिया। आपने फरमाया। चलो में उस बादशाह
के पास चलता हूँ। चुनाँचे आप उस बादशाह के पास आए। बादशाह ने पूछा,
आप ही खिज्र हैं? आपने फ्रमाया, हाँ! बादशाह ने कहा, तो हमें कोई बड़ी
अजीब बात सुनाईये , फ्रमाया मैंने दुनिया की बड़ी बड़ी अजीब बातें देखी
हैं। मगर उनमें से एक सुनाता हूँ। लो सुनो!

मैं एक मर्तबा एक बहुत बड़े खूबसूरत और आबाद शहर से गुजरा मैंने
इस शहर के एक बाशिन्दे से पूछा, ये शहर कब से बना है? तो वो बोला, के
ये बहुत पुराना शहर है। इसकी इब्तिदा का ना मुझे इल्म है ना हमारे आबाओ
अजदाद को। खुदा जाने कब से ये शहर चला आता है। फिर मैं पाँच सौ
साल के बाद उसी जगह से गुजरा तो वहाँ उस शहर का नामो निशान ना था।
वहाँ एक जंगल था। और एक आदमी वहाँ लकड़ियाँ चुन रहा था। मैंने उससे
पूछा के ये शहर बर्बाद कब से हो गया? तो वो शख्स हंसा, और कहने लगा
के यहाँ शहर कब था। ये जगह तो मुद्दतों से जंगल  आ रही है। हमारे
आबाओ अजदाद ने भी यहाँ जंगल ही देखा है। फिर मैं पाँच सौ साल के बाद
वहाँ से गुजरा तो वहाँ एक अंजीम-उश्शान दरया बह रहा था। और किनारे
पर चन्द शिकारी मछलियाँ पकड़ रहे थे। मैंने उनसे पूछा के ये जमीन दरया
केब से बन गई? तो वो हंसकर मुझ से कहने लगे के आप जैसा आदमी ये
सवाल करे? ताज्जुब है। जनाब! यहाँ तो हमेशा से दरया ही बहता आया है।
हमारे आबाओ अजदाद ने भी यहाँ दरया ही देखा है। फिर में पाँच सौ साल
बाद वहाँ से गुजरा तो वो जगह एक बहुत बड़ा मैदान देखी। जहाँ एक
आदमी को फिरते देखा। मैंने उससे पूछा के ये जगह खुश्क कब से हो गई
तो वो बोला। के ये जगह तो हमेशा से यूंही चली आ रही है। मैंने पूछा। यहाँ

कभी दरया नहीं बहता था? तो वो बोला हर गिज नहीं, हम ने ऐसा ना देखा।
ना अपने आबाओ अजदाद से सुना, फिर में पाँच सो साल के बाद वहाँ से
गुजरा। तो वहाँ फिर पहले शहर से भी ज़्यादा एक अजीम-उश्शान शहर
देखा। मैंने एक बाशिन्दे से पूछा के ये शहर कब से है? वो बोला ये शहर
बहुत पुराना है। इसकी इब्तिदा का ना हमें इल्म है ना हमारे आबाओ अजदाद
को। ( अजायब-उल-मखुलूकात लिलकजुवीनी हाशिया हयात-उल-हैवान,
सफा 29, जिल्द अव्वल )

सबक्‌:ः- ये दुनिया हजारों रंग बदलती है। इसकी किसी चीज को
दव्वाम व कयाम हासिल नहीं। लिहाजा ऐसी नापायदार दुनिया में दिल नहीं
लगाना चाहिए और अपनी आक्बत की फिक्र करना चाहिए। जहाँ की हर
चीज पायेदार और हमेशा के लिए काम आने वाली है।

हिकायत नम्बर 940 पुर असरार फकौर

 

ईंद का दिन है, सेठ नईम और उसकी बीवी हसीना कीमती लिबास में
मलबूस एक कमरे में बैठे हुए खाने के इन्तिजार में हैं के उनका मुलाजिम
शकूर कमरे में दाखिल हुआ। और मौहबाना लहजे में कहा। . .

शकूरः:- हुजर खाना तैयार है, तशरीफ ले चलिए।

नईमः- चलो बैगम खाने से फारिग हो लें।

हसीना:- चलिये। |

हक नईंम मओ हसीना के खाने पर बैठे ही थे। के बाहर के दरवाजे से आवाज

आईं। ।

 

 

“बाबा कई दिन से भूका हूँ, ईद का दिन है। खुदारा कुछ खाने को दो।
खुदा भला करेगा।” |

फकौर की ये सदा सुनकर सेठ नईम जो दौलत के नशे में चूर और
मगरूर था। चीं बजबीं होकर बोला।
नईम:- ये मंगते कम बख़्त ईंद के दिन भी पीछा नहीं छोड़ते। शक्कूर उसे

धक्के देकर दरवाजे से बाहर निकाल दो। चुनाँचे फकीर को धक्के देकर
बाहर निकाल दिया गया। | | ह

लक नईम मुतफक्किर व परेशान घर में दाखिल हुआ। हसीना ने दरयाफ्त
। है

हसीना:- हालात कुछ सुधरे या नहीं? क्‍
नईमः- हसीना! क्या बताऊँ हो क्‍या गया है। मेरी हर कोशिश मौजिब

नुक्सान साबित हो रही है। थोड़े ही दिनों में मेरी हर चीज मेरे कब्जे पे निकल
है। और जो कुछ रह गया है। वो भी जा रहा है। अगर हालात का यही
रंग ढंग रहे। तो हसीना मुसतकुबिल बड़ा तारीक नजुर आ रहा है।
का हर वक्त तंग करने लगे। हत्ता के बाहर निकलना भी दुश्वार
हो गया है। |
ईद के दिन से छः माह बाद वही नईम जो सेठ कहलाता था। इंकिलाब
जमाने का शिकार हो गया। और उसका सारा मालो मताअ दुकान व मकान
वगैरा नज नुक्सान होकर गिरफ्त रहन में आ गया। और फिर नईम के उरूज
व इकबाल का सूरज दीवालिया पन के सियाह बादलों में छुप कर रह गया।
और नईम पैसे पैसे का मोहताज हो गया हत्ता के फाका कशी तक नोबत
पहुँच गई।
इन्तिहाई यास अंगेज और हसरत आमेज्‌ लहजे में लरजृती हुई आवाज
से नईम ने हसीना को मुखातिब किया।
कि नईम:- मेरा एक आखरी जुमला सुन लो। मैं जानता हूँ के तुझे बेहद रंज
_चेगा और उम्र भर के रिश्ते को यूं आआनन फआनन दूटते हुए देखकर
तुम्हारा दिल भी टूट जाएगा। मगर हसीना ( रोते हुए ) क्या करूं। तुम्हारा नईम
शिकार इंकिलाब हो गया। मुफलिस व मोहताज हो गया। खुद फाकाकश
रहूं मगर तुम्हारी फाका कशी नहीं देख सकता। हसीना! सिर्फ इस खयाल
तुम अपना मुसतकूबिल बेहतर बना सको मैं तुम्हें बादिले नख्त्ास्ता
छोड़ देता हूँ। और तलाक्‌ देता हूँ। जाओ तुम्हें इजाजत है के बाद अज इद्दत
कहीं और निकाह कर लो। ( दोनों रो पड़े और फिर उसके बाद ) पूरा साल
भुजर गया और फिर ईद का दिन आ गया। हसीना अपने दूसरे खाविंद सेठ
शाकिर के साथ खाना खाने बैठी ही थी के बाहर के दरवाजे से एक फकीर
की आवाज आई।
“बाबा कई दिन से भूका हूँ। ईद का दिन है। खुदारा कुछ खाने को दो।
जुदा भला करेगा।” क्‍
सेठ शाकिर ( जो बड़ा नेक दिल और फय्याज था) ने हसीना से कहा
पहले इस फकीर को खाना भिजवाओ। फिर हम खायेंगे। चुनाँचे हसीना
फैकीर को खाने भिजवाने उठी। कमरे से निकली तो अचानक बाहर के
पेरवाजे पर खड़े हुए फकीर पर नजुर पड़ गई। फक्कौर को देखा तो एक
ऐप चीख मार कर धड़ाम से गिर पड़ी और बेहोश हो गईं। शाकिर दौड़ा।
और उसे होश में लाने का जतन करने लगा और होश जो आया तो शाकिन

मुखातिब हुआ। ।
शाकिर:- हसीना! प्यारी हसीना! क्‍या बात है। ये क्या हुआ तुम्हें।
हसीना:- ( रोते हुए ) माफ करना प्यारे! ये दिल काबू में ना रहा! बढ़ी
ही इम्नतनाक और दर्दअंगेज नज़्जारा है।
शाकिरः- हाँ बताओ तो वो क्‍या है?
हसीना:- ये फकीर जो बाहर दरवाजे पर खड़ा है। मैंने उसे पहचान
लिया है। ये सेठ नईम है।
शाकिर:- सेठ नईम? और तुम उसे जानती हो और फिर ये अब
इस हाल में?
हसीना:- हाँ, हाँ, में उसे जानती हूँ, गुजिश्ता साल ये मेरा खाविंद था,
आज से पूरे एक साल पहले इसी ईद के दिन हम खाना खाने बैठे। तो इसी
तरह उस रोज भी एक फकीर ने हमारे दरवाजे पर आकर भीक माँगी थ्री।
मगर आह! नईम ने उसे धक्के दकर निकलवा दिया। और आज इस पादाश
में खुद भीक माँगता नजर आ रहा है।
शाकिरः- ये दुनिया बड़ी बेवफा है। इस पर क्या भगेसा! हसीना! लो
अब इससे भी ज़्यादा इब्नतनाक हकीकृत का नज्जाग करो। हसीना! तुम ने
नईम को तो पहचान लिया मगर अब पुझे भी पहचान लो।
हसीना:- आपको भी पहचान लूं। क्या मतलब?
शाकिरः- मतलब ये के ये तुम्हारा खाबिंद सेठ शाक्िर वहीं
पिछले साल वाला फकौीर हैं। जो सेठ नईम के दरवाजे से धक्के देकर
निकलवाया गया था। हसीना ये सुनकर फिर बेहोश हो गईं। ( हिकाबत
सअदी तबसरफ मौल्लिफ )
सबक:- ये दुनिया बड़ी त्रे वफा है। इस पर कभी भरोसा ना
करना चाहिए। और दौलत के नशे में मखमूर होकर गरीबों, मोहताजों
और फकीौरों को हर गिज्‌ सताना ना चाहिए। बलल्‍्के उनकी मदद करना
चाहिए। और ये भी मालूम हुआ के खुदा की गिरफ्त बड़ी सख़्त और
होलनाक होती है। वो देर से पकड़ता है। मगर सख्त पकड़ता है। उसके
जलालो गृजुब से बचना चाहिए। और ये भी मालूम हुआ के इस जमाने
में इमारत व गुर्बत सब आरजी चीजें हैं। आज जो अमीर है मुमकिन है
कल वो ग्रीब हो जाए। और आज जो गरीब है मुमकिन है कल अमीर हो
जाए और इस इंकिलाब में उसकी मिसालें बहुत सी देख भी ली गई हैं।

 

हिकायत नम्बर 940 दुनिया परस्त का अंजाम

 

अलेहिस्सलाम एक सफर में निकले, तो आपके हमराह एक

हो लिया उस यहूदी के पास दो रोटियाँ थीं। और ईसा अलेहिस्सलाम

के पास एक रोटी हर । ईसा अलेहिस्सलाम ने उससे कहा। आओ दोनों
पिलिकर रोटी खायें। यहूदी ने मान लिया। मगर जब उसने देखा। के ईसा
अलेहिस्सलाम के पास एक रोटी है। और मेरे पास दो, तो पछताया के
मैने शिकत का वादा क्‍यों कर लिया? चुनाँचे जब खाने का टाईम हुआ
गे यहूदी ने एक ही रोटी रखी। ईसा अलेहिस्सलाम ने फ्रमाया, तुम्हारे
पप्त दो रोटियाँ थीं, एक कहाँ गई? यहूदी बोला, मेरे पास तो एक ही
गेगी थी। दो कब थीं? खाना खाकर आगे बढ़े। तो एक अंधा मिला। ईसा
अलेहिस्सलाम ने उसके लिए दुआ की तो वो अच्छा हो गया। ये मौजजा
दिखाकर ईसा अलेहिस्सलाम ने यहूदी से कहा। तुझे उस अल्लाह की
कसम जिसने मेरी दुआ से उस अंधे को अच्छा कर दिया। बता! दूसरी
गेटी कहाँ गई? वो बोला मुझे उसी खुदा की कसम! मेरे पास तो एक
ही सेटी थी। दूसरी थी ही नहीं। इतने में आगे बढ़े तो एक हिरन दिखाई
दिया। ईसा अलेहिस्सलाम ने उसे बुलाया। वो आ गया। आपने उसे जिबह
किया। भूना और खाया। और फिर उसकी हड्डियों से फ्रमाया, कुम
बिउ्जुनिल्लाह/ वो हिरन फिर जिन्दा हो गया। ईसा अलेहिस्सलाम ने
फरमाया। तुझे उसी खुदा की कूसम जिसने हमें ये हिरन खिलाया। और
फिर उसे जिन्दा कर दिया। बताओ वो दूसरी रोटी कहाँ गईं। वो बोला।
पुझे उसी खुदा की कसम! मेरे पास तो एक ही रोटी थी आगे बढ़े तो एक
ऊस्बा आ गया। हजरत ईसा अलेहिस्सलाम ने वहाँ कयाम किया। यहूदी
मौका पाकर हजरत ईसा अलेहिस्सलाम का असा मुबारक चुरा लिया

और खुश हुआ के मैं इस सोंटे से मुर्दे जिन्दा किया करूंगा। चुनाँचे उसने
फैसबे में एलान कर दिया के मुर्दे को मुझ से जिन्दा करा लो। लोग उसे
शक शहर के पास ले गए। जो बीमार था। ये गया और जाते ही पहले
डेडा उस हाकिम के सर पर दे मारा। वो मर गया। और फिर कहने
गगा लो देखो। अब मैं इसे जिन्दा करता हूँ। चुनाँचे फिर उसे डंडा मारा
भे भौर कहा कम बिद्वजनिल्लाह मगर वो जिन्दा ना हो सका। अब तो
बबराया। लोगों ने पकड़ लिया। और उसे फाँसी पर लंटकाने लगे के
हेजुरत इंसा अलेहिस्सलाम पहुँच गए। फरमाया। तुम्हारा हाकिम

मैं जिन्दा कर देता हूँ। उसे छोड़ दो। चुनाँचे आपने कुम बिइजुनिल्लाह
कहा। तो हाकिम फौरन जिन्दा हो गया। और उन्होंने यहूदी को छोड़
दिया। ईसा अलेहिस्सलाम ने उससे कहा। तुझे उसी अल्लाह की कसम
जिसने तुम्हारी जान बचाई। बताओ वो दूसरी रोटी कहाँ गई? वो बोला
मुझे उसी खुदा कौ कसम! मेरे पास दूसरी रोटी थी ही नहीं। आगे बढ़े
तो सोने की तीन ईंटें मिलीं। ईसा अलेहिस्सलाम ने फरमाया। इनमें एक
ईंट मेरी दूसरी तुम्हारी और तीसरी उसकी जिसने तीसरी रोटी खाईं। वो
बोला। खुदा की कुसम तीसरी रोटी मैंने ही खाई थी। आपने वो तीनों ईंटें
उसी को दे दी। और फ्रमाया। अब तुम मेरा साथ छोड़ दो। चुनाँचे वो
ईंटें लेकर चला गया। मगर अल्लाह तआला ने उसे ईटों समेत जमीन में
धंसा दिया। ( नुजहृत-उल-मजालिस, सफा 207, जिल्द अव्वल )
सबक :- दुनिया का लालच बार्बादी और हलाकत का मौजिब होता
है। और ये भी मालूम हुआ के पैगृम्बर के सामने झूट बोलना बड़ा खतरनाक
है। इसलिए के पैगुम्बर को सब इल्म होता है। और ये भी मालूम हुआ के जो
बात पैगृम्बर के मुंह से निकले वही बात दूसरा भी कहे। तो जो असर पैगृम्बर
के मुंह से निकले पंर होता है दूसरों के मुंह से वो असर नहीं होता। मालूम हुआ
के पैगम्बर की मिस्ल बनने वाला अंजाम कार तबाह व बर्बाद ही होता है।

हिकायत नम्बर ७70 मोहलिक दुनिया

 

तीन आदमियों को असना सफर में तीन सोने की ईंटें मिलीं। तीन ने खुशी
खुशी एक एक ले ली। फिर एक उनमें से एक करीबी गाँव में खाना लेने के
लिए गया। उसकी नीयत बदली और सोचा खाने में जहर मिला कर ले चलूं
मेरे दोनों साथी खायेंगे। और मर जायेंगे। तो तीनों ईंटें मेरी हो जायेंगी। चुनाँचे
वो जहर आलूद खाना लेकर आया। उधर उन दोनों ने आपस में ये मशवरा
तय कर रखा था के वो खाना लेकर आए तो हम दोनों उसे कत्ल कर दें।
ताके तीनों ईंटें हम दोनों के हिस्से में आयें। चुनाँचे उसके खाना लाते ही ये
दोनों उस पर टूट पड़े और उसे क॒त्ल कर दिया। और फिर फारिंग होकर
उसका लाया हुआ खाना खाया। तो खुद भी दोनों मर गए और ईटें वहाँ की
वहाँ ही धरी रह गई। (नुजुज्त-उल-मजालिस)……ः

सबक:- दुनिया फना का घर है उसकी हर चीज फानी है। दुनिया
का लालच रखने वाला अंजाम कार तबाह हो जाता है और इंसान दुनिया
के लिए हजार मकरो फरैब करता है मगर इंसान मर जाता है। और दुनिया

 

थहीं की यहीं रह जाती है। फिर इस दुनिया के लिए लड़ना मरना किस

.._ हिकायत नम्बर७॥ माले दुनिया
_एक शख्स सोते में हमेशा बिस्तर पर पैशाब कर दिया करता था। उसकी
बीवी ने कहा के ये आपको क्‍या हो गया है? के हर रोज बिस्तर पर पैशाब
कर देते हो, उसने कहा के मैं ख़्वाब में शैतान को देखता हूँ के मुझ को सैर
के लिए ले जाता है और जब मुझ को हाजत होती है किसी जगह बिठा कर
कहता है के पैशाब कर ले मैं पैशाब कर देता हूँ। बीवी ने कहा के शैतान
वो जिन्नात में से है जिनके बड़े तसर्रुूफात दिए गए हैं। उनसे कहना के हम
फिक्रो फाका में रहते हैं हम को कहीं से रुपे दिला दे। उसने कहा, बहुत
अच्छा। अब अगर ख़्वाब में आया तो जुरूर कहूंगा। हस्बे मामूल ख़्वाब में
फिर शैतान आया। उसने कहा। कमबख्त! तू मुझ को हमेशा परेशान करता
है। हम परेशानी में मुबतला हैं। हम को कहीं से रुपया नहीं दिलाता। शैतान
ने कहा, तूने मुझ से पहले क्‍यों नहीं कहा। रुपया चाहिए, गुर्ज एक जगह
ले गया। और वहाँ से बहुत सा रुपया उसे उठवा दिया। और उस रुपया का
इस क॒द्र उसे बोझ महसूस हुआ के बोझ से पाखाना निकल गया, जब आँख
खुली तो बिस्तर पर पाखाना मौजूद है और रुपये का पता भी नहीं। ( माहे
तीबा, जनवरी 54० ) |
सबक्‌:- इस आलम की मिसाल आलम ख़्वाब की सी है। और दुनिया
के तालिब ख़्वाब देखने वाले की तरह हैं। और माल दुनिया की मिसाल
पाखाना की है। उस वक्त हम ख़्वाब गुफ्लत में नहीं जानते के क्या जमा कर
रहे हैं। जब आँख खुलेगी यानी मौत आएगी तो उस वक्त मालूम होगा के
माल तो नदारद और पाखाना यानी गुनाह मौजूद है।

हिकायत नम्बर७» गधा और शाही घोड़े
. एक गरीब आदमी के कमजोर गधे को शाही असतबल # जाने का
इैत्तिफाकु हुआ। क्‍या देखता है के घोड़े खूब मोटे ताजे हैं और कई खिदमत
गुजार उनकी खिदमत में लगे हुए हैं। गधे को अपनी हालत पर रंज हुआ।
और ये तमन्ना करने लगा के ऐ काश! मैं भी उन जैसां होता। इतने में जंग का
बुग्ल बजा। और घोडों के मैदाने जंग में जाना पड़ा। और जब वो वापस हुए
गधे ने देखा के कोई घोड़ा जुख्मी है। कोई लहू लहान है। किसी के जिस्म

 

में तीर पैवस्त है। जिसे निकाला जा रहा है। और कोई क्रीब-उल-मर्ग है। ये
आलम देखकर गथे ने कहा। मेरे खालिक! मैं इसी हाल में खुश हूँ। मैं नहीं
चाहता के मैं इन जैसा हो जाऊँ। ( माह तय्यबा, 54ई० फ्रवरी )

सबक ः- खुदा ने जिस जिस हाल में रखा है, वही अच्छा है। और जो
बडे हैं, उनकी आजमाईश भी बड़ी है।

 

हिकायत नम्बर 940 शेर की खाल में गधा

 

किसी शख्स का गधा जख्मी और नाकारा हो गया। उसने उसको जंगल
में आवारा छोड़ दिया। परिंद और मक्खियाँ उसकी रही सही खाल को नोचती
थीं। और उसके जख्म और शदीद होते गए। किसी राहगीर को उस पर रहम
आया। और वो उसे घर ले आया। उसके पास शेर की एक खाल थी। उसने
वो खाल उस गधे के जिस्म पर डाल दी। और खाल का चेहरे वाला हिस्सा
गधे के मुंह पर चढ़ा दिया। अब गधा बे फिक्री से जंगल में चरने लगा। परिंदे,
दरिंदे सब उसे शेर समझ कर उससे डरने लगे। कोई नजदीक ना आता था।
अब क्या था। बे फिक्री का चरना और जंगल की बादशाही। गधे के जख्म
भी अच्छे हो गए। और खूब मोटा ताजा हो गया। गधे की खुरमस्ती मश्हूर है
जो बन में आके खुरमस्ती ने जो जोर किया। तो लगा चारों तरफ ढेंचूं ढेंचू
लगाने। इस आवाज को सुनकर जंगल के तमाम जानवरों में मशहूर हो गया
के ये कोई मसख्रा गधा है। जो शेर की खाल जैबतन करके आज तक हमें
धोका देता रहा। और आखिर सब ने जमा होकर गधे का नकाब असदी उतारा
ओर आपकी असल शक्ल देखकर आपको अपने ठिकाने पहुँचा दिया। ( माह
तथ्यबा, अप्रैल, 5ई० )

सबक्‌:- आज कल बहुत से दुश्मनाने दीन भी मुसलमानों का बहरूप
इजख़्तियार करके असली मुसलमान बन बन कर फिर रहे हैं। और असल में
वो कुछ और ही हैं। मुसलमानों को ऐसे बहरूपों से होशियार रहना चाहिए।
इस किस्म का कोई बहरूपिया अगर हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व
सल्लम के इल्मो इख़्तियार। औलिया इक्राम की अजमत व बकार या सहाबा
इक्राम के फज्लो शरफ या इमामाने दीन की बुजूर्गी व इमामत के खिलाफ
ढेंचूं ढेंचूं करने लगे। तो समझ जाइये के ये शेर की खाल में गधा है।

हिकायत नम्बर?) हलवा
एक इसाई और एक यहूदी और एक मुसलमान तीनों कहीं जा रहे

थे। चूंके रमजान शरीफ का महीना था। इसलिए मुसलमान का रोजा था!
चलते चलते सूरज गृरूब होने को आया। तो रात गुजारने के लिए ये तीनों
एक गाँव में पहुँचे, और एक मस्जिद में चले गए मस्जिद के एक पड़ोसी
ने तीनों को मुसलमान और रोजादार समझकर बहुत सा हलवा पकायो।
और एक बर्तन में डाल कर ले आया। और कहा लो भाईयो! रोजा इफ्तार
कर लो। हलवा देखकर इसाई और यहूदी ने आपस में मशवरा किया
के हमरा ये मुसलमान साथी रोजे से था। अगर हलवा इस वक्‍त खाया।
तो ये बहुत सा हलवा खा जाएगा। कोई ऐसी तरकीब करें के हलवा
इस वक्त तो महफूज रख दें। और सुबह उठ कर खायें। इस मुसलमान
साथी का सुबह रोजा होगा। और हम दोनों मजे से सारा हलवा खा लेंगे।
चुनाँचे दोनों ने इस मुसलमान को बुलाया और कहा के हमारा इरादा है
के हलवा इस वक्‍त संभाल कर रख दें। और सुबह उठ कर त्तीनों अपना
अपना ख़्वाब सुनाऐँगे। रात को जिसने सब से अच्छा ख़्वाब देखा होगा
सारे हलवे का वही मालिक होगा। मकसद ये के ख़्वाबों की उलझन से
उसे उलझाओ। सुबह तो उसका रोजा होगा ही। हलवा बहरहाल हमारे
काम ही आएगा। मुसलमान ने कहा। मुझे मंजर है। इस फैसले के बाद
हलवे को संभाल कर एक कोने में रख दिया गया। और तीनों सो गए।
सहरी का वक्त हुआ तो मुसलमान हस्बे मामूल उठा और देखा के उसके
दोनों साथी गहरी नींद सो रहे हैं उसने हलवे का बर्तन उठाया और सारा
हलवा खा गया। और रोजे की नीयत करके फिर सो गया। सुबह इसाई व
यहूदी जागे तो हलवा की फिक्र मे एक जगह बैठकर मुसलमान के सामने
अपना अपना ख्वाब बयान करने लगे। ये ख़्बाब महज हलवे की लालच
में उन्होंने घड़ लिए थे। यहूदी बोला, क्या पूछते हो भाई! रात को मेरे
पैगम्बर हजरत मूसा अलेहिस्सलाम ख़बाब में तशरीफ लाए थे, उन्होंने
मुझ से फरमाया के उठ चल मेरे साथ कोहे तूर पर, चुनाँचे मैं अपने
पैगम्बर के साथ कोहे तूर पर चला गया। और कोहे तूर की खू सैर की।
इससे बेहतर ख़ाब भला और कया होगा। लिहाजा हलवा मैं खाऊँगा।
इसाई बोला। सुनो! मियाँ रात को मेरे पैगम्बर हजरत ईसा अलेहिस्सलाम
भी मेरे पास तशरीफ लाए थे, और आपने मुझ से फ्रमाया। उठ मेरे
उम्मती! चल मेरे साथ आसमान पर जहाँ मैं रहता हूँ। चुनाँचे में अपने
पैगम्बर के साथ आसमान पर चला गया। कोहे तूर तो आखिर जुमीन पर
ही है ना। मैं तो आसमान से होकर आया हूँ। लिहाजा हलवा मैं खाऊँगा।

अब मुसलमान का नम्बर आया। तो वो बोला भईं सहरी का वक्त हुआ।
तो मेरे पैगुम्बर हुज॒र मोहम्मद सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम भी
मेरे पास तशरीफ लाए थे। और आपने तशरीफ लाते ही मुझ से फरमाया के
उठ! ऐ मेरे उम्मती ! सुबह को तुझे रोज़ा रखना है। उठ कर सहरी खा, हलवा
मौजूद है। यही खा लो। चुनाँचे मैं उठा। और हुक्म पैगृम्बरी की तामील में
मुझे हलवा खाना पड़ा। और मैंने वो सारा हलवा खा लिया! इसाई व यहूदी
ये ख़्वाब सुनकर हैरान रह गए। और बोले। तो क्या सच मुच तुम हलवा खा
गए उसने कहा तो क्या करता पैगृम्बर का हुक्म ना मानकर काफिर होता। वो
बोले। तो यार हमें भी बुला लेते। मुसलमान ने कहा मैंने तो बहुत आवाजें दी
थीं। मगर तुम में से एक कोहे तूर पर था। एक आसमान पर। सुनता ही कोई
ना था। नाचारा के लिए ही खाना पड़ा। ( मसनवी शरीफ )
सबक्‌ः- बद मजहब अपनी मतलब बरारी और मुसलमानों का
ईमान छीनने के लिए बड़े बड़े हीले बहाने और खुद साख्ता दलायल
कायम करते हैं। मगर दाना मुसलमान उनके किसी दाव में नहीं आते।
और अपने ईमान व मसलक पर मजबूती से कायम रहते हैं। वो मुसलमान
अगर इस इसाई व यहूदी के फ्रैब में आ जाता तो हलवे से महरूम रह
जाता। और सुबह भूक से परेशान होता। यूंही जो मुसलमान किसी बद
मजहब के दाव में आ गया समझो के वो ईमान से महरूम हो गया। और
कयामत के रोज वो परेशान होगा।

हिकायत नम्बर 940 रुपों की थेली

 

एक जगह चन्द चोर बेठे हुए थे। उनके पास से एक सुनार गुजरा।
जिसके पास एक रुपों की भरी थेली थी। चोरों मे से एक चोर बोला।
लो देखों मैं ये थेली उड़ा कर लाता हूँ। ये कह कर वो इस सुनार के
पीछे हो लिया। यहाँ तक के सुनार अपने घर पहुँचा। तो ये चोर भी साथ
ही मकान तक पहुँच गया। सुनार ने थेली को चबूतरे पर रखकर अपनी
लॉडी से कहा। के मुझे पैशाब की हाजत है। पानी लेकर ऊपर बालाखाने
पर आ जाओ। ये कह कर सुनार ऊपर चला गया। और लोंडी भी पानी
लेकर ऊपर चली गई। इतने में चोर मकान के अंदर घुस कर थेली उठा
लाया। और अपने साथियों में आकर सारा किस्सा बयान क्रिया। उन्होंने
सुनकर कहा के तूने अच्छा ना किया। उस ग्रीब लोंडी की शामत आ
जाएगी। और सुनार यही समझेगा के थेली उसने उठाई है ये अच्छी बात

कद कहा के फिर तुम क्‍या चाहते हो / वो बोले के लोंडी मार
पीठ से बच जाए। और थेली भी हमें मिल जाए। उसने कहा लो ऐसा
ही होगा। चुनाँचे ये चोर उठा और सुनार के मकान पर पहुँच गया।
इसने देखा के सुनार वाकई लोंडी को मार रहा था। चोर ने दरवाजा
छट्खठाया तो सुनार बोला कौन है? चोर ने कहा के आपके पड़ोसी
क्‍ का नौकर हूँ, सुनार ने बाहर आकर पूछा, क्‍या कहते हो,
तो चोर बोला के मेरी आका ने सलाम कहा है और कहा है के आपका
हर्फिजा खराब हो गया है, आप थेली दुकान में फैंक आए हैं। और चल
दिए हैं। अगर हम उसे ना देख लेते तो कोई दूसरा उठा कर ले जाता।
और थेली सामने करके दिखाते हुए बोला। यही है ना, उसने कहा। हाँ
वलल्‍लाह यही है। सुनार ने थेली को ले लिया। तो चोर बोला। ये मुझे दे
दीजिए। और घर में जाकर एक रूकूओ पर लिख लाईये के आपके नौकर
मे थेली वसूल पा ली। ताके मैं अपनी जिम्मेदारी से बरी हो जाऊँ और
आपका माल आपको मिल जाए। तो उसने वो थेली उसे वापस की। और
खुद रूकूआ लिखने अंदर गया तो चोर थेली लेकर वापस आ गया।
(किताब-उल-अजकिया, सफा 35)
सबक :- ये दुनिया एक फ्रैब है, और फ्रैब ही से हाथ आती है
और इस दुनिया में बड़े बड़े फ्रैबी और मक्कार भी बस्ते हैं। इसलिए बड़ा
शेशियार रहना चाहिए।

हिकायत नम्बर 940 उक्दत-उल-ममसूख

 

‘काजी अबुबक्र बिन अरबी हजरत इमाम गृजाली अलेह अर्रहमत से
श्म हासिल करके अपने वतन को वापस जा रहे थे। और एक कश्ती
‘र बैठे हुए दरया उबूर कर रहे थे। अचानक दरया की मौजों में तूफान
पा पैदा हुआ। और कश्ती डगमगाने लगी। काजी अबु बक्र ने दरया को
पघातिब किया। खबरदार! ऐ दरया! तुझ पर से तेरी ही मिसल एक दरया
गे रहा है। ( काजी साहब ने अपने इल्म पर फख्र करके अपने आपको
कहा ) इतने में अजीब शक्ल का एक जानवर दरवा से जाहिर हुआ

भौर कश्ती रोक कर खड़ा हो गया। और पूछने लगा। के अगर तुम इतने
५ बड़े आलिम हो, तो बताओ जिंस औरत के शौहर पर अजाब मस्ख्‌
‘जिल हो, और वो ममसूख हो जाएं तो वो औरत कितने दिन इच्दत
रे? काजी अबु बक्र ला जवाब हो गए। और वहीं से फिर वापस हो

गए। ताके हजरत इमाम गृजाली से ये मसला पूछ के आयें। चुनाँचे इमाम
गूजाली के पास फिर पहँँचे। और यही मसला पूछा तो इमाम गृजाली ने
जवाब दिया, के अगर वो शख्स ममसूख होकर किसी हैवान की शक्ल
में चला गया है, तो औरत पर तलाक की इद्दत लाजिम होगी। इसलिए के
उस शख्स की रूह बाकी है और अगर वो ममसूख्‌ होकर पत्थर बन गया
है तो औरत पर वफात की इद्दत लाजिम है इसलिए के रूह भी बदन से
जुदा हो गई। ये जवाब मालूम करके काजी साहब फिर वापस हुए। और
इसी दरया से गुजरे। तो वही जानवर फिर मिलला। और काजी साहब ने
उसे सुनाया। तो उसने कहा। जनाब! दरया अगर है तो गृजाली है। आप
नहीं। ( नुजुहत-उल-मजालिस, सफा 22, जिल्द 2)
सबक्‌:- इल्म बड़ी नओमत है और गृरूर बहुत बुरा है। और ये भी
मालूम हुआ के मसायल दीन का खुद ब खुद समझ लेना बड़ा मुश्किल है।

किसी आलिम और जानने वाले से पूछना चाहिए। क्‍
हिकायत नम्बर७७ हारून अलरशीद और उसकी लोंडी

शायर अबु निवास ने हारून अलरशीद की शान में एक नज़्म लिखी।
जिसे सुनाने के लिए वो हारून रशीद के दरबार में गया। इत्तिफाकुन उस रोज
हारून रशीद अपनी एक लोंडी के पास बैठा था जिसका नाम खालिसा था।
और एक बहुत बड़ा कीमती हार उस लोंडी के गले में पड़ा हुआ था। जिसे
देखकर हारून रशीद खुश हो रहा था। अबु निवास नज़्म सुनाकर कुछ ईनाम
हासिल कने के लालच में आया था। मगर हारून रशीद लोंडी और उसके
गले के हार की तरफ ऐसा मुतबज्जह हुआ। के अबु निवास उसकी तरफ्‌
उसने तवज्जह ही ना की। अबु निवास बद दिल होकर दरबार से निकल
आया। और दरवाजे से निकलते हुए दरवाजे पर ये शैर लिख आया। के….
लकंद जाआ . शिअरी अला बाबिकुम ‘
कमा जाआ इउक़्दुनु अला खालिसती
“यानी मेरे शैर तुम्हारे दरवाजे पर इस तरह जाए हो गए, जिस तरह एक
कीमती हार खालिसा के गले में जाए हो गया ” क्‍
हारून अलरशीद को जब पता चला के अबु निवास जाते हुए दरवाजे
पर ये शैर लिख गया है। तो गस्से में आकर उसे बुलाया। अबु निवास जब
लाया गया तो दरवाजे से गुजरते हुए उसने शैर के दोनों मिसरओ में लफ्ज
“जाअ” के “औन” के दायरे को मिटा दिया। अब “औन” की शक्ल ने

हम्जा ” की यानी हम्जा की शक्ल इख़्तियार कर ली। और शैर यूं बन गया
क… लक॒दज़ाआ शिअरी अला बाबिकुम
कमरा जाआ इकब्न अला खालिसती

और मानी उसका ये बन गया के मेरे शैर तुम्हारे दरवाजे पर इस तरह
गैशन हो गए जिस तरह एक कीमती हार खालिसा के गले में रोशन हो गया।

अरबी से मस रखने वाले हजूरात इस पुर लुत्फ तगृय्युर व तबहुल
पे महफूज हो सकते हैं। “जाअ ” जब अन से हो तो मानी “जाए हुआ”
होते हैं। और जब “जाअ ” हम्जे से हो तो मानी ज॒अ यानी रोशन के होते
हैं। यानी “रोशन हुआ ” तो अबु निवास ने ये कमाल किया के दरबार
में दाखिल हाते हुए “औन” से “हम्जा” बन जाए। और मानी कुछ और
हो जाए। चुनाँचे हारून अलरशीद ने जब बाजु पुर्स की। तो अबु निवास
ने कहा। जनाब मैंने तो तारीफी शैर लिखा है आप खुद मुलाहेजा फ्रमा
सकते हैं। चुनाँचे हारून अलरशीद ने खुद वो शैर देखा। तो खुश होकर
उसे ईनाम दिया। और अबु निवास बजाए सजा के अता लेकर आया।
(नफहत-उल-यमीन )

सबके:- अरबी जुबान बड़ी जामओ मानओ और प्यारी जबान है। और
देना आदमी अपनी दानिशमंदी बड़ी बड़ी मुश्किलता को दूर कर लेता है।

 

हिकायत नम्बर 940 बनान तुफली…

 

अरब का मश्हूर जरीफ बनान तुफेली जो इन्तिहा दर्ज का शिकम परवर
१ एक दफा वो किसी अमीर की दावत पर उसके हाँ गया। तो अमीर ने उसे
पास बिठा लिया। गुलाम ने खुश्क हलवे के टुकड़ों का ख़्वान सामने
‘वा। अमीर ने एक टुकड़ा उठाकर बनान को दिया।
श पे ने कहा अन्ना इलाहाकुम लवाहिदुन तहकीक तुम्हारा खुदा
अपीर ने फिर दो टुकड़े दिए। तो बनान ने ये आयत पढ़ी अरसलना
‘मिहिमिसनैनी हमने उनकी तरफ दो पैगृम्बर भेजे।
अमीर ने फिर तीन टुकड़े दिए। तो बनान ने ये आयत पढ़ी। फअज़्जजना
पैसालिसिन फिर हम ने तीन से इज्जत बढ़ाई।
जब ने फिर चार टुकड़े दिए। तो बनान ने ये आयत पढ़ी। फरबुज
अत ग्रिनत्तैरी चार परिंदे ले लो।

“अमीर ने पाँच दिए तो वो बोला व यकलूना खुमसहुन वो कहते हैं
के पाँच हैं।
फिर उसने छः: दिए तो: ये आयत पढ़ी खलाकृास्समावाती वल अरजा
फी पित्ताती ड्र्यामिन खुदा ने जमीन व आसमान को छ: दिनों में पैदा
किया।” -.:
फिर उसने सात दिए तो उसने पढ़ा व बनीना फोक्ाकुम सबअन
शिदादन हमने तुम पर सात आसमान बना दिए। |
उसने आठ दिए। तो उसने कहा अन ताजुरेनी समानिया हिजज तुम
आठ बरस मेरी मुलाजुमत करो। |
फिर उसने नो दिए। तो उसने ये आयत पढ़ी व काना फिलमदीनती
तिसअत्‌ रहातिन मदीना में नो गिरोह थे।
उसने दस दिए। तो उसने पढ़ा। तिल्‍्का अशग्गरात्रिन कामिलतिन ये है
दस की पूरी तादाद। ह
उसने ग्यारह दिए। तो उसने कहा: ज्न्ना इद्वतश्शुहूरी इंदल्लाही इसना
अशरा शहरन खुदा के नजदीक महीनों की तादाद बारह है।
इस पर अमीर ने तंग आकर तबाक्‌ उठाया। और बनान के आगे रख
दिया। तो बनान ने झट ये आयत पढ़ी व अरसलना इला [िआती अलफिन
ओ यजीदूनाहमने उसे एक लाख या उसकी ज़्यादा की तरफ भेजा। ( लोअ.
लोअ अश्शरअ, सफा 48)
सबके :- बद मजहब अफ्राद भी अपने खयालात फासिद व अकायद
बातिला को ताईंद में बनान तुफैली की तरह क्रआने पाक की आयात पढ़ने
लगते हैं। और अहले हक्‌ खूब जानते हैं के उन लोगों का करआने पाक पढ़
पढ़ कर सुनाना बिलकुल इसी तरह है जिस तरह बनान तुफली पढ़ता था।

हिकायत नम्बर 940 युजिल्ला बिही कसीरन

 

एक गिरोह किसी दावत पर गया।साहबे खाना ने बहुत बड़े तबाक में
चावल भर कर दरमियान में गढ़ा करके उसमें घी डाला। और वो तबाक्‌ इस
गिरोह के सामने रख दिया। उनमें से एक शख्स ने लुक्मा उठाकर घी पर डाल
दिया। और कहा फकुबकिबू फीहा हुम बल ग्राइऊन तो उसमें ओंथे मुंह
मिराये जाएँगे वो और गुमराह लोग और घी को अपनी तरफ खींच लिया।

दूसरे ने कहा ड्रजाा उलक फीहा समीऊ लहा पशिहीकन वहिया
तफू रू जब वो इस जहब्ुम में फैंके जायेंगे। तो उसके चीखने की

आवाज सुनेंगे। और वो जोश मारती होगी” और उसने घी को अपनी
तरफ खींच लिया।

तीसरे ने कहा आखारक़्ताहिया लितुगरिका अहलाहा क्‍या तूने
कश्ती को इसलिए तोड़ा के बैठने वालों को गर्क कर दै” और घी को अपनी
तरफ खींच लिया। ढ

चौथे ने कहा इन्ना नतुकुलमाआ इलल अरज़िल जोजी हम पानी को
सूखी जमीन की तरफ ले जाते हैं” और धी को अपनी तरफ्‌ खींच लिया।

पाँचवें ने कहा फीहिमा ड्रनानी तजारियान इन दो बागों में दो चश्मे
जारी होंग” और घी को अपनी तरफ खींच लिया।

छठे ने कहा फीहिमा डनानी नज़्जाखतानी इन दो बागों में दो चश्मे
जोश मारते होंगे” और घी को अपनी तरफ खींच लिया।

सातवें ने कहा फअलत्रकुल मआ अला अगरिन कृदक॒दीरू फिर
आसमान व जुमीन का पानी इस काम के लिए जो मुकदर हो चुका था।
आपस में मिल गया। और घी को अपनी तरफ खींच लिया।

आठवें ने कहा फसुकनाहू इला बलादिन मीतिन हम ने पानी को
ऐसे शहर में पहुँचाया। जिसकी जूमीन मुर्दा थी” और घी को अपनी तरफ
खींच लिया।

नवें ने कहा व कीला या अरजब लाई मआका व या समाऊकलई्ईड।/और
हुक्म दिया गया के ऐ जमीन अपने पानी को पी जा। और ऐ आसमान उठा ले ”।
और उसने तमाम घी सारे चावलों में मिला दिया। ( किताब-उल-अज॒किया
प्फा क लाइमाम बिन जोजी रहमत-उल्लाह अलेह )

सबके्‌:- इस हिकायत से मालूम हुआ के हर्स व आज के बन्दे और
शिकम परस्त अफ्राद पहले भी थे। और अब भी हैं। जो करआने पाक की
आयात को ख़्वाह म ख़्वाह अपने ऊपर चसपाँ कर लेते हैं। और अपने
बयालात फासिदा अकायद बात्तिला को करआने पाक से खींचा तानी के
पाथ साबित करना चाहते हैं। चुनाँचे आज भी जो नया फिर्का पैदा होता है।
त्रो अपनी ताईद में कुरआन पढ़ने लगता है। यही वजह है के क्रआने पाक
है ने खुद एलान फर दिया है के व युज़िल्लुन बिही कसीरन यानी बहुत
पे लोग क्रआन पढ़कर भी गुमराह हो जाते हैं।

हिकायत नम्बर&0 मुर्गी की तक्सीम
इब्नाहीम अलखरामी कहते हैं के एक दीहाती सहराई अरब के

बाशिन्दों में से एक शहरी के यहाँ आया। उसने उसको अपने यहाँ बतौर
मेहमान ठहराया उसके पास बहुत सी मुर्गियाँ थीं। और उसके घर वालों
में एक बीवी, और उसके दो बेटे , और दो बेटियाँ थीं। ये शहरी मेजबान
बयान करता है के मैंने अपनी बीवी से केहा के आज नाएता के लिए मुर्गी
भून कर ले आना। जब नाश्ता तेयार होकर आ गया। तो में और मेरी बीवी
और दोनों बेटे और दोनों बेटियाँ और वो अराबी सब एक दसंतरख्वान
पर बैठ गए। हम ने भुनी हुई मुर्गी उसके सामने कर दी। और कहा आप
हमारे दरमियान इस तकूसीम कर दें। हमने उससे हंसने और मजाक के
लिए ऐसा किया था। उसने कहा के तक्सीम करने का काईं अहसन
तरीक तो मैं नहीं जानता। लेकिन अगर तुम मेरी तकसीम पर राजी हो
तो मैं सब पर तकूसीम करने को तैयार हूँ। हमने कहा हम सब राजी हैं।
अब उसने मुर्गी का सर पकड़कर काटा। और वो मुझे दिया। और कहा
रास (यानी सर ) रईस के लिए। फिर देनों बाज काटे और कहा दोनों
बाज दोनों बेटों के लिए। और फिर दोनों पिंडलियाँ काटीं और कहा
पिंडलियाँ दोनों बेटियों की। और फिर पीछे से दुम का हिस्सा काटा
और बोला अज्ज्‌ ( यानी चूतड़ वाला हिस्सा ) अजूज्‌ ( यानी बुढ़िया ) के
लिए। और वो मेरी बीवी को दे दिया। फिर कहा करोर ( यानी धड़ का
पूरा हिस्सा ) दायर ( यानी मेहमान ) के लिए और पूरी मुर्गी अपने आगे
रख ली। जब दूसरा दिम आया। तो मैंने कहा के आज पाँच मुर्गियाँ भून
कर लाना। फिर जब नाश्ता आया तो हम ने कहा तकसीम कीजिए। तो
कहने लगा के मेरा खयाल ये है के आप साहिबान को मेरी कल वाली
तकसीम ना गवार गुजूरी है। हम ने कहा नहीं ऐसा नहीं है आप तक्सीम
कीजिए। कहने लगा। तो में जुफ़्त का हिसाब रखूंगा या ताक्‌ का? हम ने
कहा। ताक का। तो कहा बेहतर! तो यूं होगा के तू और तेरी बीवी और
एक मुर्गी। पूरे तीन हो गए। ये कहकर एक मुगी हमारी तरफ फैंक दी!
फिर कहा और तेरे बेटे और एक मुर्गी पूरे तीन हो गए। ये कहकर दूसरी
मुर्गी उनकी तरफ फैंक दी फिर कहा और त्तेरी दो बेटियाँ और एक मुर्गी
पूरे तीन हो गए। ये कहकर तीसरी मुर्गी उनकी तरफ फैंक दी फिर कहा
मैं और दो मुर्गियाँ पूरे तीन हो गए और खुद दो मुर्गियाँ लेकर बैठ गया।

फिर हमें ये देखकर के हम उसकी दो मुर्गियों को देख रहे हैं। बोला के
तुम लोग क्या देख रहे हो, शायद तुम्हें मेरी ताक्‌ु बाली तकसीम पसंद नहीं
आई वो तो इसी तरह सही आ सकती है। हम ने कहा अच्छा तो जुफ्त के

हिसाब से तक्सीम कीजिए ये सुनकर फिर सब मुर्मियों को इकटड्ा करके
अपने सामने रख लिया। और बोला तो और दो तेरे बेटे और एक मुर्गी। चार
हो गए। ये कहकर एक मुर्गी मेरी तरफ फैंक़ दी। और तुम्हारी बीवी और दो
तुम्हारी बेटियाँ और एक मुर्गी चार हो गए। ये कहकर एक मुर्गी उनकी तरफ
फंक दी। और मैं और तीन मुर्गियाँ चार हो गए। ये कहकर तीन मुर्गियाँ अपने
आगे रख लीं। फिर अएना मुंह आसमान की तरफ उठाकर कहा। ऐ अल्लाह!
तेरा बड़ा अहसान है। तूने ही मुझे इस तकसीम को समझ अता फ्रमाई है।
(किताब-उल-अजूकिया, सफा ॥72) |

सबके :- बाजू अवकात हंसी मजाक का उल्टा अपने ऊपर ही वाके

हो जाता है।

 

हिकायत नम्बर 940 चार जुहीन भाई

 

नजार बिन मअद एक बड़ा रईस आदमी था। उसके चार बेटे थे न्‍
जिनके नाम मजुर, रबिआ, अयाद और अनमार थे। नजार बिन मअद जब
मरने लगा तो अपना माल चारों बेटों में तकसीम करने के लिए उसने
चारों को बुलाया। और कहा, बेटो! देखो फलाँ चीज मजर की है। फलाँ
रबिआ की, फलाँ अयाद की और फलाँ अनमार की। और अगर माल
की तकसीम में कुछ मुश्किल पेश आए तो अफई जरहमी शाह नजरान
के पास चले जाना। चुनाँचे नजार बिन मअद के मरने के बाद तकसीम
में मुश्किल देखकर ये चारों भाई शाह नजरान के पास पहुँचने के लिए
नेजरान रवाना हुए। चलते हुए रास्ते में उन्होंने एक चरा हुआ खेत देखा।
मेजर ने कहा। के जिस ऊँट ने ये खेत खाया है वो काना है रबिआ ने
कहा। वो लंगड़ा भी है। अयाद ने कहा। और वो सुस्त भी है। अनमार ने
कहा। और उसके दांत भी कमजोर हैं। इतने में ऊँट वाला अपने ऊँट की
तलाश में आ निकला। और उनसे ऊँट का पता दरयाफ्त किया। मजर

कहा। तुम्हारा ऊँट काना है। वो बोला हाँ। अयाद ने कहा। और वो
सुस्त रफ़्तार भी है। उसने कहा। हाँ! अनमार ने कहा। और उसके दांत
भी कमजोर हैं। उसने कहा। हाँ! रबिया ने कहा। लंगड़ा भी है। वो बोला
हो, फिर चारों ने कहा। लेकिन भाई खुदा की कसम हमने तुम्हारा ऊँट
देखा नहीं है। वो हैरान होकर बोला, के निशानियाँ तो तुम ने सारी और
भुकम्भल बता दी हैं। फिर मैं ये कैसे मान लूं। के मेरा ऊँट तुम ने नहीं
देखा। चारों बोले भई | वाकेया यही है के ऊँट हम ने देखा बिलकुल नहीं।

ऊँट का मालिक उनके साथ ही नजरान पहुँच गया। और शाह नजरान से
इन चारों भाईयों की शिकायत कर दी के चारों ने मेरे ऊँट की पूरी पूरी
निशानियाँ तो बता दी हैं मगर ऊँट देखने का इंकार कर रहे हैं, बादशाह
ने उन से बिन देखे ऊँट की निशानियाँ बता देने की वजह पूछी तो मजर
बोला। जनाब खेत को मैंने एक सिम्त से खाया हुआ देखा और दूसरी
जानिब को सालिम पाया तो समझ गया के ऊँट यक चश्म है। रबिया ने
कहा और मैंने जमीन पर पैर का एक निशान दूसरे पैरों के निशानों से
बहुत हल्का पाया तो जान गया के ऊँट एक पैर से लंगड़ा है। अयाद ने
कहा और मैंने उसकी मेंगनियों को बहुत थोड़े थोड़े फासले पर मजतमअ
पाया, इससे मैंने अंदाजा लगाया के ऊँट सुस्त रफ्तार है। अगर तेज रफ्तार
होता तो मेंगनियाँ दूर दूर और मुनतशिर पड़ी होतीं। अनमार कहा, और
मैंने खेत का नर्म नर्म हिस्सा खाया हुआ और सख्त हिस्सा छोड़ा हुआ
देखा तो समझ गया के ऊँट के दांत कमजोर हैं।

बादशाह ने उनकी ये गुफ्तगू सुनी तो ऊँट वाले से कहा। के मियाँ तुम्हारा
ऊँट वाकई उन्होंने नहीं देखा। जाओ उसे कहीं तलाश करो।

उसके बाद बादशाह ने उन चारों को मेहमान खाने में भेजा। ताके
कुछ खा पी लें। चारों एक कमरे में पहँचे। और खा पी कर मजूर ने कहा।
के ये शराब जो हम ने पी है। किसी कब्रिस्तान के दरंख़्तों से कशीदा है।
रबिआ ने कहा। और ये जो गोश्त हम ने खाया है किसी कुतिया के दूध
से पले हुए बकरे का है। अयाद ने कहा और ये जो रोटियाँ हम ने खाई
हैं उनका आटा किसी हैज वाली औरत ने गुंधा है। अनमार ने कहा और
हम आज जिसके मेहमान हैं वो अपने बाप का नहीं। ( यानी बादशाह
हरामी है ) उनकी सारी ये गुफ्तगू जासूस ने बादशाह से कह दी। बादशाह
ने फौरन शराब कशीद करने वाले को बुलाकर दरयाफ्त किया के शराब
कहाँ की थी? तो बादशाह के तेवर देखकर उसने सच सच कह दिया के
हुज॒र आपके बाप की कब्र पर लगे हुए फलदार दरख़्तों से कशीद की गई
थी। बादशाह ने फिर कसाब को बुलाया। और पूछा के गोश्त किस चीज
का था। कसाब ने भी सच सच कह दिया के ये गोश्त कुतिया के दूध
से पले हुए एक मोटे ताजे बकरे का था। बादशाह फिर घर पहुँचा। और
आटा गूंधने वाली के मुतअल्लिक्‌ ततकीक की तो वाकुईं वो हायजा थी।
इन तीनों बातों की सहत मालूम करने के बाद बादशाह हैरान होकर दिल
ही दिल में कहने लगा के अब तो चौथी बात भी दुरूस्त ही निकलेगी।

में अपनी माँ के पास पहुँचा। और तलवार लेकर उसकी छाती पर
बैँठ गया। और कहने लगा, सच सच बता। मैं हलाली हूँ या हरामी? माँ
ने कहा, बेटा खुद ही अंदाजा कर लो। हलाली होते तो माँ की छाती पर
सवार होते? बाकेया ये है के मरहूम बादशाह से मेरा कोई बच्चा ना
थ। मैं डर गई के इस तरह हकूमत दूसरों के पास ना चली जाए इसलिए
मैने जिना से तुझे हासिल किया। और मश्हूर तुझे बादशाह का बेटा कर
दिया। ये हकीकत सुनकर बादशाह इन्तिहाई कर्ब व मलाल से वापस
आया। और चारों भाईयों से कहने लगा के तुम्हारी सारी गुफ्तगू मैंने सुनी
और तहकीक्‌ के बाद तसदीक्‌ भी कर ली। मगर ये तो बताते जाओ। के
तुप ने इन बातों का अंदाजा कैसे लगा लिया। मजर ने कहा के जनाब
शराब पीने से सुरवर व इनबिसात और चएती पैदा होती है मगर आपकी
शराब पीकर हज़्न व मलाल और सुस्ती पैदा हुई। इससे मैंने समझ लिया
के ये किसी बागृ से नहीं बल्के कब्रिस्तान से कशीद कर्दा है। रबिया ने
कहा और बकरे के गोश्त पर हमेशा चर्बी ऊपर और बोटी नीचे होती
है बरखिलाफ कुत्ते के गोश्त के के बोटी ऊपर और चर्बी नीचे होती है!
और हम ने जो गोश्त खाया वो दूसरी किस्म का था। ये तो ना मुमकिन था
के आपके हाँ कत्ते का गोश्त बिकता। इसलिए मैंने ये अंदाजा लगाया के
ये बकरा किसी कुतिया के दूध से पला हुआ होगा। अयाद ने कहा और
हायजा औरत के गूंथे हुए आटे की रोटी सालन में डालने से बिखर जाती
है। और उसके रेजे अलग अलग हो जाते हैं। चुनाँचे हम ने जो रोटियाँ
बाई उनका भी यही हाल था, इसलिए मेरा अंदाजा ये था के ये आटा
हायजा औरत ने गूंधा है। अनमार ने कहा। और जनाब के मरहूम
पादेशाह बड़े मेहमान नवाज और हमेशा मेहमानों के साथ बैठकर खाना
जाया करते थे। और इज्जत व शराफत भी उसमें है। मगर आपने तनहा
‘एक कमरे में भेज दिया। इससे मैंने अंदाजा कर लिया के आप अपने
गेष के नहीं। वरना आप भी हमारे साथ बैठकर खाना खाते। 3
बादशाह ने पूछा। तुम यहाँ आए क्‍यों हो? वो बोले, अपना झगड़ा
जैकाने। बादशाह ने कहा तुम्हारा झगड़ा चुकाना मेरे बस की बात नहीं ॥
‘ज्राहे करम वापस जाओ। और मुझ से जो लेना है ल लो। और खुदारा
जल्द ये तहकीक और किसी से ना कहना। ( हयात-उल-हैवान, सफा 26,
अच्बल)

सबक: बअज्‌ लोग ऐसे जूहीन होते हैं क॑ जहाँ दूसरों का जहन नहीं

पहुँचता। वहाँ उनका जहन पहुँच जाता है। और ये आम लोगों की बात है
फिर जो अल्लाह के खास और मकक्‍्बूल बन्दे हैं उनके इल्मो इरफान की शान
क्या होगी। और उनके लिए क्‍यों ना कहा जाए के वो ऐसी ऐसी बातें जान
लेते हैं जिनका हमें कुछ पता नहीं होता।

हिकायत नम्बर७29) करआन से जवाब देने वाली औरत
हजरत अब्दुल्लाह वास्ती फरमाते हैं। मैंने अरफात में एक औरत को
देखा जो तनहा खड़ी कह रही थी मंवहदिल्लाहू फला मुजिल्ललाह
वमंयुज़लिलहू फला हादियला यानी जिसे खुदारा समझा दे उसे कोई
भटका नहीं सकता। और जिस वो राह भला दे। उसे कोई राह समझा नहीं
सकता। मैंने मालूम कर लिया के ये औरत रास्ता भूल गई है। मैंने उसके
करीब जाकर उससे कहा, के ऐ नेक औरत! तू कहाँ से आई है? तो बोली
सुबहानल्लजी असरा बिअब्दीही लेलम्पिन मस्जिदिल हरामी इलल
मस्जिदिल अक्सा मैंने समझ लिया के ये बैत-उल-मुक्‌दस से आई है। मैंने
पूछा, तुम यहाँ क्‍यों आई हो तो बोली। व लिल्लाही अलतन्नासी हिज्जुलबेती
मुझे मालूम हो गया के ये हज के लिए आई है। मैंने पूछा आप का शौहर भी
साथ है या आप अकेली हैं? तो बोली वला तकृफ्‌ मा लेसा लका बिही
इल्मुन इसमें इशारा था के उसका इन्तिकाल हो गया है। मैंने पूछा ऊँट पर
सवार होगी? तो बोली कमा तफअलू मिन खेरिन यअलुमाहुल्‍लाहू चुनाँचे
– मैंने सवारी के लिए ऊँट बिठा दिया और वो सवार होने लगी तो बोली कुल
लिलगोपिनीना यगज़्ज मिन अबसारिहिम मतलब ये के अपनी नजरें
दूसरी तरफ कर लो। चुनांचे मैंने नजर दूसरी तरफ कर ली। और वो सवार हो
गईं। फिर मैंने पूछा, आपका नाम क्‍या है? तो बोली वज॒कुर फिलकिताबी
मरयमा मुझे पता चल गया के उसका नाम मरयम है। मैंने पूछा आपकी
औलाद हे? तो बोली ववस्सा बिहा इब्राहिमा बनीही मैंने समझ लिया के
उसके चन्द बच्चे हैं। मैंने पूछा उनके नाम क्‍या हैं तो बोली वकल्लमल्लाहू
पूसा तकलीगा वत्तंखजललाहू इब्राहीयमा खलीलंन या दाऊदा अन्ना
जअलनाका खलीफतन मतलब ये के उनके नाम मूसा, इब्राहीम, और
दाऊद हें। मैंने पूछा वो तुम्हारे बच्चे कौनसी जगह हैं ताके मैं उनकी तलाश
करूं तो बोली बवअलामातित्रजमी हुम यहतादून मैंने समझ लिया के वो
काफलों के रहबर हैं। फिर मैंने पूछा के क्या कुछ खाओगी, तो बोली ढ्रन्नी
नजरतू लिरहमानी सोमन यानी मैं रोजे से हूँ। चुनाँचे जब हम ढूंडते दूंडते

उप्तके बेटों के पास पहुँचे तो वो अपनी माँ को देखकर रोने लगे। और कहने

लो। ये हमारी माँ आज तीन दिन से हम से अलेहदा होकर रास्ता भूल गई थी।
फिर थोड़ी देर गुजरी तो वो अपने बेटों से कहने लगी फबअसू अहादुकुम
बिवरीकिकुम हाजिही इलल मदीनती यानी उसने मेरे लिए बाजार से कुछ
मंगवाने का हुक्म दिया। थोड़ी देर के बाद उस नेक औररत की हालत खराब
हो गई। और उसका आखरी वक्त आ पहुँचा। मैं उसके क्रीब पहँँचा। और
मिजाज पुर्सी की तो बोली वजाआ सकरतुल मौती बिलहक्की चुनाँचे
उस पाक बाज औरत का इन्तिकाल हो गया। फिर मैंने उसे उसी रात ख्वाब
में देखा, और पूछा तो किस मुकाम में है तो बोली इन्नलमुत्तकीना फी
जन्नातिंव व नहारिन फी मक्अबी सिदकिन इंदा मलीकिस्मुक्तदीरिन
(नुजुहत-उल-मजालिस, सफा 27, जिल्द 2)

सबके:- हर मर्द और औरत को करआने पाक से शगफ और
मोहब्बत लाजिम है अफसोस के आज कल हमें करआने पाक से प्यार ना
रहा। एक जुमाना वो भी था के औरतें भी अपनी हर बात करआने पाक की
आयात से करती थीं। और एक जमाना ये भी है के मर्दों को भी फिल्‍मी गाने
ही याद हैं। ( फयालुल अजब )

हिकायत नम्बर 940 हसीन लोंडी

 

एक निहायत हसीन लोंडी हम्माम खाने से निकली, एक जवान उसे
देखकर फरीफता हो गया। और उसके सामने आकर कहा जुय्यनाहा
लिन्राज़॒रीना यानी हम ने उसे देखने वालों के लिए जीनत दी। उस लोंडी ने
उसके जवाब में ये आयत पढ़ी व हफिजनाहा मिन कुल्ली श़ैतानिररजीस
यानी हम ने हम शैतान मर्दूद से उसकी हिफाजुत की। फिर वो जवान बोला
नुरीदू अन नआकुला मिनहा व ततमाइन्न कुलूबुना यानी हम सिर्फ यही
चाहते हैं के इससे खायें। और हमारे दिल को आराम हो। लोंडी फिर बोली
तनतनालुल बिर्या दत्ता तुनाफिकू मिम्मा तिहिब्बूना यानी हर गिजु ना
पाओगे भलाई को जब तक के खर्च ना करो। उससे जो तुम दौलत रखते
हो, जवान ने यूं जवाब दिया वलल्‍लज़ीना ला यजीदूना निकाहन यानी
जिनको वो चीज ना मिले जिससे निकाह हो सके। ( तो वो लोग क्या करें? )
इस लोंडी ने फौरन जवाब दिया ऊलाईका अनहा मुबअदूना यानी वो
उससे से दूर रहेंगे। बिल आखिर जवान ने हार का और तंग आकर कहा
लभनतनत्रादी वत्लेव्मा तद्य पर अल्लाह की लानत हो। उस लोंडी ने फौरन

जवाब दिया वलिज़्जिक्री मिसलू हज्जिल उनसीयीन यानी ( तुझ ) मर्द
को दो औरतों के हिस्से के बराबर ( लानत ) है। उसके बाद वो जवान मुंह
की खा कर खामोश हो गया। और जलीलो ख़्वार होकर चला गया। ( लोअ
लोअ अशशरअ, सफा 4)

सबक्‌:- करआने पाक का इल्म इज्जत व असमत का मुहाफिज भी
है। और ये भी मालूम हुआ के पहले जुमाने की औरतें भी बड़ी इल्म वाली
और दाना थीं और इल्म अगर है तो क्रआन व हदीस का। दिगर सब हैच।

हिकायत नम्बर 940 तीन लोडियाँ

 

मामूं रशीद को एक मर्तबा एक लोंडी की जुरूरत पेश आई तो उसने
एलान किया। तो उसकी खिदमत में तीन लोंडियाँ हाजिर हुई। और तीनों
सामने खड़ी हो गईं। बादशाह ने देखा तो कहा मुझे तो एक दरकार है। और
तुम तीन हो अच्छा में तुम तीनों से इन्तिखाब कर लेता हूँ। तीनों लोंडियाँ सामने
एक सफ में खड़ी थीं। बादशाह जब इन्तिखाब के लिए उठा तो पहली बोली।
वस्साबिकना अव्वलूना मिनल मुहाज़िना वल अनसारी पहली ने जब ये
आयत पढ़ी तो दूसरी जो दोनों के वस्त में खड़ी थी। बोली। वकाजालिका
जअलनाकुम उम्पावंव वस्तनलिवकूनू श्रौहदाआ अलकन्नासी तीसरी जो
‘सबसे आखिर में खड़ी थी उसने हस्बे जेल आयात पढ़ ली। वललआखिरतू
खैरललका मिनल ऊला। फ
मार्मू रशीद तीनों पर बड़ा खुश हुआ। और तीनों को खरीद लिया। ( लोअ
लोअ अशशरअ, सफा 49)
सबक्‌:- आज कल की ढोलक के गीत गाने वालियों को लाजिम है के
पहले जूमाने की औरतों की तरह करआने पाक की आयात को याद करें।
और उन फिजूल और लचर गानों और गीतों से किनारा करें।

हिकायत नम्बर७2) दो लोंडियाँ
. एक मर्तबा हारून अलरशीद को एक लोंडी की जरूरत पेश आई तो
उसके पास दो लोंडियाँ आईं। एक का रंग काला था। और एक का सफेद।
हारून रशीद ने कहा। मुझे तो एक दरकार है। मैं तुम दोनों में। अपनी खिदमत
के लिए उसे रखूंगा। जो अपने रंग की दूसरी के रंग पर तरजीह साबित कर
दे। चुनाँचे सफेद रंग वाली ने अपने रंग की कुछ खूबियाँ बयान कीं। तो
काली ने कहा हुजर! देखिये उसका सफेद.रंग अगर जुरा सा भी मेरे चेहरे

पर आ जाए तो सब मुझे फलबहरी को मरीजा कहेंगे। और मेरा सियाह रंग
ज़रा सा भी उसके चेहरे पर चला जाए तो उसका हुस्न दोबाला हो जाएगा।
के मेरा रंग तिल बनकर उसके चहरे पर चमकने लगेगा। हारून अलरशीद
उनकी हाजिर दिमागी पर बहुत खुश हुआ। ( लो लो अश्शरअ, सफा 50)

सबकः- पहले जुमाने की औरतें बड़ी दाना थीं। आज-कल की जाहिल
औरतों को उनसे सबक हासिल करना चाहिए।

हिकायत नम्बर 940 जुहीन औरतें

ख़्वाजा मेहमूद जुरदार शीराजी एक रईस शहर और दुनयवी जद्दोजहद
से बे फिक्र थे। एक ईद के दिन उनका आलिशान खैमा नहर के करीब
नसब किया गया जिसमें एक बज़्म तर्ब कायम की गईं। इस बज़्म में ख्वाजा
जुरदार की छः: कनीजें भी थीं। जो अपनी जुहानत व काबलियत के लिहाज
से ख़ाबजा को बे हद अजीज थीं। बज़्म तर्ब खत्म हुईं तो ख़्वाजा जरदारान
कनीजों के लुतायफ व तरायफ से जी बहलाते रहे। यकायक कनीजूुं को
कुछ खयाल हुआ। और उन्होंने अपने आका से पूछा के आज ईद का रोज:
है। आप फैसला कीजिए के हम में से अफ्जूल कौन है।

ख़्वाजा ने कहा के ये फैसला मैं उसी वक्त कर संकता हूँ के तुम में से
हर एक अपनी अपनी फजीलत और दूसरे पर फौकियत साबित करे। शर्त ये
है कै ये मुनाजूरा अकल व नकल दरायत व रिवायत के साथ हो। ये सुनकर
गोरी ने काली को। लागिर ने फर्बा को और जुर्द ने गंदम गूं को अपना अपना
हरीफ बनाकर गुफ्तगू शुरू की। |
सब से पहले गोरी कनीज ने काली को मुखातिब किया, और कहा। ऐ
सियाह रू! जानती है के मैं कौन हूँ? मेरा रंग हर रंग से बेहतर है। मेरी पैशानी
दरझुशाँ और मेरे रूख़्सार ताबाँ हैं। मैं चौधवीं रात का चाँद हूँ। खुदा ने अपने
पैगृम्बर मूसा अलेहिस्सलाम को यदे बेजा अता फ्रमा। आयात रहमत में से
अबयज्जत वुजूहूहुम कहकर गोरे रंग का जिक्र आया है। हदीस शरीफ में
है के सफेद रंग सब रंगों से बेहतर है। हूरों का यही रंग है। तो ऐ हबशन!
जाग पीकर है दाग मंजर है। ख़्वाजा जुरदार ने सियाह फाम कनीज को अपनी
भजप्पत पर चीं ब जबीं देखा। तो गोरी कनीज से कहा। बस बस इसी कद्र

फाफी है। उसके बाद काली कनीजु ने जुबान खाली। और बोली।
सफेद चमड़े पर इत्राने वाली, तू अकूल से खाली है। क्या तूने कुरआन
में नहीं पढ़ा बल्‍लैली डजा यगशा वन्नहारी हजा तजल्ला अगर शब

सियाह मोहत्रम ना हो तो अल्लाह उसकी कुसम ना फ्रमाता। और उसे दिन
पर मुक॒दम ना फ्रमाता। तुझे मालूम नहीं के सियाही जवानी की जीनत है।
बालों में सफेदी आई के बुढ़ापे ने मौत की खूबर सुनाई। देख अगर मेरी एक
सियाही का थब्बा तेरे चहरे पर पड़े तो उस खाल मशकों से तेरे हुस्न में
इजाफा हो जाए। लेकिन तेरी सफेदी का एक जुर्रा मेरे चहरे पर नमूदार हो
तो दुनिया मुझे फलबहरी की मरीजा कहने लगे। सियाही की फजीलत उससे
बढ़कर और क्या होगी। के तमाम उलूम व फिनून की किताबें इसी सियाही
से लिखी जाती हैं। मुशक व अंबर का यही रंग है। अगर सियाही सबसे बेहतर
ना होती तो सानओ मतलकू। आँख की पुतली को ये रंग अता ना फ्रमाता।
ख़्वाजा जरदार ने कहा। बस ऐ आँख की पुतली बस! ह

उसके बाद फर्बा कनीज ने अपने गोल मटोल बाज उठा कर लागिर
इंदाम कनीज को कहा। ऐ दिकृज॒दा। मेरा तेरा क्या मुकाबला? आज तक
दुनिया में किसी ने लाग्री को भी पसंद किया है? हर शख्स फ्रबही का
आरजूमंद है। आदमी तो आदमी कोई दुबले जानबर को भी अच्छा नहीं
समझता। दुबला पन तो खुदा को भी पसंद नहीं इसी लिए दुबले जानवरों को
कर्बानी जायज नहीं। तेरी टांगें जो चिड़िया के मुशाबह हैं। और तेरे हाथ जो
बांस की खपचियों की मानिंद हैं कैसे मरऊब हो सकते हैं?

‘कनीज लागिर को हुक्म हुआ। तो वो बोली। ऐ फर्बा! अपनी फ्रबही
पर ना इत्रा। ऐब को हुनर बनाकर ना दिखा। खुदा का शुक्र है के उसने मुझे
शाखे गुल की तरह नाजुक और मोजे नसीम की मानिंद सिबक्‌ पैदा किया
है तू रेत का थेला है। गोश्त का एक पहाड़ किसी ने मअशूक्‌ की पील तनी
और कोहे पेकरी की तारीफ नहीं की। सिवाये उसके के जिबह करने के लिए
फ्रबही बेहतर होती है। ।

ख़्वाजा जरदार ने ये अलफाज सुनकर कनीजू लागिर को भी अपनी
तक्रीर खत्म करने का हुक्म दिया। और कनीज जर्दफाम की तरफ इशारा
किया! उसने गंदम गूं कनीज की तरफ रूख करके कहा। मैं जर्द हूँ। मगर
हसीनों में फर्द हूँ। सय्यारो में मेहर दरख्शाँ हूँ। निबात की जाफरान हू। गुलों
में गुल सदबर्ग हूँ। सरसासें का सिंगार हूँ। बसंत की बहार हूँ। तू ऐ गंदम गूं!
अजीब-उल-खुलकत है। ना सफेद है ना सियाह, त्तेर रंग खज़्न व मलाल
की अलामत है। तेरे मुतअल्लिक्‌ किसी शायर ने खूब कहा है

हरा करा ग्रफ्ल बोद पेश ‘रोद राह नरम
शोद शीफ्ता हर गिज़ बर्ख गंदम गमूं

चूके आदम दिल य॑ मील स्‌ए गदम कर्द
कर्द अज॒ जन्नत फिर्दास बढ
उसके बाद कनीज गंदम ने जुर्दफाम कनीज को मुखातिब किया। और
कहा, मैं खुदा का शुक्रिया अदा करती हूँ के उसने मुझे बेहतर से बेहतर सूरत
अता फ्रमाई है। मैं ना मोटी ना पतली ना गोरी ना काली हूँ ना छिपकली की
तरह जुर्द। मेरा रंग गंदम गूँ है जो सब से अफ्जल समझा जाता है। मैं मलाहत
व सबाहत का मजमूआ हूँ। शौअरा मेरे सनाख़्याँ और नकादान जमाल मेरे
कृद्रदान हैं। ख़्वाजा जुरदार ने उनकी ये पुर लुत्फ बेहस सुनकर फैसला दिया
के तुम में एक भी दूसरी से कमतर या बेश्तर नहीं। आँख अपनी जगह पर।
बाल अपनी जगह पर। गाल अपनी जगह पर दिलफरैब हैं। एक को एक पर
फजीलत नहीं दे सकते। बस यही मेरी राय है। ( माखूज )
सबके :;- खुदा तआला ने जो कुछ भी और जिस रंग में भी किसी को
पैदा फरमाया है, खूब ही पैद्म फरमाया है। और सब अपनी अपनी जगह पर
भोज व मुनासिब हैं। और ये भी मालूम हुआ के पहले जमाने की औरतें भी
बड़ी दाना और जहीन होती थीं।

 

हिकायत नम्बर 940 औरत का फ्रैब

अबु अलहसन हुसैनी ने बयान किया। जो मिसतरशुद बिल्लाह के
भौज़्ज्न थे। के बअजु चलते फिरते ताजिरों ने जिक्र किया। के हम
मुख्तलिफ शहरों से आकर मिस्र की जामओ उमरो बिन आस में जमा
हो जाते। और बातें किया करते थे एक दिन हम बैठे बातें कर रहे थे के
हमारी नजर एक औरत पर पड़ी। जो हमारे क्रीब एक सतून के नीचे
बैठी थी। एक शख्स ने जो बगृदाद के ताजिरों में से था उस औरत से
कहा, क्या बात है? उसने कहा। मैं एक लावारिस औरत हूँ। मेरा शौहर
पेस बरस से मफकद-उल-खुबर है। मुझे उसका कुछ भी हाल मालूम
गहीं हुआ। मैं काजी साहब के यहाँ पहुँची के मेरा निकाह कर दें। मगर
उन्होंने रोक दिया। और मेरे शौहर ने कोई सामान-नहीं छोड़ा। जिससे
पेसर अवकात कर सकूं। मैं किसी अजनबी शख्स की तलाश में हूँ जो
मेरी इम्दाद के लिए गवाही दे दे और उसके साथ ये भी के वाकई मेरा
शौहर मर गया। या उसने मुझे तलाक दे दी। ताके में निकाह कर सकू
पा बो शख्स ये कह दे के में उसका शौहर हूँ और फिर वो मुझे काजी
.” सामने तलाक दे दे। ताके मैं इद्दत का जमाना किसी तरह गुजार कर

निकाह कर लूं। तो उस शख़्स ने उससे कहा। के तू मुझे एक दीनार दे
दे तो मैं तेरे साथ काजी के पास जाकर कह दूंगा के मैं तेरा शौहर हूँ
और तुझे तलाक्‌ दूंगा। ये सुनकर वो औरत रोने लगी और उसने कहा,
खुदा की कसम उससे ज़्यादा मेरे पास नहीं है। और उसने चार रूबाईयाँ
यानी चौथाई दरहम निकालीं। तो उसे शख़्स ने वही उससे ले लीं। और
औरत के साथ काजी के यहाँ चला गया। और देर तक हम से नहीं
मिला। अगले दिन उससे हमारी मुलाकात हुईं। हमने उससे कहा। तुम
कहाँ रहे। इतनी देर क्‍यों हुई? उसने कहा छोड़ो भाई मैं एक ऐसी बात में
फंस गया जिसका जिक्र भी रूसवाई है। हम ने कहा हमें बताओ। उसने
बयान किया के मैं उसके साथ काजी के यहाँ पहुँचा। तो उसने मुझ
पर जोजियत का दावा किया। और दस साल तक गायब रहने का और
दरख्वास्त की के मैं उसका रास्ता साफ कर दूं। मैंने उसके बयान की
तसदीकु कर दी। तो उससे काजी ने कहा। क्या तू इससे अलेहदगी चाहती
है? उसने कहा। नहीं बल्‍लाह। उसके जिम्मे मेरा मेहर है। और दस साल
का खर्चा मुझ देना उसका हक्‌ है। तो मुझ से काजी ने कहा के इसका
हक अदा करो। और तुझे इख़्तियार है उसको तलाक देने या रोके रखने
का। तो मेरा ये हाल हो गया के मैं मुतहब्यर रह गया। और ये हिम्मत ना
कर सका के असल सूरत वाकेया बयान कर सकूं। और उसके बयान की
तसदीक्‌ ना करूं। अब काजी ने ये इक्दाम किया। के मुझे कोड़े वाले
के सपुर्द करे। बिलआखिर बीस दीनारों पर बाहमी तसफिया हुआ जो
उसने मुझ से वसूल किए। और वो चारों रबाअयीं जो उसने मुझे दी थीं।
वो वकला और काजी के अहलकारों को देने पर खर्च और इतनी ही
अपने पास से खर्च हुईं। हम ने उसका बहुत मजाक उड़ाया। वो शर्मिंदा
होकर मिस्र ही से चला गया। और फिर उसका हाल मालूम ना हो सका।
( किताब-उल-अजूकिया, सफा 45) क्‍ ह

सबक:- औरत जब फ्रैब करने पर उतर आए तो बड़े बड़े दाना मर्दों
को भी परेशान कर देती है।

 

हिकायत नम्बर 940 फैशन ऐबल धोका

लंदन के एक मश्हूर जोहरी की दुकान में एक खूबसूरत औरत बड़ी ठाठ
और अमीराना शानो शौकत से दाखिल हुईं। और कहने लगी। मैं फलाँ डाक्टर
की बीवी हूँ। हमें कुछ बैश कीमत जवाहरात दरकार हैं। मालिक दुकान ने

से कीमती जवाहरात निकाल कर पेश किए। औरत ने कुछ जवाहरात
चुन कर कहा। इन्हें एक डिब्बे में बन्द करके अपना आदमी मेरे साथ कर दो।
बाहर कार खड़ी है। आपका आदमी मेरे साथ चले। ताके ये जवाहरात डाक्टर
प्ाहब भी देखकर पसंद कर लें। उनकी कीमत आपके आदमी को वहीं आदा
कर दी जाएगी। चुनाँचे मालिक दुकान ने हजारों रुपये की मालियत के वो
जवाहरात एक डिब्बे में बन्द करके उस औरत के हवाला किए। और अपना
मुलाजिम साथ भेज दिया। और औरत अपनी कार में उसे बिठा कर चल दी।
थोड़ी देर के बाद ये कार लंदन के किसी दूसरे हिस्से में एक मश्हूर
डाक्टर की दुकान के सामने रूकी। और औरत ने उस मुलाजिम से कहा। तुम
कार ही में बैठो। में डाक्टर साहब के पास जाती हँ। और अभी तुम्हें अन्दर
बुला लिया जाएगा। मुलाजिम कार ही में रहा। और औरत डाक्टर साहब के
मतब में दाखिल हो गईं। और डाक्टर साहब से कहने लगी। डाक्टर साहब!
मेरा शौहर दिमागी मरीज है। किसी जुमाने में बहुत बड़ा जोहरी था। कारोबार
में नुक्सान वाके हो जाने से दिमाग पर बुरा असर पड़ा। और अब हर वक्त
यही कहता रहता है “लाओ कीमत जवाहरात की ” मेरे जवाहरात, मैं कीमत
लेने आया हूँ। वगैरा बवगैरा। और मुझे देखकर उसका मर्ज और भी बढ़ जाता
है में उस साथ वाले कमरे में बैठी हूँ। वो कार में बैठा है। आप उसे अन्दर
बुलाकर उसकी तश्खीस करें। डाक्टर साहब! ये लीजिए अपनी फीस माकल
फीस देकर औरत खुद दूसरे कमरे में चली गई। और डाक्टर साहब ने अपने
दो आदमी बाहर भेज दिए के मरीज को अन्दर ले आओ। मुलाजिम अन्दर
आया। तो आते ही बोला। डाक्टर साहब! पसंद आ गए जवाहरात अब कौमत
दीजिए। डाक्टर साहब ने मुस्कुराकर कहा। बैठ जाइये। अभी सब ठीक हो
जाएगा। और फिर उसका मुआयना करने लगा। मुलाजिम ने घबराकर -पूछा।
के ये क्या? डाक्टर ने सारा किस्सा सुनाया। तो मुलाजिम ने भी सारा वाकेया
कह सुनाया! अब जो घबराकर कमरे में गए। तो औरत गायब थी। बाहर
निकले तो कार भी गायब थी। ( माह तय्यबा सितम्बर /%5ई० )

हे सबक :- इस फैशन ऐबल दौर में बड़े बड़े फैशन ऐबल धोके भी होते

। लिहाजा बड़ा चौकन्ना रहने की जरूरत है!

हिकायत नम्बर 940 जून मुरीद.

एक माही गीर कछ मछलियाँ लेकर बादशाह के पास आया। और
षादशाह को तोहफतन पेश कीं। बादशाह ने खुश होकर उसे चार सौ

रुपये ईनाम दिया। बादशाह की बैगम ने कहा। आपने चन्द
के लिए ना हक्‌ इतना रुपया दे दिया रुपया अपना वापस ले लीजिए
बादशाह ने कहा। मगर अब तो मैं दे चुका। वापस किस तरह लू?
ने कहा। तरीका मैं बताती हँ। आप उससे पूछिये। ये मछलियाँ नर हैं या
मादा? वो अगर नर बताए तो आप कहिये मुझ तो मादा दरकार हैं। और
अगर वो मादा बताए तो आप कहिये मुझे नर दरकार है। इस बहाने से
आप अपना रुपया वापस ले लीजिए। चुनाँचे माही गीर को बुला कर
बादशाह ने यही सवाल किया। माही गीर बड़ा होशियार था। उसने जवाब
दिया। हुज॒र ये मछलियाँ ना नर हैं नार मादा। ये मुखन्निस हैं। बादशाह
उसके इस जवाब से और भी ज़्यादा खुश हुआ। और चार सौ रुपये और
ईनाम दे दिए। ये देखकर बैगम और भी ज़्यादा जली। इतने में माही गीर
के हाथ से एक रुपया गिर गया। और उसने फौरन उठा लिया। बैगम को
मौका मिल गया। और बादशाह से कहा। देखिये ये कितना हरीस है। के
आठ सौ में से एक रुपया गिर गया तो कितनी उजलत से उसे उठाया है।
उससे इसी बात पर नाराजगी का इजहार करके अपनी सारी रकम वापस
ले लीजिए। चुनाँचे बादशाह ने फिर उसे बुलाया और पूछा के आठ सौ में
से एक रुपया गिर गया था तो गिरा रहने देते। तुम ने इतनी उजलत से क्‍यों
उठा लिया? माहीगीर ने जवाब दिया। हुज॒र! इस पर आपका नाम गंदा
था। मैंने गवारा ना किया। के आपके नाम की बे अदबी हो। बादशाह इस
जवाब से और भी ज़्यादा खुश हुआ। और चार सौ और इनाम दे दिया।
और फिर सारे शहर में डूंडी पिटवाई के कोई शख्स अपनी बीवी की
अंधा धुंद इताअत ना करे। ( नुजुहृत-उल-मजालिस , सफा 42, जिल्द 2)
सबकः:- जन मुरीद खूसारे में रहता है। और ये मर्ज कमजोर लोगों में
पाया जाता है। जिनकी तरफ से शायर ने लिखा है…
आए हैं दुनिया में हम दो काम करने के लिए
कुछ खुदा से और कुछ बीवी से डरने के लिए

 

हिकायत नम्बर 940 लकड़ी की औरत

एक दर्जी, एक बढ़ई, एक सुनार और एक फकीर। चारों इकड्े कहीं
जा रहे थे। रास्ते में रात हो गई। तो एक जंगल में ठहरे। और रात भर के लिए
हर एक के जिम्मे दो दो घंटे का पेहरा मुकूरर कर दिया। पहले दो घंटा एक
आदसमी जागे। और बाकी तीनों सोयें। फिर ठसरा-जागे। और ठो घंटा पेहरा

दे और बकी तीनों सोयें। चुनाँचे सबसे पहले बढ़ई का नमबर आया। और
वो दो घंटा पेहरा देने के लिए जागा। और तीनों सो गए। बढ़ईं ने सोचा के
बेकार क्यों बैठें, हथियार पास हैं कयों ना एक दरख़्त चीर कर लकड़ी की
एक औरत बना डालूं। चुनाँचे दो घंटे में उसने एक औरत का मुजस्मा तैयार
कर दिया। फिर दर्जी का नम्बर आया। और वो जागा तो उसने लकड़ी की
इस औरत को देखा तो समझ गया के ये बढ़ई का कारनामा है। और फिर
खयाल आया के मेरे पास भी सारा सामान है। मैं क्यों ना उसे कपड़े पहना
दूं। चुनाँचे उसने दो घंटे में उसका सारा लिबास तैयार करके उसे पहना
दिया। फिर सुनार का नम्बर आया। और उसने ये नक्शा देखा तो उसने उसे
गहने पहना दिए। आखिर में फक्ीर का नम्बर आया। आखिर में फकौीर का
गाबर आया। उसने ये देखा तो झट सज्दे में गिरकर अल्लाह से दुआ की। के
इलाही! मुझ बे सरो सामान की लाज रख और इसमें जान डाल दे। चुनाँचे
वो औरत जिन्दा भी हो गई। क्‍
अब सुबह चारों आपस में झगड़ने लगे। बढ़ईं बोला। औरत मेरी है,
दर्जी बोला मेरी है। सुनार बोला मेरी हैं और फकीर बोला मेरी है। ये झगड़ा
करीबी शहर के हाकिम के पास गया। हाकिम ने उस औरत को देखा तो वो
कहने लगा तुम चारों झूटे हो। औरत तो मेरी है। इतने में वो औरत खुद बोली
बोली। के मैं बताऊँ मैं किसको हूँ। हाकिम ने कहा। हाँ बताओ तुम किस की
हो? करीब ही एक दरख़्त था। वो औरत दौड़कर उस दरख्त से चिमट गईं।
और फिर लकड़ी बन गई और इस दरख़्त में गुम हो गई और वो सब के सब
मुह देखते ही रह गए। ( मसनवी शारीफ ) |
सबक्‌:- बच्चा पैदा होता है तो माँ बाप कहते हैं हमारा बच्चा है न्‍
पैचा कहता हैं मेरा भतीजा है, मामू कहता है मेरा भांजा है, भाई कहता है
पेरा भाई है और थोड़े अर्से के बाद वही बच्चा लुकमा-ए-कृब्र बन जाता है
और मिली का पुतला फिर मिट्टी बन जाता है और सारे रिश्तेदार मेरा मेरा
वाले मुंह देखते रह जाते हैं। |

हिकायत नम्बर 940 हीरे की तलाश

मिस्टर शकी ने मिस्टर शातिर की तमाम जैबें टटोल डालीं। मगर हीरे
‘ता ना चर्ली। मिस्टर शकी बड़ा हैरान हुआ के सोते वक्त मैं हीरा मिस्टर
के पास देख चुका हूँ। और उसने मेरे सामने हीरा अपनी जैब में रखा
‘भगर थे थोड़ी देर में हीरा गायब कहाँ हो गया। द

मिस्टर शातिर शहर के एक मशहूर जोहरी का एक बहुत बड़ी कौमती
हीरा चुरा कर फरार होने की खातिर ट्रेन के फस्ट किलास के डिब्बे में सवार
था। के मिस्टर शकी भी उसी डिब्बे में सवार हुआ। मिस्टर शकी ये देखकर
के डिब्बा मुख़्तसिर और दो ही मुसाफिर के लिए मखसूस है, खुश हुआ, शाम
का वक्त था। ट्रेन छोटी. और मिस्टर शक्की मिस्टर शातिर से मुखातिब हुआ।
मिस्टर शकी:- मिस्टर! कया में पूछ सकता हूँ के आप कहाँ तशरीफ
ले जायेंगे? द कक
मिस्टर शातिरः- मैं लंदन जाऊँगा। ह
मिस्टर शकी:- बहुत खूब दो दिन दो रात का खूब साथ रहेगा। मुझे भी
लंदन जाना है। ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से जा रही थी! और रात के दस बजे
का टाइम था। सोने से पहले मिस्टर शातिर ने अपनी जैब से हीरा निकाला
और मिस्टर शक्की के सामने उसे देखभाल कर फिर जैब में रख लिया। और
मिस्टर शकी से कहा के अब सोना चाहिए। चुनाँचे दोनों अपनी अपनी सीट
पर सो गए।
आशथी रात के बाद मिस्टर शकी उठा और हीरे की तलाश में मिस्टर
शात्तिर की जैबें टटोलने लगा मगर ये देखकर हैरान रह गया के वो हौरा जो
मिस्टर शातिर ने उसके सामने जैब में रखा था उसका किसी जैब में नामो
निशान तक नहीं। आखिर मायूस होकर लेट गया। सुबह हुईं तो वो ये देखकर
और भी हैरान हुआ के वही हीरा मिस्टर शातिर ने अपनी जैब से निकाला।
और मिस्टर शक के सामने उसे देखभाल कर फिर जैब में डाल लिया।
मिस्टर शक मे दिल ही दिल में सोचा के एक और भी बाकी है। उसा रात
को हीरा मिल ही जाएगा। चुनाँचे दूसरी रात फिर सोने से पहले मिस्टर शातिर
ने हीरा अपनी जेब से निकाला। और फिर अपनी जैब में डाल लिया। आधी
रात के बाद मिस्टर शकी फिर उठा और प्रिस्टर शातिर की जैबें टटोलने
लगा मगर ये देखकर बेहद हैरान हुआ के हीरा फिर गायब है। थक हार कर
फिर लेट गया। और सुबह उठा तो हीरा शातिर के हाथ में देखा। मिस्टर शकी
उसी वक्त मिस्टर शातिर से मुखातिब हुआ। ह
.. मिस्टर शकीः- गुसताखी माफ! मुझे इतना बता दीजिए के ये हीरा
जो आप अपनी जैब में रख कर सो जाते थे आधी रात के बाद कहाँ
चला जाता है। _
मिस्टर शातिर:- मिस्टर मुझे गाफिल ना समझो। मुझे ये इल्म हो
चुकः था के इस हीरे के तुम भी ख्वाहाँ हो। और हीरे के चुरा लेने ही की

मेरे तआक्कब में तुम इस डिब्बे में सवार हुए हो। मैंने इस हीरे
क्षे तुम से बचाने के लिए नफ्सियाती हर्बे से काम लिया। मैंने सोचा के
दिन के वक्‍त तो तुम कुछ ना कर सकोगे। रात ही को उड़ाने की कोशिश
क्रोगे। और चूंके नफ्सियाती तौर पर तुम को मेरी जैबों को टटोलना
धा। इसलिए रात को मैं हीरा तुम्हारे सामने जैब में डाल कर सो जाता
धा। और रात के पहले हिस्सा में जब तुम्हारी आँख लग जाती थी। तो यो
हीैशा अपनी जेब से निकाल कर मैं तुम्हारी जैब में डाल देता था। और
तुप आधी रात के बाद जब उठते थे। तो मेरी खाली जैंबों को टटोल कर
मायूस होकर लेट जाते थे। तो मैं हीरा फिर तुम्हारी जैब से अपनी जैब
में डाल लेता था। ( हिकायत मसनवी तबसर्रूफ मौल्लिफ ) ह
सबक्‌:- खुदा की तलाश में तुम जंगलों में फिरते हो। हालाँके खुदा खुद
तुष्हारे अन्दर मौजूद है। वफी अनफुसीकुम अफाला तुबंसिरून

हिकायत नम्बर 940 जामओ जवाब

एक फलसफी ने एक मजजब से पूछा के क्‍यों साईं जी! खुदा जब नज़र
नहीं आता तो फिर तुम लोग अशहद कहकर उसकी गवाही क्‍यों देते हो।
और जब हर काम अल्लाह ही करता है तो फिर बन्दा मुज़िम क्यों है? और
शैतान जब आग से बना हुआ है तो फिर उसे दोजूख्‌ में डांलने से उसको
क्या तकलीफ होगी। आग आग को कैसे तकलीफ दे सकती है? साईं साहब

पा /

ने इन तीनों सवालात के जवाब में एक मिट्टी का ढेला’उठाया। और खींच
केर इस फलसफी के सर पर दे मारा। फलसफी का संर फट गया और वो
सीधा अदालत में पहुँचा और साईं पर मुकदमा दायर कर दिया। साईं साहब
अदालत में बुलाएं गए और काजी साहब ने उनसे दरंयाफ्त किया के आप
उसे ढेला क्‍यों मारा। साईं साहब बोले के उनके तीनों सवालात का एक
ही जामओ जवाब दिया है। काजी साहब ने कहा। 8248 थे ज़वाब कैसे हुआ?
तो वो बोले के इस फलसफी से पूछिये के ढेला लगने से उसे तकलीफ हुई?
फैलसफी बोला, यकीनन हुईं और हुई। साईं साहब बोले।’मंगर वो तकलीफ
नजर भी आई? फलसफी ने कहा नजूर तो नहीं आई मगर महसूस तो

‘छै। साई साहब ने का बस ये तुम्हारे पहले सवाल का जवाब है के खुदा नजर
नहीं आता मगर मालूम तो है। दूसरे सवाल का जवाब इस तरह है के जो
भे है खुदा करता है फिर तुम ने दावा मुझ पर क्यों किया? ढेला भी उसी
पारा है उससे पूछो। तीसरे सवाल का जवाब’इस तरह है के फलसफी भी

मिट्री का बना हुआ है और ढेला भी मिट्टी का ही था। तो जिस तरह मिड्ी ने
मिट्री को तकलीफ पहुँचाई उसी तरह आग भी आग को तकलीफ दे सकेगी।
फलसफी झट बोल उठा के तीनों मसले मेरी समझ में आ गए। और मैं अपना
दावा वापस लेता हूँ। ( माह तय्यबा जनवरी %0३० ) द
सबक्‌:- फलसफा बअजु अवकात गुमराही का बाइस बन जाता
है और ये भी मालूम हुआ के अल्लाह के बन्दों की बातें मुबनी बर
हिकमत होती हैं।

हिकायत नम्बर 940 हथेली के बाल

 

एक बादशाह ने एक रोज भरे दरबार में एलान किया के जो शख्स ये
बता दे के मेरी हथैली पर बाल क्‍यों नहीं तो मैं उसे मुंह माँगा ईनाम दूंगा और
अगर कोई शख्स मेरे इस सवाल का जवाब देने के लिए उठा और जवाब
माकल ना दे सका तो मैं उसे मरवा डालूंगा।

बादशाह का ये एलान सुनकर कोई शख्स जवाब देने के लिए उठने
की जुर्रात ना कर सका। थोड़ी देर के बाद एक शख्स उठा और कहने लगा।
ह॒जूर! आपके सवाल का जवाब मैं दे सकता हूँ, बादशाह ने कहा। खूब सोच
लो। अगर जवाब माकल ना हुआ तो मरवा डाले जाओगे। वो बोला हुजर
मैंने खूब सोच लिया है।

बादशाह ने पूछा, अच्छा बताओ, मेरी हथैली पर बाल क्‍यों नहीं?

वो बोला, हुजर आप बहुत बड़े सखी हैं। हर वक्त सखावत करते ही
रहते हैं और कुछ ना कुछ देते ही रहते हैं। ये वजह है के आपकी हथैली के
बाल दे दे कर घिस गए हैं। बादशाह ये जवाब सुनकर खुश हुआ। और फिर
पूछा, अच्छा ये बताओ, तुम्हारी हथैली पर बाल क्यों नहीं? वो बोला; हुज॒र
आप जब कुछ देते हैं तो मुझी को देते हैं आपके बाल देदे कर और मेरे लेले
कर घिस गए हैं। फ

बादशाह ने दरबार के हाज्ीन की तरफ्‌ इशारा करके पूछा। और उनकी
हथेलियों पर बाल क्‍यों नहीं? वो बोला। हुज॒र! आप जब देते हैं मुझी को
देते हैं। आपके बाल दे दे कर मेरे ले ले कर और इनके हसरत व अफसोस
में अपने हाथ मल मल कर घुस गए हैं ” बादशाह ने जवाब सुनकर उसे बहुत
सा ईनाम दिया। ( माह तय्यबा )

सबक :- दाना आदमी हर मुश्किल पर काबू पा लेते हैं और अपनी
दानाईं से फायदा उठाते हैं। – कर का

 

 

हिकायत नम्बर 940 सफेद साँप

 

एक बुजर्ग इब्राहीम नामी फ्रमाते हैं के में हजरत अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह
बिन मसऊद रजी अल्लाहो अन्ह के चन्द दोस्तों के साथ हज के लिए रवाना
हुआ तो रास्ते में हम ने एक सफेद रंग का खूबसूरत साँप देखा जिसके बदन
से मुश्क व अंबर की खुश्बू आ रही थी। वो सांप बेचैन सा था और किसी
तकलीफ में नजर आ रहा था। थोड़ी देर के बाद वो सांप मर गया। उसके
खुश्बूदार बदन को देखकर मेरे दिल में उसके मुतअल्लिक्‌ नेक गुमान पैदा
हुआ। ओ मैंने उसे एक कपड़े में लपेट कर रास्ते से अलग एक अच्छी जगह
में दफन कर दिया। फिर हम आगे बढ़े। और नमाज मगरिब से पहले हम एक
जगह बैठ गए। थोड़ी देर हुई तो हमारे पास चार औरतें आई। उनमें से एक
बोली, के तुम में से “उमर” को किस ने दफ्न किया है। “उमर” कौन? वो
बोली। वो सफेद सांप जिसे तुम में से किसी दफ्न किया है, वही “उमर”
683 । बखुदा उसे मैंने दफ्न किया है। तो वो मुझ से मुखातिब होकर

“तुम ने एक तहज्जुद गुजार और बहुत ज़्यादा रोजे रखने वाले मोमिन
को दफ़्न किया है। उसने नबी आखिर-उजु-ज॒माँ मोहम्मद रसूल अल्लाह
‘सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम की सिफ्त उनकी तशरीफ आवरी से
चार सौ साल पहले आसमानों पर सुनी थी। और ये उसी वक्त नबी करीम
सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम पर ईमान ले आया था।”

मैंने ये बात सुनकर अल्लाह का शुक्र अदा किया। और फिर हम मक्का
मोअज़्जमा में पहुँचे ये जमाना हजरत फारूके आजम(२०अ० ) का था। हज
के बाद हम हजरत फारूके आजम रजी अल्लाहो अन्ह से मिले। और सफेद
सांप बाला किस्सा बयान किया। तो हजरत फारूक आजम रजी अल्लाहो

है ने फ्रमाया। तुम ने सच कहा। मैंने हुजर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह
[सल्‍लम से भी इस जिन्न का तजूकरह सुना था। ( हयात-उल-हैवान, जिल्द
:: सबके:ः- जिनों की कई कई सौ साल उम्र होती है और ये भी मालूम
हुआ के हमारे हजरए सण्अन्स०) की अजूमत व तारीफ के डंके जमीनों
आसमानों में बजते रहे और बज रहे हैं और बजते रहेंगे। और ये भी मालूम
हुआ के कई खुश नसीब अफ्राद हुजर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व
सल्‍लम की तशरीफ आवरी से पहले ही हुज॒र पर ईमान ले आए थे और कई
बदेबख़्त हुजर॒ को देखकर भी इस नओमत स महरूम रह गए।

हिकायत नम्बर 940 उमरो बिन जाबिर रजी अल्लाहो अह

 

हजरत सफवान बिन मौत्तल फरमाते हैं के हम चनन्‍्द मुसलमान मिल
कर हज के लिए घर से निकले। तो रास्ते में एक बहुत बड़ा सांप देखा जो
तड़प रहा था। हम ने देखा के तड़प तड़प कर थोड़ी देर के बाद वा मर
गया। हमारी जमात में से एक शख्स ने जैब से एक कपड़ा निकाला और
इस मुर्दा सांप को इस कपड़े में लपेट कर जूमीन में एक गढ़ा खोद कर
उसमें दबा दिया। फिर हम मक्का मोअज्जुमा पहँचे और मस्जिद हराम
में दाखिल हुए। तो एक शख्स हमारे पास आया। और कहने लगा। तुम में
से वो कौन सा नेक आदमी है जिसने “उमर बिन जाबिर रजी अल्लाहो
अन्ह ” से नेक सलूक किया? हम ने कहा “उमर बिन जाबिर” तो हम में
से कोई वाकिफ नहीं। उस शख्स ने कहा। वो कौन है जिसने रास्ते में सांप
की तजहीज व तकफीन की। हमने बताया। वो ये है। फिर वो शख्स हमारे
साथी की तरफ्‌ मुखातिब होकर कहने लगा। जजाकल्लाह! ये जिसकी
आप ने तजहीज व तकफीन की है ये हुज्र॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह
व सललम का जिन्न सहाबी था। और उसका नाम “उमरो बिन जाबिर ”
था। और ये नो जिनों में से था। जिन्होंने हुजुर सल-लल्लाहो तआला
अलेह व सल्‍लम की जूबाने नूर से क्रआन सुना था। ( रवाहू अलहाकिम
फिल मुसतदरक , हयात-उल-हैवान, जिल्द, सफा 774 रूह-उल-बयान ,
जिल्द 4, सफा 488 ) – |
: की पा सबक: हमारे हुज॒र( र०अ०) रसूल-उल-सकलीन हैं। इंसानों और
मम कैराियत रसूल हैं और जिनों में भी ऐसे खुश नसीब अफ्राद हैं जो शर्फ

दजियत से मुशर्रफ हैं रजी अल्लाहो अन्ह

 

हिकायत नम्बर 940 सक॑ रजी अल्लाहो अन्ह

 

एक रोज हजरत उमरो बिन अब्दुल अजीज रजी अल्लाहो अन्ह एक
अटयल मैदान में से गुजर रहे थे के आपने रास्ते में एक बहुत बड़ा सांप मरा
हुआ देखा। आपने अपनी चादर फाड़ी और उसमें उस सांप को लपेट कर
जमीन में दफ्न कर दिया। दफन कर देने के बाद आपने एक आवाज सुनी।

“ऐ सर्क! मैं गवाही देता हूँ के मैंने रसूल अल्लाह रु ल-लल्लाहो तआला
अलेह व सलल्‍लम से सुना था के उन्होंने तुम से फरमाया था। के ऐ सर्क!
तुम एक चटयल मैदान में मरोगे और तुम्हारी तजहीज व तकफीन एक मर्दे
सालेह करेगा।”

हजरत उमरो बिन अब्दुल अजीज ने ये आवाज सुनी। तो आपने फ्रमाया
अल्लाह तुम पर रहम फ्रमाए। तुम कौन हो? और मै। ये किस की आवाज
सुन रहा हूँ। जवाब मिला।

“मैं उन जिनों में से हूँ जिन्होंने रसूल अल्लाह सल-लल्लाहो तआला
अलेह व सललम की जुबाने अनवर से करआन सुना था। उन जिनों में से मेरे
और सर्क के सिवा कोई बाकी ना था। और अब सर्क भी चल बसा। और
सिर्फ मैं ही रह गया हूँ” ( हयात-उल-हैवान, ज , सफा 474)

सबक्‌: मालूम हुआ के सरवरे आलमए स०्अग्स० ) पर ईमान लाने वाले
और शर्फे सहाबियत हासिल करने वाले जिनों में भी हैं और हमारे हुजर
रसूल-उल-कूल हैं और ये भी मालूम हुआ के हमारे हुजर॒ सल-लल्लाहो
तआला अलेह व सल्लम को ये भी इल्म हासिल था के फलाँ शख्स फलाँ
वक्‍त और फलाँ जमीन पर मरेगा।

हिकायत नम्बर 940 खौफनाक वादी

 

हजरत सईद बिन जबीर रजी अल्लाह अन्ह फरमोते हैं के एक बनू
तमीमी शख्स ने अपने इस्लाम लाने का ये किस्सा बयान किया। के एक
पर्तबा मुझे एक सफर के दौरान एक बहुत बड़े रेगिस्तान में रात गुजारना
पड़ी। इस खौफनाक रेगिस्तान में मेरी ऊँटनी मेरे साथ थी। और मैं
बिलकुल तनहा था। रात का वक्‍त था मैंने ऊँटनी को एक जगह बिठाया।
और खुद लेट गया। और सो जाने से पहले मैंने ये पढ़ाक आऊज्‌ बि
अजीमी हाजल वादी यानी “यानी वादी के बड़े जिन के साथ मैं पनाह
माँगता हूँ ” ये पढ़कर सो गया। सोने के बाद ख़शाब में , मैंने देखा के एक

जो ३2 हाथ में एक खंजर है आया और आते ही वो
धुंजर उसने मेरी ऊंटनी के हलक पर रख दिया। ये देखते ही मैं घबरा
ह्वर जाग उठा। और इर्दगिर्द देखने लगा। मगर कोई चीज ना आई। मैं उसे
पूंही वहमो खयाल समझ कर फिर सो गया। दोबारा फिर वही जवान
हध में खंजर लिए नजर आया। उसने खंजर फिर मेरी ऊँटनी के गले
ए रख दिया। मैं फिर चौंक पड़ा। और देखा के मेरी ऊँटनी भी कांप
ही है। मैं फिर सो गया और तीसरी मर्तबा फिर यही किस्सा देखा। और
अब तो मैं डर कर और घबरा कर जाग उठा। मैंने देखा के ऊँटनी डर के
परे बहुत कांप रही है। मैंने पीछे मुड़कर देखा। तो वही जवान हाथ में
ब्ंजर लिए खड़ा नजर आया। और उसके साथ एक बूढ़ा शख्स भी देखा
जिसने उस जवान का हाथ पकड़ रखा था। और ऊँटनी के करीब आने
परे उसे रोक रखा था। और वो दोनों आपस में लड़ झगड़ रहे थे। थोड़ी
देर में तीन बड़े बड़े बैल वहाँ आ गए। और इस बूढ़े ने इस जवान से कहा
के इन बैलों में से जो बैल चाहो इस मेरे पड़ोसी आदमी की ऊँटनी के
बदले में ले लो। मगर मेरे पड़ोसी आदमी की ऊँटनी को हाथ ना लगाओ।
चुनाँचे वो जवान आगे बढ़ा। और उन बैलों मं से एक बैल उसने पकड़
लिया और उसे लेकर वहाँ से चला गया। फिर वो बूढ़ा शख्स मुझ से
पएातिब होकर कहने लगा के देखो भाई! अब तुम लोग इस किस्म की
अशवावनी जगहों में किसी जिन्न के साथ पनाह ना माँगा करो। इसलिए
के अब उनका जोर और उनका तिलिसम टूट चुका है। अब तमु यूं कहा
को आऊज बिल्लाही रन्बी मोहस्मदिन मिन होली हाजिल बादी।
गा मैं मोहम्मद के रब के साथ पनाह माँगता हूँ, इस वादी के होल
‘ मैंने पूछा, कहाँ रहते हैं? उसने कहा के मदीना मुनव्वरह मैं। मैं ये
इन्तिहाई शौक में अपनी ऊँटनी पर सवार हुआ। और सीधा मदीना
भब्वरह आ पहुँचा। और हुज॒र सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम
कल ते में हाजिर हो गया। हुजर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व
ने मुझे देखते ही मेरा ये सारा किस्सा खुद ही लफ्ज लफ्ज सुना
फौरन और फिर मुझे मुसलमान हो जाने के लिए इर्शाद फ्रमाया तो मैं
मल फेलमा पढ़कर हल्का बगोश इस्लाम हो गया। ( हुज्जत-उल्लाह
आलेपीन, सफा 84)
शक्कर हमारे हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम की
। से हर बातिल का जोर व तिलिस्म दूट गया। और ये भी

मालूम हुआ के हमारे हुजूर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्लम कू
रिसालत आलमगीर रिसालत है और जिन्न भी हुजूर के खादिम हैं। और ‘
भी मालूम हुआ के हमारे हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्लम २
कोई बात पौशीदा व पनेहाँ नहीं।

हिकायत नम्बर 940 मुबल्लिगृ जिन्न

 

हजरत खरीम बिन फातिक रजी अल्लाहो अन्ह अपने इस्लाम
किस्सा बयान फरमाते हैं के मेरे कुछ ऊँट गुम हो गए। और मैं ध
तलाश में बाहर निकला तो उन्हें वादी में पा लिया। चूंके मैं थक गया था|
इसलिए थोड़ी देर के लिए वहीं सोने के लिए लेट गया। और आदत के
मुताबिक ये पढ़ा “नऊज़ बअज़ीज़ हाज़ल वादी ” इतने में मैंने सुना के
कोई कह रहा है के… ५
उज़्या फता बिल्लाही जिलजलाली | ३
. बलमजदी वतन्नअमाई व अफजाली ह
ववहिदिल्लाहा बला तबाली
कद ममारा केदुल जिन्ना फी सिफाली
“यानी ऐ जवान! अल्लाह के साथ पनाह माँग जो अजमत व जलाल
और फज़्लो करम का मालिक है और अल्लाह की तोहीद का इक्रार कर
और जिनों का मक्रो तिलिस्म तो अब पस्ती में जा पड़ा है।”
मैंने ये आवाज सुनकर कहा ऐ हातिफ! साफ साफ बताओ के तुम्हारा
क्या मतलब है? और मेरी हिदायत के लिए क्‍या तरीक्‌ है? तो फिर वही
आवाज आई के….
जआ रसूलुल्लाही जलखैराती
बियसराबा यदऊ इलन्नजाती
“यानी अल्लाह के रसूल तशरीफ ले आए हैं जो यसरब ( मदीना
मुनव्वरह ) में हैं। और निजात की तरफ बुला रहे हैं।”
मैंने कहा। और तुम कौन हो? तो आवाज आई के मैं जिन्न हूँ। मेरा नाम
उमरो बिन आसाल हे । और नसज्द्‌ के मुसलमान ज़िनों पर हुजर सल-लल्लाहो
अलेह व सल्‍लम की तरफ से आमिल मुक़्रर हूँ। ह
मैंने कहा के अगर मेरे ये ऊँट कोई शख्स मेरे घर तक पहुँचा दे। तो मैं
अभी मदीना मुनव्वरह हाजिर होकर ईमान ले आऊँ। आवाज आई के जाओ
तुम मदीना मुनव्वरहझ। और रसूल अल्लाह सल-लल्लाहो तआला अलेह व

सल्‍लम की गज में हाजिर होकर ईमान लाओ। तुम्हारे ये ऊँट मैं तुम्हारे
3622 अप कर

चुनाँचे में उसी वकृत उन ऊँटों में से एक ऊँट पर सवार होकर मदीना

पुतव्वरह पहुँच गया। ये दिन जुमआ का था और जिस वक्त में पहुँचा हूँ।

उस वक्त नमाज हो चुकी थी। और सहाबा इक्राम मस्जिद से निकल रहे थे।
मैं अपनी ऊंटनी बिठा रहा था। इतने में हजरत अबुजर रजी अल्लाहो अन्ह
तशरीफ लाए और मुझ से फ्रमाने लगे। अन्दर चलो। हुजर अलेहिस्सलाम
तुम्हें बुला रहे 228 चुनाँचे मैं हुजर॒ को खिदमत में हाजिर हुआ। तो हुज॒र ने
फ्रमाया। क्यों भई! जिसने तुम्हारे ऊँट तुम्हारे घर तक पहुँचाने का बादा
किया था। उसने तुम से क्या क्या कुछ कहा? और फिर फरमाया। सुनो! उसने
तुम्हारे ऊँट सही सालिम तुम्हारे घर तक पहुँचा दिए हैं। ( हुज्जतुल्लाह अलल
आलमीन, सफा ॥& )

सबक्‌:- हमारे हुजर सल-लल्लाहो अलेह व सल्‍लम की अजमत व
रिसालत के डंके हर जगह बज रहे हैं। और ये भी मालूम हुआ के चाहे दुनिया
के किसी गोशे में कोई बात हो हमारे हुजर को इस का इल्म हो जाता है

 

हिकायत नम्बर 940 बिछड़ों का मिलाप

बनी इस्राईल में एक सालेह शख्स था। उसका एक बेटा था। जब उसकी
वफात करीब आईं। तो उसने अपने बेटे को वसीयत की। के “खुदा की
कसम ” कभी ना खाना, ना झूटी ना सच्ची। जब वो मर गया और लोगों ने
ये सुना तो बनी इस्राईल उसाके बेटे के पास आए। और एक एक आके कहने
लगा के तेरे बाप के जिम्मे मेरा इतना कर्ज था। वो हर एक को उसके कहने
के मुताबिक्‌ रक॒म देता रहा। हत्ता के ये बेचारा मुफलिस हो गया। ओर जब
कोड़ी भी उसके पास बाकी ना रही तो वो अपनी बीवी और दो बच्चों को
साथ लेकर निकल खड़ा हूंआ। और दरया में कश्ती पर सवार हो गया। खुदा
का हुक्म कश्ती टूट गईं। और ये चारों सितम रसीदा अलेहदा अलेहदा एक
जैक तख्ते पर बहने लगे। और बाद मुखालिफ ने हर एक को एक दूसरी सिम्त
े जा फैंका। ये शख्स जिसने मुहईयों के जुल्म से वतन छोड़ा था एक जजीरे
पहुँच गया। जहाँ कोई आदम जूाद नजूर ना आता था। हैरान था के क्या
। इतने में हातिफ से एक आवाज आई के ऐ माँ बाप के साथ एहसान
करने वाले! मशीयते इलाही इस बात की मुक्तजा है के तुझ को एक खजाना
फलाँ जगह जाओ और वहाँ से खज़ाना निकाल लो। ये वहाँ पहुँचा। तो

उस मुकाम से वाकई खजाना मिल गया। फिर अलह तआला ने कुछ आदमी
कहीं से वहाँ भेज दिए। उसने उनसे बड़ा अच्छा सलूक किया और उसके इस
नेक सलूक की खबर गर्दो नवाह में फैल गई और मेहमान नवाजी व गरबा
परवरी की दूर दूर तक शौहरत हो गई। चुनाँचे इत्राफ व जवानिब से लोग
उसके पास आना शुरू हो गए। और जो आते गए वहीं बस्ते गए। यहाँ तक के
वो जजीरा एक बड़ा शहर हो गया। और ये शख्स इस जजीरे का हाकिम बन
गया। खुदा की शान जैसे के और आदमी उसकी खबरें सुन सुन कर उसके
पास आते थे ऐसे ही उसके बड़े बेटे को भी खबर लगी के एक शख्स इन
ओसाफ का फलाँ जजीरे में है और उसकी वजह से वो जजीरा आबाद हो
गया है। ये सुनते ही वो भी उधर को रवाना हो गया। कृतओ मनाजिल के बाद
सफा जजीरे में आया। और हाकिम जजीरे से मुलाकात की। हाकिम जजीरे
ने उसकी बड़ी आओ भगत और खिदमत की। और उसे अपने खास लोगों
में दाखिल कर लिया। बावजूद उसके एक दूसरे से नावाकिफ ही रहे और
अपने रिएते से बेखबर ही रहे।
इसी तरह उसके दूसरे बेटे को खबर लगी। और वो भी हाजिरे
खिदमत होकर अपने बड़े भाई की तरह शरफे खिदमत से बहरायाब
हुआ। अभी तक एक का हाल दूसरे से मरखूफी ही था। अब हाकिम जजीरे
बीवी का हाल सुनिए। के वो किसी दूसरे जजीरे में पहँच गई और एक
शख्स ने उसे अपने घर में डाल लिया। जब उस शख्स को भी इस हाकिम
जजीरे की सखावत का इल्म हुआ तो वो भी अपनी औरत को साथ
लेकर उसकी तरफ चल पड़ा। जब जजीरे के करीब पहुँचा तो औरत को
कश्ती में छोड़कर और कुछ हदया लेकर हाकिम जजीरे के पास पहुँचा।
हाकिम ने उसकी खातिर व मदारात के बाद कहा। के रात यहीं रहो। उसने
बताया के मैं अपनी औरत कश्ती में छोड़ आया हूँ। हाकिम ने कहा के
उसकी हिफाजृत के लिए दो आदमी मैं वहाँ भेज देता हँ। फिर उन्हीं दोनों
भाईयों को हुक्म दिया के जाओ और रात भर इस कश्ती की हिफाजत
करो। जब वो दोनों कश्ती के पास पहँँचे तो आपस में सलाह करने लगे
के हमें इस औरत की हिफाजृत के लिए भेजा गया है कहीं ऐसा ना हो
के नींद आ जाए। आओ आपस में कुछ बातें करें। और आज तक जमाना
के हालात में से हो कुछ जिसको मालूम है वो बयान करे। ताके रात बसर
हो। और नींद ना आए। चुनाँचे एक ने पहले अपना ही किस्सा बयान
करना शुरू किया। और अपनी मुसीबत जूदा दास्तान सुनाना शुरू की।

४ के हम दो भाई थे। दसूरे भाई का नाम यही था। जो तुम्हारा है।
बाप हम को मओ हमारी वालिदा के लेकर दरया में सवार हुआ।
की क॒द्रत कश्ती दूट गईं। और हम सब एक दूसरे से अलग अलग
हो गए और बिछड़ गए। खुदा जाने कौन कौन कहाँ कहाँ जा पहुँचा है।
जब दूसरे ने ये किस्सा सुना तो पूछा तुम्हारे बाप का क्‍या नाम है। उसने
बताया के फलों नाम है। पूछा और तुम्हारी माँ का नाम? उसने माँ का
नाम भी बताया। ये सुन कर उसे ताब ना नही और दौड़ कर उससे लिपट
गया। और कहा के रब्बे कअबा की कसम! तो तू मेरा भाई है। वो औरत
जो कश्ती में बैठी थी और जो दरहकौकत उनकी थी। बैठी दोनों की
बातें सुन॒ रही थी। जब सुबह हुईं और वो शख्स कश्ती पर आया। तो
औरत को निहायत गृमगीन पाया। ये देखकर उसे शक गुज्रा। के शायद
उन दोनों पहरेदारों ने कोई शरारत की है। चुनाँचे वो गस्से में उल्टे पाँव
फिर हाकिम जूजीरे के पास पहुँचा और सारा किस्सा सुनाया। हाकिम
ने उन दोनों को तलब किया। और साथ ही इस औरत को भी बुला
लिया। और फिर औरत से पूछा के बताओ तुम को उनसे क्या शिकायत।
वो बोली। जनाब उन दोनों से कहिये के ये रात का अपना किस्सा जो
सुना रहे थे फिर दोहरायें। चुनाँचे उन्हें ये हुक्म दिया गया। और उन्होंने
फिर वही किस्सा बयान किया। हाकिम जजीरे ने ये किस्सा सुना। तो वे
इख़्तियार अपने तख़्त से उठा। और उन दोनों को छाती से लगाकर कहने
गंगा अनतुमा बलल्‍लाही बलादी “खुदा की कसम तुम तो मेरे ही बेटे
हो।” इधर औरत भी बेचैन हो गई। और उठी बआना वल्लाही उम्यूहुमा
और मैं खुदा की कसम इन दोनों की माँ हूँ” अल्लाह तआला जब चांहे
बिछड्ठों को जमा करने पर कादिर है। ( नुजृहरत-उल-मजालिस बाब बर
अलवालिदैन, सफा 283, जिल्द अव्वल )
सबक: – माँ बाप के साथ नेक सलूक और उनकी फ्रमाँबर्दारी का
ले पीठा हैं और माँ बाप की फ्रमाँबर्दारी औलाद की दुनिया भी बन जाती
है और दीन भी संबर जाता है। और ये भी मालूम हुआ के मुसीबत के बाद
भी हासिल होती है। और मुसीबत के वक्त सब्र करने वाले को बड़ा
“प्र पिलता है। और ये भी मालूम हुआ के खुदा तआला बड़ी हिकमतों और
फैद्रतों का मालिक है वो बिछड़ों को मिला देने पर भी कादिर है। और जिस
कहे यहाँ उसने मुनतशिर अफ्राद को एक जगह जमा फ्रमा दिया। इसी तरह
फैयापत के रोज तमाम मनतशिर अफ्राद और अजजा को वो जमा फ्रमा देएु’ :

हिकायत नम्बर 940 आरिफा

 

हजरत अब्दुल्लाह बिन जैद रहमत-उल्लाह अलेह फरमाते हैं। मैं
बैत-उल-मुकूदस जाना चाहता था के रास्ता भूल गया। अचानक एक औरत
पर नजर पड़ी। मैंने उससे कहा। ऐ मुसाफिरा! क्‍या तू भी रास्ता भूल गई? ”
उसने गुस्से में आकर जवाब दिया। कहीं आरिफबिल्लाह भी मुसाफिर हो
सकता है? और खुदा को दोस्त रखने वाला भी राह भूला हुआ कहलाया
जा सकता है? फिर कुछ तवक्कफ के बाद बोली। लो मेरी लकड़ी का सिरा
पकड़ लो। और आगे आगे हो लो। मैंने ऐसा ही किया। अभी थोड़ी दूर ही
चला होंगा के सामने बैत-उल-मुक्‌दस की चोटियाँ धुंदले गबार में नजर
आने लगीं। मैंने हैरान होकर पूछा। बड़ी बी! ये क्या माजरा है? के इतनी
जल्दी हम बैत-उल-मुकदस पहुँच गए। कहने लगी। ऐ शख्स! तेरी रफ्तार
जाहिदों जेसी है और मेरी रफ़्तार आरिफों जैसी है। जाहिद सय्यार और
आरिफ तय्यार है। कहाँ चलने वाला और कहाँ उड़ने वाला। इतना कहकर
वो मेरी नजूरों से गायब हो गई ( नुजुहत-उल-मजालिस, सफा 26, जिल्द 2!
बाब हिफ्जुलअमानत )

सबक :- अल्लाह की मारफ्तत की बदौलत बड़ी बड़ी मुश्किलें आसान
हो जाती हैं। और आरिफ्‌ बिल्लाह अफ्राद भूलों भटकों की रहनुमाई फ्रमाते
हैं। और मुश्किल में दस्तगीरी फरमाते हैं और ये भी मालूम हुआ के मारफत
हक की बदौलत जब एक औरत भी कोसों दूर का सफर पल भर में तय
कर सकती है। तो जो जूातग्रामी( स०्अण्स० ) इर्फान व मारफत का सर चश्मा

_है। वो पल भर में अगर अशें अला पर जा पहुँचे तो उसमें कौन सी ताज्जुब
की बात है। | ु

हिकायत नम्बर 940 ना अहल

 

हजूरत जुलनून मिस्री रहमत-उल्लाह अलेह के पास एक शख्स इसमे
आजुम सीखने के लिए आया और कई महीने मुतावातिर आपकी खिदमत में
रहा। एक रोज हजरत जलनून को कसम देकर कहने लगा के अब तो मुझे
इस्मे आजुम की तालीम दे दीजिए। आपने उसे एक बर्तन का मुंह कपड़े से
ढका हुआ था। दिया और फरमाया के इसे फला शख्स के पास ले जाओ।
ये शख्स इसे ले चला रास्ते में कुछ खयाल जो आया तो बर्तन का मुंह
खोल दिया। मुंह खोलते ही बर्तन में से एक चूहा निकल कर भागा…..ये

शख्स गस्से में आकर वहीं से पलटा। और हजरत जलनून के पास पहुँच
कर कहने लगा आप मुझ से दिल लगी करते हैं। हजरत ने फरमाया। दिल
लगी की कोई बात नहीं। हम ने एक चूहे पर तेरी अमानत व अहलियत को
आजुमाना चाहा था। मगर तुम इस बात के अहले साबित नहीं हुए। और तुम
ने खयानत कर दिखाई। अब तुम ही बताओ के जब तुम एक हकीर सी शै
की हिफाजुत नहीं कर सके। तो इस्मे आजम की अमानत जलीला पर तुम
साबित कृदम केसे रह सकते हो? जाओ। तुम इम्हिन की कसूटी पर खोटे
उतरे हो ( नुजहत-उल-मजालिस, जिल्द 2, सफा 3)
सबक :- अल्लाह तआला अपनी भारफत और अपनी मोहब्बत। ना
अहलों को अता नहीं फरमाता।

हिकायत नम्बर 940 गवाह

 

हजरत सफयान सूरी तालिब इल्मी के जमाने में जहाँ तालीम पाते थे।
वहाँ एक मकान था। जिसकी दीवार के साया में ब्रेठा करते थे। इत्तिफाकन
उस मकान में किसी ने नकब लगाकर सारा सामान उड़ा लिया। मालिके
मकान ने हजरत सफयान पर चोरी का इलजाम लगाकर उनको पकड़ लिया।
हजरत सफयान ने उस बेबसी की हालत में मुजुतरबाना अदा के साथ कहा।
इलाही! तू फ्रमाता है। लायआ-बह-झूहादाऊ इजा मा दुक के जब
गवाह गवाही देने के लिए बुलाए जायें तो गवाही देने से इंकार ना करें”
और यहाँ मेरा गवाह तेरे सिवा कोई नहीं। अचानक उसी वक्त एक शख्स
चिल्लाता हुआ आया। और कहने लगा। सफयान को छोड़ दो। चोर मैं हूँ।
लोगों ने उससे इस इक्रारे जुर्म की वजह दरयाफ्त की। तो कहने लगा। मैंने
अपने कानों से सुना कोई गृजुबनाक लहजे में कह रहा है। चोरी का सामान
वापस कर दो। सफयान को फौरन छुड़ाओ। वरना अभी गारत हो जाओगे।
(नुजहत-उल-मजालिस, जिल्द 2, सफा 30)

सबक;:- सच्चे दिल से अल्लाह तआला से जो भी दुआ माँगी जाए
वो जुरूर कबूल होती है। द

हिकायत नम्बर 940 मेहनत का फल

एक बादशाह का गुजर एक बूढ़े शख्स पर हुआ। जो दरख्तों की
दुरूस्तगी और कांट छांट कर रहा था। बादशाह ने कहा, ऐ बूढ़े! क्या तुझे इन
देख्तों का फल खाने की उम्मीद पड़ती है? कहा! बादशाह सलामत! हमारे

बहले लोगों ने जराअत की। तो उससे हम लोगों ने फायदा उठाया। अब हैं
अपने बाद आने वालों के लिए ये मेहनत कर रहा हूँ। ताके वो नफा हासिल
करें। बादशाह को उसकी ये बमजाक और मुफीद बात बहुत ही पसंद आईं।
और खुश होकर उसे एक हजार अशर्फियाँ ईनाम के तौर पर दीं। इस पर बूढ़ा
काश्तकार खिलखिला कर हंस पड़ा। बादशाह ने हैरत में आकर पूछा। के
इस वक्‍त हंसी का क्‍या मौका है। कहा मुझ इस जराअत के इस क॒द्र जल्द
फल देने से ताज्जुब हुआ। इस बात पर बादशाह और भी ज़्यादा खुश हुआ।
और एक हजार अशर्फियाँ और दे दीं। बूढ़ा काश्तकार फिर हंसा। बादशाह
नू पूछा। के अब क्यों हंसे? तो वो बोला के काश्त कार पूरा साल गुजरने के
बाद एक दफा फायदा उठाता है। मेरी जुराअत ने इतनी थोड़ी सी देर में दो
दफा खातिर ख़्वाह फायदा पहुँचाया। बादशाह ने एक हजार अशर्फियाँ और
दीं। और इसे वहीं छोड़ कर चला गया। ( नुजुहत-उल-मजालिस, जिल्द 2,
सफा 26)

सबक्‌ः- मेहनत का फल जूरूर मिलता है। और ये भी मालूम हुआ
के दानाई की बात करने में बड़े फायदे हैं।

हिकायत नम्बर 940 दुश्मने रसूल

 

हजरत ज॒क्रया अलेहिस्सलाम के साहबजादे हजरत याहिया अलेहिस्सलाम
ने किसी जंगल में शैतान को रोते हुए देखा। आपने पूछा रोते क्‍यों हो?
शैतान बोला, ऐ अल्लाह के नबी! वो शख्स क्यों ना रोये। जिसने एक तवील
जमाना तक खुदा की बन्दगी की हो। और उसकी इबादत महज बेकार और
रायगाँ जाती रही हो। हजरत याहिया अलेहिस्सलाम ने अल्लाह से अर्ज की।
‘इलाही! ये मलऊन अब तो पछताता और रोता है क्या उसके साथ मुसालेहत
की कोई सूरत है? खुदा ने फरमया ऐ याहिया! इस मलऊन के रोने पर ना
जाओ। ये इखलास के साथ नहीं रोता। बनावटी और मनाफिका रोना रोता
है। और अगर तुम इसके निफाक्‌ को मालूम करना चाहते हो तो उससे को
के अल्लाह फ्रमाता है। तुम आज भी अगर आदम अलेहिस्सलाम की कब्र
को सज्दा कर लो। तो हम राजी हो जायेंगे। हजरत याहिया अलेहिस्सलाम ने
शैतान से ये बात कही तो वो मलऊन खिलखिला कर हंस पड़ा और कहने
लगा मैंने जब आदम को जिन्दगी में सज्दा नहीं किया। तो अब उसके मरने

के बाद क्‍यों करने लगा। ( नुजह-उल-मजालिस, जिल्द 2, सफा ७0)
. सबक्‌ः- मालूम हुआ के हर रोने बाला जरूरी नहीं के मुखलिसाना ही

पेरहा हो। बल्के बअज लोग झूटा रोना भी रोते हैं। और ये भी मालूम हुआ
के शैतान रसूल का बहुत बड़ा दुश्मन है और रसूल के आगे झुकने पर वो
किसी सूरत तैयार ना पहले हुआ था और ना अब होता है। और ये मालूम
(आ के शैतान ने ना तो रसूल की दुनयवी जिन्दगी में तअजीमे रसूल की।
और ना उनके विसाल के बाद उनकी कब्र पर ही जाने के लिए तैयार हुआ।
और ये भी मालूम हुआ के रसूल पर “मरने” का लफ्ज शैतान ने बड़े खुले
एुंह से कह दिया था। .

हिकायत नम्बर 940 मरने से डरना

 

सुलेमान बिन अब्दुल मलिक ने एक मर्तबा हजरत अबु हाजिम अलेह
अईहमा से पूछा के “हम मरने से डरते क्‍यों हैं?” तो आपने जवाब दिया।
लिए के तुम ने दुनिया अबाद कर ली। और आक्बत बर्बाद कर डाली।
प्त आबादी से निकल कर वीराने को जाने पर किस का दिल चाहता है?
मुलेमान ने फिर पूछा के कुयामत के दिन खुदा के सामने पेश होने की क्‍या
पूरत होगी? तो आपने जवाब दिया के नेक आदमी तो यूं पेश होगा। जैसे
कोई गुमशुदा आदमी घर लौटे और घर वालों से खुशी खुशी मिले। और बुरे
आदमी की मिसाल यूं होगी। जैसे कोई भागा हुआ गलाम पकड़ा जाए। और
उसे उसके आका के हुजर पेश किया जाए। और वो लरजुता कांपता और
इरता हुआ पेश हुआ। ( रोजू-उल-फायक्‌ , सफा 3)

सबक्‌:- हमें अपनी आक्बत संवारने औ” आबाद करने की फिक्र
करना चाहिए ताके जब हम मरें तो इस शैर के ‘ सदाक्‌ साबित हों…..

निशाने मर्द मोमिन अतोीों ग्रोयम
मर्ग आयद तबस्सुपम बरलब ओसयत

यानी मोमिन जब मरता है तो हंसता हुआ मरता है। इसलिए के वो बीराने

पे आबादी की तरफ और परदेस से अपने घर की तरफ्‌ जा रहा होता है।

हिकायत नम्बर 940 हिसाब

एक आक्बत अंदेश आदमी को एक मर्तबा अपने गुनाहों का खयाल
आया और वो अपनी उम्र का हिसाब करने लगा। हिसाब जो किया। तो उसकी
उप्र साठ साल की निकली। फिर वो इन साठ सालों के दिन गिनने लगा। तो
भोठ साल के साढ़े इक्कीस हजार दिन बने। ये बात देखी। तो वो गण खाकः
गि पडा और जब होश में आया। तो कहने लगा। अफसोस मैं हलाक हो

गया। साढ़े इक्कीस हजार दिनों में फी रोज अपना एक गुनाह भी शुमार करूं।
तो भी मेरे जुमला गुनाह साढ़े इक्कीस हजार बनते हैं। और हाल ये है के मैंने
एक एक दिन में कई कई गुनाह किए हैं। ये कहकर वो फिर गिर पड़ा और
मर गया। ( रोज-उल-फायक्‌ , सफा ॥4)

सबक्‌:- हर शख्स को अपने आमाल का मुहासबा करना चाहिए।
और सोचना चाहिए। के सारी उप्र में बिलफर्ज अगर फी यौम उसने एक भी
गुनाह किया होगा तो भी हजारों गुननाह उसके लिए जमा हो जांयेंगे। फिर
अगर एक एक रोज में कई कई गुनाह किए जायें। तो अंदाजा लगाईये। के
इन गुनाहों के किस कृद्र अंबार लग जायेंगे। और कल क॒यामत के दिन किस
कद्र मुश्किल का सामना होगा। पस हर शख़्स को डरना चाहिए। और गुनाहों
से बचना चाहिए। ।

हिकायत नम्बर 940 आबादी का

 

एक घुड़सवार ने जाते हुए एक शख्स से पूछा। भई! आबादी यहाँ से ‘
कितनी दूर है? इस शख्स ने जवाब दिया। आप अपनी दायें तरफ देखिये।
वो देखिये। सामने आबादी नजुर आ रही है। घुड़सवार ने इधर देखा। तो उसे
एक वसी व अरीज कब्रिस्तान नजर आया। घोड़े सवार ने दिल में सोचा
के ये शख्स या तो दीवाना है और या कोई मर्द कामिल। फिर उसने उससे
कहा। के भई! मैंने आबादी का पूछा है। और तुम कब्रिस्तान बता रहे हो। ये
क्या बात? तो वो बोला। ये इसलिए के मैंने दूसरे तमाम मुकामात के लोगों
को यहाँ आते देखा है, और यहाँ से किसी को कहीं जाते नहीं देखा। और
आबादी कहते ही उस मुकाम को हैं जहाँ दूर दूर से लोग आयें। और वहाँ से
फिर वीराने को ना जायें। तो मेरी नजर में सही मअनों में “आबादी ” यही है।
( रोज-उल-फायक्‌, सफा ॥7)
सबक्‌:- हर एक को एक दिन मरना है। और अपने शानदार मकान,
मोहल्ले ओर शहर छोड़कर कब्रिस्तान में जाना है। जिसे हम आबादी कहते
हैं। उसे एक दिन बर्बादी का सामना होगा। असल आबादी तो कब्रिस्तान में.
है। जहाँ आहिस्ता आहिस्ता सब लोग जमा हो रहे हैं। ।

हिकायत नम्बर 940 चार बुजर्ग

 

हजरत जुनैद बगृदादी रहमत-उल्लाह अलेह एक मर्तबा अपने |
अहबाब में तशरीफ फरमा थे। और बो सब अल्लाह के मक्बूल बन्दों का

तजकरह कर रहे थे। हजरत सरी सकती रहमत-उल्लाह अलेह फ्रमाने
लगे के मैं एक रोज बैत-उल-मुक्‌हस में था। और हज के दिनों में बहुत
धोड़े दिन बाकी रह गए थे। मैंने उस साल हज के लिए ना पहुँच सकने
पर बड़ा अफसोस किया। और दिल में सोचने लगा के मक्का मोअज़्ज्मा
और मदीना मुनव्वरह पहुँच चुके होंगे। और मैं यहाँ ही हूं। अफसोस के
मैं इस नओमत से महरूम रह गया। मैं रोने लगा और बहुत रोया। थोड़ी
देर के बाद हातिफ से एक निदा सुनी। कोई कह रहा था। ऐ सरी! मत रो।
अल्लाह तआला तुम्हें किसी सबब हज के लिए मक्का मोअज़्ज्मा पहुँचा
देगा। मैंने कहा। मगर ये कैसे मुमकिन है। जब के मक्का मोअज़्जुमा यहाँ
से काफी दूर है और मैं यहाँ बैत-उल-मुकदंर्स में हैं। आवाज आईं के
अल्लाह के लिए सब कुछ मुमकिन है। मैंने सज्दा-ए-शुक्र अदा किया
और हातिफ की आवाज की सदाकृत के जुहूर की इन्तिजार करने लगा।
इतने में मस्जिद बैत-उल-मुकदस में वजीहा और नूरानी चहरे वाले चार
हजुरात दाखिल हुए। उनकी नूरानी सूरतें ऐसी पुरनूर थीं जेसे सूरज चमक
रहा हो। उन चारों में से एक उनका पैश्वा था। और तीन उनके पीछे पीछे
चल रहे थे। ये लोग मस्जिद में दाखिल हुए तो सारी मस्जिद जगमगा
उठी। मैंने उन्हें देखा तो उठकर उनके साथ हो लिया। फिर उन्होंने दो
रकातें बा जमात नमाज पढ़ी। इमाम वही बना जो उनका पैश्वा था।
माज्‌ के बाद उनका वो इमाम दुआ माँगने लगा। और वो तीनों उसकी
दुआ पर आमीन कहने लगे। मैं करीब हो गया। मैंने देखा के वो बड़ी
क्त आमेज्‌ दुआ माँग रहे हैं। जब वो दुआ से फारिगृ हुए तो मैंने उनसे
भस्सलाम अलेकुम कही। और उन्होंने जवाब दिया। फिर उनके इसी
शश्वा ने मुझ से कहा। मुबारकबाद! ऐ सरी! के हातिफ से तुम्हें हज की
शारत मिल चुकी है। मैंने कहा। हाँ! या सय्यदी! आपके यहाँ तशरीफ
होने से कब्ल मुझे हातिफ से ये बशारत मिली है। वो फ्रमाने लगे। हाँ
॥! जब तुम्हें वो निदाऐे हातिफ सुनाई गई है। हम उस वक्त खरासों में
॥ मैंने हैरान होकर पूछा। हुज॒र! खरासान की मुसाफत तो यहाँ से साल
९ की है। फिर आप इतनी जल्दी यहाँ कैसे पहुँच गए? तो फ्रमाया।
भभाफत अगर हजारों साल की भी हो तो कोई बात नहीं। जमीन उसी
हुए की है जिसके हम बन्दे हैं। हम उसी के घर की जियारत के लिए
किले हैं। और पहुँचा देना भी इसी का काम है। देखो ये सूरज मशरिक्‌
क्र सिर्फ एक दिन ही में मग्रिब में पहुँच जाता है। हालाँके

मशरिक्‌ व मग्रिब में मुसाफत कई सालों की है। तो क्या सूरज ये इतनी
तबली मुसाफत अपनी क्‌द्गत से तय करता है? तो जब एक बे जान वजूद
अपनी लम्बी मुसाफत दिन भर में तय कर लेता है तो जो अल्लाह के
मक्बूल बन्दे हैं वो अगर साल भर की मुसाफत पल भर में तय कर लें
तो कौन सी ताज्जुब की बात है फिर वो बाहर निकले और मुझे साथ
ले लिया। और नमाज जोहर के वक्‍त हम एक ऐसी जगह पहुँचे। जहाँ’
पानी का नामो निशान तक ना था। मगर उसी मक्बूले हक्‌ की बर्कत व|
करामत से हम ने वहाँ एक ठंडा चश्मा पाया। जिससे हम ने वज किया
और नमाज पढ़ी। फिर चले। और नमाज अमर के वक्त हमें हिजाज
निशानियाँ नजर आने लगीं। और मगूरिब से पहले पहले हम मक्का
मोअज़्जमा पहुँच गए। मक्का मोअज्जुमा पहुँचा कर वो पाक लोग मेरी
नजरों से गायब हो गए। ( रोज-उल-फायक्‌, सफा 22)

सबक :- अल्लाह के मक्बूल बन्दों को अल्लाह तआला से बड़ी बड़ी
ताक॒तें हासिल होती हैं। ये लोग सेंकड़ों मील की मुसाफत पल भर में तय:
कर लेते हैं। फिर जो उनके आका व मौला सल-लल्लाहो तआला अलेह व
सल्लम हैं। उनकी मैराजे पाक का इंकार करना क्‍यों गुमराही ना होगी। और
ये भी मालूम हुआ के अल्लाह तआला अपनी मखलूक्‌ की मुरादें अपने बन्दों
के जुरिये व वसीले से पूरी फरमाता है। और ये भी मालूम हुआ के जो लोग
बगैर छड़ी के चल नहीं सकते और एक मील ही की मुसाफत तय करके
उनका दम फूल जाता है वो लोग उन अल्लाह वालों की मिसल बनने लगें॥
तो बड़े ही गुमराह हैं।

 

हिकायत नम्बर 940 एक बूढ़ा शेर

( मंजम हिकायत )
कहते हैं एक शोर जब बूढ़ा हुआ
दौड़ने और भागने से रह गया
नाखन व पजे की ताकृत कम हुं
दांत दूटे पुशए्त उसकी खम हुई
भूक से लाचार हो मरने लगा
फिक्र करके दिल में ये हीला किया
बन गया बीमार और जो जानवर
पूछने आता ना आत्रा फिर नज़र

लोमड़ी आई अयादत के लिए
ग़र॒ को दर पर लगी ये पूछने
है. तबीयत आपकी कैसी हुजर?
चरम बद रखने खुदा हज़रत से दूर
शेर बोला उम्र हो तेरी फिज्ञों
बच्ची तो अन्दर नहीं आती है क्‍यों?
लोगड़ी ने ये कहा ऐ ज़िल्ल रब ॥
अर्ज़ कर देती हूँ उसका भी सबब
कह रहे हैं. बरमला ये नक्शा पा
हैं जो ज़ाहिर ग्रार के दर’ पर जहा
सेंकड़ों अन्दर -गए हैं बिलयकीन
क्‍ बाहर आने का निश्याँ हक थी नहीं
( दरमंजम, सफा 2) न्‍ ।
सबक्‌:- काम से पहले है लाज़िम सोचना
… ये के है इस काम का अंजाम क्‍या

हिकायत नम्बर&) आईना-ए-हक्‌ नुमा
( मंजम हिकायत )

.._ देखकर अहमद का रूऐ पुरजिया
जहल से बोझल यूं बकने लगा
सब से बद रू है बनी हाशिम मैं तू
क्‍यों उसी मण्टूर है आलम मैं तू
आपने फ्रमाया है मुझ को यकीं
वू बजा कहता हैं और झूटा *हीं
देखकर पिद्दीक ने फिर ये कहा
आफताबे दो जहाँ तू है शहा
चहरा-ए-रोशन है ऐसा पुर जमाल
बद्र कामिल हो मुकाबिल क्‍या मजाल
सरवरे आलम का यूं इरशाद था
वूने भी सिद्दीक! बिलकुल सच कहा
ये कहा यारों ने हो के बा अदब
ऐ नबी हैरान हैं हम सब के सब

 

आप ने दोनों की क्‍यों तसदीक की
रास्त दोनों हो नहीं सकते कभी
आपने फरमाया। ऐ याराने दीं
आईना भी देखते हो या नहीं
हर कोर्ईह़ जैसा है दिखलाता है वो
ये सबक तुम सब को सिखलाता हैं वो
ऐ अजीज मैं भी हूँ वो आईना
अक्स देता है दिलों का जो दिखा
( दर मंजम, सफा 40 ) ।
सबक:-

… नूरों हक से जिनके दिल मायूर हैं
उनकी नज़्रों में मोहम्मद सब्अन्स०) नूर हैं
और जिन के दिल हुए तारीक तर
वहीं कहें अहमद को मिसल अपनी बशर

 

हिकायत नम्बर 940 तवक्कल

थे मदीने में यमन के चन्द मर्द
था तवक्‍्कल में हर इक उनमें से फर्द
सब गए फारूक को करने सलाम
आपने पूछा के क्‍या करते हो काम
बोले वो करते नहीं हम कोई कार
है. तवक्‍कल पर हमारा तो मदार
सुन के ये फासक ने उनसे कहा
ये भी कोर्ट काम है व्रारीफ का
मुफ़्त खोरे क्‍यों नहीं कहते के हो
बोझ अपना डालते ओरों पे हो
जा खपाता है कोर्ड खाते हो तुम
और तवक्‍कल उप्तको बतलाते हो तुम
है. तवक्‍कल असल में दहकान का
है. तबक्‍कल पैश-ए-मर्दे खुदा
डाल कर दाना फक्त उम्मीद. पर
रब पै रखता है नज़र जो साल भर

 

 

मम. अयया कर मत कर भ्ररोसा कार पर
कर भरोसा किस्पत जब्बार पर

 

हिकायत नम्बर 940 कौमती पियाला

एक बादशाह के पास कोई शख्स बेहद कीमती पियाला
जो जवाहरात से जड़ा हुआ था। बादशाह ऐसा ला जवाब पियाला पाकर
बढ़ा खुश हुआ। एक मर्द दाना दरबार में हाजिर था। बादशाह ने उससे पूछा।
के तूने इस पियाले को देखा कैसा है? उसने कहा। हुज॒र! इस पियाले के
प्राथ साथ में रंज व गृम और नुक्सान को देखता हूँ। इस पियाले के आने से
एले आप इन बातों से मुतमई थे। मगर अब इस के आने से रंजो गम और
गुक्सान का भी अंदेशा पैदा हो गया है। बादशाह ने कहा के ये कैसे? वो
बोला के अगर ये टूट गया तो रंजो गम का पैदा हो जाना यकीनी है और
अगर गुम हो गया तो नुक्सान वाके हो जाएगा। इत्तिफाकुन वो पियाला एक
गेज टूट गया। तो बादशाह को बेहद रंज हुआ। और वो कहने लगा के इस
पर्दे हकीम ने सच ही कहा था। ( कौमियाऐे सआदत-उल-इमाम गृजाली
अलेह अर्रहमत, सफा 366 )
सबक्‌:- दुनिया की हर चीज फानी और अंजाम कार मौजिब हज्नो
ग्लाल है। हकीकी और अबदी राहत अगर है तो खुदा की याद में माले
पुनिया की जितनी इफ्रात होगी उतनी ही परेशानी भी बढ़ेगी। एक शायर ने
या ख्वाब लिखा है के…
गरचै जाहिर में सूरत गुल है
पर हकीकृत में खार है दुनिया
एक झोंकने में है इधर से उधर
चार दिन की बहार है दुनिया
जिन्दगी माम रख विया किस ने
मौत का इन्तिज़ार है. दुनिया

हिकायत नम्बर 940 पुल सिरात

३५ गेरत उमर बिन अब्दुल अजीज रजी अल्लाहो अन्ह की एक बांदी
‘के रोज सबह अर्ज की। अमीर-उल-मोमिनीन! आज रात मैंने एक

ख्वाब देखा, आप ने फरमाया बयान कर। वो बोली मैंने देखा है के
दोजुख भड़काई गई है। और पुल सिरात इस पर रखा गया है। और बअज
खुलफा को फरिएते लाए हैं। पहले खुलीफा मरवान को देखा के फरिश्ते
उसे लाए हैं। और उसे हुक्म दिया के पुल सिरात पर चल। वो थोड़ा
सा चला था। के दोजख में गिर गया। हजरत उमर बिन अब्दुलअजीज
बोले। फिर आगे क्‍या हुआ? जल्दी बयान करो। वो बोली। फिर मरवान
के बेटे बलीद को लाया गया। वो भी इसी तरह दोजख में गिर गया।
आप बेचेनी से बोले। जल्दी कहो। फिर क्‍या हुआ। वो बोली के फिर
इब्ने अब्दुल मलिक को लाए। वो भी इसी तरह दोजूख्‌ में गिर गया।
आप बोले। फिर क्या देखा? जल्दी कहो। वो बोली। फिर आपको लाया
गया। बांदी इतना कहा ही था के हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज ने एक
नारा मारा और बेहोश होकर गिर पड़े। इस डर से के कहीं मुझे भी इसी
तरह दोजुख में गिरते हुए ना देखा गया हो। बांदी ने चीख कर कहा।
अमीर-उल-मोमिनीन! खुदा की कसम! मैंने देखा के आप सलामत गुजर
गए। बांदी चीख चिल्ला रही थी मगर हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज
बेचैनी में लौटते और हाथ पैर मारते थे। काफी देर के बाद आपको होश
आया। ( कीमियाए सआदत, सफा 4% )

संबक:- अल्लाह के मक्बूल बन्दों के दिल में आक्बत का खौफ
रहता है। और वो कभी ऐसा काम नहीं करता जिसका अंजाम दोजख में
गिरना हो। एक वो पाक लोग भी थे के हर वक्त आक्बत की फिक्र रहती

थी। और एक ये लाग भी हैं जों अलल एलान कहते हैं के…

. आकबत की खूबर खुदा जाने

अब तो आराम से गृजरती है

खुदा एसे गुफ़्लत आमोज शैरों से भी बचाए।

हिकायत नम्बर 940 अदल व इंसाफ

 

, जंगे बद्र में हुजुर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍्लम अपने हाथ
मुबारक में एक तीर पकड़कर मुजाहिद की सफें दुरूस्त फ्रमा रहे थे। हजरत ‘
सव्वाद रजी अल्लाहो अन्ह सफ से बाहर निकले हुए थे। हुजूर अलेहिस्सलाम
ने उस तीर से हजरत सव्वाद की पीठ को छू कर फ्रमाया। ऐ सव्बाद! सफ
के बराबर हो जाओ। हजरत सब्बाद ने अर्ज़ किया। हुज॒र! आपके इस तीर
के मेरे बदन के साथ छू जाने से मुझे जो ठोकर सी लगी है। मैं इसका बदला .

लेना आहता ६। (3 । आप अदलो इंसाफ कक मुनव्बअ व परदछजन ् । पड़
दूमका बदला लग दीजि|। हुज॒र अलेहिस्मलाम ने वही तीर हजरत सब्वाद
क्रो दिया। और कहा। लो तुम भी इस तीर से मेरे बदन पर ठोकर लगा लो।
हुजुर अलहिस्स्तताम ने बदला देने को अपनी कमीज मुबारक पुश्त अनवर से
उठाई तो हजरत सत्वाद ने हुजर के बदन अनवर से चिमट कर मेहर नव॒ुव्वत
क्रो चूप लिया और अर्ज किया मेरे आका! मैंने तो इस बहाने से बदने अनवर
से अपना बदन लगा लिया है। ताके बदन अनवर की बर्कतों से में माला माल
हो जाऊ। ( नुजृहृत-उल-मजालिस, जिल्द 2, सफा १)

सबक :- हमारे हुजुर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम् अदल
व इंसाफ और रहमो व करम के पैगम्बर हैं। और आप ने हमें ये दर्स दिया
हैं के हम भी अदलो इंसाफ को अपनायें। और ये भी मालूम हुआ के सहाबा
इक्राम रजी अल्लाहो अन्हुम का ये ईमान था के हुजर॒ सल-लल्लाहो तआला
अलेह व सल्‍लम के बदन अनवर से छू जाने से इंसान का बैड़ा पार हो जाता
है। फिर आज अगर कोई शख्स हजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम
का जिस्म मुबारक ना पाकर आपके इसमे मुबारक ही को चूम ले। तो खुदा
तआला उस पर क्‍यों फज्लो करम ना फरमाएगा। एक शायर ने क्‍या खूब
लिखा है ै

तर आसताँ जो मिल सका, तिरी रहगुज़र पे जबीं सही
हमें सन्‍दा करने से काम है जो वहाँ नहीं तो यहीं सही

हिकायत नम्बर 940 रस्ता

 

हजरत अबु इसहाक्‌ शीराज़ी रहमत-उल्लाह अलेह एक मर्तबा अपने
पुरीदेन के साथ कहीं जा रहे थे के रास्ते में एक कुत्ता आता हुआ नजुर आया।
मुरीदैन ने आगे बढ़कर कुत्ते को धतकारा। हजरत ने फ्रमाया। उसे मत धतकारो।
क्योंक्रे रास्ता हम में और उसमें मुशतरिक है। ( नुजुहत-उल-मजालिस, जिल्द
*, सफा ५)
. सबक: – अल्लाह के मकूबूल बन्दे जानवरों तक से भी नेक सलूक से
पेश आते झा और अपनी अजमत व बड़ाई का खयाल तक नहीं लाते।

हिकायत नम्बर 940 नामे अक्दस

 

एक यहूदी तौरात पढ़ रहा था। उसने तौरात में एक सहीफा पर हुजर
सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम का नाम अक्दस लिखा देखा।

यहूदी ने ब॒ुग्ज व कीना से उस नामे पाक को खुरच डाला। दूसरे रोज
तौरात खोली तो इस सफहे पर ये नामे अक्दस चार जगह लिखा देखा।
गससे में आकर उसने इस नाम पाक को फिर खुरच डाला। तीसरे रोज
उसने देखा। के इस सफहे पर ये नाम अक्दस आठ जगह लिखा हुआ
है। उसने फिर ये नाम पाक सब जगह से खुरच दिया। चौथे दिन उसने
इस नाम अक्दस को बारह जगह लिखा देखा। अब इसकी हालत बदली।
और इस नाम पाक की दिल में मोहब्बत पैदा हो गई। और इस नाम वाले
महबूब सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम की जियारत के लिए शाम
से मदीना मुनव्वरह की तरफ रवाना हुआ। इत्तिफाक देखिये के ये हुज्र
सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम की जियारत करने के लिए रवाना
हुआ। मगर उधर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम का विसाल पाक
हो चुका था जब ये मदीना मुनव्वरह पहँचा। तो उसकी हजरत अली रजी
अल्लाहो अन्ह से मुलाकात हुई। और हजरत अली से हुज॒र के विसाल
का इल्म हुआ। अब तो ये सख्त बेचैन हुआ। और हजरत अली से कहने
लगा। के मुझे हुजर के बदने अनवर का कोई कपड़ा दिखाईये। हजरत
अली रजी अल्लाहों अन्ह ने हुजर का एक कपड़ा मुबारक उसे दिया। उस
यहूदी ने पहले तो उसे सूंघा। फिर हुज॒र के रोजा-ए-अनवर के सामने
आकर कलमा पढ़ा। और मुसलमान होकर दुआ माँगी के इलाही! अगर
तूने मेरा इस्लाम कबूल कर लिया हे तो मुझे अपने महबूब के पास बुला
ले। इतना कहा। और हुजर के सामने ही इन्तिकाल कर गया। हजरत
अली रजी अल्लाहो अन्ह ने उसे गस्‍ल दिया और जन्नत बकीअ में उसे
दफनाया। ( नुजुहत-उल-मजालिस , जिल्द 2, सफा 44 )
सबके :- हुजूर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम का नाम पाक
कोई कीना परंवर लाख मिटाना और खुरचना चाहे। मगर बमिसदाक्‌…..
तू घटाए से किसी के ना घटा है ना घटेगा
जब बढ़ाए तुझे अल्लाह तआला तेरा
हुजर का नाम अनवर ना मिटा ना मिट सकता है। मिटाने वाले खुद
मिट गए। मगर इस नाम अदृदस को वही करार और उसकी वही बहार है जो
यहले थी। सल-लल्लाहों तआला अलेह व सल्लम।

हिकायत नम्बर 940 दुनयवी मेहबूब

 

एक अभीर आदमी एक गरीब मगर नेक आदमी की लड़की पर

प्रशिक हो गया। गरीब बाप को पता चला, तो उसने अपनी बेटी को
#छ्ल इसहाल आवर दवाई खिला दी। जिससे उसकी लड़की को कसरत
के साथ इसहाल आने लगे। बाप उसके इस माहा-ए- गलाजत को एक
बढ़े मटके में जमा करता रहा। लड़की कसरे इसहाल से बेहद लागिर
और दुबली हो गई। और रंग भी पीला पड़ गया। फिर उस गरीब आदमी
ते इस रईस को पैगाम भेजा। के आप मेरे घर तशरीफ लायें। और मेरी
लड़की को जो आप की मेहबूबा है देख लें और दिल चाहे तो उससे
निकाह कर लें। वो अमीर आदमी खुश खुश उसके घर आया। और जब
उप्त लड़की को देखा तो वो पहला सा हुस्नो जमाल ना देख कर मुंह फैर
लिया। और कहा के मुझे जिस हुस्नो जमाल से मोहब्बत थी वो तो सब
जजर नहीं आता। लड़की के बाप ने कहा। ठहरिये आपको वो मेहबूब
हुलो जमाल भी मैंने एक मटके में मेहफूज रखा है। आप अपने मेहबूब
ही को साथ लिए जाईये। चुनाँचे वो गुलाजृत से पुर मटका उठा लाया।
और कहने लगा के इसी में है आपका वो मेहबूब जो जब तक इस लड़की
के अन्दर मौजूद था। तो ये लड़की आपको अच्छी लगती थी। और अब
ये समें से निकल गया है तो लड़की अच्छी नहीं लगती। लीजिए आपका
पेहबूब हाजिर है। ले जाईये इसे साथ। वो अमीर आदमी बड़ा शर्मिंदा
हुआ और उठकर चला गया। ( मसनवी शरीफ )
सबक:- दुनयवी और गैर शरई मोहब्बत गुलाजत का एक ढेर ही है।
आदमी को चाहिए के हुस्न जाहिरी पर फरिफ्ता ना हो के उसकी असल
सरासर गूलाजत की पोट ही है…
रोगनी है ज़र्फा इसानी बजाहिर और बासिल
हम को है मालूम जो कुछ उसकी आन व गुल में है

हिकायत नम्बर७७ चालाक औरत
( मंजम हिकायत ) का
था मुजर्रिद और बूढ़ा एक
आजमोदा था जहाँ के गर्म सर्द
चैन से रहता था वो सुबह व मसबा
आई कमबख्ती निकाह इ़क जा किया
बीवी जो आईं बड़ी चालाक थी
बद रोया बे हया बे बाक थी

चाटने खाने से उसको काम था
और यही काम उसका सुबह व ज्ञाम था
एक दिन मेहमान आया उनके घर
उसकी खातिर ग्रोश्न आया सैर भर
भूनती जाती थी जब के देगची
बोटी इक डक चुन के जालिय खा गर्ड
देखकर हॉांडी को खाली ये किया
लाई बाहर से मियाँ को वो बुला
और कहा तुम को ना आया यर्कीं
है मगर सच झूट जर्रा भर नहीं
उस निगयोड़ी बिल्ली को तुम देखना
बेटी है क्‍या भोला भाला मुह बना
भूनती थी में मसालह ग्रोश्त का
गोश्त था इक तास में रखा हुआ
में लगी चखने मसालह का नमक
गोश्त साय कर गई चट बे धड़क
कुछ ना बोला मर्द साहब दिल मगर
जाके ले आया तराज दोड़ कर
पलड़े में बिल्‍ली को रखा की ना देर
वजन में पूरी जो निकली एक सैर
ये कहा मुझ को बढ़ा ऐ बे हया
वजन है बिल्ली का या ये गोश्त का?
गोश्त है कर ये तो बिल्ली है कहाँ?
है जो बिल्ली योश्त का दे तो निशा!
नतीजा
नाव कागज की कभी बहती नहीं
काठ की हंडिया सदा रहती नहीं
झूट तेरा जाहिर इक दिन होएगा
चोर के सौ दिन तो इक दिन साथ का
( दर मंजम तर्जुमा मसनवी शरीफ )

 

हिकायत नम्बर 940 हजरत अबु सईद

रहमत-उल्लाह अलेह

हजरत अब्दुर्रहामन बिन जाफर अलेह अर्रहमा फरमाते हैं। मैं बसरा
प्रें रहता था। और मरे पड़ोस में एक मस्जिद थी। जिसमें मैं पाँचों नमाजें
बा जमात अदा किया करता था। इस मस्जिद के इमाम एक खुदा रसीदा
बुजुर्ग थे जो “अबु सईद” के नाम से मश्हूर थे। हजरत अबु सईद हर रोज
मुबह बाद अज्‌ नमाज फञ्न वअज फरमाया करते थे। एक साल में हज
के लिए घर से निकला। इस साल बड़ी सख्त गर्मी पड़ रही थी। इसलिए
मैं जिस काफले के साथ था। रात को उनसे जुदा होकर सारी रात सफर
करता, और सुबह होती तो किसी मंजिल पर कयाम कर लेता। और
दिन भर वहीं रहता। शाम तक मेरा काफला भी वहाँ आ जाता। और मैं
दूसरी रात फिर आगे बढ़ता! एक रात मैं रास्ते से भटक गया। और अपने
काफले से बाहर जुदा हो गया। और एक खतरनाक दछत में पहुँच गया।
मूरज चढ़ा। तो दिल घबराया। के अब क्‍या होगा। दोपहर को गर्मी की
शिह्ठत और रेत का सहरा और काफले से जुदाई। इन बातों ने मौत का
पकौन दिला दिया। और इस तसव्युर से एक मुकाम पर लेट गया। और
गत की इंन्तिजार करने लगा। इतने में मुझे किसी शख्स की आवाज
मुनाई दी। जो मेरा नाम लेकर मुझे पुकार रहा था। मैंने हैरान होकर ऊपर
जो देखा तो ये वही मस्जिद के इमाम अबु सईद थे। उन्हें इस दश्त में
देखकर हैरान रह गया। और अल्लाह का शुक्र भी अदा किया। अबु सईद
फरमाने लगे। तुम भूके मालूम होते हो? मैंने कहा। हाँ! फरमाया! लो
ये रोटी खाओ। फिर फरमाया। लो ये रोटी खाओ। फिर फ्रमाया। तुम
णासे भी हो? कहा। हाँ। फरमाया। लो पानी भी मौजूद है। चुनाँचे मैंने
पेट भर कर रोटी भी खाईं और पानी भी पिया। और मेरी जान में जान
आईं। हजरत अबु सईद ने फिर फरमाया। लो अब मेरे पीछे पीछे चले
आओ। मैं उनके पीछे पीछे चलने लगा। और थोड़ी ही देर चलने के बाद
पक्का मोअज़्जमा के शहर की दीवारें नजर आने लगीं। और हम मक्का
अज्ज्मा पहुँच गए। फिर आपने मुझे एक जगह ठहरा कर फ्रमाया। के
‘हीं ठहरो। तुम्हारा काफला तीन दिन के बाद यहाँ पहुँचेगा। आपने मुझे
“के रोटी और फरमाया ये तुम्हारे लिए काफी है। चुनाँचे मैं तीन दिन तक
उसी एक रोटी से दो लुक्मे खाता रहा। और सैर शिकम हो जाता रहा।

तीसरे रोजू हमारा काफला भी आ पहुँचा। और फिर जब हम अरफात
में पहुँचे। तो मैंने हजरत अबु सईद को जबले रहमत के करीब दुआ में
मशगल देखा। मैंने सलाम अर्ज किया। तो फरागृत के बाद उन्होंने सलाम
का जवाब देकर फ्रमाया। के कुछ हाजत हो तो कहो। मैंने कहा। मेरे
लिए दुआ कीजिए। चुनाँचे उन्होंने दुआ की। उसके बाद फिर उन्हें नहीं
देखा। हत्ता के जब हम हज के बाद बसरा पहुँचे। और रात घर कयाम
करने के बाद सुबह उसी मस्जिद में नमाज पढ़ने गया। तो हजरत अबु
सईद ही जमाअत करा रहे थे। और बाद नमाज आपने हस्बे दस्तूर वअज
भी फरमाया। वअज्‌ के बाद मैंने उन से मुसाफहा किया। तो आपने मेरा
हाथ दबाया। गोया इर्शाद फरमाया के राज जाहिर ना करना। मैंने मस्जिद
के मौअज्ज्न से पूछा के हजरत अबु सईद इन दिनों कहीं गए तो नहीं थे
तो मौअज्ज्न ने हलफिया बयान किया। के एक रोज भी आप मस्जिद
से गैर हाजिर नहीं रहे। बाक॒यदा पाँचों नमाजें पढ़ाते रहे हैं। और सुबह
बअज भी फरमाते रहे हैं। ये बात सुनकर मैंने यकीन कर लिया। के हजरत
अबु सईद अब्दाल में से हैं। ( राज-उल-फायक्‌, सफा 54)

सबक: – मालूम हुआ के अल्लाह के मक्बूलों को खुदा तआला ने
बड़ी ताक॒तें अता कर रखी हैं। वो दिनों और महीनों का रस्ता पल भर में तय
कर लेते हैं। और ये भी मालूम हुआ के हवा के वो एक वक्‍त में यहाँ भी
और वहाँ भी हो सकते हैं। और ये भी मालूम हुआ के अल्लाह के मक्बूल
बन्दे मुश्किल और मुसीबत के वक्त मदद को लिए पहुँच जाते हैं। फिर जो
इन मक्बूलों के भी सरदार और रसूलों के भी रसूल और सारी कायनात
के बादशाह हैं। यानी हुजुर सय्यद-उल-अंबिया अहमदे मुजतबा, मोहम्मद
मुसतफा सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम। उनके इख्तियार व तसररूफ
और उनके दाफओ-उल-बला और हामी नासिर होने में अगर कोई शख्स
कलाम करने लगे तो वो किस क॒द्र जाहिल व बद नसीब है।

हिकायत नम्बर 940 मर्दे जाकिर

. एक बुजर्ग फ्रमाते हैं। एक रोज मैं मस्जिद हराम से निकल कर जबले
अबी कैस पर गया। तो मैंने एक सियाह रंग आदमी को देखा जो बड़े जौक
व शौक से जिक्रे हक्‌ में मशगल था। और ये कलमात कह रहा था अंता।
अंता। याहू। याहू” बस यही कलमात बार बार दोहरा रहा था। मैंने जब उसे
देखा के इन कलमात के सिवा और कुछ कहता ही नहीं। तो मैंने उससे कहा

के तुम पागल तो नहीं हो? ये सुनकर वो बोला। के या शेख! पागल तो वो है
जो इतने कदम चल कक पहुँचे। और इस अर्से में अपने मालिक को एक
ब्रार भी याद ना करे ” मैंने कहा। भईं! खुदा का जिक्र दिल से करना ज़्यादा
अफजूल है। वो बोला। ठीक है मगर दिल जब जिक्रे हक्‌ से पुर हो जाए। तो
वो जुबान पर भी छलकने लगता है। इतना कहकर वो मेरी नजरों से गायब
हो गया। और मैं बड़ा नादिम हुआ के मैंने ऐसे मक्बूल से ये तकरार क्‍यों
की। फिर रात को जब सोया हूँ। तो ख़्वाब में एक निदाऐं हातिफ सुनी के इस
प्रियाह रंग के आदमी की हमारे नजदीक बहुत बड़ी क॒द्र है। और कयामत के
गेज हम उसे एक ऐसा नूर अता फ्रमायेंगे। जिस नूर से सारा माहोल चमक
उठेगा। ( रोज-उल-फायक 77)

सबक्‌:- अल्लाह के मक्बूल बन्दों का दिल भी और जबान भी
बुदा के जिक्र में मशगल रहती हैं। और वो किसी लम्हा अपने मालिक को
फारोमोश नहीं करते। और ये भी मालूम हुआ के मक्बूलाने हक को कभी
हिकारत की निगाह से ना देखना चाहिए! इसलिए के ये अपने अल्लाह के
नजदीक बड़ी क॒द्रों मंजिलत के मालिक होते हैं।

हिकायत नम्बर 940 तीन तीर

 

हजरत फजील रहमत-उल्लाह अलेह एक बहुत बड़े क॒ज्जाकु थे। एक
रात वो अपने गलाम की गौद में सर रखे सो रहे थे। के दफअतन एक काफला
जाहिर हुआ। काफले वालों ने जब राह में फजील को देखा। तो डर गए। और
कहने लगे। के अब हम क्‍या करें। फजील क॒ज़्जाक वो रास्ते में मौजूद है।
काफले में तीन शख्स हाफिज करआन और कारी भी थे। कहने लगें ठहरो
हम इस पर तीन तीर बरसाते हैं। मुमकिन है के वो असर कर जायें। चुनाँचे
अमें से एक ने तीर फैंका और ये आयत पढ़ी। अलम याती लिल्लजीना
आमनू अन तख़्शा कलूबूहुम लिज़िक्रिल्लाही “क्या ईमान दारों पर वो
‘केत नहीं आया के जिक्रे इलाही से उनके दिल कपकपा उठें।” |

फजील ने ये आयत सुनी तो लर॑ज गए। इतने में दूसरे ने ये आयत पढ़ी:

फाफिरू इललाही ्न्नी लकुम मिनहू नजीरू मुबीना “अल्लाह की
गफ्‌ रूजू करो। मैं उसकी तरफ से तुम्हें डराता हूँ।”

ये आयत सुनकर फजील चीख मार कर रोने लगे। इतने में तीसरे ने ये

पढ़े दी।
वे आनीबू इला रब्बीकुम असलिमू लहू मिन कब्ली अन यातीकुम

अलअज़ाबु सुम्मा ला तनसुरूना “अपने रब की तरफ रूजू करों और
अजाब टूट पड़ने से पहले पहले मान जाओ। क्योंके इस वक्त तुम्हें मदद ना
मिलेगी।”

अब तो फजील बे काबू हो गए और अपने साथियों से कहने लगे।
यहाँ से सब पलट जाओ। मैं अपनी करतूतों पर नादिम हूँ। मेरे दिल में खौफ
इलाही घर कर गया है। ये कहकर मक्का मोअज़्जुमा को रवाना हो गए
और सच्चे दिल से तायब होकर अल्लाह के वलियों में शुमार होने लगे।
( नुजह्त-उल-मजालिस , जिल्द, 2 सफा 6)

सबक्‌:ः- अल्लाह का खौफ बड़ी अच्छी चीज है। उससे इंसान की
काया पलट जाती है। और उम्र भर के गुनाह छूट जाते हैं। और आदमी
अल्लाह का मक्बूल बन जाता है।

हिकायत नम्बर 940 हलवा फरोश

 

एक बुजर्ग जिनका नाम अहमद था। वो कर्ज ले ले कर लोगों को
खिलाया पिलाया करते थे। इस आदत की वजह से उनके जिम्मे बहुत सा
कर्ज हो गया आपका जब आखरी वक़्त आया। तो कर्ज ख्वाह आपके
पास जमा हो गए। और तकाजा करने लगे। के आप तो मर रहे हैं। हमारे
रुपये किसी तरह देते जाईये। थोड़ी देर के बाद एक हलवाई लड़का हलवे
की सीनी लिए हुए हलवे की आवाज देता हुआ गुजरा। हजरत अहमद
ने उसे बुलवाया और सब हलवा उससे खरीद लिया। और उन सब कर्ज
ख़्वाहों को खिला दिया। लड़के ने हलवे के पैसे माँगे तो आपने फरमाया
के जहाँ ये लोग बैठे हैं। तू भी बैठ जा। ये सब मेरे कर्ज ख्वाह हैं। तू भी
इन में शामिल हो जा। लड़के ने रोना शुरू कर दिया। के मैं एक गरीब
और गरीब बाप का लड़का हूँ। मेरा बाप मुझे मार डालेगा। लोगों को ये
बात बहुत नागवार गुजुरी के नाहक्‌ इस लड़के को सताया और रूलाया।
वो बुजर्ग खामोश पड़े थे। इतने में एक रईस का फ्रसतादा आया। और
बहुत सा रुपया सामने लाकर रख दिया और कहा के ये फलाँ रईसे ने
भेजा है। हजरत ने उस रुपये से सब कर्ज ख्वाहों का कर्ज अदा कर दिया।
एक खादिम ने अर्ज किया के हजरत इसमें क्या हिकमत थी के आपने
मरते दम भी हलवाई लड़के से हलवा खरीद कर अपने जिम्मे कर्ज और
बढ़ा लिया। फ्रमाया के मैंने खुदा से दुआ की के मेरा कर्ज अदा हो
जाए। तो इर्शाद हुआ के कर्ज की अदाएगी कोई मुश्किल नहीं। मगर कोई

तो दरया-ए-रहमत जोश में आए। लेकिन तुम्हारे इन कर्ज ख़्वाहों में
क्षोई रोने वाला तो है नहीं। सब खामोश बैठे हैं। इसलिए मैंने उस गरीब
लड़के से हलवा खरीदा। जब उसने रोना शुरू कर दिया तो उसी वक्त
#मते हक को जोश आया। तो ये मेरी एक तरीकीब थी जो काम आई…
ताना गरीद को दके हलवा फरोश
बहर बख्यायश नमी आयद बजोश
( मसनवी शरीफ )
सबक:- अल्लाह के हुजूर तजुरों बजारी बड़ी मक्बूल है जो लाग अपने
गुतहों पर नादिम होकर रोते और सच्चे दिल से तायब हो जाते हैं। रहमते
हक उन्हें अपनी आगोश में ले लेती है।
दर तजर्रे बाश व्राशादाँ. शबी
गर ये किन ताबे दहाँ खिंदाँ.. शबी
ऐ खुशा दिल के आँ बरयान औसत
ऐ खोशा चश्मे के आँ गरयान औसत

हिकायत नम्बर 940 चालाक लोमड़ी

 

एक शेर ने जंगल के जानवरों को हुक्म दिया। के मैं अब बूढ़ा हो
चुका हूँ। आईंदा मार व धहाड़ और शिकार करके खाने की जेहमत
पुप्न से ना हो सकेगी। मेरा हुक्म है के फलाँ गार में हर रोज तुम खुद
है किसी जानवर को मुनतखिब करके मेरे पास भेज दिया करो। ताके
बैठे बिठाए अपना शिकार पा लिया करूं। जानवरों ने ये शाही हुक्म
गकर हर रोज किसी जानवर को मुनतखिब करके उस गार में भेजना
गुरू किया। दस पंद्रह दिन के बाद लोमड़ी का नम्बर आ गया। और गार
उसे जाना पड़ गया। चलते हुए लोमड़ी ने सारे जानवरों से कहा के
अल्लाह ने चाहा तो आज तुम सबकी मुश्किल दूर करके आऊँगी। दुआ
फेते रहना। आज मेरा इरादा शेर को खत्म करके आने कां हैं जानवर
रैशन हुए। के ये क्‍या कहती है? लोमड़ी चली गईं। और वक्त मुक्रर
॥ बिलइरादा कुछ देर से गार में पहुँची। शेर ने गुस्से में पूछा। के देर
क्यों आई? लोमड़ी ने जवाब दिया हुज्र! हम दो बहनें थीं और हम
गे ही आपके “राशन” के लिए आ रही थी के रास्ते में एक और
के… गया। उसने जबरदस्ती मेरी बहन को पकड़ लिया। और कहा।
से मैं खाऊँगा। और उसे साथ ले गया। मैंने बहतेरा कहा। के हम

दोनों अपने बादशाह की खूराक हैं। मगर हुज॒र! वो तो आपको भी कुछ
नहीं समझता। और आपकी परवाह किए बगैर मेरी बहन को ले गया है|
ये किस्सा सुनकर शेर गस्से में आ गया। और कहा चलो मुझे वो शेर|
दिखाओ कहाँ है? पहले में उससे निपट लूं। चुनाँचे लोमड़ी उसे एक गहरे;
कएँ पर ले आई। और शेर को कुएँ के किनारे खड़ा करके साथ ही आप|
भी खड़ी हो गईं। और कुएँ के अन्दर पानी की तरफ इशारा करके कहने |
लगी। ह॒जर! वो देखिये। वो शेर है और वो साथ ही उसके मेरी बहन
खड़ी है। शेर ने देखा तो उसे बाकुई ( अपना अक्स ) शेर नजर आबा।
और साथ ही ( लोमड़ी का अक्स ) लोमड़ी भी नजर आईं। तो ग्ससे में,
उसने मुंह फाड़ कर उस ( अपने ही अक्स ) शेर पर हमला करने को;
जस्त लगा दी और जस्त लगाते ही कुएँ में जा पड़ा। लोमड़ी ने किनारे!
पर से कहा। बादशाह सलामत! बन्दी सलाम अर्ज़ करती है। अफसोस!!
के आपका आखरी वक्त आ पहुँचा। ये कहकर लोमड़ी वापस चल गईं।
और शेर कुएं में डूब कर मर गया। ( मसनवी शरीफ ) ।

सबक :- जिस तरह इस शेर ने बजोौम खवैश दूसरे शेर पर हंमला
किया था। हालाँके वो उसका हमला किसी गैर पर ना था। बल्के खुद अपनी
ही जात पर था। जिसके बाइस वो हलाक हो गया। इसी तरह वो लोग जो
अपने भाईयों को लूटते हैं। कम तोलते हैं। रिश्वत लेते हैं। और दूसरों पर जल्म
करते हैं वो दरअसल किसी दूसरे पर नहीं बल्के खुद अपनी ही जान पर जल्म
करते हैं। पस अगर सलामती दरकार है तो किसी भाई पर जल्म ना करो।

 

हिकायत नम्बर 940 इत्तिफाक्‌

( मंजम हिकायत )
एक जंगल में कहीं दो बैल थे
शेर ने उन पर कह हमले किए
को मगर रहते थे दोगें एक जा
एक लहज़ा भी ना होते थे जुदा
मिल के और सौंगों को करके सामने
मारते थे दोनों टक्कर शेर के
जब लगाते मिल के टक्कर और सुम
भायता था शेर हो के नोक दुम
काम देखा जोर से चलता नहीं

 

फिक्र कर तदबीर ये स्रोची वहीं!!
पाके मौका एक ने उससे कहा
मुफ़्त क्यों खोता है जान अपनी भला
यार से तेरे अदावत है मुझे
कुछ भी हो जाए ना छोड़्या उसे
है कृसम मुझ को खुदा की कर यकीन
तुझ से मेरे दिल में कीना कुछ नहीं
दोस्ताना ये समझ मेरा सुख्न!
साथ उसका छोड़ दे अहमक ना बन
आ गया दुश्पन के दम में वो गधा
बैल ही आखिर था धोका खा गया!
इस तरह से जब गए दोनों वो फट
शेर ने फौरन किया दोनों को चट

(मोतियों का हार तर्जुमा मसवी शरीफ )

सबक :-
है अजब जशै उत्तिफा बाहमी
ये कहावत क्‍या नहीं तुम ने सुनी
दुश्मनों को जेर करना हो अगर
तफर्रक डाल उनमें और मग्रलूब कर

 

हिकायत नम्बर 940 दिल की बात

 

देवबंदी हज॒रात के हकीम-उल-उम्मत मौलाना अशरफ अली साहब

धानवी लिखते हैं। शाह अब्दुर्रहीम साहब के पहले पीर का नाम भी शाह

साहब ही था। फरमाते थे के एक मर्तबा मैं अपने पीर का सर

रेबा रहा था, पीर साहब ने कहा। के खूब अच्छी तरह जोर से दबाओ। मेरे

में खयाल आया के जो बहुत जोर से दबाऊँगा तो सर खरबूजे की तरह

जाएगा। ( क्‍योंके शाह साहब खूब कृवी थे ) पीर साहब ने फ्रमाया।

फे नहीं भाई तुम खूब जोर से दबाओ। खरबूजे की तरह नहीं पिचकेगा।

हे भलफूजात हसन-उल-अजीज , सफा 90 यानी मोलवी अशरफ्‌ अली थानवी

मलफूजात )

के सबक :- उन अल्लाह के वलियों से कोई बात छूपी नहीं रहती। और

दिलों को बातें भी जान लेते हैं। फिर अगर कोई शख्स खुद हुजर सरवरे

9९९06 099 (थ्वा]5८शाशश’

सच्ची हिकायात 692 थे हिस्सा चहारम
आलम सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍्लम के इल्म में कलाम करे और ये
कहे के उन्हे दीवार के पीछे का भी इलम ना था तो वो किस कंद्र जाहिल है।

हिकायत नम्बर 940 दूरदराज से

 

एक मगरिबी शख्स ने एक रईस से 50 रुपये कर्ज माँगे। रईस ने कहा
के एक साहब मेरे दोस्त हैं। उनका एक दुश्मन लंदन में है। अगर तुम उसको
किसी तरकीब से मार दो। तो मैं तुम्हें उन से 450 रुपये दिलवा दूंगा। इस शख्स
ने वादा किया! चुनाँचे साहब के पास गए। इस शख्स ने एक आईना मंगवाथा।
और साहब से इस आईने में देखने के वास्ते कहा। चुनाँचे देखा। तो उसमें
लंदन नजर आया। और वो दुश्मन बाजार में जा रहा था। उस शख्स ने साहब
से कहा के आप निशाना दुरूस्त करके पंचा का फायर कीजिए। चुनाँचे
फायर किया गोली गायब हो गई। वो साहब बराबर आईना में देखते रहे। के
वो शख्स गोली खा कर गिरा। फिर उन्होंने अहतियातन लंदन से बजरिया तार
अपने किसी दोस्त से खुबर मंगाई के फलाँ शख्स का क्या हाल है। वहाँ से
खूबर आई के वो फलाँ शख्स का क्‍या हाल है। वहाँ सफा खबर आई के वो
फलों तारीख में इस तरह हलाक हुआ। के दफअतन गोली आकर लगी। और
पता ना चला के किस ने गोली चलाईं। पुलिस तहकीकात में मसरूफ है।
कातिल का हनूज पता नहीं चला। जब साहब बो अपने दुश्मन की हलाकत
का यकौन हो गया तो उन्होंने मुआहेदा से कुछ ज़्यादा रुपये पेश किए। तो
इस मगरिबी ने सिर्फ 50 रुपये लेकर बाकी जायद वापस कर दिए।( मोलबी
अशरफ्‌ अली थानवी के मलफूजात हसन-उल-अजीज , सफा 9)

सबक :- एक मगरिबी शख्स अगर इतनी दूरदराज से किसी शख्स
को लंदन में जरर पहुँचा सकता है और उसकी गोली सेंकडों मील दूर से मार
कर सकती है और एक आईना के जूरिये वो सेंकड़ों मील दूर की चीज देख
सकता है और दिखा भी सकता है तो फिर अल्लाह के बली में ये ताकुत क्‍यों
नहीं हो सकती। के वो सेंकड़ों मील दूर की चीज को आईना करामत के जरिये
से देख भी ले और दिखा भी दे। और दूर दराज से वो अपने अकीदतमंदों की
मदद फ्रमाए। और नफा पहुँचाए। और फिर जो उन सब मक्बूलों के सरदार
हुजूर अहमद मुख्तार सल-लल्लाहो तआला अलेह व सललम हैं। उनकी बे
पनाह ताकतों और बे नजीर तसर्सूफात का जो इंकार करे। और यूं कहे के
जिसका नाम मोहम्मद है वो किसी चीज का मालिक व मुख्तार नहीं। और
वो कुछ नहीं कर सकते। तो वो शख्स किस क॒द्र बदबझ्त और गुमराह है।

हिकायत नम्बर 940 हक हक हक

 

शेख अहमद अब्दुलहक रूदोलवी ने शादी की। औलाद भी हुई मगर
औलाद जिन्दा ना रहती थी जो बच्चा पैदा होता था वो तीन मर्तबा हक हक
हुक कहकर मर जाता था। एक मर्तब्रा आपकी बी बी इस रंज की वजह से
के औलाद नहीं जीती। आपके सामने रोई। आपने फरमाया के अच्छा अब जो
बच्चा पैदा होगा वो “न्दा रहेगा। चुनाँचे फिर जो बच्चा पैदा हुआ उसने हक्‌
हक हक्‌ नहीं किया। और वो जिन्दा रहा। ( मोलवी अशरफ अली थानवी के
प्रलफूजात हसन-उल-अजीज , सफा ॥00)
सबक्‌:- मालूम हुआ के अल्लाह के मक्बूलों से फरयाद करना
जायज है। और अल्लाह के वलियों से औलाद और औलाद की जिन्दगी
हलब करना शिक नहीं। और ये भी मालूम हुआ के अल्लाह के मक्बूलों
को नजर से मौत भी जिन्दगी बन जाती है। और ये भी मालूम हुआ के जो
बात अल्लाह के मक्बूल कह दें वो हो जाती है। और ये भी मालूम हुआ के
अल्लाह के वलियों को ये इल्म होता है के फलाँ बच्चा मर जाएगा और फलाँ
जिंदा रहेगा। फिर जो सारे वलियों और नबियों के भी सरदार के इखि्तियार
व तसरूफ में और उनके इल्मे पाक में कलाम करे वो किस कद्र बद नसीब
और नाकृद्र शनास शाने रिसालत है।
नोट:- ये तीनों हिकायात मोलवी अशरफ अली साहब थानवी की
यान की हुई हैं। लिहाजा जो शख्स मोलबी साहब मज॒कूर से अकीदत
जता है। इसे हुजर सरवरे आलम सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍्लम
कि गैल और हुजर के इख़्तियार व तसरूफ का इंकार जैब नहीं देता।
पही औलिया इक्राम के मतलअ अललअसरार होने और उनके तसर्ूफात
शिर्क बताना मोलवी अशरफ अली साहब की इन तहरीरात के खिलाफ
इसी तरह मोलबवी अशरफ अली साहब की कोई अपनी तहरीर भी
दूसरी जगह इन तहरीरात के खिलाफ हो काबिले कबूल हर गिज
“हीं। हक यही है जो उन ऊपर की हिकायात में लिखा गया है।

हिकायत नम्बर७9) फिरऔन की हलाकत
पके रोज खुदा तआला ने हजरत मूसा अलेहिस्साम से फ्रमाया के ऐ
की! मेरी तरफ से फिरऔन से कहो। के क्या तुम मुझ से सुलह कर लेने
जैवाहिश रखते हो? अगर रखते हो तो तूम ने सारी उम्र अपने नफ्स की

पैरवी में गुजार दी। अब अगर एक साल भी तुम हमारी मर्जी पर चलो। तो
हम तेले उप्र भर के गुनाह माफ फ्रमा देंगे। और अगर तुम से इस क॒द्र ना हो
सके। तो सिर्फ एक महीना ही हमारी इताअत करो। अगर ये भी ना हो सके
तो एक रोज ही सही। ये भी नहीं तो एक सांस में लाइलाहा इल्लल्लाह कह
लो। तो हमारी तुम्हारी सुलह हो जाएगी।

. हजरत मूसा अलेहिस्सलाम ने ये पैगामे हकू फिरऔन तक पहुंचाया
तो वो जालिम गस्से में आ गया। और सारे लश्कर को जमा करके बरसरे
दरबार कहने लगा। कौन है मेरे सिवा दूसरा कोई रब? अना रब्बीकुम
अललआला फिरऔन का ये मुताकब्बिराना एलान सुनकर जमीनो
आसमान लरजू उठे। और उसके हलाक किए जाने की खुदा तआला से
दुआ माँगी। हक्‍्म हुआ। के फिरऔन कुत्ते की मानिंद है। उसे तो सिर्फ
एक लकड़ी ही काफी है। ऐ मूसा! तुम अपना असा जमीन पर डालो। मूसा
अलेहिस्सलाम ने असा जमीन पर डाला। तो वो एक अजीम अजदहा बन
गया। हजरत मूसा अलेहिस्सलाम ये असा लेकर फिरऔन के दरबार में
पहुँचे। और उसे अपना ये करिश्मा दिखाया। तो वो डर कर अपने महल
में भाग गया। मूसा अलेहिस्सलाम ने फरमाया। ऐ फिरऔन! अगर तू
घर से ना निकलेगा तो मैं अपने असा को वहीं तेरे पास पहुँच जाने का
हुक्म दूंगा। ये सुनकर फिरऔन बोला। ऐ मूसा! मुझे थोड़ी सी मोहलत
मिलनी चाहिए। और इस क॒द्र जल्द हलाक करना ना मुनासिब है। मूसा
अलेहिस्सलाम से खुदा तआला ने फरमाया। ऐ कलीम! से मोहलत दे दो।
क्योंके मैं हलीम हूँ हजरत मूसा अलेहिस्सलाम ने उसे चालीस रोज तक
की मोहलत दे दी। मगर जालिम ने अपना इंकारो कुफ्र फिर भी ना छोड़ा।
पस खुदा तआला ने उसे दुनिया व आखिरत के अजाब में पकड़ लिया।
और यहाँ दुनिया में उसे अजाब गृर्क में मुबतला किया। और आखिरत
में दोजूख के अलमनाक अजूब में डाल दिया। ( नुजुहत-उल-मजालिस,
फसल फी अलजिक्र, सफा 33)

सबके्‌:- खुदा तआला बड़ा गुफ्र-उर-रहीम है। कोई शख्स उप्र भर
गुनाह करता है। मगर पल भर के लिए भी सच्चे दिल से तौबा कर ले तो
खुदाए तआला उसके सारे गुनाह माफ फ्रमा देता है। और ये भी मालूम हुआ
के तकब्युर व गुरूर और अनानियत बहुत बुरी चीज है। इससे आदमी तबाह
व हलाक हो जाता है। तकब्बुर खुदा ही को जैबा है। और ये भी मालूम हुआ
के अल्लाह के पैग॒म्बरों को बड़े बड़े मोजजात अता हुए हैं। और जो अल्लाह

पैगम्बरों ( अलेहिम अस्सलाम ) की इताअत नहीं करते। वो दुनिया व
अखिरत के अजाब में मुबतला हो जाते हैं।

हिकायत नम्बर 940 गाय

 

एक आबिद का एक शख्स पर गुजर हुआ। जो गाय की पूजां कर
हा था। आबिद ने उससे फ्रमाया। ऐ नादान! इस गाय की पूजा ना कर
और ये बुत परस्ती छोड़ कर मुसलमान हो जा और लाइलाहा इल्‍लल्लाह
प्रोहम्मदुरयूल अल्लाह पढ़ ले। उस शख्स ने कहा के मैं तो ये कलमा
हगिजू ना पढ़ंगा। आबिद ने उस गाय की तरफ मुंह करके कहा। ऐ गाय!
ढक लाइलाहा डल्लल्लाह तू आग का शौला बन जा। चुनाँचे गाय हुक्म
हलाही से आग का शौला बन गई। फिर इस आबिद ने उस शख्स से कहा। देख
अब भी कलमा पढ़ ले। वरना तू भी इसी तरह आग का शौला बन जाए। उस
शस््स ने फौरन पढ़ लिया और मुसलमान हो गया। ( नुजहत-उल-मजालिस,
जिल्द अव्वल, सफा 4)

सबक्‌:- अल्लाह के नेक बन्दे बुरा काम होता देखें। तो उससे मना
करे हैं और ये भी मालूम हुआ के औलिया इक्राम की करामात बरहक हैं।
और ये भी मालूम हुआ के ये गाय जिसे बअज लोग अपना “खुदा” समझते
हैं। मुसलमान की नजुर में ये महज एक जानवर ही है। और मुसलमान के
ग़बे बल्के मुसलमान की ग्िजा। गोया मुशरिक का जो खुदा है। मुसलमान
को वो गिजा है।

हिकायत नम्बर 940 एक राहिब का ख़्वाब

हजुरत मालिक बिन दीनार रहमत-उल्लाह अलेह एक रोज एक इसाई
गहिब के गि्जे के पास से गुज़रे। तो आपने अन्दर से राहिब की आवाज
। जो यूं कह रहा था।
ऐवबो मुकृदस जात जिसके हरम में डरने वाले और लोगों के सताए हुए
९, लेते हैं। और तालिब लोग उसकी रहमत व नअओमत में रगबत करते
| मैं तेरे इन्तिकाम से रिहाई की दरख्वास्त करता हूँ। और अपने गुनाहों की
चाहता हूँ। इन गुनाहों की जिनकी लज्ष्ज्त मिट गई और मुशक्क्‌त
रहे गईं ।”
के मालिक बिन दीनार ये आवाज सुनकर राहिब के पास पहुँचे। और पूछा
ये इंकिलाब कैसे आ गया। तो वो बोला। के मैं इसाई था लेकिन अब

नहीं रहा। बात ये हुईं। के एक रात ख़्वाब में देखा। के कोई कहने वाला बड़े
तसल्ली बख्श लहजे में कह रहा है। के ऐ राहिब! भला तू कब तक शिक व
कुफ्र में मुबतला रहेगा। बिला शक ईसा ( अलेहिस्सलाम ) खुदा के बन्दों में
से एक बरगजीदा बन्दे और उसके पैगृम्बर हैं। मगर वो खुदाया खुदा के बेटे
हर गिज नहीं। मैंने पूछा। आप कौन हैं? तो फ्रमाया।.__ हिल
मैं गुनहगारों का शफीअ, आखिर जूमान का पैगृम्बर हूँ और वो रसूल
हूँ, जिसकी बशारत ईसा अलेहिस्स्लाम ने भी दी। और जिसकी पेशगोई
इंजील में भी मौजूद है। और मैं वो हूँ जिसकी नबुव्वत को गवाही मूसा
( अलेहिस्सलाम ) ने भी दी और जिसके ओसाफ तौरात ने भी बयान किए।”
फिर इस मुबारक शख्स ने मेरे सीने पर अपना रहमत का हाथ फैरा।
और ये दुआ पढ़ी। अल्लाहुम्मा अलहम अब्दुकररशाद व वफकुलसदाद
“यानी इलाही! तो अपे बन्दे के दिल में हिदायत की बात डाल दे और
जमे रास्ती और सच्चाई की तौफीक अता फरमा।”
जूही मैं नींद से चौंका तो मेरे दिल में इस्लाम की मोहब्बत मौजूद थी और अब
में मुसलमान हूँ। अलहम्दू लिल्‍लाह अला जालिका ( नुजहृत-उल-मजालिस,
जिल्द अव्वल, सफा 4)
सबक्‌:- हमारे हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम आज
भी जिन्दो और कृयामत तक के लिए हादी व रहबर हैं। और आप जिस पर
नजरो करम फरमा दें। उसकी काया पलट जाती है और वो दोजख से निकल
कर जन्नत का मालिक बन जाता है। |

हिकायत नम्बर 940 राहिब के सवालात

 

सालेहों का एक मर्दे मुजाहिद रास्ता भूल कर एक ऊँचे पहाड़ पर
चढ़ गया। वहाँ उसने देखा, के इसाईयों का एक बहुत बड़ा मजमअ लगा
हुआ है। और बीच में एक बड़ी कुर्सी लगी हुई है। मर्दे मुजाहिद ने उनसे
इस इजतमअ और बीच में खाली कुर्सी होने की बजह पूछी। तो वो बोले
के हमारे पास साल भर में एक दफा एक राहिब यहाँ आता है और कुछ
वअज व नसीहत करता है। इसीलिए हम यहाँ जमा हैं और ये कुर्सी इस
राहिब के लिए है। वो मर्दे मुजाहिद भी इस मजमओ में बैठ गए। थोड़ी
देर में एक राहिब आया। और उस कुर्सी पर बैठ गया और चारों तरफ
मुतजस्सुस नजरें डाल कर कहने लगा। ऐ हाज्भीन! आज मैं तुम लोगों को
वअज नहीं सुनाऊँगा। कक्‍योंके इस वक॒त तम में उम्मते मोहम्मदिया का

क्ोई शख्स मौजूद है। ये कहकर फिर उसने चारों तरफ नजर डाली। और
ब्राअवाज्‌ बुलंद कहा। ऐ मोहम्मद! मैं तुझे तेरे दीन की कसम देता हूँ के
हम सबके सामने आ खड़ा हो। ताके हम तुम्हें देखें। और तुझ से कुछ
प्वाल करें। वो मर्दे मुजाहिद फौरन उठा। और राहिब के सामने आ खड़ा
हो गया। और राहिब से कहा। मैं हँ मोहम्मदी! फ्रमाईये, आप क्‍या पूछना
बाहते हैं। राहिब ने कहा। मेरे चन्द सवालात हैं उनका जवाब दो। पहले
ये बताओ के मैंने सुना है के खुदा तआला ने जन्नत में रंग रंग के फल
और तरह तरह के मेवे पैदा किए हैं। क्‍या दुनिया में भी उन जैसे फल हैं?
पर्दे मुजाहिद ने जवाब दिया। बेशक दुनिया में भी उन जैसे फल हैं। मगर
वो जन्नत के फलों के साथ सिर्फ नाम और रंग में मुशाबहत रखते हैं।
मजे और लज्ज़्त में दुनिया के फलों को जन्नत के मेवों से कुछ मुनासबत
नहीं। उसके बाद राहिब बोला। के मैंने सुना है के जन्नत में कोई ऐसा
घर और बालाखाना नहीं। जिसमें शज्ञ तूबा की एक शाख मौजूद ना हो।
क्या दुनिया में उसकी कोई नजीर है। मैंने कहा। हाँ देखो। जब आफ्ताब
आसमान के वस्त में पहुँचता है तो जिस तरह शज्र तूबा की शाखें तमाम
परकानों में हर जगह पहुँची हुई हैं। इसी तरह इस वक्‍त आफ्ताब का नूर
हर जगह फैल जाता है। राहिब ने कहा के जन्नत में चार नहरें हैं। जिनके
मजे तो मुख्तलिफ हैं मगर उनका मुनब्बआ और जड़ जहाँ से वो निकली
हैं एक ही है। क्या दुनिया में इसकी भी नजीर है? [जाहिद बोला, बेशक
रैसको मिसाल भी दुनिया में है। देखो कान का पानी कड़वा है। आँख का
जारी। नाक का बूदार और मुंह का शीरीं। तो ये चारों पानी मजे और बू
में गो मुख्तलिफ हैं मगर इन सबको असल एक ही है। और वो है सर।
उसके बाद राहिब बोला। के बस एक बात और पूछनी है। मैंने सुना है के
जन्नत तरह तरह के खाने खायेंगे और किस्म किस्म के मशरूबात
गोश करेंगे। मगर उन्हें ना तो पैशाब की हाजते पड़ेगी ना पाखाना की।
जया दुनिया में उसकी भी कोई नजीर है? मर्दे मुजाहिद बोले के हाँ उसकी
पैसाल भी है। देखो जब तक बच्चा माँ के पेट में रहता है तो वो जिस
पीजू के खाने की ख्वाहिश माँ के दिल में डाल देता है और क॒द्गते खुदा
पेही गिजा बच्चा के पेट में पहुँच जाती है। मगर जब तक वो पेट में
ता है ना तो पायखाना ही करता है और ना ही पैशाब!

इसके बाद राहिब खामोश हो गया। और लोगों से कहने लगा। लो आज

मेरा वेअज ये है के लाइलाहा डल्‍लल्लाह मोहम्मदर्रसल अल्लाह

तुम भी मेरी तरह यही कलमा पढ़ लो। चुनाँचे वो सब कलमा पढ़कर
मुसलमान हो गए। ( नुजह्त-उल-मजालिस, जिल्द अव्वल, सफा $-% )
सबक्‌:- अल्लाह के मक्बूलों और मुजाहिदों के इल्मो इर्फान की
बदौलत हजारों को दौलते ईमान मिल जाती है।

हिकायत नम्बर 940 नफ्स की मुखालफत

 

मिस्र में एक राहिब रहता था। जिसे मुकाश्फा हसिल था। और उसके
मुकाएफे का बड़ा चर्चा था। वहाँ के एक मुसलमान आलिम ने ये सोचा
के उसके मुकाश्फे के चर्चे से कहीं ऐसा ना हो के अवाम मुसलमान
धोका खा जायें और उसके दाम में फंस जायें। इसलिए बेहतर है के इस
रहिब को कृत्ल कर दिया जाए। चुनाँचे वो आलिम एक खू्‌ंजर लेकर इस
राहिब के मकान पर पहुँचे और उसके दरवाजे को खटखटाया। राहिब ने
अन्दर से आवाज दी। के “ऐ मुसलमानों के आलिम व रहबर! खंजर को
वहीं डाल दो। और खुद अन्दर आ जाओ। आलिम ने खंजर को तो वहीं
छोड़ा और ख़ुद अन्दर चले गए। और राहिब से पूछा के ये तो बताओ। के
ये मुकाश्फा तुम्हें हासिल कैसे हुआ। राहिब ने कहा। नफ्स की मुखालफत
करने से। आलिम ने फ्रमाया। और तुम्हारा नफ्स मुसलमान हो जाने पर
खुश है या नहीं? राहिब बोला। नहीं। आलिम ने कहा। तो नफ्स की ये
मुखालफत अभी बाकी है। नफ्स की इस मामले में भी मुखालफत करो।
और कलमा पढ़ लो। चुनाँचे ये बात राहिब के दिल पर असर कर गई
और वो कलमा चघढ़कर मुसलमान हो गया। ( नुजुहत-उल-मजालिस,
जिल्द, अव्वल, सफा 87)

– सबक :- नफ्स की मुखालफत करने से एक फाफिर को भी ये मनसब
मिल जाता हैं के वो छुपी हुई बातों को जान जाता है। मालूम हुआ के दिल
की बातें जान लेना और पोशीदा बातों की खबर दे देना ये कोई कमाल
नहीं कमाल ये है के हुज्‌र मोहम्मद रसूल अल्लाह सल-लल्लाहो अलेह व
सल्लम की गुलामी इख़्तियार की जाए। और ये भी मालूम हुआ के जब एक
काफिर को भी अपने इसतदराज से ये इल्म हो जाता है। के उसके दरवाजे
पर कोन खड़ा है और उसके पास क्या चीज हैं फिर अगर कोई शख्स
सय्बद-उल-अंबिया सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्लम के मुतअल्लिक्‌
यूं कहने लगे के उन्हें दीवार पीछे की चीज का भी इल्म नहीं होता। तो वो
शख्स किता बड़ा रसूले दुश्मन और गुमराह है।

हिकायत नम्बर 680 बातिनी किला

 

जंग फारस में एक किले को मुसमानों ने घेर लिया। और मजूसी
अके अन्दर महसूर हो गए। इस किले में एक हसीन औरत थी। इस
औरत ने मुसलमानों के लश्कर में एक -हसीन मुसलमान को देखा। और
इस पर फ्रीफ्ता हो गई। इस औरत ने अपना एक कासिद भेजा। ताके
वो उस मुसलमान को इस औरत के पास ले आए। कासिद ने जब इस
शख्स को इस का पैगाम दिय तो वो बोला। के तुम उसे जाकर कह दो।
के तू अपना जाहिरी और बातिनी किला सिर्फ खुदा के लिए हमारे सपुर्द
कर दे। औरत ने जवाब दिया। के जाहिरी किला तो मैं समझ गईं। मगर
बातिनी किले को मैं नहीं समझी। के इससे क्या मुराद है। उसने जवाब
भेजा के इसका मतलब ये है के तू अपना दिल भी खास खुदा के लिए
प्ोंप दे। ये बात सुनकर औरत ने बेसाख़्ता कहा के अच्छा मैंने अपना दिल
खुदा को सोंप दिया। उसके बाद उस औरत ने किला खोल दिया। और
‘पुसलमानों का लश्कर अन्दर चला गया। औरत ने उस जवान मुसलमान
से कहा के तुम्हारे हांथ पर मुसलमान होना चाहती हूँ। उस नोजवान ने
कहा के चलो हमारे सरदार हजूरत अब्दुल्लह बिन उमर के पास। उनके
हाथ पर मुसलमान होना। चुनाँचे जब उसे हजरत अमीर लश्कर हजरत
अब्दुल्लाह बिन उमर के पास लाया गया तो वो कहने लगी के मैं उनसे
भी बड़े शख़्स के हाथ पर मुसलमान होंगी। आपने फरमाया। मेरे वालिद
हजरत अमीर-उल-मोमिनीन फारूके आजम के हाथ पर? उसने कहा।
हाँ! चुनाँचे उसे हजरत उमर के पास ले गए। उसने हजरत उमर से भी
पही कहा के मैं आपसे भी बड़े शख़्स के हांथ पर मुसलमान होंगी! हजरत
उमर ने फ्रमाया। उसे हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम की
फैब्न अनवर पर ले चलो। चुनाँचे उसे रोजा-ए-अनवर के पास लाया
गया। उस औरत ने जूहीं कब्र अनवर को देखा। कलमा-ए-शहादत
पढ़कर उसी वक्त जान दे दी। ( नुजुहृत-उल-मजालिस , जिल्द अव्वल,
20।) ‘
सबक्‌:- सच्चे मुसलमान जाहिरी किलों के साथ साथ बातिनी
किले मा फत फतह करते हैं। और उन की नजरों से अगयार के दिलों में भी
इकेलाब आ जाता है। और वो अपने ईमान। खलूस और हुस्‍्ने किरदार के
पाइस दीन व दुनयि के बादशाह होते हैं।

हिकायत नम्बर 681 नमाज की बर्कत

 

एक शख्स एक औरत पर आशिक हो गया। और उस औरत वे अपनी
ख्वाहिश जाहिर की। इस औरत ने इस वाकेये की अपने खाविंद को इत्तिला
दी। उसका खाविंद नेक आदमी था। उसने अपनी बीवी से कहा के तुम उसे
कह दो के अगर तुम चालीस रोज तक मेरे खाविंद के पीछ नमाज पढ़ोगे तो
जो तुम चाहोगे मैं मंजर कर लूंगी। चंनाँचे उसने अपने खाविंद की बताई हुईं
बात उस शख्स से कह दी। वो शख्स बड़ा खुश हुआ उसने चालीस दिन तक
बिला नागा उसके खाविंद के साथ नमाज पढ़ी। जब चालीस दिन हो गए। तो
औरत ने बुला कर पूछा के बताओ तुम्हारा क्या मतलब है। वो बोला। बस अब
मुझे तुम्हारी कोई हाजत नहीं। मैंने जो कुछ पा लिया है उसके होते हुए अब
मेरी कोई बड़ी ख्वाहिश बाकी नहीं रही। औरत ने ये सारा किस्सा खाविंद
से कहा। तो वो बोला। नमाज के मुतअल्लिक्‌ इशादे हक्‌ है के ड्न्नसलाता

तनही अनफाहशाई व मुनकर/ नमाज नमाज बुरी बातों से रोकती है। मैंने

ये उसका इलाज क्‍या है। ( नुजहत-उल-मजालिस, जिल्द अव्वल, सफा 204)

सबक्‌:- नमाज बड़ी बर्कतों की चीज है। और नमाज से बुरी बातें
छूट जाती हैं।.

लतीफा:

और अगर कोई कहे। के हम ने ऐसा भी देखा है के बअज लोग नमाज
पढ़ने के बावजूद बुरी बातों से किनारा कश नहीं हैं। तो उसका जवाब समझने
के लिए एक लतीफा सुनिये।

एक भिकारी ने एक रईस से एक भेंस तलब की। रईस ने कहा, मियाँ
भिकारी! तुम चालीस रोज नमाज पढ़ते रहो और जाब चालीस दिन पूरे हो
जायें तो मुझ से भेंस ले जाना। चुनाँचे उस भिकारी ने चालीस रोज नमाज
पढ़ना जारी रखी। और 4वें रोज उस रईस के पास आकर भेंस तलब करने
लगा। रईस ने जवाब दिया। मियाँ अपनी राह लो। कैसी भेंस? मैंने तो तुम्हें
नमाज की आदत डालने के लिए ये बात कही थी। भिकारी ने कहा। अच्छा
अगर यही बात है तो जाइये। मैंने भी चालीस रोज सारी नमाज बे वज ही
पढ़ी हैं। मालूम हुआ के उसकी नमाज ही ना थी। नमाज वही है जो अपनी
शरायत व अरकान के साथ पढ़ी जाए। और खुलूस, खुशू और खुज से अदा
की जाए। ऐसी नमाज यक्रीनन बुरी बातों से रोक देती है। और अगर नमाज से
उसका फायदा मुरत्तब ना हो तो ये नमाज का कसूर नहीं। बल्के तरीक्‌ अदा

 

क्ष कंसूर है। एक मिसाल और सुनिये हकीम साहब ने आपको बताया के

6९ रोज सुबह दस बादाम खा लिया करो। उससे तुम्हारी कमजारी की तमाम

दूर जाऐँगी। अब आपने हर रोज दस बादाम बगैर तोड़े के साबित

ही निगलने शुरू कर दिए तो बजाए तक्‌वीयत के आंतें छिलने लगीं। और

के दस्त आने लगे। तो फ्रमाईये ये हकौम साहब या बादामों का कुसूर

था खुद आपकी तरीके इस्तेमाल का कुसूर है? नमाज को पूरे खुशू व खुज

और उसके जुमला शरायत व अरकान के साथ अदा कीजिए। फिर देखिये।
उप्तके किस क॒ृद्र फवायद हैं।

हिकायत नम्बर 682 माँ

 

एक शख्स ने ख़्वाब में देखा के हजरत अबु इसहाकु रहतम-उल्लाह
अलेह की दाढ़ी मुबारक याकृत और जवाहरात से मरसओ है। उस शख्स ने
मुबह हजरत अबु इसहाक्‌ के पास पहुँच कर ये ख़्वाब बयान किया। तो
हजरत अबु इसहाक्‌ फ्रमाने लगे। तूने सच कहा है। मैंने कल अपनी माँ
के कृदम चूमे थे। ये उसी की बदौलत है। ( नुजहत-उल-मजालिस, जिल्द
अब्बल, सफा 369)

सबक: – माँ का बहुत बड़ा दर्जा है। उसके कृदमों तले जन्नत है और
उसके कृदम चूमने से नूरानियत व बर्कत हासिल होती है।

हिकायत नम्बर 683 शाही फरमान

 

खलीफा हारून अल रशीद के बेटे मामून के अहद में एक मुद्िम शहर
प्रे भाग गया। खलीफा ने उसके भाई को पकड़ कर मंगाया और कहा के
आपने भाईं को हाजिर करो। वरना तुम्हें कृल्ल कर दिया जाएगा। उसने अर्ज
किया के ऐ खलीफा! अगर तुम्हारा कोई मातहत हाकिम किसी को कतल
करना चाहे और तो हुक्म दे के उसे छोड़ दो। तो वो छोड़ेगा या नहीं? मार्मू
शीद रे कहा के हाँ छोड़ देगा। तो मैं तुम्हारे सामने इस बड़े बादशाह का
एक्स पेश करता हूँ। जिसकी इनायत से तू हाकिम बना है। के तू मुझे रिहा
कर दे। भामूँ ने कहा। वो हुक्म मुझे सुनाओ। कहा वो अल्लाह का ये इर्शाद है
ला तजीस व्जीरातुन विजरा उख़रा “यानी किसी को दूसरे के गुनह
बदले ना पकड़ो ” ह
मामूँ ये सुनकर बड़ा मुतासिर हुआ। और रोते हुए हुक्म दिया के
पे छोड़ दो? उसने मुहक्किम और अटल हुक्म पेश कर दिया है।

( तालीम-उल-अखलाक्‌, सफा 483 )

सबक्‌:- बड़े से बड़ा हाकिम भी हो तो उसे करआने पाक के
अहकाम के आगे सर तसलीम खम कर देना चाहिए और ये के बे गुनाहों
को कभी पकड़ना और सताना नहीं चाहिए।

हिकायत नम्बर 684 सबसे ज़्यादा अहमक्‌

 

सुलतान मेहमूद गुजुनसी रहमत-उल्लाह अलेह ने एक दफा अपने
अरकाने दौलत से कहा के एक ऐसा शख्स ढूंड कर लाओ। जो सबसे ज़्यादा
अहमक्‌ हो। ये सुनकर सुलतानी मुकूर्रिंब तलाश में निकल खड़े हुए। ताके
किसी बेवकफ को ढूंड निकालें। आखिर उन्होंने एक शख्स को देखा जो
एक ऊँचे दरख्त की शाख पर बैठ कर उस शाख की जड़ पर कुलहाड़ा मार
रहा था। पैश्तर इसके के वो शाख जड़ से कटती और वो शख्स नीचे गिरकर
मर जाता। उस शख्स को दरख्त पर से उतार लिया गया। और पकड़कर
उसे सुलतान मेहमूद के पास ले आए। और अर्जु किया हुज॒र! ये शख्स बड़ा
बेवकफ और अहमक है। उसे हम ने इस हालत में पाया है के एक बड़े दरख्त
की शाख्‌ पर बैठा उसी शाख की जड़ पर कुलहाड़ा मार रहा था। सुलतान ने
कहा। वाकई ये शख्स बड़ा अहमक है। मगर ये बताओ के उससे भी ज़्यादा
अहमक्‌ और कौन हो सकता है? अर्ज किया। हुजर खुद फ्रमाएँ। सुलातन
ने जवाब दिया। के वो हाकिम सबसे ज़्यादा अहमक है। जो जल्मो सितम से
रूइय्यत को तबाह कर दे। और खुद उसके सबब बदबख्ती और परेशानी के
गढ़े में गिरे। ( तालीम-उल-अखलाक्‌ , सफा 4% )

सबके :- रूइय्यत की मिसाल जड़ की है। और बादशाह दरख्त के
मानिंद होता हैं। और दरख़्त जड़ की पायदारी से सलामत रहता है। इस जड़
को जितना मजबूत किया जाएगा। दरख़्त उतना ही महफूज रहेगा। और जब
जड़ कमजोर हो जाए तो हवा का एक झोंका भी उस दरख़््त को गिर सकता
है। पस हर साहबे इक्तिदार को अपनी रिआया का खयाल रखना चाहिए।

हिकायत नम्बर 685 मलिक सालेह और एक दुरवेश

 

.. मलिक सालेह बादशाह शाम का मामूल था के रात को एक गुलाम के
साथ मस्जिदों, मक्बरों और मजारों में जाता और हर एक का हाल मालूम
करता। एक रात मौसमे सर्मा में गश्त करता हुआ एक मस्जिद में पहुँचा। देखा
के एक दुरवैश बिरहना है। और सर्दी से कांप रहा है। और कह रहा है के या

अल्लाह! दुनिया के पक तेरी अता की हुई नअमत को नफ्स की हर्स व
हवआ और लज्जत में बर्बाद कर देते हैं। मोहताजों, जईफों की हालत से बे
खबर हैं। अगर वो कयामत के दिन बहिश्त में गए। तो तेरी इज़्जतो जलाल
की कसम! मैं वहाँ कदम ना रखूंगा।

मलिक सालेह ये बात सुनकर आगे बढ़ा और दीनारों भरी थेली आगे
रख दी। और रोते हुए कहा के मैंने सुना है के दुरबैश बहिश्त के बादशाह
होंगे। आज हम बादशाह हैं और सुलह के लिए तुम्हारे पास आए हैं। क्योंके
कल तुम बादशाह होगे। अज्राहे करम उस दिन हम से दुश्मनी ना करना।
बल्के इनायत व मेहरबानी से पेश आना। मैं उन बादशाहों में से नहीं हूँ! जो
गरीबों से मुंह फैर लेते हैं। ( तालीम-उल-अखलाक्‌, सफा 50)

सबक: – बड़े बड़े लोगों को मोहताजों और ग्रीबों का खयाल रखना
चाहिए। और अपनी दौलत से गरीब लोगों की जरूरतों को भी पूरा करना
चाहिए। जो लोग दौलत के नशे में गर्बा और मोहताजों का खयाल नहीं रखते
वो बहुत बड़े ग़ाफिल और ना आक्बत अंदेश हैं।

हिकायत नम्बर 686 एक लड़के की दानाई

 

मअन बिन जायदा एक अमीर शख्स और मेहमान नवाजी में बड़ा मश्हूर
था। उसके पास उसकी दुश्मन कौम के कई हजार अफ्राद असीर करके लाए
गए। उसने हुक्म दिया के सब को कत्ल कर दो। उस कौम में से एक लड़का
खड़ा हुआ। और कहा। ऐ अपीर! मैं प्यासा हूँ। मुझे क॒त्ल तो हो ही जाना है।
पगर मुझे पहले पानी तो पिला दो। मअन ने हुक्म दिया के उसे पानी पिला
दिया जाए। उसने पियाला हाथ में लिया। और कहा। के ऐ अमीर! मेरे लिए
डूब मरने का मुकाम है। और मुरव्वत का मुकाम नहीं। के मैं तो पानी पी लूं।
और मेरी कौम प्यासी मरे। आपकी दरया दिली से तवक्को है। के उनको भी
पानी पिलाने का हुक्म दीजिए। चुनाँचे सबको पानी पिला दिया गया। अब
गैड़का फिर बोला। के ऐ अमीर! अब तो हम सब तेरे मेहमान हो गए हैं। और
पेहमानों को मारना करीमों की शान नहीं बलल्‍्के उनकी इज्जत करने का हुक्म
है। मअन लड़के की फुसाहत व दानाई पर मुताज्जिब हुआ और सब कैदियों
रिहा कर दिया। ( तालीम-उल-अखलाक, सफा 508 )
सबक्‌:- अक्ल व फुसाहत और मौका व महल के पुताबिक गुफ्तगू
औने से बड़े बड़े फबायद हासिल होते हैं। और खुदा तरस अफ्राद हमेशा
जुफो करम से काम लेते हैं।

 

हिकायत नम्बर 687 नोशेरवाँ और एक बूढ़ी औरत

 

नोशेरवाँ ने एक बड़ा आलीशान महल तामीर कराया। और उसकी
तकमील के बाद अपने बजीरों अमीरों को दिखाया। और पूछा के उसमें कोई
कजी तो नहीं? अर्ज की गई। के ये महल ऐसा अजीम-उश्शान है के चश्मे
फलक ने भी ऐसा महल ना देखा होगा मगर उसमें एक नुक्स की बात ये
है के उसके गोशे में एक झोंपड़ी है जिसके रोजून से धुआँ निकलकर सारे
ऐवान को सियाह कर रहा है। उसे उठा देना चाहिए ताके वे महल बिलकुल
बे दाग हो जाए।
नोशेरवाँ ने कहा। के ये झोंपड़ी एक बूढ़ी औरत की है जिसने सारी
उम्र उसी झोंपड़ी में बसर की है। अब वो कब्र में पाँव लटकाए बैठी है।
मैंने ये महल शुरू करते वक्त उस बुढ़िया को कहला भेजा था के ये
जगह मेरे हाथ बेच दे। और मुंह माँगी कीमत ले ले। या उसके अवज
जैसा अच्छा चाहे कोई मकान ले ले। उसने जवाब दिया के ऐ बादशाह!
ये जगह मेरी मलकियत है। उसी में मैं पैदा हुई और इससे मैं मानूस हो
गई हूँ में तो ये देखकर के तेरे पास इतना बड़ा मुल्क है बुरा नहीं मनाती।
और तू इस ग्रीब की कूटिया देखना गवारा नहीं करता। मैं इस बात से
मुतास्सिर होकर खामोश हो गया। हत्ता के महल बन कर तैयार हो गया।
अब जो उस कूटिया से धुआँ निकल कर खराब करने लगा तो मैंने पैगाम
भेजा के धुआँ निकालती हो। तो बोली के अपने लिए खाना पकाती
हूँ। मैंने उसके लिए भुने हुए मुर्ग बगैरा समेत ख्वान इरसाल किया। इस
पैगाम के साथ के ऐ माँ! में हर रोज तुम्हें किस्म किस्म के ख्वान भेजता
रहूंगा। तू अपनी झोंपड़ी में आग लगाना छोड़ दे। बुढ़िया ने जवाब दिया।
के मुल्क भर में कितने ही आदमी फाका जदा दिल जले रो रहे हैं और
मैं भुने हुए मुर्ग खाऊँ, ये जायज नहीं। मैं अपने खुदा से डरती हूँ के
सत्तर साल तो जौ की रोटी खाईं। और अब भुने हुए मुर्ग खाने लगूं।
मेरी कुटिया को बरकरार रहने दे के ये तेरे अदल के महल की जीनत
है। उमरा जब देखेंगे के तूने गरीब की झोपड़ी पर भी हाथ डालना पसंद
नहीं किया। तो वो रिआया के इमलाक पर दस्त दराजी से बाज रहेंगे।
एक और बात भी है के तेरा मेहल इस ना पायदार दुनिया से कुछ मुद्दत
के बाद वीरान हो जाएगा। मगर मेरी झोंपड़ी की हिकायत तेरे अद्ल
की शाहिद रहेगी। लिहजा मैंने इस बात को पसंद किया और बुढ़िया

को मंजूर कर लिया। उस बुढ़िया की एक गाय भी थी।
वो इसे महल के फर्श पर से गुजार कर हर सबह़ याहर जंगन मेँ चगान
ते जाती थी। और शाम को वापस आती थी। इस आस्टोग्फ्न से फर्श
ध॒राब हो जाता था। एक दिन एक नदीम ने उमसे कहा कं ऐ बढ़िया! तु
(् हर्कत से बाज आ। के शाही महल को खूबसूरती में धव्या लगता है।
उसने जवाब दिया के बादहशाही नामूस पर जुल्म से श्रव्बा लगता है या
अदल से। मैं जो कुछ कर रही हूँ बादशाह की नेक नामी के लिए रही हूँ
(वालीम-उल-अखलाक्‌ , सफा 52) ह

सबके :- एक ग्रीब को भी दुनिया में गहने का वैसा ही हक है जैसा
के किसी अमीर को। और मालूम हुआ के आदिल बादशाह अपनी गरीब
रिआया का हर तरह खयाल रखते हैं। और ये भी मालूम हुआ के अपने
पड्टोसियों से चाहे वो गरीब हों नेक दिल अफ्राद नेक मलुक करते हैं। और
ये भो मालूम हुआ के अदलो इंसाफ से रहती दुनिया तक नाम रोशन रहता
है। चुनॉंचे मजकूरा बाला बुढ़िया से अदलो इंसाफ करने के बाइस नोशेग्वाँ
का अदलो इंसाफ आज तक सुनहरी ह्फों से लिखा हुआ मौजुट है। और
जबानों पर जारी है।

हिकायत नम्बर 688 एक आबिद

 

अगली उम्मतों में एक बन्दा-ए-हक बीच समुद्र में एक पहाड़ पर
गहाँ इंसान का गुजर ना था। रात दिन इबादते इलाही में मशगल रहते।
ब्बे अज़्जोजल ने इस पहाड़ पर उनके लिए एक अनार का टर्ख़्त
गाया। और एक शीरीं चश्मा निकाला। अनार खाते और पानी पीने। और
रादत करते। चार सौ बरस इसी तरह गुजारे। जाहिर है क॑ जब इंसान
बिलकल तन तनहा जिन्दगी बसर करे। और कोई दूसरा ना हो। तो ना
भूट बोल सकता है। ना किसी की गीबत कर सकता है। ना चोरी ना कोई
और कसूर कर सकता है। जिसका ताल्लुक्‌ दूसरे से हो। और अक्सर
नाह बही हैं। गर्ज जब उनके नजृओ का वक्‍त आया। हजरत इज्जाईल
तशरीफ लाए। उन्होंने कहा इतनी इजाजत दीजिए। के मैं
पे ताजा करके दो रकअत नमाज पढ़ लूं जब दूसरी रकअत के दूसरे
‘न्हे भें जाऊँ। रूह कब्ज कर लेता। उन्होंने फ्रमाया। मैं तुम्हारे लिए
नी इजाजत लाया हूँ। उन्होंने वज किया। दो रकअत नमाज पढ़ी। दूसरी
‘फेअत के दूसरे सक्‍्टे में इन्तिकाल हुआ। बदन उनका सलामत है। अब

तक बैसे ही सज्दे में हैं। जिन्नाईले अमीन अलेहिस्सलात वस्सलाम ने हुजरे
अक्दस सल-लल्लाहो ताअला अलेह व सलल्‍लम से अर्ज की। हम जब
आसमान से उतरते या आसमान को जाते हैं। उन्हें इसी तरह सरसबसजूद
देखते हैं। ये बन्दा-ए-खुदा कूयामत के रोज जब हाजिर होंगे। इबादत
के सिवा नामा-ए-आमाल में गुनाह तो कोई होगा ही नहीं हिसाब व
मीजान की क्‍या हाजत रब्बुल इज्जत इर्शाद फ्रमाएगा। इजहबू बिअब्दी
इला जन्नाती बिरहमती। “यानी मेरे बन्दे को जन्नत में मेरी रहमत से ले
जाओ ” उनके मुंह से निकलेगा। ऐ रब मेरे! बल्के मेरे अमल से। यानी मैंने
अमल ही ऐसे किए हैं जिनसे मुसतहिक जन्नत हूँ। इशांद होगा। लौटाओ
और मीजान खड़ी करों उसकी चार सौ बरस की इबादत एक पलले में
और हमारी नअमतों से जो हम ने उसे चार सौ बरस में दीं। सिर्फ आँख .
की नओमत को दूसरे में रखो। वजन किया जाएगा। उनके चार सौ बरस
के आमाल से एक ये नअमत कहीं ज़्यादा होगी। इर्शाद होगा इजहब्‌’
बिअन्दी इला नारी बिअदली “मेरे बन्दे को मेरे जहन्नम में मेरे अदल,
से ले जाओ ” इस पर घबरा कर अर्ज करेंगे। नहीं ऐ रब मेरे! बल्के तेरी
रहमत से। इशांद होगा इज॒हबू बिअन्दी इला जन्नती बिरहमती “मेरे
बन्दे को मेरी रहमत से ले जाओ।” ( मलफूजात अला हजरत बरेलवी
कदस सरह, जिल्द दोम, सफा 62)
सबके :- अपने आमाल पर कभी घमंड ना करना चाहिए और हर
हाल में अल्लाह की रहमत पर नजर करनी चाहिए। ।

हिकायत नम्बर 689 इल्म की बर्कत

 

एक हदीस में है बाद नमाज अस्न शियातीन समुंद्र पर जमा इबलीस
का तख़्त बिछता है। शियातीन की कारगुजारी पेश होती है। कोई कहता है।
उसने इतनी शराबें पिलाई। कोई कहता है। उसने इतने जिना कराए। सब की
सुनें। किसी ने कहा। आज उसने फलाँ तालिब इल्म को पढ़ने से बाज रखा।
सुनते ही तझ्त पर से उछल पड़ा। और उसको गले से लगाया। और कहा
अनता। अनता तूने काम किया। तूने काम किया। और शियातीन ये कैफियत
देखकर जल गए के उन्होंने इतने बड़े बड़े काम किए। और उसको इतनी,
शाबाशी दी। इबलीस बोला। तुम्हें नहीं मालूम। जो कुछ तुम ने किया। सब
उसी का सदका है। अगर इल्म होता तो वो गुनाह ना करते। बताओ कौन
सी जगह है जहाँ सबसे बड़ा आबिद रहता है। मगर वो आलिम नहीं। और

वहाँ एक आलिम भी रहता है। उन्होंने एक मुकाम का नाम लिया। सुबह
को केब्ल तलू आफताब शियातीन को लिए हुए उस मुकाम पर पहुँचा।
और शियातीन मख़्फी रहे। और ये इंसान की शक्ल बनकर रास्ता पर खड़ा
हो गया। आबिद साहब तहज्जुद की नमाज के बाद फज्ज के वास्ते मस्जिद
की तरफ तशरीफ लाए। रास्ते में इबलीस खड़ा ही था। सलाम अलेकृम
व अलेकुम अस्सलाम। हजरत मुझे एक मसला पूछना है। आबिद साहब
ने फरमाया। जल्द पूछा। मुझ नमाज को जाना है। उसने जैब से एक छोटी
सी शीशी किल कर पूछा। अल्लाह तआला कादिर है। के इन समावात व
अर्ज को इस छोटी सी शीशी में दाखिल कर दे। आबिद साहब ने सोचा
और कहा। कहाँ जुमीनो आसमान और कहाँ छोटी सी शीशी। बोला। बस
यही पूछना था। तशरीफ ले जाइये। और शियातीन से कहा। देखो मैंने
उसकी राह मार दी। उसको अल्लाह की क॒द्गत ही पर ईमान नहीं। इबादत
किस काम की। हे

तुलू आफ्ताब के क्रीब आलिम साहब जल्दी करते हुए तशरीफ लाए।
उसने कहा अस्सलाम अलेकुम व अलेकुम अस्सलाम मुझे एक मसला पूछना
है। उन्होंने फ्रमाया। पूछो नमाज का वक्त कम है। उसने वही सवाल किया।
फ्रमाया मलऊन! तू इबलीस मालूम होता है। अरे वो कादिर है के ये शीशी
ते बहुत बड़ी है। एक सूई के नाके के अन्दर अगर चाहे तो करोड़ों आसमान
और जमीन दाखिल कर दे जन्नल्लाहा अला कुल्ली शैड़न कृदीरा आलिम
साहब के तशरीफ ले जाने के बाद शियातीन से बोला। देखा ये इल्म ही की
बकत है। ( मलफूजात, जिल्द सोम, सफा 22)

सबक्‌:- इल्मे दीन हासिल करना चाहिए। बगैर इल्मे दीन के शैतान
से बचना बड़ा मुश्किल है।

हिकायत नम्बर 690 दिल की बात

 

… एक साहब औलियाएऐ इक्राम रहमत-उल्लाह तआला अलेहिम अजमईन
में से थे। आपकी खिदमत में बादशाहे वक्त कृदम बोसी के लिए हाजिर हुआ।
हैजर के 0 58: कुछ सेब नज्ज में आए थे। हुजर ने एक सेब दिया। और कहा

। अर्ज किया। हुज॒र भी नोंश फ्रमाएँ। आपने भी खाए। और बादशाह
ने भी। उस वक्त बादशाह के दिल में खयाल आया के ये जो सब में बड़ा
अच्छा खुश रंग सेब है। अगर अपने हाथ से उठा कर मुझ को दे देंगे। तो जान
जूँगा। के ये बली हैं। आपने वही सेब उठा कर फरमाया। हम मिस में गए थे

वहाँ एक जगह जल्सा बड़ा भारी था। देखा के एक शख्स है। उसके पास एक
गधा है। उसकी आँखों पर पढ़ी बंधी है। एक चीज एक शख्स की दूसरे के
पास रख दी जाती है। उस गधे से पूछा जाता है गधा सारी मजलिस में दौरा
करता है जिसके पास होती है सामने जाकर सर टेक देता है। ये हिकायत हम
ने इसलिए बयान की के अगर ये सेब हम ना दें तो वली ही नहीं और अगर
दे दें तो इस गधे से बढ़कर क्या कमाल किया। ये फ्रमा कर सेब बादशाह
की तरफ फेक दिया। ( मलफूजात, जिल्द 4, सफा 70 )

सबक्‌:- दिल की बात बता देना कोई कमाल नहीं। कमाल तो रे है
के शरोीअत का इत्तिबा किया जाए।

हिकायत नम्बर 691 खोशा-ए-जन्नत

 

एक दफा हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्लम ने नमाज पढ़ते
हुए अपना हाथ मुबारक आगे बढ़ाया। जैसे के आप कुछ पकड़ना चाहते हैं।
फिर आपने अपना हाथ मुबारक रोक लिया। सहाबा-ए-इक्राम ने अर्ज किया।
या रसूल अल्लाह! हम ने आपको अपना हाथ मुबारक आगे बढ़ाते हुए और
फिर रोकते हुए देखा। ये क्या बात थी? हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह
व सललम ने इर्शाद फरमाया। हे
इन्नी रायतुल जन्नाता फतानावबालत उनकदन लो अखजतुहू
लाकलतुम मिनहू मा बकीतुद्दनिया “मैंने जन्नत को देखा और जन्नत के
एक खोशे को पकड़ा अगर उस खोशे को मैं तोड़ लाता। तो तुम रहती दुनिया
तक इस खोशे से खाते रहते ” ( मुस्लिम शरीफ , जिल्द, सफा 29% )
सबक्‌:- हमारे हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्लम मुख्तार
ब मुतसरूफ फिलकवान हैं। जन्नत सातों आसमानों के ऊपर बाके है। मगर
हमारे हुजर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम की मुबारक आँखें मदीना
मुनव्वरह की जमीन से सातवें आसमानों की भी ऊपर की चीज को देख
लेती हैं। फिर जो शख्स बगैर ऐनक के सात इंच दूर की भी चीज ना देख
सके। वो हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍्लम की मिस्ल बने तो
किस क॒द्र जहालत है। और ये भी मालूम हुआ के हमारे हुजुर सल-लल्लाहो
तआला अलेह व सल्लम प्रदीना मुनव्वरह में रह कर सातों आसमानों से भी
परे की चीज को पकड़ सकते हैं। और ये भी मालूम हुआ के हमारे हुजर
सल-लल्लाहो तआला अलह व सल्लम जन्नत के मालिक हैं। इसी लिए
आपने जन्नत में हाथ बढ़ाकर जन्नत के खोशे को पकड़ लिया। बरना पराये

ध॥( में कोई हाथ डाल कर तो दिखाए और किसी दूसरे की चीज कोई उठा
क्र तो दिखाए। और ये भी मालूम हुआ के हमारे हुजर सल-लल्लाहो तआला
अलेह व सल्‍लम मुख्तार भी हैं। इसी लिए तो फरमाया। के अगर मैं चाहता
तो खोशे को तोड़ लाता।

हिकायत नम्बर 692 जन्नत की रफाकृत

 

हजरत रबीआ रजी अल्लाहो अन्ह हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व
एललम की खिदकमत में रात के वक्त रहा करते थे। और हुज॒र॒ की खिदमत
किया करते थे। एक रात हजरत रबीआ ने हुजर सल-लल्लाहो तआला
अलेह व सल्‍लम की खिदमत में वज के लिए पानी हाजिर किया। तो हुजर
पसल-लल्लाहो आला अलेह व सलल्‍लम का दरयाऐ करम जोश में आ गयो।
और हजरत रबीआ से आपने फरमाया। सल माँग। हजरत रबीआ ने जो
देखा के आका का दरयाऐ करम जोश में है। तो अर्ज किया। असअलूका
पुराफकृतूका फिल जन्नत “मैं जन्नत में आपकी रफाकत आपसे माँगता
हू” द
यानी या रसूल अल्लाह! जन्नत दीजिए और ना सिर्फ जन्नत बल्के जन्नत
में जहाँ आप हों। वहाँ अपने साथ रखिये। हुज्र॒ सल-लल्लाहाओ तआला
अलेह व सल्‍लम ने फरमाया।

ओ ग्रैस जालिका कुछ और भी?

अर्ज किया। नहीं या रसूल अल्लाह! बस यही हाजत है। पूरी कर दीजिए।
हुजर ने फरमाया। अच्छा तो कसरत सजूद से मेरी एआनत करते रहे यानी
नमाज पढ़ते रहना। ( मिश्कात शरीफ, सफा ४) हि

सबक्‌:- हमारे हुजर॒ सल-लल्लहो तआला अलेह व सल्लम दाता हैं।
जभी तो फरमाया “माँग” वरना जो दे ना सके वो ऐसा कब कहता है? और
पे भी मालूम हुआ के सहाबा इक्राम अलेहिम-उर-रिजवान का ये अकौदा

हमारे हुजर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम सब कुछ अता

परमा सकते हैं । हत्ता के जन्नत भी दे सकते हैं। और ना सिर्फ जन्नत बल्के

है का आला मुकाम भी दे सकते हैं। जभी तो ह्जूर से यूं अर कक
मैं जन्नत और जन्नत में आपकी रफाक्‌त माँगता हूँ गोया स अर

के इंभान था के हुज॒र जन्नत के मालिक व मुख्तार हैं जिसे चाहें दे दें। फिर

यूं कहा जाए के जिसका नाम मोहम्मद है वो किसी चीज का मालिक

पुर्तार नहीं। तो ये किस क॒द्र गुमराही है। और ये भी मालूम हुआ के हुज॒र

सल-लल्लाहो तआला अलेह व सललम से जन्नत लेने की ख्वाहिश हो तो
नमाज कभी ना छोड़नी चाहिए।

हिकायत नम्बर 693 गजवा-ए-तबूक में

 

गुजवा-ए-तबूक में सहाबा इक्राम अलेहिम-उर-रिजुवान से राशन खत्म
हो गया। तो भूक की शिद्दत में हुजुर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम
से तालिबे दुआ हुए तो हुज॒र ने फरमाया। के जो कूछ भी किसी के पास
बचा कुछा हो। मेरे पास ले आओ। चुनाँचे सहाबा इक्राम थोड़ी थोड़ी चीजें
जो बची कछी थीं। ले आए। हुजर ने उन थोड़ी थाड़ी चीजों पर दुआए बर्कत
फरमाई। और फिर फरमाया जाओ अपने अपने बर्तन ले आओ। और उसमें
से भर भर कर लेते जाओ चुनाँचे।

फाखुज फी ओ इय्यतीहि हत्ता मा तराव्बू फिल असकरी विआअन
इलल्‍ला मलाहू

सब सहाबा ने अपने अपने बर्तन भर लिए और लश्कर में जो भी बर्तन
था। कोई खाली ना रहा। सब भर लिए गए। और फिर सारे सहाबा ने सैर
शिकम होकर खाना खाया। और खाना फिर भी बच गया। ( मिश्कात शरीफ,
सफा 538)

सबक :- हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम की ये रहमत
व बर्कत हैं। के आप थोड़े को ज़्यादा कर देते हैं। और ये भी मालूम हुआ
के सहाबा इक्राम मुश्किल के वक्त बारगाहे रिसालत ही में फरयाद किया
करते हैं। और ये भी मालूम हुआ के थोड़ी थोड़ी चीजें सामने रखकर उन पर
दुआऐ खैर करनी जैसे के खृत्म व फातिहा में होता है। जायज है। बिदअत
हर गिज नहीं।

हिकायत नम्बर 694 दूध का पियाला

 

एक मर्तबा हजरत अबु हुरेरा रजी अल्लाहो अन्ह को बड़े जोर की भूक
लगी। और वो हुजर सल-लल्लाहो अलेह व सलल्‍लम की खिदमत में हाजिर
हुए। हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम ने एक दूध का पियाला
लिया। और हजरत अबु हुरेरा से फ्रमाया। जाओ असहाब सफा को बुला
लाओ। असहाब सफा की तादाद सत्तर थी अबु हरेरा ने जी में सोचा के वो
लोग आ गए तो एक पियाले में से मेरे लिए क्या बचेगा? मगर हुक्म नबव्वी
था। इसलिए वो गए और असहाब सफा को बुला लाए। हुजूर ने फ्रमाया।

बे दूध का पियाला, और उन सबको पिलाओ। चुनाँचे हजरत अबु हुरेरा
बारी बारी सबको पिलाना शुरू किया। एक को पिला लेते तो फिर वही
दूसरे के आगे रख देते। वो पी लेता तो आगे कर देते। इसी तरह
क एक पियाले से सब ने सैर होकर दूध पिया! मगर दूध बैसे का वैसा ही
ह€। जर्रा भी कम ना हुआ। फिर वो पियाला हुजर सल-लल्लाहो तआला
ब सललम ने अपने हाथ में लिया। और अबु हेरेरा ने फरमाया लो अब
(ु पियो। अबु हरेरा ने पीना शुरू किया। हत्ता के जब आपने पियाला मुंह
प्रेहठाया। तो हुजर ने वो पियाला अबु हुरेरा के मुंह से फिर लगाया। और
फ्रमाया। और पियो। हजरत अबु हुरेरा ने और पिया। और फिर जो पियाला
एृंह से हटाया। तो हुज॒र ने फरमाया नहीं और पियो। कई बार ऐसा हुआ।
अखिर हजरत अबु हुरेरा ने अर्ज़ किया। या रसूल अल्लाह! अब कोई रास्ता
हीं रहा। ( बुखारी शरीफ, सफा 56)
सबक :- हमारे हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सललम मुतसर्रुूफ
व मुख्तार हैं। चाहें तो एक पियाले से सत्तर आदमियों को खिला पिला दें।
फिर अगर यूं कहा जाए के “नबी के चाहने से कुछ नहीं होता ” तो ये बात
किस क॒द्र गुमराही व जहालत की बात है।

हिकायत नम्बर 695 घी का मशकीजह

 

एक सहाबिया उम्मे मालिक रजी अल्लाहो अन्हा मशक्कीजे में घी डाल
कर हुजर की खिदमत में पेश किया करती थीं एक रोज हुजर ने खुश होकर
जे निगाहे करम फरमाई। तो वो मशकीजह घी का चश्मा बन गया। उम्मे
प्रलिक को जब भी घी की जरूरत होती, उसी मशकीजे से निकाल लेतीं।
एक रोज उम्मे मालिक ने उस मशकीजे को निचौड़ लिया। तो ऐसा करने से
षो मशकीजृह खुश्क हो गया। उम्मे मालिक ने हुजर से ये वाकेया अर्ज किया

हुज॒र सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम ने फ्रमाया लो तरकतिहा
पा ज़ोला काइमा “अगर तू ना निचौड़ती तो घी हमेशा रहता” ( मुस्लिम
हे बा की चश्मे जिस पर पड़ जाए

सबक कर ह॒जरए सण्अग्स० ) अश्म रहमत
हद चीज हमेशा डक है। और हक बस 82 अल

फे सुधरे टू दूध फट जाए। फिर अगर
और अंधा है ।

 

हिकायत नम्बर 696 खबजूरें

 

एक रोज हजरत अबु हुरेरा रजी अल्लाहो अन्ह तक्रीबन बीस इक्कीस
खजूरें लेकर हुजर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम को खिदमत में
हाजिर हुए और अर्ज की। या रसूल अल्लाह इन खजूरों में दुआए बकंत
फ्रमा दीजिए। हुजर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍्लम ने इकट्ठा किया
और दुआ फरमा कर फ्रमाया। इन्हें अपने तोशेदान में डाल ले। और जब भी
कभी जरूरत पड़े हाथ डाल कर निकाल लिया करना। और उसे झाड़ना मत।
हजरत अबु हुरेरा रजी अल्लाहो अर ने उन्हें कमर के साथ बाँध लिया। और
चौबीस साल से ज़्यादा उस तोशेदान से खजूरें निकाल निकाल कर खाते रहे।
मनों खुदा के रास्ते में तकूसीम भी कीं। और लोगों को भी खिलाईं। आखिर
हजरत उस्मान रजी अल्लाहो अन्ह की शहादत के रोज वो तोशेदान अबु
हरेरा रजी अल्लाहो अन्ह की कमर से टूट कर कहीं गिर गया। ( तिरमीजी
शरीफ, सफा 24-जिल्द 2)

सबक:- हमारे हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम मालिक
व मुख़्तार और कायनात के हाकिम हैं। खुदा तआला की अता से आप जो
चाहें वो हो जाता है। जिस तरह चनन्‍्द एक खजूरें आप की बर्कत से कई मन
हो गईं और 24 साल तक खाई जाती रहीं। इसी तरह हम गुनहगारों की थोड़ी
नेकियाँ भी सरकारे अब्दर करार सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम की
निगाहे करम से बेशुमार हो जागेंगी। मगर शर्त ये है के सरकार के मुतअल्लिक्‌
अकौदा भी वही हो जो सहाबा इक्राम का था।

हिकायत नम्बर 697 नायब रसूल अल्लाह

 

सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍्लम

सनद सही के साथ मरवी है के हुजर गौसे आजम रजी अल्लाहो अन्ह
ने फरमाया। हर

मा ततलअ अलशम्पहती तसलम अला व तजर्ड अलसनत इला
व तसललगय अला ब तख्बरनी निया यजरी फीहा। व यजर्ड अलशहरू
यबललम अला व यख्बरनी निया यजरी फीह। व यज् अलअसबूअ
व यसलल्‍लम अला व यख्बरनी बिया यजरी फीह। वे यज् अलयौम व
यच्तललम अला व यख्बरी बिमा फीह। व इज्जत रब्बी अन अलसअदा
ब अलशकिया लबआरिजना अला ऐनी फी अललूह-उल-महफूज।

2 फॉ बहार अलिमल्‍लाहू व मशाहिदत। इन्ना हज्जतुल्लाह
अलेकु म जमीअकुम अना नायब रसूलुल्लाह( स्र०्अन्स* 2 ववारसहू
फिल अर्ज़/ ( बहुज्जत-उल-असरार शरीफ, सफा 22)

तर्जुमा:- सूर हर रोज तलू होते वक्त मुझ पर सलाम अर्ज करता है। और
हर नया साल जब आता है तो मुझ पर सलाम अर्ज करके जो कछ साल भर
में होने वाला होता है, उसकी खबर मुझे दे देता है। और हर महीना जब शुरू
होता है तो पहले मुझे सलाम अर्ज करता है। और जो कुछ महीने भर में होना
होता है उसको खबर मुझे देता है। और हर हफ्ता जब शुरू होता है तो पहले
पुझ्ते सलाम अर्ज करता है और जो कुछ हफ्ते भर में होना होता है। उसकी
खबर मुझे देता है इसी तरह हर दिन भी मुझे सलाम अर्ज करके दिन भर में
होने वाले वाक्रेयात की खबर देता है। मुझे मेरे रब की इज्जत की कसम!
नेक व बद सब मुझ पर पेश किए जाते हैं और मेरी आँख लोहे महफज में
लगी रहती है। मैं अल्लाह के इल्म व मुशाहेदे के समुंद्रों में गौताजन हूँ। और में
तुप सब के लिए अल्लाह की हुज्जत हूँ। और मैं रसूल अल्लाह सल-लल्लाहो
तआला अलेह व सलल्‍लम का नायब हूँ। और जूमीन में उनका वारिस हूँ।”

सबके :- मालूम हुआ के हजरत गौसे आजम रजी अल्लाहो अन्ह को
अल्लाह तआला ने बहुत बड़ी शान अता फरमाई है और आपको इल्म भी
इतना बसी अता फरमाया है के साल भर के हर महीने और हर रोज में जो जो
कुछ होने वाला होता है। वो सब वाक्ेयात हुजर गौर आजम रजी अल्लाहो
अन् के इल्म में दाखिल होते हैं। और ये भी मालूम हुआ के ये इतना बड़ा
वसी इल्म हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम के एक नायब का

। तो खुद हुजर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व सललम के इल्म पाक का

अंदाजा कौन कर सकता है जिनके सदके में हुजर गौसे आजम रजी अल्लाहो
अर को इतना इल्म अता हुआ। फिर अगर कोई शख्स हुज॒र सल-लल्लाहो
तआला अलेह व सल्‍लम ही के मुतअल्लिक्‌ यूं कहने लगे के उन्हें तो दीवार
पीछे का भी ना था तो वो किस क॒द्र जाहिल है।

हिकायत नम्बर 698 चुड़िया की मौत

 

हजरत गौसे आजम रजी अल्लाहो अन्ह एक मर्तबा अपने मदरसे में वज्‌
फेर रहे थे। के एक चुड़िया ने बीट कर दी। तो वो आपके कपड़े पर पड़ी।
ऐज्रत ने जलाल में आकर ऊपर इस चिड़िया की तरफ देखा। आपकी उस
गैलाल भरी नजर से चिड़िया मर गई और नीचे गिर गईं। उसके बाद हुज्र

गौसे आजम रजी अल्लाहो अन्ह ने इस कपड़े को उतार कर नीट वाली जगह
को धोया। और वो कीमती कपड़ा अपने एक खादिम को देकर फरमाया। उसे
जाकर बेच दो। और कीमत राह खुदा में सदक्ा कर दो। ताके उस चिड़िया
की मौत का बदला हो जाए। ( बहुज्जत-उल-असरार, सफा ॥0 )

सबक :- अल्लाह के बन्दों की जलाल भरी नजरों में खुदाई कहर
पनेहाँ होता हैं। और उनकी जमाल भरी नजरों में अल्लाह का फज़्लो करम
मौजूद होता है। पस हमें उन अल्लाह वालों का कभी दिल ना दिखाना चाहिए
ताके उनके जलाल व अत्ताब के हम मोरिद बन जायें।

हिकायत नम्बर 699 एक सौदागर का किस्सा

 

एक सौदागर जिसका नाम अबु अलमुजुफ्फर था। हजरत शेख हम्माद
अलेह अर्रहमत की खिदमत में हाजिर हुआ। और कहा। काफला तैयार है। मैं
मुल्क शाम को जा रहा हूँ। सर दस्त सौ अशर्फियाँ अपने साथ ले जा रहा हूँ।
और इतनी कीमत का सामान मेरे पास है। दुआ कीजिए के कामयाब लूटों।
हजरत शेख हम्माद ने फ्रमाया तो अपना ये सफर मुलतवी कर दो। वरना
जबरदस्त नुक्सान उठाओगे। डाकू तुम्हारा सब माल लूट लेंगे। और तुम को
कत्ल भी कर देंगे। सौदागर ये खूबर सुनकर बड़ा परेशान हुआ। और उसी
परेशानी में वापस आ रहा था। के रास्ता में हजरत गौसे आजम रजी अल्लाहो
अन्ह मिल गए। पूछा क्‍यों परेशान हो? सौदागर ने सारा किस्सा सुना दिया।
आप ने फ्रमाया। परेशान होने की जुरूरत नहीं। तुम शौक से मुल्क शाम को
जाओ। इंशाअल्लाह तुम्हें कोई नुक्सान ना होगा। और तुम बखैरियत और
कामयाब लौटोगे। चुनाँचे सौदागर मुल्क शाम को रवाना हो गया।

शाम मैं उसे बहुत सा नफा हुआ। और वो एक हजार अशर्फियों की
थेली लिए मुल्क हलब में पहुँचा। और इत्तिफाकन थेली कहीं रखकर भूल
गया। इसी फिक्र में नींद ने गुल्बा किया। और सो गया तो ख्वाब में देखा के
कुछ डाकूओं ने उसके काफले पर हमला करके सारा सामान लूट लिया
है। और उसे भी कृत्ल कर डाला है। ये दहशतनाक ख़्वाब देखकर सौदागर
ख्वाब से चौंका। तो देखा वहाँ कुछ भी ना था। मगर उठा तो याद आया।
के अशर्फियों की थेली मैंने फलाँ जगह रखी थी। चुनाँचे झट वहाँ गया तो
थेली मिल गई। और खुशी खुशी बगृदाद वापस आया। और अब सोचने
लगा के मैं पहले गौसे आजुम को मिलूं या शेख हम्माद को? ( रजी अल्लाहो
अन्हा ) इत्तिफाकुन बाजार में हजरत शेख हम्माद मिल गए। और देखकर

फ्रमाने लगे। पहले जाकर गौसे आजम से पिलूं। के वो मेहबूबे रब्बानी हैं।
उन्होंने तुम्हारे लिए सत्तर बार बारगाहे इलाही में दुआ माँगी। तब कहीं जाकर
तकदीर मोअल्लिक बदली है। जिसकी मैंने तुझे खबर दी थी। अल्लाह
तआला ने तुम्हारे साथ होने वाले वाकेये को गौसे आजम की दुआ से बैदारी
से ख़ाब में मुनत॒किल कर दिया। ये सुनते ही सौदागर हजरत गौसे आजम
रजी अल्लाहो अन्ह के पास आया। जिनके रूहानी तसर्रूफ से वो कत्लो
गारत से बच गया। उसे देखते ही हुजर गौसे आजम ने फ्रमाया। वाकई मैंने
तुम्हारे लिए सत्तर बार दुआ माँगी थी। ( बहुज्जत-उल-असरार, सफा 29)
सबक :- बुजुर्गों की दुआओं से बदल जाती हैं तकदीरें

हिकायत नम्बर 700 जिन्न

 

एक मर्तबा आप जामओ मनसूर में नमाज पढ़ रहे थे के दौराने नमाज में
बोरिये पर आपको कोई आहट महसूस हुई। और ऐसा मालूम हुआ के कोई
अन्दर आया और बोरिये पर कदम रखा है। मगर नजर कुछ नहीं आता। आप
बदस्तूर नमाज पढ़ते रहे। जब रूकू में गए तो क्‍या देखते हैं के सज्दागाह
में एक जहरीला और खौफनाक सांप मुंह खोले बैठा है। हुक्मे शरीअत के
मुताबिक सज्दे में जाते हुए हाथ बढ़ा कर उसे हटा दिया। सज्दा करने के
बाद जब काअदे में आए तो सांप आपकी रानों पर से होकर गर्दन पर सवार
हो गया। अब भी आपने परवा ना की। और नमाज में मशगल रहे। लेकिन क्‍
सलाम फैरते ही देखा। तो सांप गायब। आपको खयाल भी ना हुआ के क्‍या.
वाकेया पेश आया है।

दूसरे रोज आप उसी मस्जिद में गए। तो देखा एक शख्स आँखें फाड़े
हुए निगाहों से आपकी तरफ देख रहा था। आप समझ गए के इस वीराने में
और इस ह्यत कजाई के साथ सिवाऐ जिन्न के और कोई नहीं हो सकता।
आपने ये खयाल किया ही था। के उसने आपको मुखातिब करके कहा।
के कल नमाज में जो सांप आपने देखा था वो मैं ही हूँ। मैं इसी तरह सांप
पेन कर कई बुजर्गों और वलियों को डरा कर उनका इम्तिहान कर चुका
है। मगर मैंने आप जैसे साबित कृदम मुसतकिल मिजाज और बेबाक वली
किसी को नहीं देखा। वाकई आपका जाहिर व बातिन यक्‍्साँ है। ये कह
फैर उसने उसी वक्त आपके हाथ पर तौबा की और अहद किया के अब पैं
जुदा की इबादत में मशगल रहूंगा। ना किसी को डराऊँगा और ना सताऊँगा।
बहुज्जत-उल-असरार . सफा 94)

 

सबके: – गौसे आजम रजी अल्लाहो अन्ह गौसे-ठल-अनस वलसजितन्न
हैं और इंसानों के अलावा जिन्न भी आपके फयूज व बर्कात से मुसतफीद हुए।

हिकायत नम्बर 701 खोफनाक सांप॑

 

एक रोज आपकी मजलिस में उलमा व फुक्रा और अकीौदतमंदों का
हुजूमप था। और मसला क॒जा व क॒द्र पर तक्रीर फरमा रहे .थे। और लोगों
पर कैफ व इसग्राकु का आलम तारी था। अचानक छत में से एक निहायत
खौफनाक और जुहरीला सांप गिरा। उसके गिरते ही भगदड़ मच गई। और
सब पर उसकी हैबत छा गई। लेकिन आपने अपनी जगह से हरकत ना की।
खड़े हुए बअजु फरमाते रहे। वो सांप रेंगता हुआ आपके कपड़ों में घुसा।
और तमाम जिस्म पर फिर कर गर्दन पर से होता हुआ उतर कर सामने आ
खड़ा हुआ। जो लोग वहाँ मौजूद रह गए थे। उन्होंने देखा के वो आपसे कुछ
बातें कर रहा था। उसके बाद वो गायब हो गया। लोगों को बड़ी हैरानी हुई।
आखिर आप ही ने उस हैरानी को दूर किया। फ्रमाया। इस सांप ने कहा। के
मैं अब तक बहुत से औलिया अल्लाह को आजूमा चुका हूँ। मगर मैंने आप
आर इसतकलाल किसी में नहीं पाया। उसके जवाब में मैंने उससे कहा। के
मैं चूंके उस वक्त क॒जा व क्‌द्र बयान कर रहा था। तो मौका देखकर गिरा।
में तुझ से डरता क्‍यों? तू भी तो जमीन का एक कीड़ा ही है। क॒ुजा व कद्र
ने मुझे मोतहरिक कर रखा है। तेरे गिरने से मेरे कौल व फैल में तताबुक्‌ व
तवाजन पेदा हो गया। गोया कद्रत ने दिखा दिया के मेरा जाहिर व बातिन
एक हैं! ( बहुज्जत-उल-असरार, सफा 87)

सबक्‌:- अल्लाह के मक्बूल बन्दों के दिल तवक्कल व सकून और
इतमीनान के नूर से मुनव्वर होते हैं। और कोई भी दुनयवी हादसा उनके
इतमीनान कल्ब की दौलत छीन नहीं सकता। यही वो मताअ बे बहा है जिसके
लिए इक्बाल ने लिखा है के।

नहीं मिलता ये गोहर बादशाहों के खजीनों में

हिकायत नम्बर 702 अमीर व हाकिम

 

हजरत अबु इसहाक्‌ इब्राहीम रहमत-उल्लाह अलेह से एक दुरवैश
ने दरख्वास्त की। के मैं सफर हज में आपके साथ रहना चाहता हूँ।
आपने मंजर फ्रमा लिया। और फ्रमाया। के हम दोनों में से एक अमीर
व हाकिम होना चाहिए। ताके सारे काम अच्छी तरह पूरे हों। दुरवेश ने

। फिर आप ही अमीर व हाकिम बन जाइये। आपने फ्रमाया। बहुत
अच्छा। अब तुम मेरे मती हो। मैं तुम्हें जो हुक्म करूं। तुम्हें मानना पड़ेगा।
जब एक मंजिल पर पहुँचे। तो आपने दुरवैश को बैठने का हुक्म
दिया। और खूद पानी लेने चले गए। पानी लाकर फिर लकड़ियाँ इकछी
करने लगे। और आग जलाई। फिर राह में जो काम भी होता। खुद ही
करते। और दुरवैश को बैठे रहने का हुक्म देते। और वो जब अर्ज करता
के मुझे भी कोई काम करने दीजिए। तो फ्रमाते शर्त हो चुकी के मैं
अमीर व हाकिम है। और तुम मतीअ हो। रास्ते में बारिश होने लगी।
हे आपने अपना लिबादा उतार कर उस पर डाल दिया और सारी रात
लिबादा के दोनों किनारों को दोनों हाथों से पकड़ कर उस पर साया
किए रहे। ताके वो बारिश से महफूज्‌ रहें। वो ये देखकर बड़ा शर्मसार
हुआ। मगर अजरूऐ शर्त बोल ना सका। सुबह हुई तो दुरवैश बोला। के
हजरत आज मैं औमर व हाकिम बनूंगा। फ्रमाया। बहुत अच्छा फिर
जब एक मंजिल पर पहुँचे। तो आपने सारी खिदमत अपने जिम्मे ली।
दुवैश ने कहा। मेरे फरमान के खिलाफ कुछ ना कीजिए। तो फरमाया।
ता फरमानी ये है के अमीर व हाकिम को अपनी खिदमत के लिए कहा
जाए। मतीअ के होते हुए अमीर व हाकिम को किसी तकलीफ करने की
क्या जरूरत है। मक्का मौअज़्ज्मा तक आप इस दुरवैश से यही सलूक
फरमाते रहे। मक्का मौअज्ज्मा आ गया। तो दुरवैश आपके हुस्ने सलूक
परे शर्मिंदा होकर अलग हो गया। आपने फरमाया। बेटा! दोस्तों से इसी
7रह मोहब्बत रखनी चाहिए। जैसे मैंने तुम से मोहब्बत रखी। ( मख्जन
अखलाक्‌ , सफा 302)
सबक :- खुदा तआला के नेक बन्दे हर हाल में खिदमते खल्क को
अपनाए रहते हैं और उनके दिल में कभी किब्नो गरूर पैदा नहीं होता। और
प भी मालूम हुआ के अमीर व हाकिम दरअसल अपनी रिआया का खादिम
रैता है। और उसके फरायज में ये बात दाखिल होती है के वो रिआया की

‘फालीफ का इजाला करे।

हिकायत नम्बर 703 आग

 

.. एक बुर्दबार शख्स ने एक साधू का इम्तिहान लेना चाहा के देखें ये साधू
फैलने पानी में है। अगर वाकई ये किसी काबिल हुआ तो मैं उसका चैला
ने जाऊँगा। चुनाँचे वो इस साधू के पास पहुँचा। देखा तो वो अपनी कूटिया

में बैठा था। इस शख्स ने कहा। महाराज! थोड़ी सी आग दो। साधू ने कहा।
भाई! आग मेरी क्ूटिया में नहीं है।” दरअसल आग थी भी नहीं। लेकिन उस
शख्स का मक्सूद तो कुछ और था। इसलिए उसने फिर कहा। के महाराज!
आग थोड़ी सी ही दे दीजिए। तब साधू ने मुंह बनाया और गुज॒बनाक होकर
कहा। के चला जा कैसा आदमी है। हम कह रहे हैं के आग नहीं है। और
ये मानता ही नहीं और मांगने चला जाता है।” इस पर उस शख्स ने कहा
के महाराज! धुआँ तो उठता है। थोड़ी ही दे दीजिए। अब तो साधू को इस
क॒द्र गुस्सा आया के मारे गजब के आँखें सुर्ख हो गईं। और सोंटा उठा कर
मारने को दौड़ा। उस शख्स ने हाथ जोड़े और कहने लगा। महाराज! अब तो
आग अच्छी तरह जलने लगी। माफ कीजिए। साथू ने कहा। तू मुझ से बार
बार आग क्‍यों माँगता है। उसने कहा। महाराज! मैंने आपकी खाकसारी की
जाँच की थी। जो गुस्सा आपको पहले आया था। वो आग का सुलगना और
धुएँ का उठना था। और जो गस्सा बाद में पैदा हुआ वो गोया आग का पूरे
तौर पर भड़क उठना था। ये आग आपके दिल से पैदा हुई। और मुंह के राह
निकली। ये आग पहले आपको और फिर दूसरे को जलाती है। अगर आप में
खाकसारी होती तो ये आय कभी पैदा ना होती जैसे के खाक में आग नहीं
लगती। ( मख्जन अखलाक, सफा 334)

सबक्‌:- गसस्‍्सा एक ऐसी खतरनाक आग है जिससे आदमी खुद
भी जल जाता है और दूसरों को भी जला देता है। अल्लाह के नेक बच्दों में
खाकसारी व तवाजो होती है। वो कुछ भी हो जाए गस्से में नहीं आते और
गुस्सा आ भी जाए। तो उसे पी जाते हैं। रे

हिकायत नम्बर 704 चीस्त दुनिया

 

एक शख्स ने घर के कारोबार व मसारिफ से तंग आकर इरादा किया
के दुनिया को तक कर दे। एक बीवी थी। उस बिचारी को तनहा छोड़ कर
खुद किसी जंगल में निकल गया। और किसी फकीर का चैला बन गया।
गले में कफनी डाल कर- हाथ में कासा लेकर दर बदर भीक माँगने लगा।
एक दिन फिरता फिराता उसी बस्ती में आ निकला। जहाँ उसकी बीवी रहती
थी। हस्बे आदत सदा की। भला हो माई कुछ फकीर को मिल जाए। माई ने
उस बेवफा की आवाज पहचान ली झांक कर देखा तो वही जात शरीफ हैं।
खैर उनको थोड़ा सा आटा दिया। और कहा। शाह जी! गो तुम्हारा हमारा
प्रियाँ बीवी का रिश्ता तो बाकी ना रहा। लेकिन लाओ तुम्हारी रोटी पका

दें। कहा, अच्छा। मगर आटा, दाल, नमक, मिर्च, और लौटा, तबा, चूलहा,
कुछ लकड़ियों सब जुरूरी अशिया फकीर की झोली में मौजूद हैं ये सामान
लो और पका दो। तब उस औरत ने जोर से एक दोहत्तड़ मारी और कहा के
कमबख्त! सारा सामान दुनिया तो अपनी बगूल में लिए फिरता है। क्या जोरू
ही दुनिया होती है के मुझ ग्रीब को छोड़कर तारिक-उदुनिया बन गया।
(मख्जन अखलाक्‌, सफा 45)
सबक्‌:- मालो दौलत, बीवी बच्चे और दुनयवी सामान ये दुनिया हर
गिज्‌ नहीं हैं। बल्के खुदा तआला को भूल जाना ये दुनिया है। जो शख्स लाखों
का मालिक हो और खुदा याद भी हो। वो दुनियादार नहीं है। और जो शख्स
मुफलिफ व किलाश हो। और खुदा को भूला हुआ हो। वो दुनियादार है।
चीस्त दुनिया अज॒ खुदा ग्राफिल बुदन
ने कृमाश व नकरह व फ्रजन्द वजन

हिकायत नम्बर 705 केद

 

एक रंद मशरिब फकौर हजरत शाह अब्दुल अजीज मोहद्दिस देहलवी
रहमत-उल्लाह अलेह की खिदमत में आया। और कहा। मोलवी बाबा! शराब
पिलवा। शाह साहब ने एक रूपया उसकी नज्ञ किया। और फरमाया जो
चाहो सूखा खाओ पियो। तुम को इख्तियार है। वो बोला। के हम ने आपका
बड़ा नाम सुना है। लेकिन आप तो कैद में हैं। शाह साहब ने फ्रमाया के
शाह जी! क्या आप कैद में नहीं हैं? कहा के नहीं! आपने फ्रमाया। के तुम
अगर किसी रोश की केद में नहीं हो तो आज गस्‍ल करो। और जब्बा पहन
और अमामा बाँधकर मस्जिद में चलो। और नमाज पढ़ो। वरना जिसे तुम
रंदी की कैद में हो। इसी तरह हम शरीअत गरा की कैद में पाबंद हैं। तुम्हारी
आजादी एक खयाल खाम है। ये सुनकर वो चुप हो गया। और शाह साहब
कदम पकड़ लिए। के दर हकीकत मेरा खयाल गूलत था। जो आजादी का
देम भरते थे। और आईंदा के लिए रंदी मशरिब से तायब हो गया। ( मख्जुन

अखलाक, सफा 4722) |
.सबक्‌:- जो लोग उल्मा इक्राम के खिलाफ हैं और कहते हैं के उल्मा
पेंग नजर है और आजाद खयाली के दुश्मन हैं। और यूं कहते हैं के हम किसी
मजहब से मुतअल्लिक नहीं। हम आजाद खयाल हैं। ऐसे लोग बड़े नादान हैं।
और नहीं जानते के उनका आजाद खयाल होना महज्‌ एक वहम ही है। और
वो खुद भी आजाद खयाली की कैद में हैं। किसी मजहब से मुतअल्लिक्‌

ना होकर ला मजहबी इख्तियार कर लेना भी तो एक मजहब है। यानी जिम
तरह दूसरे मजाहिब हैं। इसी तरह ला मजहबी भी एक मजहब है तो जो किसी
मजहब से मुतअल्लिक्‌ नहीं। वो ला मजहब तो है ही फिर वो केसे कह सकता
है के मैं किसी मजहब से मुतअल्लिक्‌ नहीं हूँ। मजहबी आदमी नहीं तो ला
मजूहबी आदमी सही। कुछ तो है। मजहबी आदमी मजहब को कैद में है। और
लामजहबी आदमी इलहाद की कैद में है। पस उल्मा इक्राम के मुखालफीन
अपने आप को आजाद नहीं कह सकते। इसलिए के उल्मा अगर शरीअत की
कैद में हैं तो “आजाद खयाल” अफ्राद यूरोप की कैद में हैं।

हिकायत नम्बर 706 सच्ची बात

 

हज्जाज ने एक दिन खुत्बा पढ़ा। और बहुत लम्बा कर दिया। तो लोगों में
से एक शख्स खड़ा हुआ। और कहने लगा। ऐ हज्जाज! नमाज पढ़ो, क्‍्योंके
वक्त इन्तिज़ार नहीं करेगा। और खुदा तुझे मअजूर नहीं रखेगा। हज्जाज
सुनकर गस्से में आ गया। और उसे केद करने का हुक्म दे दिया। चुनाँचे वो
कैद कर लिया गया। उस कौम के चन्द लोग हज्जाज के पास आए। और
कहा। के वो केदी को छोड़ दे। इसलिए के वो कैदी एक दीवाना आदमी है।
हज्जाज ने कहा! के अगर वो दीवांगी का इक्रार कर ले तो मैं उसे छोड़ दूंगा।
चुनाँचे वो लोग फिर उस कैदी के पास पहुँचे और उससे कहा। के वो अपनी
दीवांगी का इक्रार कर ले। और कह दे के में दीवाना हूँ। ताके वो इस कैद
से रिहा हो जाए। उसने कहा। मआज अल्लाह! मैं तो हर गिज॒ ना कहूंगा। के
खुदा ने मुझे किसी मर्ज में मुबतला किया है। हालाँके उसने मुझे तनदुरूस्ती
, अता की है। आखिर ये बात हज्जाज को पहुँची। तो उसने उसकी रास्त मोई के
बाइस उसे माफ कर दिया। और छोड़ दिया। ( मख्जन अखलाक्‌, सफा 475)

सबके :- अल्लाह के नेक बन्दे कभी झूट नहीं बोलते और हमेशा सच
ही बोलते हैं। और जालिम से जालिम बादशाह भी हो। तो उसके सामने भी
सच्ची बात कहने से नहीं झिजकते।

हिकायत नम्बर 709 तीन रूके

पुराने जमाने के नेक बादशाहों में से एक नेक बादशाह ने अपने हुक्म
से तीन रूके लिखवाए। और वो तीनों रूके अपने एक खास गलाम के सपुर्द
किए। और कहा के किसी वक्त किसी मामले में हुक्म करते वक्त अगर
मिजाज तगय्युर पजीर हो जाए और गस्सा व गजब का असर मेरी आँखों और

पर जाहिर होने लगे तो कब्ल उसके के मैं हुक्म करूं। पहला रूका मुझे
जाए। फिर अगर देखो के आतिश गृजब सर्द नहीं हुईं। तो उसके
ही दूसरा रूका दिखलाओ। और अगर जूरूरत पड़े तो तीसरा रूका भी
क्षर से गुजार देना चाहिए।

_ मजमून रूका अव्वल:- ताम्मुल और अपने इरादे की बाग को नफ्से
अम्मारा के कब्जा व तसरूफ में ना दे। क्योंके मखलूक्‌ आजिज और खालिक
वी तर है। जिसने तुझ को नैस्त से हस्त किया।

मजूमून रूका दोम:- जेर दस्तों के साथ जो के वदिअत परवरदिगार हैं।
जदगी से मामला ना कर। और उन लोगों से जो तेरे मगलूब हैं, रहम
के वो जो तुझ पर गालिब है, उसके अवज तुझ पर रहम करे। ;
मजमून रूका सोम:- इस शिताब कारी में जो तू हुक्म करे, शरओ से
ग ना कर और इंसाफ से जो के दीनदारी का जजआजूम है। दरगुजर
ग कर। ( मख़्जून अखुलाक्‌, सफा 430 ) ३

सबक्‌:- नेक और खुदा तरस हाकिम कभी जल्मो सितम नहीं करते।
और हमेशा इंसाफ से काम लेते हैं। और खुदा से हर वक्त डरते रहते हैं।

हिकायत नम्बर 708 एत्राफ

 

हजरत सुलतान मेहमूद गजनबी अलेह अर्हमा के पास एक कौमती जाम
॥। एक रोज बादशाह ने अराकीने दौलत को हुक्म दिया के इस जाम को
ड़ दो। सब ने उज्ञ किया के हुजर! ऐसी कौमती चीज को तोड़ना मुनासिब
हीं। सुलतान ने फिर अयाज को हुक्म दिया के इस जाम को तोड़ दो। अयाज
फौरन इस जाम के टुकड़े कर दिए। अहले दरबार ने अयाज को मलामत
की। के तूने ये क्या गजब किया के एक कीमती जाम को तोड़ डाला। अयाज
जवाब दिया के मैंने तो एक जाम ही को तोड़ा है। मुज़िम तुम हो। जिन्होंने
ही फरमान को तोड़ा है। बादशाह ने फिर मसनुईं नाराजगी से पूछा के
बाज! तुम ने ये जाम क्‍यों तोड़ा। जब के सारे अहले दरबार ने ऐसी हरकत
‘ की। अयाज ने झट हाथ जोड़कर अर्ज की। के हुजूर! कसूर हो गया।
».. रिमाईये। मैं अपनी गलती को तसलीम करता हूँ। बादशाह ने अहले .
और से मुखातिब होकर कहा। देखा यही है वो खल्के अयाज जिसकी
भे वो मुझे मंजर नजर है। देख लो उसने इस जाम तोड़ने के बाक्‌ये
( मैरी तरफ्‌ मनसूब नहीं किया। बल्के उसे अपनी गलती करार दिया है।
आन अखलाक, सफा 45)

 

सबक्‌:- नेक और फ्रमाँबर्दार बन्दे अपनी लगृजिशों को निस्बत
कभी अल्लाह तआला की तरफ नहीं करते और हमेशा अपनी ही लगृजिश
का एत्राफ करते हैं। देख लीजिए। शैतान ने हजरत आदम अलेहिस्सलाम
को सज्दा ना किया तो रब्बे तआला ने जब पूछा के तूने आदम को सज्दा
क्यों नहीं किया? तो उसने जवाब दिया “फबिमा अग्रवैतनी ” यानी ऐ
अल्लाह! ये काम तू ही ने मुझ से कराया है। मगर जब हजरत आदम
अलेहिस्सलाम से दरयाफ्त फरपाया के ऐ आदम! तुम शज्ञ ममनूअ के पास
क्यों गए? तो हजरत आदम अलेहिस्सलाम ने अर्ज किया रब्बना ज़लमना
अनफुसाना यानी ऐ रब हमारे! ये हमारी ही लगृजिश है। हम ने खुद
अपनी जानों पर जुल्म किया। खुदा तआला को ये एत्राफ पसंद आ गया।
और हजरत आदम अलेहिस्सलाम पर खुदा खुश हो गया। मालूम हुआ के
जो लोग बुरे काम करके यूं कह दिया करते हैं के जी उसमें हमारा क्‍या
कसूर! ये तो अल्लाह ही को ऐसा मंजर था। और अल्लाह ही ने ये काम
कराया( मआज अल्लाह ) वो लोग बड़े नादान और गुनहगार हैं। हमेशा
अपनी गलती का एत्राफ करना चाहिए।

हिकायत नम्बर 709 अशर्फियों की थेली

 

दो शख्स इकड्ठे सफर कर रहे थे। चलते हुए रास्ते में उनमें से एक ने
एक अशर्फ”ियों की थेली रास्ते में पड़ी हुई पाई। वो थेली को उठा कर अपने
साथी से कहने लगा “देखो भाई। मैंने ये थेली पाई है।” दूसरा बोला। ये तुम
ने क्‍या कहा। के मैंने पाई, यूं कहो के “हमने पाईं।” इस वास्ते के हम तुम
दोनों साथ हैं। ये हम दोनों का हक है। पहले ने कहा। मैं ये बात क्‍यों कहं।
जबके थेली मिली मुझी को है। गृर्ज थेली पर लड़ते झगड़ते चले जा रहे थे।
इतने में पीछे से कुछ लोगों की आहट सी मालूम हुई। कान लगाकर सुना तो
वो लोग ये कहते हुए चले आ रहे थे के थेली के चोर वो दोनों आगे जाते
हैं। ये सुनकर वो थेली पाने वाला अपने साथी से कहने लगा। क्‍यों भई! अब
क्या करें? “अब तो हम मारे गए” दूसरा बोला। ये तुम ने क्‍या कहा। के
“हम मारे गए” यूं कहो के “मैं मारा गया ” जब तुम ने थेली पाने में मुझ को
‘शरीक नहीं किया तो अब आफत में भी मैं तुम्हारा शरीक नहीं हूँ।” ( मख्जुन
अखलाक्‌, सफा 434)

सबक्‌:- जो लोग फायदे में किसी दूसरे को शरीक नहीं करते
मूसीबत में भी उनका कोई शरीक नहीं होता।

हिकायत नम्बर 710 नेक नाम

 

एक बादशाह की मजलिस में किसी बुजर्ग का जिक्रे खैर हुआ। और
लोगों ने उस बुजर्ग की बड़ी तारीफ की। बादशाह का इश्तियाकु बढ़ा। और
उसने चाहा के वो इस बुजुर्ग से मुलाकात करे। चुनाँचे उसने अपना एक खास
आदमी भेज कर उस बुजर्ग को अपने पास बुलाया। वो बुजर्ग जब मजलिस
शाही में तशरीफ लाए तो आते ही फ्रमाया “बादशाह की हजारों साल की
उप्र हो जियो” बादशाह ने कहा आपने अपने पहले कलाम ही में अपनी
हिमाकृत जाहिर कर दी। जो आप जैसे बुजुर्ग की शायाने शान ना थी। भला
कोई आदमी हजारों साल भी जी सकता है? उस बुजर्ग ने फरमाया के आदमी
की हयात बकाऐ बदन ही पर मौकफ नहीं। जो आदमी हकूमत पाकर अद्ल
ब इंसाफ और खुदा तरसी से काम ले। और अच्छे काम करे। वो आदमी नेक
नाम बनकर हमेशा के लिए जिन्दा हो जाता है। मेरी मुराद यही थी के अदलो
इंसाफ की बदौलत आपका नाम हजारों साल तक सफा दहर पर कायम रहे।
(मख्जन अखलाक्‌, सफा 45)

सबक :- अदलो इंसाफ और खुदा तरसी से काम लेने से उप्र भी
बढ़ती है। और इंसान मर कर भी जिन्दा रहता है। पस हमेशा अदलो इंसाफ
और अच्छे काम करने चाहियें और जल्मो सितम और बुरे कामों से बाज
रहना चाहिए। सा

हिकायत नम्बर 711 फ्साहत व डाजिर जवाबी

 

हज्जाज इब्मे यूसुफ बड़ा जाबिर और स’ तगीर हाकिम और अरबी
जबान का बड़ा फाजिल और जबरदस्त खतीब भी था। एक शायर कुबउस्सरा
नामी अंगूरों के मौसम में अपने दोस्तों के साथ एक बाग में गया। सारे दोस्त
आपस में गुफ्तगू करने लगे। तो असना-ए-गुफ्तगू में हज्जाज का भी जिक्र
छिड़ गया। कबउस्सरा ने कहा। न्‍

अल्लाहुम्मा सब्विद वजहू

वक़्ताआ उनकाहू क्सकिनी मिन दमीही द

( तर्जुमा ) “ऐ अल्लाह! उसका मुंह काला कर और उसकी गर्दन काट।
और उसका खून मुझे पिला ”

जब ये खबर हज्जाज तक पहुँची तो उसी वक्त उसे हाजिर करने का

दिया। जब वो हज्जाज के सामने आया और उसके गृजबो जलाल को

देखा तो कहने लगा। के ऐ अमीर! हकीकत ये है के मैंने बाग में जाकर देखा।
के अंगूर पकने के करीब हैं। तो मैंने अल्लाह से दुआ की। के “ऐ अल्लाह!
उसका मुंह काला कर। यानी अंगूर पक कर सिंयाह हो जायें। और उसको
गर्दन काट। यानी अंगूर का खोशा दरख़्त से जुदा हो। और उसका खून पिला।
यानी अंगूर का शीरा मुझे पिला।” मेरा मतलब तो ये था। मगर दुश्मनों ने
मेरी अदाबत में आकर उसके उलटे मअनी मुराद लिए। हज्जाज इन मअनों
में उससे झगड़ता रहा। मगर वो अपनी फ्साहत व बलागृत से ग़ालिब आता
रहा। हज्जाज ने तंग आकर कहा। ्ि मे
लहामिलका अला अदहमी “मैं तुझे बैड़ियाँ पहनाऊँगा।

“अदहम” के मअनी लोहे की बेड़ी भी हैं और सिया घोड़े भी।
कुबउस्सरा ने उसका ये हुक्म सुनकर कहा। आप से यही उम्मीद है के आप
मुझे सियाह घोड़े पर बिठायेंगे। हज्जाज ने कहा “उरदतुल हदीद ” मेरी मुराद
लोहा (हदीद) है। कुबउस्सरा ने येसुनकर कहा।

“अन यकुन हदीदा खैर मिन बलीद” अगर घोड़ा तेज हो तो सुस्त
से बेहतर है।” ।

“हदीद ” के मअनी लोहा भी और तेज भी हैं। .. रा

हज्जाज उसकी फ्साहत व हाजिर जवाबी आजिजू आ गया। और उसे
माफ कर दिया। ( तालीम-उल-अखलाक, सफा 407 )

सबक:- अंरबी जबान बड़ी जामओ है। और अरब के फुसहा बड़े बा
कमाल होते है। और ये भी मालूम हुआ के इल्म बड़ी कारआमद चीज है।
उससे आदमी बड़ी बड़ी मुसीबतों से बच जाता है। द

हिकायत नम्बर 712 नंगों शैतान न

 

शेख अबु अलकासिम जुनैद रजी अल्लाहो अन्ह फरमाते हैं। मैंने इबलीस
को ख़्वाब में नंगा देखा। ( खुदा की पनाह उससे ) मैंने उससे कहा। तुझे इंसानों
से शर्म नहीं आती। कहा ये लोग तुम्हारे नजदीक इंसान हैं। मैंने का हाँ! इबलीस
ने कहा। अगर ये इंसान होते तो जैसे लड़के गोली के साथ खेलते हैं। मैं उनके
साथ ना खेलता। हाँ इंसान उनके सिवा और हैं। मैंने पूछा वो कौन हैं? इबलीस
बोला। मस्जिद शोनीजिया में चन्‍द लोग हैं जिनकी आदत व परहैजगारी से में
आजिज हूँ मैंने बड़ी कोशिश की। मगर उन पर काबू ना पा सका।

हजरत जुनेद फ्रमाते हैं के मैं ख़्वाब से बैदार हुआ तो मस्जिद
शोनीजिया में गया। वहाँ तीन मर्द नजर आए। अपने सर गड़रियों में डाले

 

और सर झुकाए बैठे थे। जब मेरी आहट हुईं तो उनमें से एक ने गडरी से सर
निकाला। और कहा। क्‍

“ऐ जुनैद! शैतान खूबीस की बात से धोका ना खाना। ये कहकर फिर
मुंह छुपा लिया।” ( रयाजू-उल-रियाहीन, सफा 6) क्‍

सबक्‌:- उरयानी और नंगा पन शैतानी फैल है। और ये भी मालूम
हुआ के शैतान अल्लाह के मक्बूलों पर काबू नहीं पा सकता। और ये भी
मालूम हुआ के अल्लाह के मक्बूलों पर कोई चीज मख्फी नहीं रहती। फिर
सब अल्लाह वालों के आका मौला और सरदार हुज॒र मुख़्तार सल-लल्लाहो
तआला अलेह व सललम से कोई बात किस तरह गायब रह सकती है।

हिकायत नम्बर 713 इम्तिहान

 

हजरत इन्नाहीम ख़्वास रजी अल्लाहो अन्ह फरमाते हैं। मैं बगृदाद में
धा। वहाँ फूक्रा की एक जमात रहती थी। एक रोज एक जवान होशियार,
अक्लमंद , खूबसूरत, खुश अखलाक्‌ आया। मैंने अपने दोस्तों और साथियों
से कहा। ये जवान यहूदी मालूम होता है। मेरे साथियों को ये बात बुरी लगी।
मैं बाहर आया तो वो जवान भी बाहर आ गया। लेकिन फिर अंदर चला
गया। और उन मेरे साथियों से पूछा के ये बड़े साहब मेरे मुतअल्लिक्‌ तुम से
क्या कह रहे थे। उन्होंने उसके बताने से इजतिनाब किया। लेकिन जब उसने
इसरार किया तो उन्होंने कह दिया के हमारे शेख तुम्हें यहूदी बता रहे थे।
इब्नाहीम ख्वास फरमाते हैं के ये बात सुनते ही वा जवान मेरे कदमों में गिर
पड़ा। और मुसलमान हो गया। और कहने लगा के मैं इम्तिहान ही की नीयत
से आया था। और ये सोच कर आया था के अगर ये लोग सच्चे हैं तो उनमें
पे कोई मुझे जरूर पहचान लेगा। चुनाँचे शेख की निगाह ने मुझे ताड़ लिया।
( रियाजु-उल-रियाहीन, सफा 8)

सबक्‌:- जो लोग अल्लाह को पहचान लेते हैं और जुमरा-ए-आरफीन
में आजाते है फिर वा हर नेक व बद और हर खैरो शर को भी पहचानने
जेगते हैं। और उनके इल्म व इफान से कोई चीज बाहर नहीं रहती।

हिकायत नम्बर 714 तकवा

 

हजरत इब्रोहीम इब्ने अदहम रहमत-उल्लाह अलेह ने एक रोज
‘के बाग में नहर के अन्दर सेब बहते हुए देखा। और ये.समझ कर के
क्या कीमत हो सकती है। उठाया और खा लिया। खा लेने के

बाद आप मुतफक्किर हुए और सोचने लगे के कहीं ये सेब खा लेना ना
जायज और हराम ना हो। खुदा जाने ये सेब किस का था। और कैसा
था। जो मैंने खा लिया। कयामत के रोज अगर उसकी बाज पुर्स हो गई
तो क्‍या जवाब दूंगा? इसी फिक्र में बागु के मालिक के घर पहुँचे। और
दरावाजा खटखटाया। एक लोंडी बाहर निकली। हजरत इब्बाहीम कहने
लगे। मैं बागू के मालिक से मिलना चाहता हूँ। लोंडी ने बताया के बाग
की मालिक एक औरत है। हजरत इब्राहीम ने फरमाया। उससे कह दो।
में उससे मिलना चाहता हूँ। चुनाँचे बाग की मालिका बाहर निकली।
और हजरत इब्राहीम से सारा किस्सा सुनकर कहने लगी। इस बाग का
आधा हिस्सा मेरा है। और आधा बादशाह का। मैं अपना हक तो माफ
करती हूँ। और बादशाह के हक की मैं जिम्मेदार नहीं। बादशाह बलख
में था। हजरत इज्नाहीम आधा हिस्सा बख्शवा कर बाकी के आधे हिस्से
को बख्शवाने के लिए बलख पहुँचे। और बादशाह से भी माफ करा के
दम लिया। ( रिवायात, सफा 308 )

सबंक:- अल्लाह के मक्बूल बन्दे बड़े ही मुत्तकी और परहैजगार होते
हैं। वो पराई चीज पर कभी कब्जा नहीं करते। और हराम, ना जायज चीज
के इस्तेमाल से हमेशा बचते हैं। मगर आह! आज कल तो ये आलम है के

कहाँ का हलाल और कहाँ का हराम

जो साहब खिलाए वो चट कीजिए

हिकायत नम्बर 715 फिजल खर्चा

एक फिजल खर्च अमीर आदमी से एक भिकारी ने सवाल किया “ख़ुदा

के नाम पर एक दीनार मुझे अता कीजिए” अमीर आदमी ने हैरत के साथ
सायल से पूछा। के तुम ने इतना ज़्यादा मुझ से क्‍यों माँगा। जब के दूसरों से
तुम हक हक कली हो। डे *”
कार्री ने जवाद दिया। बात ये है जनाब! दूसरे लोगों से मुझे उम्मीद

के फिर दोबारा भी उनसे मुझ कुछ ना कुछ मिलेगा। लेकिन हक तर्ज
से खर्च हज हैं, उसके पेशे नजर आईंदा आपसे भीक मिलने की तवक्कौ
नहीं है। क्योंके आप खुद मुफलिस हो चुके होंगे। इसलिए इसी वक्त जितना
प्रिल जाए गनीमत है। फिजूल खर्च ये बात सुनकर बड़ा मुतास्सिर हुआ। और
फिर एहतियात से खर्च करने लगा। ( रिवायात, सफा 353 )

सबक्‌:- इंसान को बड़ी एहतियात से खर्च करना चाहिए। और

 

727 हिस्सा चहारम
खर्ची से बचना चाहिए। वरना फिजल खर्ची के हाथों मुफलिस और
प्रिकारी बनना पड़ता है। हु

हिकायत नम्बर 716 इसतकलाल

 

पुराने जमाने में एक आदमी था। जो एक शहर से दूसरे शहर का चक्कर
लगाया करता था। उसके पास एक मोटा ताजा बैल था। इस बैल को वो अपने
कांप पर लिए घूमा करता था। लोग उसकी क॒व्वत का ये कमाल देखते तो
हैरान रह जाते थे। वो सोचा करते थे ये बला की क॒व्वत इस मामूली शख्स
में कहाँ से आ गई। ये क्या खाता है? कहाँ से ये क॒व्वत लाता है? एक मर्तबा
लोगों में से एक ने ये कमाल देखकर उससे पूछा। के तुम ने इतनी जुबरदस्त
क॒व्वत व ताकृत कहाँ से और कैसे हासिल की? उसने जवाब दिया। इस
बैल को जब ये जरा सा बछड़ा था। मैं रोज अपने कंधे पर उठाने का आदी
हूँ। कोई दिन भी ऐसा नहीं गुजरा के मैं उसे अपने कंधे पर ना उठाता हूँ। इस
मश्कु और मदावमत व इसतकुलाल का नतीजा ये हुआ के जैसे जैसे उसका
बजुन बढ़ता गया। मेरी क॒ृव्वत व ताकृत भी बढ़ती गई। यहाँ तक के ये अब
अगरचै पूरा सांड बन चुका है मगर इसे अपने कांधे पर उठा लेने में मुझे जूरा
भी तकलीफ नहीं होती। ( रिवायात, सफा 55 )

सबक्‌:- जो इंसान हिम्मत व मदावमत व इसतकूलाल से काम लेता
है वो कामयाबी से हमकिनार हो जाता है और इसतकूलाल व मदावमत
से बड़ी बड़ी मुश्किलें हल हो जाती हैं। और क॒व्वते बर्दाश्त ब तहम्मुल में
ज़ाफा होता है। पस हमें भी हिम्मत व इसतकूलाल और मदाबमत से काम
लेना चाहिए।

हिकायत नम्बर 717 सिद्दीके अकबर रजी ल्लाहो अन्ह

 

हजरत अली रजी अल्लाहो अन्ह फ्रमाते हैं के एक मर्तबा मुशरिकीने
पक्का ने हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल॑म पर हमला करके
ऐजूर को तकलीफ पहुँचाई और कहने लगे के तू ही एक खुदा बताता है।
जुदा की कसम किसी को मुशरिकीने मक्का से मुकाबला करने की जुर्रात
गे हुईं मगर अबु बक्र सिद्दीक्‌ रजी अल्लाहो अन्ह आगे बढ़े। और मुशरिकोन
भार मार कर हटाने लगे और धक्का देकर गिराने लगे। और फरमाते
जैतते थे। अफसोस तुम ऐसे शख्स को कत्ल करना चाहते हो जो कहता है,
फेरा परवरदिगार एक है । फिर हजरत अली चादर उठाकर रोने लगे। ह्ृत्ता के

आपकी दाढ़ी मुबारक तर हो गई। फिर फरमाया। खुदा ताअला तुम्हें हिदायत
दे। ये तो बतलाओ के मोमिन आले फिरऔन अच्छे थे या अबु बक्र अच्छे
हैं। लोग खामोश रहे। तो खुद आप ही ने जवाब दिया। तुम क्‍यों नहीं जवाब
देते। अल्लाह की कसम! हजरत अबु बक्र की एक घड़ी उनके हजार घंटों से
बेहतर है। क्‍्योंके वो अपने ईमान को छुपाते थे और अबु बक्र ने अपने ईमान
का अलल एलान इजहार क्िया। ( तारीख-उल-खुलफा, हजरत अबु बक्र
की शुजाअत के बयान में, सफा 4)

सबक्‌:- हजरत अबु बक्र सिद्दीक्‌ रजी अल्लाहो अन्ह बड़े दिलैर
और बहादुर थे। और आपकी हिम्मत व जुर्रात का इक्रार हजरत शेरे खुदा
रजी अल्लाहो अन्ह को भी है। और ये भी मालूम हुआ के हजरत सिद्दीके
अकबर रजी अल्लाहो अन्ह को हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सललम
से बड़ी मोहब्बत थी। और ये भी मालूम हुआ के अपने ईमान को ना छुपाना
और उसका एलान करना बेहतर और हजरत अली रजी अल्लाहो अन्ह के
नजदीक फजीलत का मौजिब है।

हिकायत नम्बर 718 जमा करआन

 

भंसीलमा कज़्जाब की जंग के बाद हजरते सिद्दीके अकबर रजी
अल्लाहो अन्ह ने हजरत जैद बिन साबित रजी अल्लाहो अन्ह को बुला
भेजा। हजरत जैद जिस वक्‍त सिद्दीके अक्बर रजी अल्लाहो अन्ह के
पहुँचे तो उस वक़्त हजरत फारूके आजम रजी अल्लाहो अन्ह भी
सिद्दीके अकबर के पास बैठे थे। सिद्दीके अकबर रजी अल्लाहो अन्ह ने
हजरत जैद से फ्रमाया। के ये उमर फारूके आजम मुझ से कहते थे
के जंग यमामा में बहुत से मुसलमान शहीद हो गए हैं। मुझे डर है के
इसी तरह अगर मुसलमान शहीद होते रहे तो हाफिजों के साथ कुरआन
शरीफ भी ना उठ जाए। इसलिए मैं मुनासिब समझता हूँ के क्रआन
शरीफ को जमा कर लिया जाए। मैने उन्हें ये जवाब दिया था के कोफा
तफ्अल शैअन लग यफ्अलहू रसूलुल्लाही सल-ललल्‍्लाहो तआला
अलेही व सलल्‍लम यानी “वो काम कैसे करोगे जो काम रसूल अल्लाह
सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍्लम ने नहीं किया।”

मगर उमर फारूक ने ये जवाब दिया के “वल्लाह ये काम नेक है”
( यानी अगरचे ये काम रसूले करीम सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम
ने नहीं किया। मगर काम अच्छा है ) इस बात पर वो बराबर इसरार करते रहे।

हत्ता के मेरा भी सीना खुल गया। और मैं भी उसकी अहमियत को समझ गया।
(ऐ जैद ) तुम जवान और अकलमंद आदमी हो। तुम कातिब वही भी
ह₹ह चुके हो। लिहाजा तुम तलाश करके करआन शरीफ को एक जगह जमा
कर 4 हजरत जैद को ये हुक्म बहुत शाक्‌ गुजरा। और वो भी यही फरमाने
लगे
कफा तफ्अलूना गैअन लग वफ्अलहू रसूलुल्लाही सल-लल्लाहो
तआला अलेही ब सल्‍्लगम्/आप बो काम कैसे करेंगे जो काम रसूल अल्लाह
सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्लम ने नहीं किया। हज़रत अबु बक्र रजी
अल्लाहो ने भी वही जवाब दिया के “खुदा की कसम ये काम अच्छा है।”
प्रगर हजरत जैद को इसमें ताम्मुल ही रहा। हत्ता के जैद का भी सीना खुल
गया। और वो भी जमा करआन की अहमियत को समझ गए। फिर हजरत
जैद ने कागज के परचों और ऊँट बकरियों के शानों की हड्डियों, दरख़्तों
के पत्तों और हाफिजों के सीनों से कुरआन शरीफ को हासिल किया। और
जमा करके हजरत सिद्दीके अकबर कौ खिदमत में पेश कर दिया। ( बुखारी
शरीफ, बाब जमा अलक्रआन, सफा 75 )
सबक:- हजरत सिद्दीके अक्बर रजी अल्लाहो अन्ह ने करआने
पाक को जमा फ्रमा कर उम्मत पर बहुत बड़ा एहसान फ्रमाया है। सारी
उम्मत आपके इस एहसान के जेर बार है। और ये भी मालूम हुआ के आज
कल जो लोग कई नेक कामों को बिदअत कह देते हैं के ये काम रसूल ,
अल्लाह सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्लम ने नहीं किया था। और
इसी लिए सिद्दीके अकबर और हजरत जैद ने भी पहले यूं फरमाया था।
के वो काम कैसे करें। जो रसूल अल्लाह सल-लल्लाहो तआला अलेह व
सेललम ने नहीं किया। मगर जब अनशराह सदर हो गया। तो जवाब ये था
के काम अच्छा है। अगरचै रसूल अल्लाह सल-लल्लाहो तआला अलेह व
सल्‍्लम ने नहीं किया। “जमा करआन ” बावजूद इसके के रसूल अल्लाह
पल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम से साबित ना था। मगर रण” अच्छा
पप्झ कर सहाबा इक्राम ने कर लिया। और किसी ने इस पर बिदअत का
फतवा ना लगाया। इसी तरह आज मी अगर कोई मुसलमान जलूस मीलाद ह
शरीफ निकाले। या मेहफिल मीलाद शरीफ और ग्यारहवीं शरीफ का
शेकाद करे। या कोईं और नेक काम करे और उस पर कोई शख्स यूं कहे
के मरवजा हय्यत से इन कामों को रसूल अल्लाह सल-लल्लाहो तआला
व सल्लम ने नहीं किया। तो उसके इस जौम का हम ये भी जवाब

दे सकते हैं के।

बल्‍लाही हाज़ा खैरन “खुदा की कसम ये काम अच्छा है।”

फिर भी अगर कोई ना माने तो समझ लीजिए के इनशराह सदर उसके
नसीब ही में नहीं।

हिकायत नम्बर 719 माफी-उल-अरहाम का इल्म

 

हजरत सिद्दीके अकबर रजी अल्लाहो अन्ह का वक्‍त विसाल शरीफ
आया। तो आपने हजरत आयशा सिद्दीका रजी अल्लाहो अन्हा से फरमाया।
बेटी! मैं तुझे हर हाल में खुश देखना चाहता हूँ। तेरी गर्बत से मुझे रंज पहुँचता
है। और खुशहाली से राहत। मेरे मरने के बाद मेरा तकों तेरे जो दूसरे भाई और
बहनें हैं, उन पर केरआन की रू से तकुसीम करना। हजरत आयशा ने अर्ज
किया। अब्बा जानों ऐसा ही होगा। मगर तो एक ही बहन असमा है। दूसरी
बहन है ही कब? फ्रमाया। तुम्हारी सोतैली माँ हबीबा हामला है। उसके पेट
में लड़की है पस मैं उसकी भी तुम्हें बसीयत करता हूँ। चुनाँचे आपके बाद
उम्मे कुलसुम पैदा हुई। ( तारीख-उल-खुलफा, सफा 79 सिद्दीके अकबर की
वफात के बयान में )

सबके :- सिद्दीके अकबर रजी अल्लाह अन्ह जो हुज॒र सल-लल्लाहो
तआला अलेहं व सल्‍लम के गूलाम हैं। उनकी ये शान है के खुदा तआला
को अता से वो माफी-उल-अरहाम का भी इल्म रखते हैं। फिर जो उनके
आका व मौला सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्लम हैं और जिनके
सदके में उन्हें ये शान मिली। उनकी नजर से माफी-उल-अरहाम ये
कोई और चीज केसे गायब रह सकती है। फिर किस क्र बेखबर हैं
वो लोग जो हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम के लिए भी
यू लिख और कह देते हैं के उन्हें दीवार के पीछे का भी इल्म ना था।
(मआज्‌ अल्लाह )

हिकायत नम्बर 720 चोरी

 

हजरत अहमद हर्ब रहमत-उल्लाह अलेह के पड़ोस में एक शख्स के हाँ
चोरी हो गई। आप अपने दोस्तों के साथ उसकी गमख़्वारी को तशरीफ ले
गए। पड़ोसी ने बड़ी खुंदा पैशानी से उनका इसतक्‌बाल किया। हजरत अहमद
हर्ज ने बताया के हम तुम्हारी चोरी हो जाने का अफसोस करने आए हैं।
पड़ोसी बोला। मैं तो अल्लाह का शुक्र अदा कर रहा हूँ। और मुझ पर उसके

तन शुक्र वाजिब हो गए हैं। एक ये के दूसरों ने मेरा माल चुराया है। मैंने
नहीं दूसरे ये क अभी आधा माल मेरे पास मौजूद है। तीसरे ये के मेरी दुनिया
क्रो बक है। और हे मेरे पास है। ( मख्जून अखलाक्‌, सफा 238 )
स कर * अल्लाह के बन्दे इबतला में भी अल्लाह का शुक्र ही अदा

करते हैं। और कभी उसका शिकवा नहीं करते। और ये भी मालूम हुआ
के सबसे बड़ी दौलत दीन है। ये सलामत है। तो कुछ गृम ना होना चाहिए।
बकौल शायर…

कुछ रहे या ना. रहे पर ये हुआ है के अमीर!

नज़े के वक़्त सलामत पमिरा ईमान रहे

हिकायत नम्बर 721 दुनिया की तमसील

 

एक शख्स ने ख़्वाब में देखा के वो किसी जंगल में चला जाता है। उसने

व्वा के मेरे पीछे एक शेर आ रहा है। ये भागा जब थक गया तो देखा के
आगे एक बड़ा गहरा गढ़ा है। उसने जान बचाने के लिए गढ़े में कूदना चाहा।
गगर गढ़े के अन्दर झांका। तो उसमें एक अजुदहा मुंह खोले बैठा था। अब
पे घबराया के क्‍या करे। पीछे शेर है। और आगे अजुदहा। अचानक उसे एक
की टहनी नजर आईं। ये उससे लटक गया। मगर जब हाथ टहनी को

ढल कर लटक चुका तो उसने देखा के उस टहनी को दो सियाह और सफेद

है जड़ से काट रहे हैं। अब तो ये बहुत डरा के थोड़ी देर में ये टहनी कट

। और मैं गिर जाऊँगा। और शेर व अजुदहा का लुक॒मा बन जाऊँगा।
शेत्तिफाकन दरख्त पर उसे शहद का एक छत्ता नजर पड़ा। और ये उस शहद
के पीने में मशगल हो गया। ना शेर का खयाल रहा ना अजुदहा का। और ना
पूहों का डर। अचानक वो टहनी जड़ से कट गई। और ये गिर पड़ा। और शेर
” फाड़कर गढ़े में गिरा दिया। और अजदहे ने उसे निगल लिया। ( मख्जन

‘बलाद 9, सफा ३83 ) ।

सबक: – जंगल से मुराद दुनिया है। और शेर मौत है। जो पीछे लगी

ह हैं। और गढ़ा कब्र है जो आगे है। और अजृदहा बुरे अमल हैं। जो कब्र
। इसेंगे। और दो चूहे सफेद और सियाह। दिन और रात हैं और दरख्त उप्र
९ जिसे वो काट रहे हैं। और शहद का छत्ता दुनिया की फानी लज़्जात हैं।
… भशगल होकर इंसान मौत, कब्र और सजाऐ आमाल बद से गाफिल
जाता है। फिर अचानक मौत आ जाती है। और बजुज नदामत व हसरत

” फेछ हासिल नहीं होता।

हिकायत नम्बर 722 आईनूनी या इबादल्लाही

 

माहाना फैज-उल-इस्लाम रावलपिंडी ने अपनी मार्च 6(ई० की इशाअत
में “उल्मा-ए-अमृतसर ” के जेरे उनवान “मौलाना नूर अहमद साहब पसरवरी
सुम्मा अमृतसरी ” के हालात लिखते हुए मौलाना का एक अपना बयान कर्दा
ये वाक्ेया भी लिखा है।

“मैंने एक दफा मकका से पैदल चल कर दरबारे नबत्वी में हाजरी का
शर्फ हासिल किया।” असनाऐ सफर एक रात ऐसी आई के कयाम के लिए
कोई मंजिल ना थी। इसलिए बड़ी परेशानी हुई। मअन मुझे याद आया के
हजरत रसूले खुदा सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम की हदीस है के
सफर में राह भूल जाओ तो बुलंद आवाज से या इबादल्लाही आइनूनी “ऐ
अल्लाह के बन्दों मेरी मदद करो।” पुकारा करो। मैंने उस पर अमल करते
हुए तीन बार पुकारा। और फिर एक बार चारों तरफ नजर दौड़ाई। तो करीब
ही एक झोंपड़ी नजर आईं। और मैं इस तरफ चला। जब करीब पहुँचा तो
देखा के चन्द बच्चे झोंपड़ी के बाहर खेल रहे हैं। और ये बच्चे मुझे देखते
ही पुकार उठे। “ जाआ जीफुल्लाह” अल्लाह का मेहमान आया।

बच्चों की आवाज सुनते ही अन्दर से एक मर्द निकला। और उसने मेरी
बड़ी खातिर व मदारात की। खाना खिलाय। और रात बसर करने के लिए
बिस्तर वगैश दिया। और सुबह को मुझे रास्ते पर डाल दिया।

मौलाना फरमाते हैं के मैंने उससे कब्ल यानी आईनूनी या इरनादल्लाही
पुकारने से कह्न बकायमी होश व हवास इस इलाके में कोई झोपड़ी ना
देखी थी।”

सबक :- हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सललम का इशदि
बरहक्‌ हैं और आपके इर्शाद के पुताबिक इस किस्म की मुश्किल के वक्त
अल्लाह के बन्दों को मदद के लिए पुकारना हर गिज शिर्क नहीं है। बरना
हुजर ऐसी तालीम क्‍यों देते और ये भी मालूम हुआ के हुजर सल-लल्लाहो
तआला अलेह व सल्‍लम की अहादीस मुबारका के लिए गहरी मोहब्बत और
सच्ची अकौदत दरकार है और अगर मोहब्बत व अकीदत ही में जौफ हो तो
फिर ऐसी अहादीस मुबारका भी जईफ नजर आने लगती हैं।

हिकायत नम्बर 723 सबके हाजत रवा सलामुन अलेक

 

शबे मैराज हजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सललम जब

प्रिदूशत-उल -मुनतहा तक पहुँचे तो जिल्नाईले अमीन वहाँ रूक गए। और
अर्ज की। या रसूल अल्लाह! अब मैं यहाँ से बाल भर भी आगे नहीं बढ़
पक्कता। अगर में यहाँ से आगे बढ़ूँगा तो नूरानियत से जल जाऊँगा। हुजर ने
फरमाया। अच्छा ऐ जिन्नाईल! हर
. हल लका मिन हाजाती तेरी कोई हाजत है?

अर्ज किया।

सलिल्लाहा अन अबसुता जनाहिया अलस्सिराती लीउम्यूतिका
हता यजूज व अलेहीयानी अल्लाह से मेरे लिए सवाल कीजिए के कयामत
के रोज आपकी उम्मत के लिए मैं पुल सिरात पर अपने पर बिछा दूंगा। ताके
आपकी उम्मत आसानी से ऊपर से गुजर जाए। ( मवाहिब लुदनिया, सफा
9, जिल्द 2)

सबक : – हमारे हुजर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम जिब्राईले
अपीन के भी हाजत रवा है। और आपने खुद उससे फ्रमाया। के कोई हाजत
है। तो पेश करो। फिर जिन्नाईल ने भी ये नहीं कहा के हृजर मेरी जो हाजत
होगी मैं अपने अल्लाह से खुद कह लूंगा। नहीं जिल्नाईल ने अपनी हाजत हुजर
क बारगाह में पेश कीो। और अल्लाह से जो माँगा हुजर के वसीले से माँगा।
और ये भी मालूम हुआ के हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम की
ग्लामी अल्लाह का बहुत बड़ा ईनाम है। इस निसबत से हम जिब्बाईल की
नजरों में भी मेहबूब बन गए हैं। देखिये जिन्नाईल ने अगर अपनी हाजत पेश
की तो ये के मैं पुल सिरात पर अपने पर बिछा देने चाहता हूँ। ताके हुजर को
उममत को आसानी हो जाए। फसल-लल्लाहो अलेही व सल्‍लम।

हिकायत नम्बर 724 हलवान का पहाड़

 

हजरत फारूके आजम रजी अल्लाहो अन्ह के जमाना-ए-खिलाफत
पें हजरत नजला बिन मुआविया रजी अल्लाहो अन्ह अपने साथियों समेत
हलवान में मसरूफ जिहाद थे। इसी असना में एक पहाड़ पर नमाजे मग्रिब
का वक्‍त हो गया। और हजरत नजला ने वहीं अजान देना शुरू की। जब
आपने कहा।
मी अल्लाहू अकबर अल्लाहू अक्यरतो उस पहाड़ में से एक गैबी आवाज

कब्बरता कबीरन या नजलतू “इखलास का कलमा है ऐ नजला!”

फिर जब कहा अशहदअन लाइलाहा इल्लल्लाह…. तो आवाज आई:

 

कलीमतुलड़्खलास या नजलतू “इखलास का कलमा है ऐ नजला!”

फिर जब कहा अशहदअन्ना मोहम्मदर्ससूल अल्लाह:……. तो आवाज आई:-.

हुवललजी बश्शरना बिही ई्सबना मारियमू

“यही वो जाते पाक है जिसकी बशारत हमें ईसा अलेहिस्सलाम ने दी।”
फिर जब कहा हय्या अलस्सलाह:……. तो आवाज आई:- क्‍

तूबा लिमन मशिया इलेहा व ज़बा अलेहा

“बशारत हो उसे जो नमाज पढ़ने गया और हमेशा पढ़ता रहा।”

फिर जब कहा हव्या अलल फलाह:…… तो आवाज आई:-

कद अफलाहा मन अहाबाबा मुहस्मदन “निजात पा गया वो शख्स
जिसने मोहम्मद( स“्अन्स” ) को माल लिया” फिर जब कहा अल्लाहो
अकबर अल्लाहो अकबर ला इलाहा इल्लल्लाहू….. तो आवाजू आई:

अखलासवल इ्खलासा कुल्लहू या नजुलता “तुम ने पूरा पूरा
इखलास बयान कर दिया ऐ नजला! ”

हजरत नजुला अजान से फारिगृ हुए तो आपने आवाज दी के ऐ गैब
से आवाज देने वाले तो फरिएते है या जिन्न है। या कोई अल्लाह का मक्बूल
इंसान। तो कौन है? तूने हमें अपनी आवाज तो सुना दी। अब अपनी सूरत भी
दिखा दे। देख हम अल्लाह और उसके रसूल के और हजरत उमर के वफ्द
हैं। हमारी बात माल और सामने आ।

इतने में पहाड़ फटा। और उसमें से एक सफेद रेश और सफेद बुजर्ग
निकले। और कहने लगे। अस्सलाम अलेकुम व रहमत-उल्लाह। हजरत
नजूला और उनके साधियों ने व अलेकुम अस्सलाम कहा। और पूछा आप
कोन हैं? फ्रमाया मैं हजरत ईसा अलेहिस्सलाम का वसी हूँ। मेरा नाम जूरीब
बिन बरगला है। हजरत ईसा अलेहिस्सलाम ने मुझ इस पहाड़ पर ठहराया
है। और मेरे लिए लम्बी उप्र की दुआ फ्रमाई है और दुआ फ्रमाई है के मैं
उनके आसमान से नाजिल होने तक जिन्दा रहूँ। चुनाँचे मैं आज तक जिन्दा
हूँ। ऐ असहाब मोहम्मद! ( सण्अन्स० ) मैं हुज॒र मोहम्मद मुसतफाएं स०्अन्स० )
से तो मुलाकात कर नहीं सका। अब ये हजरत उमर का दौरे खिलाफत है।
उमर फारूक को मेरा सलाम कहना। ( कंजल आमाल, बरहाशिया मसनद
इमाम अहमद, सफा 27 जिल्द 2) .

सबक !:- सहाबा इक्राम की बहुत बड़ी’शान है। बिलखसूस हजरत
उमर फारूक रजी अल्लाहो अन्ह की तो इतनी बड़ी शान है। के हजरत ईसा
अलेहिस्सलाम के हवारी भी उनपर सलाम भेजते हैं। और ये भी मालूम हुआ

के हजरत ईसा अलेहिस्सलाम की दुआ से उनके एक गलाम को तवील उप्र
प्रिल गई। फिर खुद उनका तबली उम्र पाना क्‍यों मुमकिन नहीं। और ये भी
प्रालूम हुआ के हजरत ईसा आसमान पर जिन्दा मौजूद हैं।
और वो आसमान से नजल फरमायेंगे। और ये भी मालूम हुआ के अहले
इस्लाम घरों में हों। जंगलों में या पहाड़ों पर, और हालते अमन में हों या जंग
में। नमाज को वो किसी हाल में नहीं छोड़ते।

हिकायत नम्बर 725 अमीन भिकारी

 

एक फकौर मिस्र की जामओ मस्जिद के दरवाजे पर बैठा भीक माँग रहा
था। कुछ रईस लोग वहाँ से गुजुरे। उसने उनसे सवाल किया। मगर किसी ने
कुछ ना दिया। उन लोगों में से एक रईस की जैब से दीनारों भरी थेली गिर
पड़ी। इस थेली में पाँच सौ दीनार थे। उनके जाने के बाद फकौर की नजर
पड़ी। तो उसने वो थेली उठा ली। ओर हिफाजत के साथ रख ली। इतने में
दीनारों का मालिक घबराया हुआ आया। और पूछा। मेरी थेली कहीं गिर पड़ी
है। तुम ने तो नहीं देखी? फकीर ने कहा। वो थेली मुझे मिली है। और मेरे
पास है फिर उसने थेली निकाल कर पेश कर दी। वो शख़्स बड़ा खुश हुआ
और कहा अब मैं तुझे पंद्रह दीनार दूंगा। फक्ौर बोला। मैं कुछ नहीं लूंगा।
इसलिए के मैंने पहले आपसे एक चीज बतौर एहसान के माँगी थी मगर अब
नहीं लूंगा। क्यों अब अगर कुछ कबूल करूंगा तो उसके मअनी ये हुए के
दीन देकर दुनिया ले लूं। ( हिकायत व रिवायात, सफा 328 )

सबक्‌:- पहले जमाने के भिकारी भी बड़े अमीर होते थे। मगर आज
कल ये रोशन आम है के “राम राम जपना पराया माल अपना ” या ( बजुबान
पजाबी ) लबी चीज खुदा दी। ना ढेले दी ना पादी।

हिकायत नम्बर  726 जहरीला सांप

 

.__ हजरत अबु अलसायब रजी अल्लाहो अन्ह ने फरमाया। के एक नोजवान
पहाबी की नई नई शादी हुई। एक दफा वो अपने घर आए। तो देखा। के उनकी
दरवाजे में खड़ी है। ये देखकर उनको गरैरत आई। और दुलहन को

अरे के लिए नेजह उठा लिया। दुलहन ने का। मुझे मारो नहीं। पहले अन्दर
पैल कर देखो। के किस चीज ने मुझे बाहर खड़े होने पर मजबूर किया है?
पैनाचे वो सहाबी अन्दर गए। तो देखा। के एक बहुत बड़ा सांप कुंडली मारे
बिछोने पर बैठा है। आपने वो नेजह उस सांप को मारा। और सांप नेजे में

पिरो लिया। सांप ने तड़प कर उन पर हमला करके डस लिया। सहाबी का
इसी वक्‍त इन्तिकाल हो गया। और वो सांप भी मर गया। ( मिश्कात शरीफ,
सफा 352)

सबक :- सहाबा इक्राम बड़े गैरत मंद थे। के बीवी को महेज दरवाजे
में खड़े देखकर ये नोजवान सहाबी गैरत में आ गए। और बे करार हो गए।
मगर आज कल के बअज मुसलमान अपनी औरतों को थेैट्रों, कलबों में ले
जाते हुए भी नहीं शर्माते। और पराये मर्दों से खुद ही अपनी औरतों का हाथ
मिलाकर खुश होते हैं। और फख्र करते हैं। मुसलमानों को अपने इसलाफ
के नक्शे कदम पर चलना चाहिए॥ और औरतों को पर्दे में रखना चाहिए।

हिकायत नम्बर 727 अबु अलमआली की हिकायत

 

मशायख्‌ ओजा की एक जमात ने मुतअद्दिद इसनाद के साथ रिवायात
किया है। के अबु अलमआली मोहम्मद बिन अहमद बगृदादी एक मर्तबा हुजर
गौसे आजम रजी अल्लाहो अन्ह की मजलिसे वअज में हाजिर हुए। हुजूर गौसे
आजम रजी अल्लाहो अन्ह एक बहुत बड़े मजमओ में वअज फरमा रहे थे।
ये भी आकर बैठ गए। थोड़ी देर के बाद अबु अलमआली को रफओ हाजत
की जरूरत लाहक्‌ हुई और इतने बड़े मजमओ में से निकलने की कोई सूरत
नजर ना आईं। ये बड़े परेशान हुए। और उसी परेशानी के आलम में हुज॒र
गौसे आजम की तरफ देखने लगे। हुजर गौसे आजम मिंबर से नीचे उतरे।
और सफा शान से उतरे के मिंबर पर भी गौसे आजम तशरीफ फरमा रहे।
| और उनके पास भी तशरीफ ले आए। मगर उनके पास तशरीफ लाते हुए
दूसरा कोई ना देख सका। अबु अलमआली के पास पहुँच कर आपने अपने
रूमाल से उनका सर ढांप दिया।
अबु अलमआली ने देखा के वो एक बसी सहरा में हैं जिसमें एक नहर
के पास एक दरख्त है। अबु अलमआली ने अपनी क्ुंजियाँ उस दरख्त पर
लटका दीं और कजाऐ हाजत के बाद नहर से वज करके दो रकअत नफिल
पढ़े। और जब सलाम फैरा तो हुजर गौसे आजम ने उनके सर से रूमाल
उठा लिया। और उन्होंने देखा के वो बदस्तूर उसी मजलिस बअज में हैं। और
हुजर गौसे आजम बदस्तूर वअजु फ्रमा रहे हैं। गोया मिंबर से उतरे ही नहीं।
अबु अलमआला ने गौर किया। तो बज के पानी से आजा तर थे। हाजत भी
मरफूअ थी। मगर कुंजियाँ ना मिलीं। एक मुद्दत के बाद वो एक काफले के
हमराह बिलादे अजम की तरफ निकले। बग॒दाद से चौदह दिन के सफर के

बाद काफला उसी सहरा में पहुँचा। अबु अलमआली ने देखा के वही नहर है
और वही दरख्त। और दरख़्त पर उनकी कुंजियाँ भी लटक रही हैं। काफला
जब वापस आया तो अबु अलमआली हुजर गौसे आजम रजी अल्लाहो अन्ह
की खिदमत में हाजिर हुए। ताके वो सारा माजरा कह सुनायें। मगर हुजर गौसे
आजम ने उनका कान पकड़ कर फरमाया।
अबु अलमआली! मेरी जिन्दगी में इसका जिक्र किसी से

ना करना।” (नप्न-ठल-मुहासिन-उल-इमाम याफई बर हाशिया
जामओ-उल-करामात-उल-जहानी, जिल्द अव्वल, सफा 57)

सबक :- अल्लाह के मक्बूल बन्दों बिलखसूस हुजर गौसे आजम रजी
अलाह अन्हुम को अल्लाह तआला ने बड़ी बड़ी ताक॒तें अता फरमाई हैं। और
ये पाक लोग बड़े बड़े तसररूफात के मालिक हैं और ये अल्लाह बालों की
करामात हैं जो बरहक हैं। करामात का इंकार अल्लाह की दीन व अता और
उसकी बे पनाह क॒द्गत का इंकार है। और ये भी मालूम हुआ के अल्लाह के
पिरक्बूल बन्दे एक वक्त में मुतअद्दिद मुकामात पर भी हो सकते हैं। और ये
भी मालूम हुआ। के गौसे आजम रजी अल्लाहो अन्ह को अल्लाह तआला
ने तकालीफ व मुश्किलात के रफे व हल की ताकत बख्शी है। हम अगर
उनकी तरफ कजाऐ हाजात के लिए रूजू करें। तो ये हर गिज शिर्क नहीं है।

हिकायत नम्बर 728 कजीब की हिकायत

 

हजरत क॒जीब-उल-बान रहमत-उल्लाह अलेह से काजी-ए-मवस्सिल
दुश्मनी रखता था। और उसका इरादा था के वो हाकिमे वक्‍त से उनकी कोई
शिकायत करके उन्हें शहर मवस्सिल से निकलवा दे। काजी-ए-मवस्सिल
का बयान है के मेरे इस इरादे की अल्लाह के सिवा किसी को खबर ना थी।
एक रोज हजरत कजीब मवस्सिल के एक कूचे से गुजर रहे थे। और दूसरी
परफ से काजी-ए-मवस्सिल भी आ रहे थे। काजी-ए-मवस्सिल कहते हैं। के
पैंने दिल में कहा के अगर इस वक्त मेरे साथ कोई दूसरा भी होता तो मैं उससे
फैहता के उसे पकड़ कर हाकिमे वक्‍त के पास ले चलो। काजी-ए-मवस्सिल
ने इतना सोचा ही था के वो क्‍या देखता है के हजरत कजीब ने एक कदम
उठाया तो एक कुर्दी की शक्ल में थे। फिर एक कृदम उठाया तो एक फुकिहा

फी शक्ल में नमूदार हुए। फिर आपने काजी-ए-मवस्सिल से फ्रमाया। के
साहब! आपने चार सूरतें देखीं हैं। उनमें से कुजीब कौन सा है। जिसको
ऐैषहाकिम से कहकर निकलवाना चाहते हो? ये सुनकर काजी-ए-मवस्सिल

बे इख््तियार आपके हाथ चूमने लगा। और उनकी दुश्मनी से तौबा की।
( बहुज्जत-ठल-असरार, सफा ॥9 )

सबक :- अल्लाह के मक्बूल बन्दे आम इंसानों की मिस्ल नहीं होते। वो
बड़ी शान के मालिक होते हैं। और खुदा तआला ने उन्हें बड़े बड़े इख्तियारात
व तसर्ूफात अता फरमाए हैं। और ये भी मालूम हुआ के अल्लाह वालों की
नजर से दिल के भैद भी छपे नहीं रहते। और ये भी मालूम हुआ के अल्लाह
बालों से दुश्मनी कोई नई बात नहीं ये पहले से चली आई है। खुश किस्मत
हैं। वो लोग जो इस बुरी बात से तौबा कर लेते हैं।

हिकायत नम्बर 729 हजरत अबु अब्दुल्लाह मोहम्मद करशी रहमत-उल्लाह अलेह

 

हजुरत अबु अब्दुल्लाह मोहम्मद करशी एक बहुत बड़े वली अल्लाह थे।
और नाबीना थे। उनके एक मुरीद ने एक मर्तबा अपनी लड़की से दरयाफ्त
किया के आज घर में क्‍या पके। तो लड़की बोली। के आप मेरी आरज
पूरी ना कर सकेंगे। बाप ने कहा जुरूर करूंगा। तुम कहो तो सही। लड़की
बोली। तो मेरी आरज है के मेरा निकाह अबु अब्दुल्लाह मोहम्मद करशी से
कर दीजिए। बाप हज़र करशी की खिदमत में आया! और अपनी लड़की
की आरज जिक्र किया। हजरत ने फ्रमाया। काजी को बुला लाओ। चुनाँचे
काजी साहब आए। जिन्होंने निकाल पढ़ा दिया। और बाप ने लड़की को
आरास्ता करके हजरत शेख की खिदमत में हाजिर कर दिया। जब औरतें
निकल गईं तो हजरत करशी गस्‍्ल खाने में दाखिल हुए। और निकले। तो
एक बेरेश खूबसूरत नोजवान तनदुरूस्त आँखें वाले उम्दा कपड़े पहने हुए
जाहिर हुए। लड़की ने हया के मारे अपना मुंह ढांप लिया। आपने फ्रमाया।
ऐसा ना कर। मैं ही करशी हूँ। वो बोली के तू करशी नहीं। आपने खुदा की
कसम खाकर फ्रमाया। मैं ही करशी हूँ। लड़की ने पूछा के ये क्या माजरा
है? तो फरमाया के मैं तेरे साथ इस हाल पर रहूंगा। और गैरों के सामने इस
हालत पर नजर आऊँगा। लेकिन मेरी जिन्दगी में इस मामले की खबर किसी
को ना देना। लड़की ने कहा। ऐसा ही करूंगी। ( तबकात कुब्रा शैरानी, सफा
435, जुज अव्वल )

सबक:- अल्लाह वाले अपनी शानों को मखलूक की नजरों से
छपा कर रहते हैं। और खुदा तआला ने उन्हें बड़े बड़े तसरूफात पर कुद्रत

अता फरमाई है। और ये भी मालूम हुआ के किसी अल्लाह के मक्बूल की
ज्हिरी हालत को देखकर उसे कभी हिकारत की नजूर से ना देखना चाहिए।
के 7ब्बा अशअता अग्रबरा ” हृदीसे पाक के मुताबिक्‌ बअज॒ सादा और
दुनयवी जाह व जलाल से खाली मरदाने हक हकीकत में बहुत पहुँचे हुए
होते हैं। और ये भी मालूम हुआ के अच्छी और नेक औरतें हमेशा दीन और
तकुवे को पसंद करती हैं। और अपना शौहर ऐसा चाहती हैं जो खुदा के
अहकाम का पाबंद और शरीअत पर चलने वाला है।

हिकायत नम्बर 730 सच्चा मुसलमान

 

एक ताजिर का इन्तिकाल हो गया। उसने बहुत सी दौलत अपने पीछे
छोड़ी। उसका एक ही लड़का था। जो उसका वारिस था। मगर वो मुद्दत से
मफ्कृद-ठल-खबर था। और उसका कोई पता ना था के वो कहाँ है। और
इसी वजह से किसी की शक्ल व सूरत भी याद ना रही थी। कुछ मुद्दत के
बाद तीन लड़कों ने ये दावा किया के वही मरहूम त्ताजिर के बेटे हैं यानी
उनमें से हर एक का ये दावा था के ताजिर का लड़का मैं हूँ। ये तीनों काजी
के पास आए। और अपना दावा पेश किया। कुजी ने मरहूम ताजिर की एक
तसवीर मंगवाई। और कहा के जो लड़का उस तसवीर पर बंदूक का ठीक
निशाना लगाएगा। वही वारिस होगा। तीनों में से दो लड़के तो निशाना लगाने
को तैयार हो गए। मगर तीसरा परेशान हो गया। चहरे पर परेशानी के आसार
जाहिर हो गए। और आँखों से आँसू बहने लगे। और बोला के ना मुमकिन
है के मैं अपने बाप की तसवीर को निशाना बनाऊँ। मुझे परवाह नहीं। मुझे
कुछ मिले या ना मिले। मगर मैं ऐसा नहीं करूंगा। काजी ने फैसला दे दिया
अपने बाप का हकौकी बेटा यही है। और यही मीरास का हकदार है।
(हिकायत व रिवायात, सफा 39)
सबक्‌:- मुसलमान होने के मुद्दई तो सब हैं। मगर जो लोग इस्लाम
को अपना तख्तता मश्क नहीं बनाते और इस पर इलहादो जूंदका के तीर
नहीं बरसाते। असल में वही सच्चे मुसलमान और जन्नत के जायज वारिस हैं

हिकायत नम्बर 731 पनाह

 

बादशाह बहराम एक मर्तबा शिकार के लिए निकला। और एक हिरन
फो देखकर उसके पीछे घोड़ा दौड़ा दिया। हिरन जान बचाने के लिए इधर
उधर भागा। और ये भी उसकी तआक्कब करने लगा। हिरन एर 57_

से प्यास का गुल्बा हुआ। और बेताकृती से एक आराबी के खैमे में घुस गया।
जिसका नाम कबीसा था उसने इसे पकड़कर रस्सी कान बाँध दिया। बहराम भी
खैमे तक पहुँच गया। और कुबीसा से कहा के ऐ. | मेरा शिकार तेरे
खैमे में है। उसे बाहर निकाल दो। कूबीसा ने ना पहचाना के ये कौन है और
जवाद दिया के ऐ खूबसूरत सवार! के ये बात मुरव्वत से बईंद है के जिस
जानवर ने मेरी पनाह ली है! मैं उसे किसी के हवाले कर दूं। ताके वो उसे मार
डाले। बहराम ने सख्ती शुरू की। कूबीसा ने कहा। झगड़ा ना बढ़ा। जब तक तू
अपने तीर से मेरा सीना छेद देगा। और मुझे कृत्ल ना कर देगा। तेरा हाथ हप
“हिरन की गर्दन तक नहीं एहुँच सकता! और जब तू मुझे कत्ल कर देगा तो
भी मेरे कूबीले वाले हिरन तेरे हवाले नहीं करेंगे। अपनी जान पर रहम करो।
और हिरन का खयाल छोड़ दे। हाँ हिरन के अवजु अगर तू मेरा ताजी घोड़ा
जो खैमे के दरवाजे पर बंधा है जीन व लगाम मतलन समेत लेना पसंद करे।
तो इसे ले जा। मगर हिरन जो मेरी पनाह में आ चुका हैं वो मैं तुम्हारे हवाले
नहीं कर सकता। बहराम को ये हिकायत बड़ी पसंद आईं। और बाग मोड़ कर
वापस चला गया। ( अखलाक मोहसिनी तालीम-उल-अखूलाक्‌ , सफा 48)
सबक:- किसी बे यारो मददगार मजलूम की मदद हिमायत करना
बहुत. बड़ी जवांमर्दी है। और अगर कोई जानवर भी किसी की पानह में आ
जाए तो जबांमर्दी व इंसानियत ये है के उसकी मदद की जाए। – .

हिकायत नम्बर 732 लुत्फ व नर्मी…..

 

एक बादशाह बड़ा नर्म मिजाज और लुत्फ खू था। एक दिन शाही
बावर्ची को एक खास खाना तैयार करने का हुक्म दिया। चुनाँचे जब वो
पका कर दूसरे खानों के साथ लाया। और बादशाह के आगे दसतरख्वान पर
रखा तो बादशाह ने पहले अपने फ्रमाईशी खाने पर नजर डाली। तो उसमें
मक्खि नजुर आई। उसे निकाल कर दूर किया। दूसरे लुकमे में भी एक मक्खि
देखी। तो उस खाने से हाथ खींच कर दूसरा खाना नोश जान किया। जब
खा चुका तो बावर्ची को बुलाया। और कहा के तूने जो खाना पकाया बहुत
लजीज था। कल भी वही तैयार करना। मगर शर्त ये है के उसमें मक्खियाँ
ना डालना। हाज्जीन इस कलाम पर बड़े मुतज्जिब हुए के बादशाह ने कैसे
नर्म व लुत्फ तरीक्‌ से बावर्ची को शर्मिंदा किया और अदब सिखाया है।
( तालीम-उल-अखुलाक्‌, सफा 48)

सबक्‌:- लुत्फ व नर्मी से अगर काम लिया जाए तो वो तलवार व

गेगे से भी ज़्यादा काट करती है। मगर जो मौका सख्ती का हो वहाँ सख्ती ही
क्राम देती हें मसलन गद्दारों और सरकशों का सामना हो तो फिर अलहवीद
वक़्त बिलहदीद “लोहा लोहे से काटा जाता है” के मुताबिक सख्ती ही
से काम लेना पड़ता है। ह

हिकायत नम्बर 733 सब्कंतगीन बाशाह

 

सब्कतगीन एक गुलाम था। और उसके पास सिर्फ एक घोड़ा था। उस
पर चढ़कर वो जंगल में जाया करता था। और अगर कोई शिकार हाथ आ
जाता तो उसी पर गुजारा कर लेता। एक दफा उसने एक हिरनी देखी। जो
अपने बच्चे के साथ चर रही थी। सब्कत्‌गीनन ने उसके पीछे घोड़ा दौड़ा
दिया। हिरनी तो पकड़ी जा ना सकी। मगर उसका बच्चा जो माँ के साथ
भाग ना सका हाथ आ गया। सब्कत्‌गीन ने उसे बाँध कर जीन के आगे रख
लिया। और शहर की जानिब चल पड़ा। हिरनी बच्चे को देखकर मुड़ी और
सब्कत्गीन के पीछे दौड़ने लगी। और फरयाद करने लगी उसे उसकी हालत
पर रहम आया। और बच्चे को खेल कर छोड़ दिया। हिरनी ने दौड़ कर बच्चे
को ले लिया। और आसमान की त्तरफ्‌ मुंह कर के दुआएँ देने लगी। बे जबानों
की जबानें जानने वाले खुदा तआला को सब्कत्‌गीन का ये रहमदिलाना काम
पसंद आया। रात उसे ख़्वाब में हुजर॒ रहमतुललिल आलमीन सल-लल्लाहो
तआला अलेह व सलल्‍्लम की जियारत नसीब हुई। तो आपने फरमाया के तूने
जो एक बे जबान पर रहम किया है। उस पर हम बहुत खुश हुए हैं। उसके
अबज्‌ अल्लाह तअला तुझे बादशाही अता फ्रमाएगा। और याद रखना। जिस
तरह तूने इस जानवर पर रहम किया है। इसी तरह अपनी नोय्यत पर भी नजरे
करम किया करना। और जलल्‍्मो सितम ना करना। ( तालीम-उल-अखुलाक्‌
49) कह

सबकः:- अल्लाह तआला को मखलूक्‌ पर रहम करना बड़ा पसंद
है। इसलिए हुजर रहमतुललिल आलमीनए स*अध्स ) को उसने सारे जहानों
के लिए रहमत बना कर भेजा है। और ये भी मालूम हुआ के एक जानवर
प रहम करने से अल्लाह तआला और उसके हबीब सल-लल्लाहो तआला
अलेह व सल्‍लम जब इस कद्र खुश होते तो किसी इंसान पर जुल्म करने से
वो क्यों नाराज ना होंगे। और ये भी मालूम हुआ के अल्लाह तआला ने जिसे
रेकूपतत अता फरमाई हो। उसका फर्ज है के वो अपनी रिआया पर यूं मेहरबान

शै जैसे बाप औलाद पर होता है।

हिकायत नम्बर 734 सखावत

 

एक रोज एक शख्स हजरत इमाम हुसैन रज़ी अल्लाहो अन्ह की खिदमत
में हाजिर हुआ। और अर्ज की के मैं कसरते अयाल के बाइस बेहद तंगी और
इफलास में हूँ। यहाँ तक के आज रात के खाने के लिए भी कुछ नहीं। हजरत
इमाम आली मुकाम ने उसे अपने पास ठहराया। इतने में पाँच तोड़े दीनारों के
हजुरत अमीर मुआविया रजी अल्लाहो अन्ह ने हजरत इभाम आली मुकाम की
खिदमत में भेजे। आपने वो पाँचों तोड़े इस फकीर को इनायत फ्रमा दिए।
और उद्ध भी फरमाया। के तुझे जो थोड़ी बहुत इन्तिजार करना पड़ी उसकी
माफी चाहता हूँ। ( तोहफा रहीमी बहवाला कशफ-उल-महजूब, सफा 9)
सबक्‌:- खुदा तआला ने अपने नेक बन्दों के मुतअल्लिक्‌ फ्रमाया है
व यूअसिरूना अला अनफुसीहुम वलो काना बिहि खस्ाखयाहा यानी
वो अपना माल दूसरों को दे देते हैं। अगरचे वो खुद हाजतमंद हों।” हजूरत
इमाम हुसैन रजी अल्लाहो अन्ह इस आयत करीमा के सही मिसदाक्‌ थे। और
अल्लाह के नेक बन्‍्दे ऐसा ही करते हैं सायल का सवाल पूरा करते हैं और
उसकी उम्मीद से भी ज़्यादा उसे देते हैं और ये भी मालूम हुआ के मक्बूलाने
खुदा के दरवाजे से हाजतमंद कभी खाली नहीं लौटते!

हिकायत नम्बर 735 काला सांप

 

हजरत ईसा अलेहिस्सलाम एक मर्तबा एक गाँव में तशरीफ ले गए। तो
बहाँ के लोगों ने शिकायत की के या नबी अल्लाह! इस गाँव में एक धोबी है।
जो कपड़े चुराता है। और बदल देता है। इस वजह से हम उससे बहुत आजिज
आ गए हैं। और उसके हाथों बड़ी तकलीफ में हैं। आज वो कपड़े धोने गया
है। आप उसके लिए दुआ करें के वो वहीं गारत हो जाए। और फिर के ना
आए। हजरत ईसा अलेहिस्सलाम ने उन लोगों की दरख्वास्त कूबूल करली।
और दुआ की के इलाही! इस खायन को वहीं हलाक कर दे। इत्तिफाकुन
धोबी अपने साथ रोटी पका कर ले गया था। नागाह वहाँ एक फकौर का
गुजर हुआ। और वो बहुत भूका था। फकीर ने धोबी से सवाल किया। धोबी
ने उसे एक रोटी दे दी। फक्कीर ने उसे दुआ दी। के जैसे तू लोगों के कपड़ों
को साफ करता है। खुदा तआला तेरे दिल को पाको साफ करे। धोबी ने
एक रोटी और दे दी। वो फक्कीर बोला। इलाही! से हर बला से महफूज रख।

फिर वो धोबी शाम को बखैरियत घर वापस आया। लोगों ने हजरत

[पा अलेहिस्सलाम से कहा। या हजरत! ये कैसी बद दुआ थी आपकी। के
ध्रोबी खैरियत से वापस आ गया है। हजरत ईसा अलेहिस्सलाम ने धोबी को

कर पूछा के आज तूने कौन सा नेक अमल किया है? उसने बताया के
मैने राहे खुदा में दो रोटियाँ एक भूके मोहताज को दी हैं। उसने मुझे दुआ
दी और चला गया। इतने में खुदा तआला ने हजरत ईसा अलेहिस्सलाम पर
वही नाजिल फ्रमाई। के ऐ मेरे नबी! इस धोबी की गठरी को खुलवा कर
देख। चुनाँचे हजरत ईंसा अलेहिस्सलाम ने उसकी गठरी खुलवा कर देखी। तो
उसमें से एक काला सांप निकला। जिसके मुंह पर मोहर लगी हुईं थी। हजरत
ईसा अलेहिस्सलाम ने पूछा के ऐ मारे खूंख़्बार| अगर हक्‌ तआला ने तुझे इस _
धोबी के हलाक करने के लिए भेजा है तो तूने क्यों उसे छोड़ दिया। सांप ने.
अर्ज की के एक अल्लाह के नबी! मैंने चाहा, के उसे डसूं। मगर उसने जो
दो रोटियाँ राहे खुदा में सदका की थीं। उनकी बक॑त से फरिश्तों ने मेरे मुंह
पर मोहर लगा दी। ताके मैं उसे डस ना सकूं। हजरत ईसा अलेहिस्सलमा ने ये
सुनकर उस थोबी से फ्रमाया के ऐ अल्लाह के बन्दे! खुदा ने तेरे सारे गुनाह
माफ कर दिए हैं। अब आईंदा के लिए तू हर गुनाह से बचते रहना। खुदा ने
तुझे सदका व खैरात के सदके से बचा लिया है। ( तोहफा रहीमी, सफा 22 )

सबक :- अल्लाह की राह में कुछ देना और सदका खैरात करना बड़ी
बड़ी बलाओ से बचा लेता है। और अल्लाह तआला के गजब व जलाल
को आग को बुझा देता है। पस हमें मोहताजों, फक्कीरों की एआनत करना
घाहिए। और बुख़्लो इमसाक से बचना चाहिए। और ये भी मालूम हुआ के
पे तीजा, दसवाँ, चालीसवाँ ग्यारवीं शरीफ वगैरा तकरीबात अच्छी चीजें हैं
के इस तरह कुछ ना कुछ अल्लाह के नाम पर खर्च होता रहता है। अल्लाह
फी राह में खर्च करने की इन मदों से रोकना अल्लाह के गजबो जलाल को
अपनाने के मुतारादिफ है।

हिकायत नम्बर 736 दुरूद शरीफ

 

अनु मूसा एक बुजर्ग फरमाते हैं के मैं एक जमात के साथ एक कश्ती |
रे सवार था। के यकायक बादे मुखालिफ शुरू हुई। और उसने तूफान की
शत इख्तियार कर ली। अहले कश्ती सब हैरान हुए। और सब ने यकीन कर
लैया। के अब बचना मुश्किल है। मायूसी हद से बढ़ गई। तो सब रोने लगे।
और तौबा व असतगृफार करने लगे। ऐसे नाजूक वक्त में मुझ पर गनूदगी
री हुई। तो मैंने आलमे इसतगराक्‌ में देखा। के रसूल अल्लाह सल-लल्लाहो

तआला अलेह व सललम तशरीफ्‌ लाए हैं। और फरमाते हैं। ऐ अबु मूसा!
कश्ती वालों से कह दो के वो दुरूद तुनजीना पढ़ें। मैंने अर्ज किया या रसूल
अल्लाह! मुझ को ये दुरूद शरीफ याद नहीं। फ्रमाया। लो मैं पढ़ता हूँ। तुम
याद कर लो। चुनाँचे हुजर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम ने दुरूद
शरीफ अपनी जुबान अनवर से पढ़ा। और हुज॒र ही के एजाज से मुझ वो याद
भी हो गया। यकायक मेरी आँख खुल गई। तो बही दुरूद मेरी जुबान पर
जारी था। मैंने सब कश्ती वालों से कहा के लो ये दुरूद शरीफ पढ़ो। ये हुजर
सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम खुद तशरीफ्‌ लाकर पढ़ने को फ्रमा
गए हैं। चुनाँचे हम सब ने वो दुरूद शरीफ पढ़ना शुरू किया। तो तूफान थम
गया। और हम सब बच गए। वो दुरूद शरीफ ये है।
अल्लाहुग्मा सल्‍ली अला मोहम्मदिन सलतन तुनजीना बिहा मिन
जमीअल अहवाली बल आफवाती व तकजीलना बिहा जमीअल हाजाती
व तुतहिर्सना बिहा मिन जमीअस्स सप्यीअती व तुरफऊना बिहा
इबदका अलाइराजाती ब तुबल्लीगना बिहा अक्पसल गायाती मिन
जमीअल खैराती फिलहयाती व बादलममाती इन्नका अला कुंल्ली
शैड़न कृदीर/( तोहफा रहीमी बहवाला फज् मुनीर सफा 4 )
सबक :- दुरूद शरीफ बहुत बड़ी अल्लाह की नओमत है। उसके पढ़ने

से बड़ी बड़ी मुश्किलें टल जाती हैं। और ये भी मालूम हुआ के दुरूद शरीफ
कोई सा भी पढ़िये। मौजिबे अज़ो सवाब है। किसी मखसूस दुरूद शरीफ ही
को पढ़ना और दसूरे सीगों और लफ्जों से दुरूद शरीफ के पढ़ने को बिदअत
बताना बहुत बड़ी जियादती है। नमाज के अन्दर जिस दुरूद शरीफ की
तखसीस शरओ में वारिद है वो दुरूद शरीफ नमाज ही के लिए मखूसूस है।
और बैरूने नमाज किसी भी सीगे से दुरूद शरीफ पढ़िये जायज और मोजिबे
सवाब है। और ये भी मालूम हुआ के हमारे आका मौला सल-लल्लाहो
तआला अलेह व सल्‍लम मुश्किल के बक्त अपने गलामों की मदद फरमाते
हैं और अपने गूलामों के पास करम फ्रमा कर खुद भी तशरीफ ले आते हैं।
फसल्लल्लाहों अलेही ब आलिही कृदरा हुस्निही व जमालिही।

हिकायत नम्बर 737 पाकबाज माँ

 

हजरत शेख निजामउद्दीन अबु अलमबैद रहमत-उल्लाह अलेह के पास
एक मर्तबा देहली के लोग हाजिर हुए। और अर्ज की, हुजर! देहली में कई
रोज से बारिश नहीं हुई। लोग बड़े परेशान हैं। दुआ कीजिए। बारिश हो।

हअरत निजामउद्दीन मिंबर पर चढ़े और अपनी वालिदा के दामन का एक
कपड़ा बगूल से निकाल कर अपने हाथ पर रखकर यूं दुआ माँगी।
इलाही! बहुर्मत इस कपड़े के जो दामन एक जुईफे का है जिस पर हर गिज
किसी ना मेहरम की नजूर नहीं पड़ी। तू मीना बरसा दे। कद्गते इलाही से उसी
वक्त कक । और बारिश होने लगी। ( तोहफ रहीमी, सफा ॥5 )
सनक :- मुश्किल के वक्त अल्लाह के नेक बन्दों के पास जाकर
तालिब दुआ होने से मुश्किल हल हो जाती है। और अल्लाह के नेक बनन्‍्दों से
थोड़ी बहुत निसबत भी अल्लाह तआला के हाँ बड़ी पसंदीदा होती है। और ये
भी मालूम हुआ के जो मायें पाकबाजु अफ़्फत माब और खुदा याद हों। उनकी
औलाद भी नेक होती है। और जो मायें खुद ही गैर महरमों में आजादाना
फिरने वाली हों। उनकी औलाद भी “टेडी बुबायज॒ ” किस्म की ही होती है।

हिकायत नम्बर 738 जलाल फकीर

 

एक मर्तबा ख़्याजा कृतब-उद्दीन बख़्तियार काकी अलेह अर्रहमा अजमैर
में ख़ाजा ग्रीब नवाज को खिदमत में हाजिर थे। उन दिनों पथोरा ( पृथवी
राज) जिन्दा था। और कहा करता था के क्‍या ही अच्छा हो जो ये फक्रोर
यहाँ से चला जाए। होते होते ये खबर हजरत ख़्वाजा के गोश अक्दस तक भी
पहुँच गई। हजरत ख़्वाजा उस वक़्त आलमे सुकर में थे। फौरन आपने मुराक्बा
किया। और मुराक्‍्बे ही में आपकी जुबान मुबारक २ ये कलपमात निकले।
“के हम ने राय पथोरा को जिन्दा ही मुसलमानों के हवाले किया।”
थोड़े अर्से बाद सुलतान शम्स-उद्दीन पोहम्मद गौरी का लश्कर चढ़
आया। और शहर को लूट मार करने के बाद पथोरा को जिन्दा पकड़ कर
गया।
हु “मालूम हुआ के दुरवैश एक पियाले में आग रखते हैं और एक पियाले
में पानी। यानी वो फायदा भी पहुँचा सकते हैं और नुक्सान भी।” ( शोरिश
फाशमीरी का अख्बार चूट़ान, ॥0 दिसम्बर सफा ७)
सबक्‌:- अल्लाह के मक्बूल बन्दे बहुत बड़े इख़्तियारात के मालिब
होते हैं। और खुद शोरिश काशमीरी का अख़्चार भी ये एलान कर रहा है के
“दुरवैश एक पियाले में आग रखते हैं और एक पियाले में पानी। यानी
पो फायदा भी पहुँचा सकते हैं और नुकसान भी।”
फिर जो उन सब के आका व मौला सल-लल्लाहो तआला अलेह
सललम के इख्तियारात का मुनकिर हो और यूं कहे के जिसका नाम

मोहम्मद या अली है वो किसी चीज का मालिक मुख्तार नहीं। वो क्‍यों
गुमराह ना होगा।

हिकायत नम्बर 739 कलामे हक

 

ईरान के एक शहजादे ने एक मिसरा कहा। के
अबलक के कम दीवह मौजूद
यानी ऐसा मोती जो कुछ सियाह और कुछ सफेद हो। किसी ने कम
देखा होगा।
मतलब ये के ऐसा “दो रंगा” मोती कहीं मौजूद नहीं।
इस मिसरे पर दूसरा मिसरा मोजँ ना हो सका। उसने कई शौअरा से
कहा। मगर किसी से इस मिसरे पर मिसरा ना कहा जा सका। आख़िर उसने
देहली के बादशाह को लिखा के इस मिसरे का दूसरा मिसरा मौज करा के
भेज दीजिए। देहली के शौअरा भी मोज ना सके। मगर जैब-उन-निसा एक
दिन सुर्मा लगा रही थी इत्तिफाकुन आँसू टपक पड़े। तो दूसरा मिसरा आँसू
देखकर मोजे कर दिया के
दुरे अबलकू किस कम दीदा मौजूद
मगर अश्क बिताने सुर्मा आलूद
यानी कुछ सियाह कुछ सफेद रंग का मोती किसी ने कम देखा होगा।
मगर हाँ! मेहबूब की सरमगीन आँख से टपका हुआ आँसू एक ऐसा मोती है
जिसमें ये दोनों रंग नजर आते हैं। ।
बादशाह ने ये शैर ईरान भेज दिया। वहाँ से खत आया के इस शायरा
_ को यहाँ भेज दो। उसके जवाब में जैब-उन-निसा ने ये लिखा के…
दर सुर्न मख्फी मनम्र चूं बुऐ गुल दर बर्गे गुल
हर के दीदन मील दारिद दर सुख्न बेनद मिरा
फूल की खुश्बू फूल के पत्ते में मख़्फी है। इसी तरह मैं अपने कलाम के
अन्दर मख्फी हूं। जिसे मेरे देखने की तमन्ना हो वो मेरा कलाम पढ़ ले। ( यादे
माजी, सफा 29)

सबके ;:- जैब-उन-निसा जो अल्लाह की एक मखलूक है। जब उसे
कोई गैर आँख नहीं देख सकती तो अल्लाह तआला जो खालिके कूल है उसे
कौन देख सकता है? और जिस तरह जैब-उन-निसा के दीदार के तमन्नाई
को ये कहा गया के उसे देखने के लिए उसका कलाम पढ़ो। बिला तश्बीह
दीदारे हक के तमन्नाई के लिए भी लाजिम है के वो उसका कलामे पाक

#एआन मजीद पढ़े। इसलिए के इस कलामे हक में हक के जलवे मौजूद हैं।
3 चौस्त क्आन ऐ कलामे हक शनास

रोनुमाऐे रब नास आमद बा नास

हिकायत नम्बर 740 शायरी

 

एक शख्स शायर था। लोग उसके शैर सुन सुन कर वाहवा किया करते
ध। और कभी कोई यूं कहता। के ये शैर तो आपका हजार रुपये का है। और
क्रभी कोई यूं कहता है के ये शैर तो आपका दो हजार का है। वो शायर
बुश होकर उसे लिख लेता। एक मर्तबा उसकी माँ ने कहा के तू बेकार काम
करता है। कोई ऐसा काम नहीं करता जिसमें कुछ आमदनी हो। उसने कहा।
मैं बेकार कब हूँ। मुझ को तो बड़ी आमदनी होती है। किसी रोज हजार की
और किसी रोज दो हजार की हो जाती है। माँ ने कहा अच्छा एक आने की
सब्जी ला दो। शायर साहब अपने अश्ञआार की कापी लेकर बाजार गए। और
से कहा के एक आने की सब्जी दे दो। उसने सब्जी दी तो उसने
कापी से एक शैर निकाल कर कहा लो ये दस रुपये का शौर है। दुकानदार ने
कहा। जनाब! कैसा दस रुपये का शैर। आप ये अपने पास ही रखिये। मुझे तो
शक आना दीजिए। अब आप बहुत घबरा गए। के मैं अपने इन शैरों को यूंही
ती समझता रहा। यहाँ तो उनकी कुछ भी क्ोमत नहीं है। फौरन उस्ताद
के पास आए और कहा के वाह हजरत वा! मालूम हो गई आपकी सिखाई
है शायरी की क॒द्रों कीमत, मुफ्त में मेरी उप्र जाए की।
सबक: – ये दुनयवी मदारिज व ऊरूज महेज जी खुश कर लेने की
बातें हैं और कल कयामत के बाजार में उनकी कोई कीमत ना होगी। वहाँ
तो ईमान व तकवा ही का सिक्का चलेगा।

हिकायत नम्बर 741 बुजर्गों का तसर्रूफ

 

देवबंदी हज॒रात के हकीम-उल-उम्मत मोलवी अशरफ अली धानवी

हब लिखते हैं के शाह अब्दुर्रज़्जाक्‌ झिंजानवी के साहबजादे को कौमिया

शौक था। एक दफा शाह साहब इसतंजा फरमा रहे थे। और ये साहबजादे

७ दवायें कीमिया की लिए हुए खड़े थे। बाद फिरागृ ढेला पत्थर पर मारा।

‘त्थर सोने का हो गया। एक सुनार उसमें से कुछ काट कर ले गया। फिर

शाह साहब ने फ्रमाया। के भाई अगर उसको कोई उठा कर ले गया तो
‘पाजियों को तकलीफ हो जाएगी। फिर दुआ की वो पत्थर हो गया। 2

( मोलवी अशरफ अली साहब के मलफूजात हसन-अलअजीज, सफा ५)
सबक :- ये तसर्रूफ व इख़्तियार है औलिया इक्राम का जो हुज॒र
सल-लल्लाहो तआला अलेह व सललम के गुलाम हैं। फिर हुज॒र के अपने
तसर््ूफ व इख्तियार की क्या शान होगी। बावजूद उसके फिर भी अगर कोई
शख्स यूं कहने लगे या लिख दे के “रसूल अल्लाह के चाहने से कुछ नहीं
होता” तो वो कितना बड़ा बे खबर और गुमराह है।

हिकायत नम्बर 742 नर्मी व सख्ती

 

( मंजम हिकायत तर्जुमा मसनवी शरीफ )
जैब तन करके. लिबास फाखरा
फिरता था इक एछख्य जाता हुआ
देख कर उसको हवा और आफताब
दोनों यूं करने लगे बाहम खिताब
देखें तो है कौन सा हम मैं कवी
इस बशर को जो करे नंगा अभी!
ये कहा सुन के हवा ने मुशफकन
मैं अभी देती हूँ लो तुझ को दिखा
बन के झक्‍कड़ जोर से चलने लगी
प्यड़ी व टोपी ना छोड़ी एक की
पीपल और शीशम गए जड़ से उखड़
बड़ ने और कीकर ने भी दी छोड़ जड़
छप्प और खफैल जो मज़बूत थे
मिस्ल कागज हर कफ उड़ने लगे
जिस कुद्र अपना दिखाती थी वो ज़ोर
कपड़ों को करता था वो काब्‌ू. बजोर
ज़ोर अपना कुल लगा कर थक गई
पर ना. नया उसको हर गिज कर सकी
फिर कहा यूरज ने बस आपा संभाल
हम भी अब अपना दिखाते हैं कमाल
गर्म तदरीजनण हुआ फिर आफताब
हो गए कपड़े बदन पर सब अजाब
सेंगटों से अर्क था फब्वरा जन

अर्क में थे ग्र्क॑ सारे मर्द व जन
इस बशर ने भी दिया अंगा उतार
बाँध के लुंगी अलय फैंकी अजार
सबक:- खलल्‍क और नर्मी से ले मतलब निकाल
तू ना बे मौका दिखा अपना जलाल
तेजी और सख्ती से अक्सर नोजवान
अपने हाथों अपना करते हैं ज़याँ
(दर मंजम , सफा 79)

हिकायत नम्बर 743 शराब

 

एक बादशाह को मजलिस में एक गुरीब मगर दाना शख्स हाजिर हुआ।
तो उसे सफे आख़िर में जगह मिली। थोड़ी देर के बाद एक इल्मी गुफ्तगु में
वो शख्स बोला। तो उसकी काबलियत देखकर बादशाह बड़ा खुश हुआ।
और उसे अपने करीब बुला कर अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर के बाद
मजलिस में शराब लाई गई। और उस दाना शख्स के सामने भी रखी गईं।
उसने बादशाह से अर्ज की के मुझे उससे माफ रखा जाए। ताके जिस अक्ल
व दानिश के तुफेल मुझे कर्बे सुलतानी हासिल हुआ है। वो जायल ना हो
जाए। शराब पी ली। तो मुझ से बे अदबी के लफ्ज सादिर होंगे। और जलीलो
सार हो जाऊँगा। बादशाह उसकी इस बात से बड़ा खुश हुआ। और उसे
ईनामो इक्राम से नावाजा। ( तालीम-उल-अखलाक्‌ , सफा ॥6 )

सबक्‌:- शराब पीने से आदमी जलीलो ख़्वार हो जाता है। उससे
बचना चाहिए।

हिकायत नम्बर 744 शेर शाह सूरी

 

दरबार अवाम व ख़्वास और फौजी जान निसार सिपाहियों से पटा
पड़ा है। नक्नीब की पुर जलाल आवाज और चाबिश की ललकार से दिलों
पर हैबत तारी है। आदाब, सलाम नियाज, बादशाह सलामत तसलीमात,
घुदावंद आदाब खसूसी बजा लाओ। कोरनिश , बंदगी , नजर, रूबरू जिल्‍ले
सबहानी, शहनशाह जी जाह, जहाँ पनाह, सुलतान मौअज्ज्म, को मिली
जुली आवाजों से दरबारे सूरी गूंज रहा है। मसनद खास पर शाही पोशाक में
पलबूस शेर शाह सूरी जलवा अफरोजु हैं। दायें बायें मुशीराने सलतनत और
अरबाब हकमत , जागीरदार, राजे, महाराजे अदब से गर्दन झुका लिए। सफ

बस्ता खड़े हैं। मजलूमों की दादरसी और जालिमों की बीख कनी के फ्रमान
जारी हो रहे हैं। उसी दौरान में चौबदार एक परेशान हाल हिन्दू बनिये को
शेर शाह के हुजर में पेश करता है। जो सरासीमगी के आलम में दो जानों
होकर कांपने लगता है।
शेर शाह:- “मा बदौलत से क्या कहना चाहते हो?”
बनिया:- माता पिता ( और ये कह कर कांपते हुए हाथों से पान का
एक बीड़ा शेरशाह की खिदमत में पेश कर देता है )
शेर शाह:- ठीक है। बादशाह रिआया का माता पिता ही होता है। मगर
ये बीड़ा क्या है। और उसके पेश करने से तुम्हारा क्या मक्सद है?
बनिया:- ( हकलाते हुए ) “माई बाप इज्जत का मामला है और इज्जत
सब को प्यारी होती है।”
शेर शाह:- क्यों! क्या किसी जालिम ने तुम्हारी इज्जत पर हमला किया।
बताओ! कोन है वो मर्दूद? ”
बनिया:- हुजर!……….नाम ना ही पूछें तो अच्छा है।”
शेर शाह:- परवाह नहीं! शेर शाह की नजर में अराकीने सलतनत से
लेकर मामूली खुद्दाम तक सब बराबर हैं। अगर तुम अपने दावे में सच्चे हो।
तो मुज़िम को करार वाकुई सजा दी जाएगी। बोलो! क्‍या नाम है उस मलऊन
का। जिसने तुम्हारी इज्जत पर हाथ डाला।”
बनिया:- ( मुरतअश आवाज में ) हुजर! गूलाम का मुलजिम…..शहजादा
आदिल है।” सा
शेर शाह:- “आदिल!…….क्या क्या आदिल ने?”
बनिया:- खुदावंद! मेरी बीवी अपने मकान की छत पर नहा रही थी।
के इत्तिफाकु से शहजादा आदिल की सवारी उस तरफ से गुजरी। हाथी पर
सवार शहजादे की नजर जब मकान पर पड़ी तो हुजर की लोंडी पर पान
का ये बीड़ा फैंक मारा। महाराज वो शर्म व गैरत की मारी जब से रो रो कर
हलकान हो रही है। कुसम भगवान की, भूक प्यास के मारे उसकी हालत इस
क॒द्र गैर हो गई है के मुझ से देखी नहीं जाती। आखिर मजबूर होकर आपके
पास फ्रयाद लेकर आया हूँ।
शेर शाह:- ( गैज के आलम में ) “आदिल को पाबजोलाँ हाजिर किया
जाए।”( सिपह सालार आजूम, शहजादा आदिल को हाजिर दरबार करते हैं )
शेर शाहः- आदिल! तुझे इस वक्त हाजिर दरबार होने की वजह मालूम
है? अगर नहीं तो सुन ले।

 

तुझे इसलिए तलब किया गया है के तेरी जबान से अपनी मेहबूब
आया की बेहूर्मती का वाक्केया सुन।

आदिल! तू इस वक्त शहनशाह का फ्रजुंद नहीं, बल्के कौम व मिल्लत
का मुज़िम है। कब्ल उसके के मा बदौलत तुझ को इब्नतनाक सजा दें, बोल!
उज्न में क्या पेश करना चाहता है।”

आदिल……. ( सरासीमगी के आलम में ) आलम पनाह! ये गलाम किसी
ऐसे फैल का मुरतकिब नहीं हुआ है जिससे दामने शाही आलूद हो। हकीक॒त
ये है के मुहई मुसतगीस की अहलिया अपने मकान की छत पर आजादाना
तौर पर गसस्‍ल कर रही थी के मेरा उस तरफ्‌ से गुजर हुआ। उसको बरहंगी का
अहसास दिलाने के लिए, ताके आईंदा ऐसी बे एहतियाती और लापरवाही
का मुजाहेरा ना करे। मैंने पान का बीड़ा उस पर फैंक दिया। वरना खुदा
शाहिद है के बन्दे की नीयत हर गिज हर गिज्‌ बुरी ना थी।”

शेर शाह:- आदिल! तेरा ये बयान ख़्वाह कितना ही दुरूस्त क्यों ना
हो, लेकिन उससे मुसतगीस की तसल्ली नहीं होती। तू मुज्जिम है, खायन है,
जालिम है। तुझे सजा जरूर मिलनी चाहिए। ( नजाकत हालात का अंदाजा
करके वजीरे आजम शहजादे की सिफारिश में कुछ कहना चाहता था। मगर
शेर शाह गैजो गजब के आलम में ये कहकर उसको खामोश कर देता है।

शेर शाह:- ( हैबत नाक आवाज में ) “हम उस वक्त कुछ सुनने के
लिए तैयार नहीं। करआन हकीम में कहा गया है के जो बात करो इंसाफ
की रू से करो। ख्वाह उससे अपने किसी क्राबत दार को नुक्सान ही क्‍यों
ना पहुँचता हो।”

आदिल:- “अजमत मआब! गलाम अपनी गलती का एत्राफ करता है।
अफ्व का तालिब है। आईंदा ऐसी गलती का मुरतकिब नहीं होगा।”

शेर शाह:- ( गस्सा से कांपते हुए ) क्या कहा। तुझे माफ कर दूं। आज
पने जो जुर्रात की है के दूसरे की बहू पर बीड़ा फैंका है। कल तू इतना दिलैर
होगा के उनके उठवा कर अपने हवदज में रख लेगा। और फिर तेरी देखा
देखी दूसरे उमरा और नवाब इससे ज़्यादा बेबाकियों का मुजाहेरा करेंगे। और
रेस तरह आखिरत में तू मुझे रोसिव्या करेगा। क्या खलाक दो आलम ने तुझे
रेधी को सवारी इसलिए अता की है के तू हाथी पर सवार होकर गरीबों के
फेच्चे भकानों के पास से गुज्रे और उनकी बहू बेटियों की बे पर्दगी करे। और
जा नामूस पर हमला करे। नहीं ऐसा नहीं होगा। तुझे सजा जरूर मिलेगी।

इज्जत का बदला बे इज्ज्ती ही से लिया जाएगा। शेर शाही इंसाफ कहता

है के तू अपनी बीवी को बनिये के मकान पर भेज और उससे कह दे के वो
भी इसी तरह उसके सहन में गुस्ल करे। हम बनिये को हाथी पर सवार कर
के भेजते हैं। जब तक वो तेरी बीवी पर इसी तरह बीड़ा ना फैंक लेगा। शेर
शाही इंसाफ की तशंगी रफे ना होगी! ”
.. आदिल! ( आबदीदा होकर ) खुदावंद नओअमत। अगर आदिल की
बेहुर्मती का तमाशा देखना मक्सूद हो तो गलाम हाजिर है। उसकी बे इज्जुती
से अगर हुज॒र का मनशाऐ दिली पूरा हो सकता है तो भरे दरबार में उसके
दुर्रे उड़वा कर अपनी आतिश गृजब फ्रो फ्रमा लें। मगर आलम पनाह!
आदिल की बीवी भी रिआया के मेहबूब बादशाह की कुछ लगती है। वो
अफीफा इस मामले में बिलकुल बेगुनाह है। उसे बे आबरू ना किया जाए।

शेर शाह:- अपनी इज्जत का इतना पास है। में बादशाह हूँ। और मा
सिवाए जात बारी मेरे हुक्म को कोई रद करने वाला नहीं है। तो कहता है के
आदिल की बीवी भी हमारी कुछ लगती है। नहीं शेर शाह की नजर में मामूली
बनिया हो या शहजादा आदिल। दोनों की बीवियाँ बराबर हैं। अगर बनिये की
बीबी की बेइज़्जुती करते हुए आदिल को शर्म ना आईं तो शेरशाह भी अपनी
बहू की बेडज़्ज्ती बर्दाश्त कर सकता है। जाओ और हुक्म की तामील करो।”

(सारे दरबार में सन्नाटा छाया हुआ है। आदिल की मुतगृय्यर हालत
देखकर अहले दरबार दिल ही दिल में कुढ़ रहे हैं। आखिर कार वही हिन्दू
बनिया आगे बढ़ता है। और शेर शाह की खिदमत में गिड़गिड़ा कर अर्ज
करता है ) |

बनिया! ……..“बस महाराज मेरा मुकदमा खृत्म हुआ। मुझे दाद मिल
गई। भगवान मेरे माता पिता की उप्र दराजु करे। शहजादी हुज॒र का इसमें
कोई कसूर नहीं। मैं उनकी शान में गुसताखी का मुरतकिब नहीं हो सकता।
मैंने हुजर का नमक खाया है। फिर भला हरम शाही की बे इज़्ज्ती कैसे
बर्दाश्त कर सकता हूँ।”

शेर शाह:- मेरे मजुलूम बच्चे! ऐसा ना करो जिस हिम्मत और दिलैरी से
दाद ख़्वाह हुए हो। इसी शान इसतकुलाल से इन्तिकाम भी लो। ताके आईना
किसी शहजादे, राजे, महाराजे को ऐसी जुर्रात ना हो।

बनिया………. “महाराज की जै हो” लेकिन हुजर शहजादे को काफी
सजा मिल चुकी है। वो अपने किए पर नादिम और पशेमान हैं भगवान
लिए अब इससे ज़्यादा सजा की जरूरत नहीं। द

शेर शाह:- सुनते हो आदिल? रिआया बादशाह को अपना माँ बाप

 

(व्वुर करती है। इसलिए हमें भी उससे बही सूलक करना चाहिए। जो माँ
ब्राव अपनी औलाद के साथ करते हैं। जाओ और उस हिन्दू से माफी माँगो।
जिसने फय्याजी से काम लेकर तुम्हें बे आबरू होने से बचा लिया। वरना
क्रबामत तक तुम किसी को मुंह दिखाने के काबिल ना रहते।”

आदिल …………… ( बनिये से ) मैं अपनी गलती का एत्राफ करते हुए
हुप से माफी का तलबगार हूँ। और इक्रार करता हूँ के आज से तुम्हारी बीवी
प्रेरी बहन है। और मैं उप्र भर उसको अपनी बहन ही की तरह समझूंगा।

बनिया! शहजादे की जै हो।

शेर शाह:- ( बनिये से ) ठहरो! इधर आओ ( गले लगा कर ) आज से
तुह्री बीवी हमारी बेटी है। ( इसलिए जिस क्‌द्र जर व जवाहर दरकार हों,
बे झिमक शाही खजाने से ले जाओ। ( माखूज )

सबके :- इस्लाम अद्‌ व अंसाफ की तालीम देता है। और मुसलमान
बादशाह बड़े आदिल व इंसाफ पसंद होते हैं। और अपनी रिआया के हर फर्ट
का खयाल रखते हैं। जो लोग मुसलमान बादशाहों के खिलाफ परोपेगंडा
करते हैं। वो बड़े झूटे हैं।

हिकायत नम्बर 745 नूर-ए-मोहम्मदी

 

हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम की विलादत तय्यबा
पे बहुत पहले यमन का एक बादशाह था जिसका नाम अबक्नहा था। उसके
दिल में कअबा शरीफ की बड़ी अदावत थी। और वो चाहता था के मक्का
पुकरमभा पर चढ़ाई करके कअबा शरीफ को ढहा दे। चुनाँचे एक रोज वो
अपने लश्कर समेत हाथियों पर सबार होकर कअबा शरीफ को ढहा देने
इरादे से मक्का मोअज़्ज्मा आ पहुँचा। करैश मक्का ने जब अब्नहा की
पढ़ाई और उसके इरादे को मालूम किया तो वो हुजर सल-लल्लाहो तआला
व सल्लम के दादा जान हजरत अब्दुल मुत्तलिब रजी अल्लाहो अच
पास पहुँचे। और इस अग्र की शिकायत्र की। तो हजरत अब्दुल मुत्तलिब
फ्रमाया। के घबराओ नहीं जिसका ये घर है वो खुद ही अपने घर की

गत फरमाने लेगा।

अन्नह्म वादी मक्का में खैमा जन था। वो अहले मक्का को बहूत तंग
लगा। हत्ता के एक रोज उसने अहले मक्का के सारे ऊँट जिनमें चार
अपने सिर्फ हजरत अब्दुल मुत्तलिब के थे। जंगल से हंकवा लिए। और
पे कब्जे में ले लिए। हजरत अब्दुल मुत्तलिब को जब पता चला तो क्रैश

को साथ लेकर कोहे सबीर पर चढ़ आए। उस वक्त हजरत अब्दुल मुत्तलिब
की पैशानी मुबारक से नूरे मोहम्मदी मिस्‍ल हलाल चमकता नजूर आ रहा
था। और उस नूर की शुआएँ कअबा शरीफ पर पड़ रही थीं। हजरत अब्दुल
मुत्तलिब ने अपनी पैशानी के इस नूर को मालूम करके कौम को फ्रमाया।
के वापस चलो और यकीन के साथ इतमीनान दिलाया के तुम तसल्ली रखो।
ये चमक जो मेरी पैशानी में देखते हो, तुम्हें यही एक नेक फाल काफी है।
अन्नहा के मामले में तुम कामयाब रहोगे।

अब्रहा को जब मालूम हुआ के अब्दुल मुत्तलिब मेरे पास ना खुद
आए हैं, और ना ही क्रैश को आने दिया है तो उसने अपना एक आदमी
हजरत अब्दुल मुत्तलिब के पास भेजा। वो आदमी जब मक्का शरीफ
में दाखिल होकर हजरत अब्दुल मुत्तलिब के पास पहुँचा और उसकी
आँख हजूरत अबदुल मुत्तलिब के चहरे पर पड़ी तो वो खुद ब खुद बे
बस होकर हजरत अब्दुल मुत्तलिब के आगे झुक कर उनके पाऊंँ पर
गिर गया। और जबान से कुछ ना बोल सका। और फिर बे साख्ता कहने
लगा के मैं गवाही देता हूँ के तू बे शुबह सरदारी के लायक है। और तेरी
पैशानी में एक ऐसा नूर है के जिसके सामने बगैर झुक जाने के कोड चारा
ही नहीं। फिर उसने निहायत नदामत के साथ अब्नहा का पैगाम दिया के
अब्रहा कहता है के अगर अब्दुल मुंत्तलिब जो सरदारे क्रैश है मेरे पास
हाजिर हो जाए। तो मैं बिला मुजाहेमत वापस चला जाऊँगा। और माल
मक्बूजा ऊँट वगैरा भी सब क्रैश के हवाले कर दूंगा। क्रैश ने ये बात
सुनकर बड़ी आजिजी और इजत्राब के साथ हजरत अह्दल मुत्तलिब को
अब्नहा के पास जाने के लिए तैयार किया। चुनाँचे हजरत अब्दुल मुत्तलिब
तशरीफ ले गए। और जब अब्रहा के खैमे के क्रीब पहुँचे तो अब्रहा की
सवारी का अजीम-उल-जसा सफेद हाथी जो बड़ा मुहीब था और खेमे
के पास खड़ा किया हुआ था हजरत अब्दुल मुत्तलिब को देखते ही झुक
गया। और अब्दुल मुत्तलिब की तरफ सर करके सज्दा करने लगा। और
अल्लाह के हुक्म से यूं गोया हुआ। क्‍

अस्पलायू अलानूरिललजी फी जहारिका या अब्दल मुत्तलिब “ऐ
अब्दुल मुत्तलिब! इस नूर पर सलाम जो तेरी पुश्त में है।”

अब्नहा ने ये मंजर देखा तो बड़ा हैरान हुआ। और हजरत अब्दुल
मुत्तलिब को बड़ी इज्जत के साथ बिठाया। और हजरत अब्दुल मुत्तलिब
ने फ्रमाया के हमारे ऊँट वापस कर दे। अब्हा बोला के ताज्जुब है के

आपको ऊंटों की तो फिक्र है। मगर ये घर यानी कअबा जिसकी बदौलत
आप सब की इज्जत है। उसके ढहा देने से बाज रखने की आपने मुझ
मे कोई बात ही नहीं की। आपने फ्रमाया। ऊँट हमारे हैं। हमें उन्हीं की
फिक्र हे और कअबा शरीफ जिसका घर है वो खुद अपने घर को बचा
लेगा। कअबे वाला जाने, या तुम जानो। ये कहकर आप वापस तशीफ
ले आए। अब्नहा ने सारे ऊँट वापस कर दिए। लेकिन कअबा शरीफ को
हहा देने के लिए उसने लश्कर को हुक्म दे दिया के हाथियों पर चढ़कर
और एक हाथी को सब से आगे रखकर कअबे पर फौरन हमला कर
दो। ताके ये हाथी पल भर में कअबे को ढहा दें। चुनाँचे जब हाथियों
को तैयार करके ये लश्कर कअबा की तरफ्‌ बढ़ा तो अगले हाथी ने जब
बैत अल्लाह शरीफ को देखा तो वहीं अपना सर सज्दे में डाल दिया। हर
चन्द फौलबान ने मारा और उठाने का चारा किया मगर उसका सर फिर
ना उठा। फीलबान ने उसे पीछे जाने का इशारा किया तो वो फौरन उठ
कर पीछे भागा। बाकी हाथी भी बे जोर होकर उसके पीछे भाग निकले।
उधर अल्लाह के अजाब ने उन्हें आ लिया। और ऊपर से कंकरों का
| मीना बरसने लगा। जिससे अब्रह्या और उसके तमाम साथी हलाक हो गए।

(अनवार-उल-मोहम्मदिया, मतबूआ मिस्र, सफा ॥)
सबक्‌:- नूर मोहम्मदी सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम की
बक॑तें हर जमाने में पाई जाती हैं। हजरत अब्दुल मुत्तलिब रजी अल्लाहो
अन्ह को सरदारी इसी नूर की बदौलत मिली। और कअबा शरीफ की
_हिफाजृत अल्लाह तआला ने इसी नूरे पाक की बदौलत फरमाई। और
भी मालूम हुआ के हूजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम का
पर जानवरों को भी नजर आ गया। फिर जो बराऐ नाम इंसान इस नूरे
पक का मौतरिफ ना हो और जिसे ये नूर नजर ना आए। वो जानवरों से
भी बदतर हुआ या नहीं? और ये भी मालूम हुआ के कअबा शरीफ न
गानवरों ने भी सज्दा किया। फिर जो लोग नमाज नहीं पढ़ते और अल्लाह

इस घर की तरफ रूख नहीं करते वो ऊलाई्का कलअनआगमगी
हम अजल्लू के मिसदाक हुए या नहीं?

 

हिकायत नम्बर 746 पेशवाई कुल

 

हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम अपने बचपन शरीफ पें
द ऐक बार घर से निकले तो फिर घर तशरीफ ना लाए। आपके मुतअल्लिकीन

ने समझा के हुज॒र गुम हो गए हैं। चुनाँचे आपकी तलाश शुरू हुई। एक
साहब ऊँटनी पर सवार होकर हुज॒र की तलाश कर रहे थे के उन्हें हुजर
सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍्लम एक दरख़्त के नीचे इसत्राहत फरमाते
हुए मिल गए। उसने अपनी ऊँटनी को बिठाया। और हुज॒र सल-लल्लाहो
तआला अनेह व सल्‍लम को अपने पीछे बिठा लिया। और ऊँटनी को जो
उठाया तो उसने उठने से इंकार कर दिया। फिर उसने हुजर सल-लल्लाहो
तआला अलेह व सललम को अपने आगे बिठाया। तो ऊँटनी उठ बैठी।
( हुज्जत-उल्लाह अलल आलमीन, सफा 258 )
सबक्‌:- हमारे सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम को जानवर

भी पहचानते हैं के हुजर इमाम-उल-अंबिया और पैश्बाऐ कुल हैं। इसी
लिए ऊँटनी ने हुज॒र का पीछे बैठना गवारा ना किया। ऊँटनी के इस
किस्से के मुतअल्लिक्‌ शायर ने लिखा है इस ऊँटनी ने गोया जूबाने हाल
से यूं कहा के |

गोया थी उस ऊनी की ये सदा

बे खबर सरकार को आगे बिठा

जब तलक आगे ना बैठेंगे नबी

में कयामत तक ना उठूगी कभी

मालूम हुआ के हुजर सल-लल्लाहो आला अलेह व सल्‍लम की नबुव्वत

व इमामत को जो नहीं मानता। वो जानवरों से भी गया गुजरा है।

हिकायत नम्बर 747 दुर्रे यतीम

 

हजरत हलीमा सअदिया रजी अल्लाह अन्हा फरमाती हैं के एक मर्तबा
यहूदियों की एक जमात से मैंने कहा। के इस बच्चे मोहम्मद सल-लल्लाहो
तआला अलेह व सल्‍लम के अजीब व गरीब हालात हैं। जब ये शिकमे मादर
में था तो उसकी माँ अजीबो गरीब नूरानी मनाजिर देखती रही। फिर जब ये
पेदा हुआ तो उसकी माँ ने एक नूर देखा। जिसने सारे घर को रोशन कर दिया।
और अब भी उसके अनवारो बर्कात से हम सब मुसतफौद हो रहे हैं। यहूदियों
ने जब ये अलामात सुनीं तो एक दूसरे से कहने लगे के इस बच्चे को कृतल
कर दो। फिर उन्होंने हजरत हलीमा से पूछा के क्‍या ये यतीम है? तो हजरत
हलीमा ने उनकी नीयत भाँप कर जवाब दिया के मैं इसकी माँ हूँ। और इसका
बाप भी है। ये सुंनकर यहूदियों ने कहा अगर ये बच्चा यतीम होता तो दूसरी
सारी अलामतें इसमें नत्नी आखिर-उज़्जमाँ की हैं हम उसे जरूर कृतल कर

देते। ( का जम आलमीन, सफा 269 )

०: हमारे हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम की
पैशगईयाँ कुतब साबिका में मौजूद थीं। और हुजर के आला व कमालात
का जिक्रे पाक बिलतफसील उनमें था। और दुश्मनों को भी हुज॒र की शाने
पाक का इल्म था। मगर अदावत व हसद की बिना पर वो नहीं मानते थे। और
ये भी मालूम हुआ के दुश्मन इस नूरे ऐजूदी को बुझाने की फिक्र में रहते थे।
मगर उस नूरे पाक का अल्लाह हाफिज हुआ।

हिकायत नम्बर 748 आग की खाई

 

अबु जहल ने एक मर्तबा अपने दोस्तों से कहा के मोहम्मद
(सल-लल्लाहो अलेह व सल्लम ) को मैं अगर कभी नमाज पढ़ते देख
लूंगा। तो मैं उसकी गर्दन मार दूंगा। ( मआज अल्लाह ) चुनाँचे एक दिन
जब के हुज॒र अलेहिस्सलाम नमाज पढ़ रहे थे। अबु जहल इसी नापाक
हादे से आगे बढ़ा। लोगों ने देखा के वो हुज॒र की तरफ बढ़ रहा था। के
गागहाँ अपनी ऐडियों पर फिरा। यानी उल्टा भागता और मुंह पर हाथ रखे
हुए नजर आया। जैसे कोई अपने मुंह को किसी मुंह पर पड़ी हुई चीज
से बचाता है। लोग देखकर हैरान हुए और उससे पूछा के तुझे क्या हुआ।
तो कहने लगा के मैंने जज आपको गर्दन पर बार करने को आगे होना
चाहा तो मैंने देखा के मेरे और आपके दरमियान आग की एक खाई है।
और बड़े बड़े पर मुझे नजर आए। मुझे यकीन हो गया के अगर मैं आगे
बढ़ा तो जुरूर आग में गिर पड़ंगा। चुनाँचे खौफ के मारे मैं वहाँ से जल्द
उल्टा दौड़ा। और बमुश्किल जान बचाई। हुजर सल-लल्लाहो तआला
अलेह व सल्‍लम ने जब उसका ये चश्म दीद बाक्रेया सुना तो फ्रमाया।
अगर वो मेरे नजदीक आ जाता तो फरिए्ते उसका जोड़ जोड़ जुदा करके
आग की खाई में फैंक देते। ( मुस्लिम शरीफ , सफा 467 जिल्द 2)
सबक :- हमारे हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम बलल्‍लाहो
पार्सामृका मिनन्नासी के मुताबिक अपने अल्लाह की खास हिफाजुत में
थे। और “सारी खुदाई इक तरफ फज्ल इलाही इक तरफ ” के मिसदाक्‌
जैंदा अपने मेहबूब का हाफिज था। ये भी मालूम हुआ के सारे फरिश्ते 23
ऐरबान व खादिम हैं। और ये भी मालूम हुआ के जा शख्स हमारे हुजूः
पेल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्लम का गुसताख है। उसके लिए एक
आग की खाई तैयार हो चुकी है। .

 

हिकायत नम्बर 749 रसूले बरहक

 

हजरत अब्दुलल्लाह इब्ने उमर रजी अल्लाहो अन्हा फरमाते हैं। के मैं
जो कुछ रसूल अल्लाह सल-लल्लाहो तआला अलेह सल्लम से सुनता।
तो याद रहने की गर्ज से लिख लिया करता था। क्रैश ने मुझे मना किया।
के हर बात जो तुम हुज॒र से सुनते हो। लिख लेते हो। हुजु्‌र सल-लल्लाहो
तआला अलेह व सलल्‍लम के मुंह मुबारक से बशरियत के बाइस कभी
गुस्से की हालत में कुछ निकल जाता है। ये सुनकर मैं लिखने से रूक
गया। और हजर से ये बात कह दी। हुजर ने अपने मुंह मुबारक की तरफ
उंगली से इशारा फरमा कर फरमाया। बे शक लिखो , के इस मुंह से हर
हालत में जो भी निकलता है हकु ही निकलता है। ( अबु दाऊद सफा
257 जिल्द अव्वल )
सबकः:- मालूम हुआ के हमारे हुजर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व
सल्लम रसूले बरहक्‌ हैं। और आपकी जुबाने अनवर से जो भी निकले हक्‌
ही होता है। और उस मुंह से हक्‌ के सिवा कुछ और निकल ही नहीं सकता।
और ये बात हो ही नहीं सकती के हुजर के मुंह मुबारक से झूट निकले। फिर
जब अल्लाह के रसूल के मुंह से झूट नहीं निकल सकता तो खुद अल्लाह के
मुतअल्लिक्‌ ये कहना के उसका झूट बोलना मुमकिन है। ( मआज अल्लाह )
क्यों सब से बड़ा झूट ना होगा। ओर ये भी मालूम हुआ के सहाबा इक्राम
हदीसे पाक लिख भी लिया करते हैं। ।

हिकायत नम्बर 750 दानाऐ गैब

 

अबु जहल के लड़के हजरत अक्रमा रजी अल्लाहो अन्ह ने इस्लाम लाने
से कुब्ल एक जंग में एक मुसलमान अनसारी को शहीद कर दिया। जब
ये खबर हुजर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍्लम को मिली तो हुज॒र
मुसकुरा दिए। सहाबा ने अर्ज की। हुजर! आप मुसक्‌ुराए क्‍यों? फ्रमाया।
इसलिए के अक्रमा ने एक मुसलमान को शहीद कर दिया है। मगर मैं अक्रमा
को भी इस मुसलमान शहीद के साथ जन्नत में देख रहा हूँ। यानी दोनों ही
जन्नती हैं। हुजुर॒ सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम के इस इशांद का
राजू उस वक्त खुला, जब के अक्रमा भी मुसलमान हो गए। ( हुज्जत-उल्लाह
अलल आलपमीन, सफा 468 )

सबक्‌:- हमारे हुजुर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सललम दानाऐ

गयूब हैं। और आपकी नजरों से कोई बात पनेहाँ नहीं। हत्ता के हर शख्स के
अंजाम की भी आपको खबर है।

हिकायत नम्बर 751 हर गिज॒ नमीरद आके दिलश जिन्दा शुद बअश्क

 

एक शख्स के मरने पर उसकी कब्र खोदी जा रही थी। के कब्र खोदते
हुए साथ ही एक दूसरी कृन्न जाहिर हुई। जिसकी लहद से एक ईंट नीचे गिर
गई। लोगों ने देखा के इस लहद में एक नूरानी शक्ल के बुजर्ग सफेद लिबास
में मलबूस तशरीफ फ्रमा हैं। और उनकी गोद में एक सुनहरा क्रआन मजीद
रखा है। जिसके हरूफ भी सुनहरे हैं। और वो बुज॒र्ग तिलावत कर रहे हैं।
ईंट गिरते ही इस नूरानी बुजूर्ग ने अपना सर उठाया। और पूछा। क्या क्यामत
कायम हो गई? कहा गया नहीं! उन्होंने फ्रमाया तो ये ईंट फिर इसी जगह
लगा दो। चुनाँचे वो ईंट फिर उसी जगा लगा दी गईं। ( बशरा लसयूती अलेह
अर्॑हमत अली हामिश शरह अलसदूर, सफा 80 )

सबक :- अल्लाह वाले मरते नहीं हैं। बल्के जगह बदलते हैं। और
इन्तिकाल फ्रमाते हैं। और कब्रों में नूरानी लिबास में मलबूस होते हैं। और
करआन भी पढ़ते हैं। फिर जिस जात ग्रामी सल-लल्लाहो तआला अलेह व
सलल्‍लम की बदौलत इन अल्लाह वालों को ये अब्दी हयात मिली। इस जाते
ग्रमी सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम के लिए “मर कर मिट्टी में
मिल गए” लिखना बे अदबी व बे दीनी की बात हुई या ना?

हिकायत नम्बर 752 बुजर्गों की दुआ

 

शारेह बुखारी हजरत इमाम इब्मे हज़् असकूलानी रहमत-उल्लाह अलेह
के वालिद के घर कोई बच्चा पैदा होकर जीता ना था। आप बड़े कशीदा
खातिर और गमगीन होकर अल्लाह के एक वली हजरत शेख सना किद्नी
रमत-उल्लाह अलेह की बारगाह में हाजिर हुए। और जीते जागते बच्चे के
लिए दरख्वास्ते दुआ की। हजरत शेख अलेह अर्रहमा ने फ्रमा दिया। के जाओ
पुप्हारी पशुत से एक ऐसा बच्चा पैदा होगा जो अपने इल्मो फज़्ल से दुनिया
भर को भर देगा। चुनाँचे आपकी दुआ से हजरत इमाम इब्ने हज़ असकलानी
साहब फतह अलबारी शरेह बुखारी पैदा हुए। ( बस्तान-उल-मोहदिसीन अल
पाहहिस देहलवी, सफा ॥4 )

सबक्‌:- बुजुगों की दुआ से नामुरादों के दामन गोहर मुराद से पुर हो

जाते हैं। बे औलादों को औलाद मिल जाती है! और गृमगीन दिलों को राहत
मिलती है। और ये भी मालूम हुआ के बड़े बड़े मोहद्दिसों और बुजुर्गों का ये
दस्तूर था के मुश्किल के वक्‍त वो अल्लाह वालों की बारगाह में हाजिर हुआ
करते थे। और अपनी मुश्किलात का इजाला 4४ । और ये भी मालूम

आ के बुखारी शारीफ के शारेह हजरत इमाम इब्ने हज रहमत-उल्लाह
अलेहूं जैसे इमाम व मोहद्दिस एंक बुज॒र्ग की दुआ से पैदा होते हैं। फिर कौन
है जो उन मोहद्दिसीन का गुलाम होकर बुजुर्गों के तसरूफ का मुनकिर हो।

हिकायत नम्बर 753 खुदा की बन्दगी

 

अबु मनसूर जो सुलतान तगृरूल का वजीर था। खुदा तरस और मर्द दाना
थां। हर सुबह नमाज पढ़ता और मुसल्ले पर बैठ जाता और तुलू आफताब
तक वजाईफ पढ़ता रहता। फिर खिदमत सुलतान में हाजिर होता। एक दंफा
बादशाह को एक मुहिम पेश आ गई। सुलतान ने वजीर को ब तअजील
तलब किया। आदमी बुलाने आया। तो वो मुसल्ले पर बैठा था। उसको तरफ्‌
मुतवज्जह ना हुआ। हासिदों को बात हाथ आ गईं। और शिकायत का मौका
मिल गया। उन्होंने बादशाह को बहकाया के बादशाह ने ऐसे जरूरी काम
के लिए बुलाया। और वजौीर ने परवाह नहीं की। बादशाह के गुस्से की आग
भड़क उठी। जब वजीर अपने मामूल वजायफ से फारिगृ हो गया तो बादशाह
की खिदमत में हाजिर हो गया। बादशाह ने सख्ती से पूछा के इतनी देर से
क्यों आए। उसने कहा। ऐ बादशाह! मैं खुदा का बन्दा हूँ। और तेरा चाकर।
जब तक उसकी बन्दगी से फारिग ना हो जाऊंँ। तेरी चाकरी पर हाजिर नहीं
हो सकता। बादशाह उसके इस दिलैराना और सच्चे जवाब से आबदीदा हो
गया। और उसकी बहुत तारीफ की और कहा। के खुदा की बन्दगी को मेरी
चाकरी पर मुक॒ृदम रख। ताके उसकी बर्कत से हमारे सब काम हो जायें।
( मख्जन अखलाक, सफा 4॥ ) |

सबकः:- अल्लाह के नेक बन्दे अपने अल्लाह की बन्दगी में कभी
गुफलत इख्तियार नहीं करते। और अल्लाह की बन्दगी को दुनिया के हर
काम से मुकृदम समझते हैं और उनके इस पाक जज्बे की बदोलत अल्लाह
तआला उनके हर काम में बर्कत पैदा फरमाता है।

हिकायत नम्बर 754 नासहाना कलमात

 

हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज जब तखझुते खिलाफत पर मुतमकिन हुए

तो 2 हसन बसरी रहमत-उल्लाह अलेह को एक खत लिखा। जिसका
थाः
“मेरे दोस्त तू जानता है के मैं एक बहुत बड़े काम में मुबतला हुआ हूँ।
मुझे कुछ नसीहत कीजिए। और अपने हम नशीनान खुदा दोस्त में से बी
की मेरे पास भेज दीजिए। ताके मैं उसकी मसालेहत से आसायश हासिल
कर सकू।”
जवाब में हजरत ख़्वांजा हसन बसरी अलेह अर्हमा ने लिखा:-
“अमीर-उल-मोमिनीन का नामा मुतालओ से गुजरा। और जो इशारा
इसमें किया गया था वो समझ लिया। आपने जो फरमाया। के उसकी
प्रसाहबत से आसायश हासिल करूं। तो आप समझ लें के जैसा शख्स
आपको चाहिए वो आपके नजदीक ना आएगा। और आपकसे बे नियाज
होगा। और जो शख्स आपके पास आएगा ऐसे की आपको जरूरत नहीं
है। उसकी मसाहबत से आपको कोई नफा ना होगा। और जो आपने
गसीहत के लिए लिखा है तो जान लो के जो कोई खुदा से डरता है। तमाम
लोग उससे डरते हैं। और जो खुदा से शर्म रखता है लोग भी उससे शर्म
रखते हैं। और जो कोई खुदा के हुजर में गुनाहों पर दिलैरी का इजहार
करता है। तमाम लोग इस पर दिलैर हो जाते हैं और जो कोई आज ऐमन
है। कल मख्दूश होगा। और जो आज मख्दूश है कल ऐमन होगा। और
जो कोई अपने आप पर मग्रूर होगा वो दुनिया व आखिरत में माजल
होगा। दुनिया की तामम नेकियों का निचौड़ सब्र है। और सब्र का सवाब
सब से ज़्यादा है। अपने तमाम कामों में खुदा की पनाह तलब कर और
उस पर तबवक्कल रख। जो कोई आँख को आजाद करता है के जो कुछ
पाहे देखे। उसका अंदवा दराजु हो जाता है। और जो कोई जबान को
रिहा कर देता है। के जो कुछ चाहे कहे। वो गोया अपने आपको हलाक
फैर देता है। गालिबन ये कलमात आपकी रहनुमाईं के लिए काफी हैं।”
मड़जून अखलाक्‌, सफा 4॥3 )
सबक्‌:- अल्लाह बाले दुनिया बालों से बे नियाज्‌ होते हैं और उनके
द्लों में दुनयवी जाह व जलाल का कोई असर नहीं होता। और ये भी मालूम
भी के हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज बड़े खुदा तरस और औलिया दोस्त
पैलीफा थे। और हजरत हसन बसरी रहमत-उल्लाह अलेह के नासहाना
फैलमात पर पूरे पूरे आमिल थे।

 

हिकायत नम्बर 755 दिलजोई

 

एक बादशाह ने अपना एक एलची एक दूसरे बादशाह के पास इस गर्ज
से भेजा के वो उसकी सलतनत की तरक्की के असबाब पर गौर करके अपने
मुल्क में भी उन्हीं कृवानीन को तरवीज दे। एलची ने बादशाह के पास पहुँच
कर अपने आने की गर्ज व गायत बयान की। इधर उधर की बातें होती रहीं।
के चिराग का तेल खत्म हो गया। बादशाह खुद अपने हाथ से चिराग में तेल
डालने लग गया। एलची ने कहा के गलाम को क्‍यों नहीं कह देते। बादशाह
ने कहा। उसकी आँख लग गई है। और अभी उसकी कच्ची नींद है। इस वक्त
जगाना मुनासिब नहीं। मेरी सलतनत की तरक्की का राज रिआया की इसी
तरह दिलजोई करने में है। आपका बादशाह भी इसी फरोतनी और दिलजोई
को इख़्तियार करे। तो सलतनत खुद ब खुद तरक्की पजीर हो सकती है।
( मछ्जन अखलाक, सफा 49 )
सबके :- नेक दिल हाकिम हमेशा अपनी रिआया की दिलजोई करते
हैं और कभी किसी फर्द पर जियादती नहीं करते।

हिकायत नम्बर 756 हजारों साल की उम्र

 

एक बादशाह को मजलिस में एक बुजूर्ग की बहुत तारीफ की गई।
बादशाह को इश्तियाक्‌ हुआ। के उससे मिलूं। चुनाँचे फरमान भेज कर उनको
बुलाया। वो बुजुर्ग जब मजलिस में आए तो उन्होंने सलाम के बाद कहा
“बादशाह को हजारों साल की उप्र हो” बादशाह ने कहा के आपने पहले
ही कलाम में हिमाकृत जाहिर की। जो आप जैसे बुजर्ग की शयाने शान ना
थी। उसने जवाब दिया के आदमी की हयात बकाऐ बदन पर मोकफ नहीं
है। लेकिन नेक नाम की जिन्दगी वफात के बाद दूसरी हयात है। मेरी गर्ज ये
थी के आपका नाम सफा दहर पर हजारों साल तक कायम रहे। ( मख्जन
अखूलाक्‌, सफा 45)

सबक :- अदलो इंसाफ इख़्तियार करने से हमेशा के लिए नाम जिन्दा
रहता हैं। और ऐसा शख्स गोया मरता ही नहीं। बल्के वो हजारों साल तक
जीता रहता है।

हिकायत नम्बर 757 अजाबे कब्र

 

हारिस बिन मिनहाल कहते हैं। एक बार मैं ईदगाह में गया। यहाँ
मेहराब में सो गया। वहाँ एक कृम्र भी थी। मैंने आवाज सुनी के एक लोहे

के हथोड़े से उस मईयत को मार रहे हैं। उसके गले में एक जजीर है।
और उसका चहरा सियाह हो गया है। और आँखें नीली पड़ गई हैं। वो
कहता है। हाय मुझ पर कया बला नाजिल हुई अगर दुनिया वाले मुझ को
देखें तो कोई उनमें से गुनाह का इरादा ना करे। वल्‍्लाह मुझ से खताओं
की बाज पुर्स हुई। और उसने मुझे हलाक कर डाला। कोई है जो मेरे घर
वालों को खबर दे। हारिस कहते हैं मैं नींद से जाग उठा। और मैं हैबत व
खौफ में था। मैंने उसके घर वालों की तलाश की। तीन लड़कियाँ पाई
मैंने उन्हें उसके हाल की खबर दी। और उसके दोस्तों से उसका माजरा
बयान किया। वो सब उसकी कबज्न पर आए और रोये और अल्लाह से
उसकी मगुफिरत की दुआ की। बाद रोज के में फिर उसी कब्र के पास
गया। और वहीं उसके मुतस्सिल सो गया। और उसे बड़ी अच्छी हालत में
देखा। उसके सर एक ताज था। और उसके पाँव में साने की नअलैन थीं।
उसने मुझ से कहा। जजाकल्लाह अनी खैरा। तूने मेरी बेटियों और दोस्तों
को खबर की। और उन्होंने मेरी मगृफिरत की दुआ की। ( दवा-ए-कल्ब
अलकासी बतज॒कीर-उल-मौत-उन्नासी, सफा 55 )

सबक ः- अजाबे कब्र बरहक्‌ है। और अमवात के लिए मुसलमानों
की दुआऐ मगफिरत बड़ी अच्छी और जरूरी है। उससे गुनहगार मईयत को
फायदा पहुँचता है। और ये भी मालूम हुआ के गुनाहों का इरतिकाब बहुत
बुर काम है। उससे कब्र में भी अजाब होता है। इसलिए हर शख्स को गुनाहों
से बचना चाहिए।

हिकायत नम्बर 758 सुलतान को नसीहत सअदी

 

हजरत शेख सअदी अलेह अर्रहमा एक मर्तबा हज से वापस हाते हुए
शहर तबरैज पहुँचे। वहाँ के उलमा ब सलहा से मुलाकात की। सुलतान
अबाका खान के दो मौतमिद बजीर थे। जिनका नाम ख़्वाजा शम्सउद्दीन और
ज्वाजा अलाउद्दीन था। हजरत सअदी से उन दोनों को खास अकीदत थी। एक
रोज सुलतान की सवारी आ रही थी। औरये दोनों बजीर भी उसके हमराह
सवार थे। इत्तिफाकन हजरत सअदी भी राह से गुजर रहे थे। जब इन दोनों
वजीरों ने हजरत सअदी को देखा तो अपने घोड़ों से उतर कर हजरत सअदी
को निहायत अदब से सलाम किया। और उनके हाथ पाँव को बोसे दिए। ये
हाल देखकर सुलतान न हाज्ीन से पूछा के शम्सउद्दीन ने कभी ४७५४६
भी इस मुसाफिर के बराबर नहीं की। ये कौन शख्स है? जब दोनों वजीर

हजरत सअदी को मिल कर वापस आए तो सुलतान ने पूछा ये कौन शख्स है।
जिसकी तुमने इस क॒द्र ताजीम की। वो बोले ये हमारे शेख हजरत सअदी हैं।
सुलतान को हजरत सअदी से मिलने का शौक्‌ पैदा हुआ। और दोनों वजीरों
की वसतात से हजरत को अपने पास बुला कर उनकी सोहबत से मुसतफीद
हुआ। हजरत शेख जब चलने लगे तो सुलतान ने कहा मुझे कुछ नसीहत
कीजिएं। हजरत सअदी ने फ्रमाया। नेकी या बदी के सिवा दुनिया से कोई
चीज साथ ना जाएगी। अब तुम को इख़्तियार है। जो चाहो साथ ले जाओ।
सुलतान ने कहा। अगर ये मजमून नज़्म में हो जाए तो बेहतर है। आपने उसी
वक्‍त ये दो शैरों का कृतआ नज़्म करके पढ़ा… ह

शहे के पास रअय्यत नियाह मीदारिद

हलाल बाद खराजश के मज़्द चू पानी अस्त

वबगर ना राई खलल्‍क अस्त जहर पारश बाद

के हर चे मेखोरदाज जज़िया मुसलमानी अस्त
तर्जुमा:- जो बादशाह रअय्यत की हिफाजृत करता है। खुदा करे उसके
लिए खिराज ( टेक्स ) हलाल हो क्‍्योंके वो उसकी निगहबानी की उजरत
है। और अगर खलकत का राई ( निगहबान ) नहीं है। तो वो उसके लिए
सांप का जेहर है। इस सूरत में जो कुछ खाएगा वो मुसलमानी जजिया है।

( मुगनी-उल-वाजैन, सफा ॥84) ।

सबके :- दुनिया से कूच करने के बाद साथ अगर कोई चीज जाएगी
तो नेकी या बदी। इसलिए आक्बत अंदेश अफ्राद अपने साथ नेकी लेकर
जाते हैं और बदी से हमेशा किनारा कश रहते हैं। और ये भी मालूम हुआ के
नेक दिल हाकिम अपनी रिआया के राई व निगहबान और उनके दुख दर्द
में शरीक होते हैं।

हिकायत नम्बर 759 हजरत हसन बसरी अलेह अर्रहमा की नसीहत

 

हजरत हसन बसरी अलेह अर्हमा कहीं तशरीफ ले जा रहे थे। तो रास्ते
में आपने एक अमीर शख्स को देखा जो जर्क बर्क और मौअत्तर लिबास पहने
अपने खिद्दाम व चऋश्म के साथ बादशाह के दरबार में जा रहा था। हजरत
हसन बसरी अलेह अरहमा ने इस अमीर आदमी को मुखातिब फ्रमा कर
फ्रमाया। के ऐ अमीर शहर! तू कहाँ जा रहा है। उसने कहा। मैं बादशाह के

दु/आर में जा रहा है। आपने फ्रमाया जरा गौर कर के तूने जो ये शानदार
और मौअत्तर लिबास पहना है। सिर्फ इसलिए के बादशाह के दरबार में
(जुरी के वक्त तू फटे पुराने बोसीदा और बदबूदार लिबास से शर्मिंदा ना
हो। हालाँके वो बादशाह भी तेरी तरह एक इंसान है। अब सोचो तो! के ये
गुताहों की कसरत और नाफरमानी की गंदगी से जो तूने अपनी रूह को
पुलव्विस कर रखा है। तो कल कयामत के रोज अंबिया व सालेहीन के
दरमियान अहकम-उल-हाकिमन के दरबार में हाजिरी देते वक्‍त क्‍या तुम
शर्मिंदा ना होगे?

अमीर पर इस कलाम का बड़ा असर हुआ। और उसने हजरत हसन
बसरी अलेह अर्हमा की बैअत कर ली। और अल्लाह तआला की इबादत
में मशगल हो गया। ( दुर्रत-उन्नासिहीन, सफा 25 )
.. सबक्‌:- अल्लाह तआला की बारगाह में हुजरी के लिए हमें लाजिम
है के नेक आमाल और अखलाके हसना से अपने आप को आरास्ता व
मुजृव्यन कर लें। और गुनाहों की गंदगी से अपने आपको बचाए रखें। ताके
अल्लाह के हुज्र शर्मिंदगी से दो चार ना होना पड़े।

हिकायत नम्बर 760 बादशाह और फकीर

 

एक दुरवैश बुजर्ग किसी बादशाह अमीर से मिलने नहीं जाते थे। आखिर
बादशाहे वक्त खुद चल कर उनके पास पहुँचा। जिस वक्त उस दुरवैश ने
देखा के बादशाह मेरे पास आया है। तो उसी वक्त सज्दा-ए-शुक्र अदा किया।
और वजह ये बताई के अल्लाह का शुक्र है के उसने बादशाह को मेरे पास
‘भैजा। और मुझे उसके पास नहीं जाने दिया। क्‍यों दुरबैशों के पास बादशाह
का आना इबादत है। और उनका उसकी तरफ चलना गुनाह है। बादशाह को
सवाब हासिल हुआ। और मैं गुनाह से बच गया। (/तालीम-उल-अखलाक,
सेफा ५० )

सबकः:- बड़े अच्छे हैं वो अमीर जो दुरवैशों की खिदमत में
शज्रि होते है। और बहुत बुरे है. वो बड़ाग्रे नाम दुरवैश जो अपीरों
फे देरवाजों पर हाजरी देते है’। इसी लिए कहा जाता है के “निअमल
भीख अला बाबिल फकीरी व बिअसल फकीरू अला बाबिल
अभीरी » यानी वो अमीदझ बहुत अच्छा है जो फकीर के दरवाजे पर
‘जेर आए। और वो फकौर बहुत बुरा है जो अमीर के दरबाजे पर

गेजर आए । ग्र की

हिकायत नम्बर 761 जेहरी नजर

 

इसकंट्रिया के अहद में एक जानवर पैदा हुआ। जिसकी नजर जेहरीली
थी। वो अपनी जहर भरी नजूर से जिसकी तरफ भी देखता। उसे हलाक कर
देता। कोई उसके नजदीक जाने की जुर्रात ना करता। बादशाह ने बड़े बड़े
दानाओं से पूछा के इस जानवर को कैसे हलाक किया जाए। उस वक्त ऐसे
असलह तो थे नहीं। जिन्हें दूर से चला कर उसे ढेर कर दिया जाए। किप्ी
दाना की समझ में कुछ ना आया। आखिर अरस्ता तालीस ने एक तजवीज
सोची। एक बहुत बड़ा आईया तैयारं किया। उसे छकड़े पर रखवाया। और
शीशे के पीछे एक आदमी बिठाया। के उसे उस रूख पर रखे जिधर वो मूजी
जानवर हो। चुनाँचे वो मूजी जानवर छकड़ा देखकर आगे बढ़ा। जूही उसकी
नजर आईने पर पड़ी और अपनी सूरत नजुर आई तो वहीं गिर कर मर गया।
खुलकत ने खुदा का शुक्र अदा किया। इसकंद्रिया ने अरसता तालीस से पूछा
के इसमें क्या हिकमत थी। अर्ज किया के जूमीन के अन्दर गंदे बुखारात
बन्द रहने के बाइस कई सालों के बाद ऐसे जानवर पैदा हो जाते हैं। उस
जानवर की. आँख में जहर कातिल था वो जिसकी तरफ्‌ देखता। हलाक हो
जाता। जब उसने आईने पर नजर की। तो उसकी जहर भरी नजर का अक्स
उस पर पड़ा। और सराईय्यत करके उसकी हलाकत का मौजिब बन गया।
( तालीम-उल-अखलाक, सफा 505 ) या

सबक्‌:- जिस तरह इस मूजी जानवर की जेहरीली नजर का असर
खुद उसी पर पड़ा और वो हलाक हो गया। इसी तरह हसद करने वाला
इंसान भी अपनी हसद की आग में खुद ही जल भुन जाता है। और अपना
ही नुक्सान कर लेता है। जिस का वो हसद करता है। वो तो खुशिया मनाता
रहता है। और हासिद अपने हसद की आग में जलता रहता है।

हिकायत नम्बर 762 निशाने मर्दमी

 

किरमान का एक बादशाह बड़ा सखी और मेहमान नवाज था। उसके
मेहमान खाने का दरवाजा हर वक्त खुला रहता था। और हर खासो आम
को खाना मिलता था। जो कोई उसके शहर में दाखिल होता है। वो उसका
प्रेहमान होता था। और सुबह का नाश्ता और शाम का खाना उसके मेहमान
खाने में तैयार मिलता था। एक दफा अज्दुद्दोला ने उस पर लश्कर कशी की
और किरमान का बादशाह ताबे मुकाबला ना लाकर किला नशीन हो गया।

अज्दुद्दोला का लश्कर हर सुबह महसूरीन से सख्त जंग करता। जब रात
होती तो किरमान का बदशाह दुश्मन के सारे लश्कर के लिए खाना भेजता।
अज्दुद्दोला ने पैगाम भेजा के क्‍या वजह है के हम से सारा दिन लड़ते भी हो
और रात को रोटी भी भेजते हो। जवाब दिया, के जंग करना इजहारे मर्दमी
है और रोटी खिलाना निशाने मर्दमी है। आप अगरचै हमारे दुश्मन हैं मगर
हमारे शहर में मुसाफिर हैं। ये मुरव्वत के खिलाफ है के आप हमारे शहर में
हों और अपना खाना खायें।

अज्दुद्दोला ये सुनकर रो पड़ा और कहा के ऐसे बामुरव्वत से लड़ना बे
मुखव्वती है। चुनाँचे मुहासरा उठा कर चला गया। और फिर छेड़ छाड़ ना की।
(तालीम-उल-अखलाक्‌, संफा 508 ) |

सबक्‌:- जो काम अखलाक्‌ व मुरव्वत की तलवार कर सकती है वो
काम फौलाद की तलवार नहीं कर सकती।

हिकायत नम्बर 763 चुगुल खौर पर लानत

 

खलीफा मौतसिम बिल्लाह बड़ा नेक दिल हाकिम था। उसके अहद
में एक कमीने चुगुलखौर ने उसके पास रिपोर्ट की। के फलाँ आदमी फौत
हो गया है। वो बड़ा दौलतमंद था। उसका एक ही बेटा है। अगर हुक्म हो
ते उसके तकें से कुछ हिस्सा लड़के के गुज़ारे के लिए रखकर बाकी सारा
माल बतौर कर्ज दाखिल खजाना कर लिया जाए। और जब वो बड़ा हो तो
उसे दिया जाए। इस तरीके से लड़के का माल मेहफ्ज रहेगा और खजाना
शाही मामूर हो जाएगा मौतसिम ने उस कागज की पुश्त पर लिख भेजा के।

मरने वाले को खुदा बख़्शे, और उसके मालो मीरास में बर्कत दे। और
यतीम नेक नीयती से परवरिश पाए और चुगुलखौर पर खुदा की लानत हो।
(तालीम-उल-अखलाक्‌, सफा 5॥7 ) क्‍ ।

सबक्‌:- नेक दिल हाकिम कभी किसी चुगूलखौर की बात पर ध्यान
“हीं देते और अपनी रिआया के मालो मीरास पर कभी’ ना जायज कब्जा नहीं
फेरते और ये भी मालूम हुआ के जो लोग महज शरारत व तमओ से हुक्काम
की बहकाने की कोशिश करते हैं। वो झूटे और चुगलखौर होते हैं। और
अल्लाह की लानत के मुसतहिक्‌।

हिकायत नम्बर 764 कंब्रिस्तान

 

हजरत अली बिन अलमगैरा रहमत-उल्लाह अलेह दिन रात कब्रिस्तान

में रहा करते थे। हजरत खल्फ बिन सालिम अलेह अर्रहमा ने एक बार
उनसे पूछा के आप कहाँ रहते हैं? तो फरमाया। वहाँ जहाँ अमीर गरीब का
इमतियाज नहीं। और जहाँ सब बराबर हैं। पूछा के वो कौन सी जगह है?
फ्रमाया। क्‌ब्रिस्तान। पूछा कया आपको वहाँ रात की तारीकी में डर नहीं
लगता? फरमाया। जब रात पड़ती है तो मैं उस वक्त कब्र की तारीकी याद
कर लेता हूँ। फिर मुझे रात की तारीकी नहीं डराती। पूछा। कब्रिस्तान के
होलनाक मंजर का आपके दिल पर असर नहीं पड़ता? फ्रमाया। मैं कृयामत
के दिन का होलनाक मंजर याद कर लेता हूँ। तो कब्रिस्तान का मंजर मुझे
. नहीं डरा सकता। ( रोज-उल-रियाहहीन, सफा ॥3 )

सबक्‌:ः- इंसान को हर वक्‍त कब्र का आलम और कुयामत का दिन
याद रखना चाहिए। इसलिए के एक दिन मरना है और कृयामत के रोज
अल्लाह के रूबरू पेश होना है।

हिकायत नम्बर 765 शैतान का अफसोस

 

एक मर्तबा एक अल्लाह के मक्बूल ने शैतान को देखा। और उससे पूछा
के ऐ इबलीस! क्‍या कभी तूने मुझ पर भी अपना दाव चलाया? शैतान ने
कहा। के हाँ एक मर्ततरा आपने खूब पेट भर कर खाना खाया था। और आप
पर उस रोज नींद का कुछ ऐसा गृुलबा हुआ के आप रात का वजीफा पढ़े
बगैर सो गए थे। वो बुजुर्ग फरमाने लगे। खुदा की कूसम आईदा मैं कभी खूब
सैर शिक्रम होकर खाना ना खाऊँगा। शैतान बोला! अफसोस मैंने अपना राज
बता दिया। मुझे भी खुदा की कसम! आईंदा मैं भी कभी आप जैसे बुजर्ग
को नसीहत ना करूंगा। ( रोज-उल-रियाहीन, सफा ॥77 ) ह

सबक :- अल्लाह के मक्बूल जन्दों पर शैतान को गल्खा हासिल नहीं
होता। और मक्बूलाने हक हर ऐसी बात से जो गफ्लत में डाल देने वाली और
शैतान को खुश करने वाली है। बचते हैं। इसी लिए हमें हुक्म है के कूनो
मआस्सादिकरना “यानी सच्चों के साथ हो जाओ।” ताके उन पाक लोगों
की तफाक॒त व मईयत के सदके में हम भी शैतान से बच जायें।

हिकायत नम्बर 766 अल्लाह की एक मकक्‍्बूल बंदी

हजरत हबीब अजमी रहमत-उल्लाह अले की बीवी भी बड़ी इबादत
गुजार और अल्लाह की मक्बूल बंदी थी रात के वक़त अपने खाविंद को ये
कह कर जगाया करती थी। के

कुम या रजुलू जहाबल्लैलू व बेचना यदेका तरीकुन ब्ड़दुन व
गदूगा कलीलुन व कृवाफिलुस्पालीहीना कृद सारत कुड्मामगा व
नहनू। क्‍
“उठये! के रात गुजर गई और रास्ता तबील है। और जादे राह कुलील।
और अल्लाह वालों के काफले चल भी दिए। और हम पीछे रह गए।”
(रोज-उल-रियाहीन, सफा ॥॥6)

सबक :- अल्लाह के नेक बन्दे रातों को भी उठ उठ कर अल्लाह की
बाद करते हैं। और मंजिले मक्सूद तक पहुँचने की फिक्र में रहते हैं। मालूम
हुआ के दिन लहू व लअब में और रातें नींद में गुजारने वाले बड़े ही ना
आक्बत अंदेश हैं। और पीछे रह जाने वाले हैं।

हिकायत नम्बर 767 आग में

 

एक बुजुर्ग वअजू फ्रमा रहे थे और फ्रमा रहे थे के कयामत के रोज
हर एक को जहन्नुम के ऊपर से गुजरना होगा। खुदा तआला फरमाता है।

इनमिनकुन इलला वारिदृहा काना अला रब्बिका हतमन मकजिय्या।

वहाँ से एक यहूदी गुजर रहा था। उसने ये आयत सुनी। तो कहने लगा के
अगर ये बात दुरूस्त है तो फिर हम तुम बराबर हैं। इसलिए के हमें और आप
सब को जहन्नुम से गुजरना होगा। वो बुजर्ग फरमाने लगे नहीं ये बात नहीं
गुज्रेंगे तो सभी। लेकिन हम सलामती के साथ उबूर कर जायेंगे, और तकवा
और ईमान की बदौलत बच जायेंगे। और तुम उस प्ले अन्दर गिर जाओगे। फिर
उहोंने ये आयत पढ़ी।

पुम्मा नुनज्जिल लज़ीनत्तकृव व नजारूज़्जालिगीना फीहा

जिपिय्यन

हे यहूदी ने कहा के अगर मुत्तकी बचेंगे तो सुन लीजिए के मुत्तकी हम ही
हैं। फरमाया। ये बात भी नहीं और ये आयत पढ़ी।

वरहमती वसीअत कुल्ला शैड़न फसआकतुबहा लिल्लजी ना यत्तकू ना
१ यौतूनज्ज्काता वल्‍लजीना हुम बिआयातिना योग्रिनुनल्लजीना
‘तबिऊनरसूला अन्नविव्यलउमिव्या।

यहूदी ने का। अच्छा अपने दावा पर कोई दलील पेश कोजिए। फरपाया।
तो ऐसी दलील पेश करता हूँ जिसे हर खास व आम देख सकेगा। और वो ये
; के एक कपड़ा मेरा और एक कपड़ा तुम्हारा लेकर दोनों को आग में डालते

जिसका कपड़ा आग में जलने से बच जाए वो सच्चा। यहूदी ने कहा।

मुझे मंजर है। चुनाँचे उन्होंने अपना एक कपड़ा लिया। और एक कपड़ा उस
यहूदी का लेकर यहूदी के कपड़े को अपने कपड़े के अन्दर लपेट कर जलती
आग में डाल दिया। थोड़ी देर के बाद उसे निकाला गया। तो सारे लोगों ने
देखा। के हजरत का कपड़ा जो ऊपर था। बिलकुल महफूज है। और यहूदी
का कपड़ा जो अन्दर था। जल चुका है। करामत देखकर वो यहूदी उसी वक्त
मुसलमान हो गया। ( रोज-उल-रियाहीन, सफा 20 )

सबक्‌:- ईमान एक ऐसी मुफीद और नाफे चीज है के उसकी बदौलत
इंसान जहंन्रुम की आग से बच जाता है। और ये भी मालूम हुआ के एक
बुजूर्ग की तरफ मंसूब हो जाने से एक कपड़ा भी आग में जलने से बच गया
तो जो इंसान किसी अल्लाह के मक्बूल बन्दे से निसबत पैदा कर लेगा वो
क्यों ना निजात पा लेगा। ।

हिकायत नम्बर 768 सब से बड़ी दौलत

 

हजरत सुलेमान अलेहिस्सलात वस्सलाम एक मर्तबा अपनी पूरी शानो
शौकत के साथ तशरीफ ले जा रहे थे। परिंदे आपके सर पर साया किना थे।
और आपके दायें बायें आगे पीछे जिन्नो इन्स और वहवश व तयूर के लश्कर
थे। इस बेमिसल शौकत को देखकर एक आबिद जाकिर शख्स ने कहा। ऐ
अल्लाह के पैगुम्बर! आपको बहुत बड़ी सलतनत व दौलत अता फरमाई गई
है। हजरत सुलेमान अलेहिस्सलाम ने फरमाया। मेरी इस सलतनत व दौलत से
भी बड़ी दौलत खुदा की याद है। इसलिए के ये सलतनत व दौलत फानी है।
और खुदा की याद बाकी है। ( रोज-उल-रियाहीन, सफा 724)
. संबक:- ख़ुदा की याद बहुत बड़ी दौलत है और जिसे ये दौलत
हासिल हैं असल में अमीर वही है। और जो खुदा की याद से गाफिल है वो
ये चन्द रोजा हकूप्तत पाकर भी मुफलिस व किलाश है।

हिकायत नम्बर 769 रोजा

हज्जाज सकूफी एके मर्तबा हज के लिए मक्का भोअज्जमा व मदीना
_मुनव्वरह के दरमियान जाते हुए एक मंजिल में उतरा और दोपहर का खाना
तैयार कराया। खाना तैयार हो गया तो अपने हाजिब से कहा। के किसी
मेहमान को ले आओ। जो मेरे साथ बैठ कर खाना खाए। हाजिब खैमे से
बाहर निकला। तो उसे एक आराबी लेटा हुआ नजर आया। उसने उसे जगाया।
और कहा। चलो तुम्हें अमीर हज्जाज बुला रहे हैं। आराबी आया। त्तो हज्जाज

नें कहा। मेरी दावत कबूल करो। और हाथ धोकर मेरे साथ खाना खाने बैठ
जाओ। आराबी बोला। माफ फ्रमाइये आपकी दावत से पहले मैं आपसे
बेहतर एक करीम की दावत कबूल कर चुका हूँ। हज्जाज ने कहा। वो किस
की? वो बोला। अल्लाह की। जिसने मुझे रोजा रखने की दावत दी। और मैं
रेजा रख चुका हूँ। हज्जाज ने कहा। इतनी सख्त गर्मी में रोजा? आराबी ने
कहा। हाँ! कयामत की सख्त तरीन गर्मी से बचने के लिए। हज्जाज ने कहा।
आज खाना खा लो और ये रोज कल रख लेना। आराबी बोला। और क्या
आप इस बात की जमानत देते हैं। के मैं कल ता जिन्दा रहूंगा। हज्जाज ने
कहां। ये बात तो नहीं। आराबी बोला। तो फिर दो बात भी नहीं। ये कहा और
दिया। ( रोजू-उल-रियाहीन, सफा 30)

सबक्‌:- अल्लाह के नेक बन्दे किसी दुनयवी हाकिम के रौब में नहीं
आते। और ये भी मालूम हुआ के जो लोग यहाँ की गर्मा बर्दाश्त करके रोजा
रखते हैं। वो कल की होलनाक गर्मी से महफूज रहेंगे।

हिकायत नम्बर 770 यहूदी से मुनाजरा

 

हजरत अबुअलहजील फरमाते हैं के एक यहूदी बंसरें में आया। और
उसने आम मुतकल्लमीन को बन्द कर दिया। मैंने अपने चचा से कहा। के मैं
इस यहूदी से मुनाजरा करने के लिए जाना चाहता हूँ। चचा ने कहा। बेटा!
वो मुतकल्लमीन बसरा की एक जमात को हरा चुका है। मैंने कहा। के मुझे
जुरूर जाना है। तो चचा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। और हम इस यहूदी के
पास पहुँच गए। तो मैंने उसे इस हाल में पाया। के वो इन लोगों से जो उन
से बहस करते थे। अपने सामने हजरत मूसा अलेहिस्सलाम की नबुब्बत का
इक्रार कराता है। फिर हमारे नबी करीम सल-लल्लाहो तआला अलेह व
पल्‍लम की नबुव्वत का इंकार करता है। फिर कहता है के हम उस नबी के
दीन पर हैं के जिसकी नबुव्वत पर मुसलमानों ने भी इत्तिफाकु किया। और
एप उस नबी की दीन पर हो। जिसकी नबुव्व्त पर हम इत्तिफाक्‌ नहीं करते।
गे हम इस दीन को क्‍यों मानें जिसका नबी मुत्तफिंक्‌ अलेह नहीं है। और
उसका इक्रार क्‍यों करें? अब मैं उसके सामने पहुच गया। मैंने कहा। के मैं
‘झ से सबाल करूं या तू मुझ से सवाल करेगा? उसने कहा। बेटा! क्‍या तू
नहीं के मैंने तेरे बड़ों को गुफ्तगू में बन्द कर रखा है। मैंने कहा। तुम
बातों को छोड़ो। और इन दो बातीं में से एक को इख्तियार करो। उसने
केहा। में सवाल करता हूँ। के मूसा अल्लाह के अंबिया में से एक ऐसे नबी नहीं

हैं, जिनकी नबुव्वत सही और उनकी नबुव्वत साबित है? तो उसका इंकार
करता है या इक्रार? अगर तू इंकार करता है तो अपने नबी की मुखालफत
करेगा मैंने उससे कहा। के जो सवाल तू मूसा के बारे में मुझ से कर रहा है।
मेरे नजदीक इसमें दो सूरतें हैं। एक ये के मैं इक्रार करता हू, उस मूसा क्द्वी
नबुव्वत का जिसने हमारे नबी करीम सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍लम
की नबुव्वत के सही होने की ख़बर दी और हम को हुक्म दिया के उनका
इत्तिबा करें। अगर तू उस मूसा के बारे में सवाल कर रहा है। तो मैं उस मूसा
अलेहिस्सलाम की नबुव्वत का इक्रार करता हूँ। और अगर तू जिस मूसा के
बारे में सवाल कर रहा है वो ऐसा है के हमारे नबी करीम सल-लल्लाहो
तआला अलेह व सल्‍लम की नबुव्वत का इक्रार नहीं करता और उसने उनके
इत्तिबा का हुक्म हमें दिया और ना उसने उनकी आमद की बशारत दी तो मैं
-उसकों नहीं पहचानता। और ना मैं उसकी नबुव्वत का इक्रार करता हूँ। तो
मेरे जवाब से वो यहूदी बोखला कर रह गया। फिर उसने कहा तौरात के बारे
में तू क्या कहता है। मैंने कहा। तौरात के बारे में भी मेरे नजदीक दो सूरतें
हैं। अगर वही तौरात मुराद है जो उस मूसा पर नाजिल हुई जिसने हमारे नबी
सल-लल्लाहों तआला अलेह व सल्‍लम की नबुव्वत का इक्रार किया था।
तो ये तौरात हक है और अगर वो तौरात मुराद है जिसका तू दावा कर रहा
है तो झूटी है। और मैं उसकी तसदीक्‌ नहीं करूंगा। फिर उसने कहा। मैं तुझ
से अलेहदगी में एक बात कहना चाहता हूँ। जो सिर्फ मेरे और तेरे दरमियान
होगी। मैंने खयाल किया के शायद कोई नेक बात हो। मैं उसके करीब हो
गया। उसने आहिस्ता आहिस्ता मुझे गालियाँ देना शुरू कीं के तेरी माँ ऐसी
और ऐसी है। और जिसने तुझे तालीम दी उसकी माँ ऐसी है। वो गालियों
में बजाए कनाया के उरयाँ अलफाज इस्तेमाल कर रहा था। दर असल वो
कोशिश ये कर रहा था के मैं उस पर हमला कर बैठूं। फिर उसको ये कहने
का मौका मिल जाए के मुझ पर हमला कर दिया गया हैं इसलिए मैं जा रहा
हूँ। मगर वो इसमें कामयाब ना हो सका। फिर मैंने हाड़ीने मजलिस से खिताब
किया। और मैंने कहा। अल्लाह तुम को इज्जत दे। क्‍या मैंने उसको जवाब
नहीं दिया? सब ने कहा। बेशक। फिर मैंने कहा। क्या इस पर लाजिम ना था।
के मेरे जवाबात को रद करता। सब ने कहा। जुरूर फिर मैंने कहा। के उसने
जब मुझ से सरगोशी की। तो मुझे ऐसी गालियाँ दीं। जिनसे. हद वाजिब होती
है। और मेरे उस्ताद को भी ऐसी गालियाँ दीं और उसने ये समझा था के मैं
ये गालियाँ सुनकर उस पर हमला कर दूंगा। फिर उसको ये कहने का मौका

जाएगा के हम ने उस पर हमला किया था। अब तुम पहचान चुके हो
के ये किस कमाश का शख्स है। बस फिर तो अवाम के हाथों से उस पर जूते
(डुना शुरू हो गए। और वो भागता हुआ निकला। और वहाँ लोगों के जिम्मे
उसका बहुत सा कर्ज था। उसको भी छोड़ गया। ( किताब-उल-अजकिया,
सबके:- बद मजहब हमेशा अय्यारी व चालाकी के साथ अपने
अ्रकायद बातिला की तशहीर करते हैं। और ऐसे चालाक लोगों के दाव से
बचने के लिए बड़ी दानाई और होशियारी दरकार होती है। और ये भी मालूम
हुआ के बदअकौदगी का पोल आखिर खुल कर ही रहता है।

हिकायत नम्बर 771 हक बहक्‌ दार रसीद

 

शाम के धुंद लके में खैरू माली बाग में पौदों को पानी दे रहा था। उस
वक्त वा ना जाने किन खयालों में खोया हुआ था।-उसे अपने बीते हुए दिन
बुरी तरह याद आ रहे थे। जब वो शेख गलाम अली के हाँ काम करता था।
कितना खुश था। वो शेख जी के हाँ। शेख साहब उस पर कैसे मेहरबान थे।
उस्तका कितना खयाल रखते थे। उसके काम की कितनी क्‌द्र करते थे। और
वो केसी बुरी घड़ी थी। जब वो इस शहर से जाने लगे और ऐसे शरीफ आदमी
की नौकरी से उसे अलग होना पड़ा।

और अब वो नए आका के हाँ काम करता था। गुलजार खाँ के हाँ। ये
बाँ साहब शेख जी की बिलकुल जिद थे। बहुत कंजूस, बद मिजाज और
बहुत चिड़चिड़े। बहुत नाकूद्रे। चाहे कोई कितनी ही मेहनत करे। चाहे कोई
कितना ही काम करे। पर उनका मुंह सीधा नहीं होता था। उनका लड़का
दिलदार खाँ बाप से भी दो कदम आगे था। खैरू माली उन दो पाटों के बीच
प्रें पिस रहा था। मगर आदमी वफादार था। सब तकली<८ झेल रहा था। और
जैसे तैसे निबह रहा था।

वो अपने खयाल में महू बराबर पानी दे रहा था। इतने में एक नर्म-सी
आवाज ने उसे चौंका दिया। उसने गर्दन उठा कर देखा। तो एक शरीफ आदमी
गसके सामने खड़ा था। उसने पूछा। भला खैरू माली को भी तुम जानते हो?

खैरो झट बोला। मैं ही हूँ खैरू माली। क्या बात है सरकार! मेरे लायक्‌

फोई काम? शरीफ आदमी ने पूछा। शेख गुलाम अली को जानते हो? अपने

पुराने आका का नाम सुनकर खैरू का चहरा खुशी से खिल गया। बोला।

मैं खूब जानता हूँ। भला उन्हें ना जानूंगा। बरसों उनका नमक खाया। खुदा

उनकी सी आदत सबको अता करे।
शरीफ आदमी ने खैरू की तरफ गौर से देखा। और ये इतमिनान रे ।

के जो हुलिया उसे बताया गया था। खैरू बिलकुल वैसा ही है। बहुत गुमगीन
अंदाज में बोला। तो भई! तुम्हें ये सुनकर अफसोस होगा के शेख जी
इन्तिकाल हो गया है। खैरो को यु खबर सुनकर एक धक्का सा लगा। और
उसे ऐसा मालूम हुआ के जैसे इस दुनिया में उसका कोई सहारा नहीं रहा
फिर वो फूट फूट कर रोने लगा।
शरीफ आदमी भी रो रहा था। उसने गला साफ करते हुए रूक. रूक

कर कहा। शेख जी मरते हुए तुम्हें दुआएँ दे गए हैं और तुम्हें एक
भेजा है। ( कोट की जैब से थेली निकाल कर ) ये दो हजार के नोट हैं “ तुम

ने शेख जी की बहुत मेहनत, ईमानदारी और वफादारी से खिदमत की है।

ये उसका ईनाम है।

._ खैरू बिलकुल खो गया। जेसे किसी ने इस पर जादू कर दिया हो।

देर बाद हवास ठिकाने हुए। तो वो शरीफ आदमी जा चुका था।
उस वक्त खैरो के दिमाग में पहली बात जो आई वो ये थी के उस नौकरी
को लात मारेगा। और जिन्दगी के बाकी दिन आराम व इतमिनान से गुजारेगा।
अब ये दौलत हिफाजत से रखना थी। उसने चारों तरफ नजर दोड़ाई।
अपनी झोपड़ी तो उसकी बिलकुल गैर महफ्ज थी। एक झाड़ी नजर आई।
जो घनी और एक तरफ थी। सुर्ख सुर्ख फूलों से लदी हुईं। उस झाड़ी के पीछे :
एक पुराना पेड़ था। पेड़ की जड़ से जरा ऊपर एक खोख थी। बस यही जगह
सबसे ज़्यादा महफूज उसे नजर आईं। खैरू ने बो थेली उसमें ठूंस दी और
उस पर एक पत्थर रख दिया।

५८ खैरू को थेली की तरफ से इतमिनान हो गया तो उसने सोचा। चलो
खाँ साहब को जाकर आखरी सलाम कर आऊँ। उसे ये बिलकुल पता नहीं
था। के दिलदार खाँ कहीं छुपा हुआ उसे थेली रखते हुए देख रहा है। खैरो
जूंही पेड़ के पास से हटा दिलदार खाँ पंजों के बल दौड़ता हुआ आया। और
चुपके से थेली निकाल कर सीधा बाप के पास पहुँचा। उसे बताया के थेली
खैरो माली की है। वो इसे एक जगह से उड़ा लाया है। |

लालची बाप ने थेली बेटे से ले ली। और कहा तुम इत्तमिनान रखो ये:
थेली कहीं बहुत हिफाज॒त से रख दूंगा। ;
इतने में खैरो भी पहुँच गया। गुलजार खाँ उस वक्त बहुत खुश खुश था।
और उम्मीद के खिलाफ बहुत मिलनसारी और इंसानियत के साथ बात कर

रहा था। उसने बड़ी खुशी के साथ खैरो का हिसाब साफ कर दिया। और
दूसरी सुबह को उसे जाने की इजाजत दे दी। दूसरे दिन जैसे ही खैरो माली
हख्सत हुआ दिलदार खाँ अपने बाप के पास दौड़ा हुआ आया। और थेली
वाली बात पूछने लगा। गुलजार खाँ ने कहा। बेटा! ये थेली मैंने ऐसी जगह
रख दी है के किसी कि फलक को भी खबर नहीं हो सकती।

दिलदार खाँ ने बे सन्नी के साथ पूछा। आखिर किस जगह?

गुलजार खा ने बड़े इतमिनान के साथ बताया। वो जो घनी सी झाड़ी है
ना। नीले नीले सुर्ख सुर्ख फूलों से लदी हुईं उसके बिलकुल पीछे एक पुराना
पेड़ है बस उस पेड़ की कोख में।

इतना सुनना था के दिलदार खाँ के पैरों तले से जमीन निकल गईं। चहरे
पर हवाईयाँ उड़ने लगीं। गुलजार खाँ को बेटे की ये हालत देखकर बहुत
अचंबा हुआ। दिलदार खाँ कमजोर आवाज में बोला।

ये क्‍या गृजब किया अब्बा आपने? ये थेली वहीं से तो निकाल कर
लाया था मैं” ( माहे तय्यबा, नवम्बर  )

सबके :- हरीस व खायन कभी कामयाब व बामुराद नहीं होता। और
पराये माल पर हाथ मारने वाले के पास ना दीन रहता है ना दुनिया। इसलिए
खयानत व बददियानती और हर्स व लालच से हमेशा बचना चाहिए।

हिकायत नम्बर 772 कुत्ते की दुम

 

एक शख्स को भूत अपने बस में करने का शौक पैदा हुआ। बिचारे ने
बहुत मंतर जंतर सीखे। मगर भूत बस में ना आया। लाचार वो एक जंगल
में रहने वाले फक्कीर के पास गया। और कहने लगा। हुज॒र! मुझे कोई ऐसी
तरकीब बताइये जिससे भूत मेरे कब्जे में आ जाए और मेरा सब काम धंदा
कर दिया करे। फक्कीर अक्लमंद इंसान था। उसने कहा। भूत बुरे होते हैं।
ऑसे खयाल खाम से बाज आ जाओ तुम उसको काम काज ना बता सकोगे।
आखिर में वो तुम्हें हलाक कर देगा। उसने कहा मेरे पास काम काज बहुत है।
जिनसे वो कभी फर्सत ना पा सकेगा। आखिर इस फकीर ने उसे एक अमल
पता दिया।ये घर आकर वो अमल करने लगा। जंब मीआद मुक्ररा पर अमल
पूरा हो गया तो भूत हाजिर हो गया। भूत हाजिर होकर कहने लगा। बताओ
क्या करूं? उसने कहा। एक शानदार इमारत बना दो। एक पल में शानदार
इमारत तैयार हो गईं। उसने कहा, खेत जोत आओ। और खेत जोता हुआ तैयार
पा। उसने कहा। बहुत सा रुपया लाओ। खजाना वहीं हाजिर। गर्ज जो मुश्किल

से मुश्किल और मुख़्तलिफ काम उसको बताए गए। सब कुछ किया कराया
तैयार। अब कोई काम ना रहा। भूत ने कहा कोई काम बताओ। वरना मैं तुम
को हलाक कर दूंगा। ये डगा और दौड़ कर फक्कौर के पास आया। और कहा
हुज॒र! भूत को जो कुछ कहता हूँ वो झट पट कर देता है। अब मेरे पास कोई
काम नहीं। बताओ अब क्या करूं? वरना मुझ को वो हलका कर देगा। इतने
भूत भी “मैं खाऊँ” “मैं खाऊँ” करता वहाँ पहुँच गया। फकौर के पास एक
कुत्ता बैठा था। उसने उस आदमी को एक खंजर देकर कहा के उस कूत्ते की
दुम काट कर भूत को दो और उसे कहो के इसे सीधी कर दे ” उस आदमी ने
ऐसा ही किया। और कूत्ते की दुम काट कर भूत को दे कर कहा। के लो ये
काम करो। के इसे सीधे कर दो। भूत ने कुत्ते की दुम हाथ में ली। एक दफा
सीधी कर दी। फिर जब उसको छोड़ा तो टेढ़ी की टेढ़ी। एक दिन गुजरा। दो
दिन गुजरे। भूत ने हजार कोशिश की मगर कत्ते की दुम सीधी ना हुई। तब
तो भूत बहुत घबराया और उस आदमी से कहने लगा। भाई! जो कुछ मैंने
धन दौलत, रुपवा पैसा तुझ को दिया वो सब कुछ तेरा। अब मुझ को छड़ी
दे। तू जीता मैं हारा। ये फौरन राजी हो गया। भूत अपने ठिकाने गया। और ये
अपने घर चला आया। ( माहे तय्यबा जनवरी  )

सबके :- दुनिया भी कुत्ते की दुम है। कोई हजार कोशिश करे ये
कभी सीधी ना होगी। हजरत इंसान ने उसे सीधा करने की बहुत कोशिशें कोी।
बहुत सी तदबीरें कीं। शिफाखाने बनाए। लेकिन मरीज मरते ही रहे। मदरसे
और किताबें ताली व इस्लाह के लिए जारी कीं लेकिन बदकारियाँ इसी तरह
जारी हैं इंसाफ गाहें बनीं। मगर जरायम बदस्तूर मौजूद रहे। अलगर्ज ये दुनिया
कभी सीधी ना हुई है। और ना होगी। इसके सेंकड़ों काम खत्म कीजिए। तो
हजारों और तैयार नजर आयेंगे। पस हमें इसकी नीरंगी से इश्नत हासिल करके
अपनी जिन्दगी को संवारना चाहिए।

हिकायत नम्बर 773 दूरअंदेशी

 

एक शख्स ने एक जगह माल दपन किया। और उस ढक्‍कन रखकर
बहुत सी मिढी ऊपर डाल दी। फिर उसके ऊपर एक कपड़े में लपेट कर
बीस दीनार रखे। और उन पर भी बहुत सी मिढ़ी डाल कर जमा दी और
चला गया। कुछ अर्से के बाद जब उसे अपने माल की जरूरत हुई तो उसने
उस मुकाम को खोद कर देखा तो वो बीस दीनार गायब थे। फिर उसने नीचे
वाली बड़ी मिक्दार का माल खोद कर देखा तो वो बदस्तूर मौजूद था। तो

उसने अल्लाह का शुक्र अदा किया। के उसका ये माल बच्च गया और उसने
(सी अंदेखे की बिना पर ऐसा किया था। के शायद कोई शख्स मुझे माल
(फ्न करते हुए देखता हो तो वो ऊपर वाले बीस दीनार पाकर ये समझे के
इतना ही माल दबाया गया था। और वही लेकर चलता बने। और ज़्यादा माल
की तरफ उसका खयाल भी ना जाए। ( किताब-उल-अजकिया, सफा 20 )

सबक:- दूरअंदेशी व हिकमत से बड़े बड़े फवायद हासिल होते हैं
और इंसान नुक्सानात से महफूज रहता है।

हिकायत नम्बर 774 जोज-उल-कहबा

 

हिन्दुस्तान का एक शायर एक अमीर के पास गया। और उसकी मदह
की। उस अमीर ने ये जानते हुए के शायर अरबी जुबान नहीं समझता कहा
तकुहम या जोज-उल-कृहबती यानी “एक बदकार औरत के खाबिंद
आओ!” शायर ने अमीर से पूछा “जोज-उल-कहबा” का क्‍या मतलब
है? तो अमीर ने कहा के लुगृते अरब में इस अलफाज से उस शख्स को
मुराद लिया जाता है। जो शानदार मर्ततब्रा का हो। और जिसका बड़ा महल
हो। और उसके पास माल और सवारियाँ बहुत हों। और बहुत से उसके
गुलाम हों। शायर ने कहा। तो बल्‍लाह! ऐ अमीर! आप दुनिया के सबसे बड़े
“ जोज-उल-कृहबत” हैं। अमीर ये सुनकर बड़ा शर्मिंदा हु और कुछ ना
कह सका। ( किताब-उल-अजकिया, सफा [5 )

सबक :- किसी से मसखरा पन और इसतहज करना बहुत बुरी बात
है। और इस किस्म की हरकत से आदमी को बअज वक्‍त बड़ी नदामत का
सामना होता है। पस हर शख्स को ऐसी बुरी हरकत से बचना चाहिए।

 

 

 

 

हिकायत नम्बर 875 जमीन का बोझ

 

खलीफा-अल-हुक्म को अपना महल बनवाना था इत्तिफाक से जो
जमीन पसंद की गईं उसमें एक गरीब बेवा का झोंपड़ा आता था। इस बेवा
परे कहा गया के ये जमीन कोमतन दे दे। मगर उसने इंकार किया। खलीफा ने
जबरदस्ती उस जमीन पर कब्जा करके महल बनवा लिया। इस बेवा ने काजी
को अदालत में हाजिर होकर इसकी शिकायत की। काजी ने उसे तसल्ली

देकर कहा के इस वक्त तुम जाओ। मैं किसी मुनासिब वक्त तेरा इंसाफ
फेरने की कोशिश करूंगा। खालीफा अलहुक्म जब पहले पहल महल और
बाग मूलाहेजा करने गया। तो उसी वक़्त काजी भी बहाँ खुद एक गधा और

एक खाली बोरा लेकर गया। और खलीफा से वहाँ से मिट्टी लेने की इजाजत
चाही। इजाजत दी गई। उसने बोरे में मिट्री भरकर अर्ज की। मेहरबानी करके
इस बोरे को उठाने में मेरी मदद की जाए। खलीफा ने उसे एक मजाक समझा।
और बोरे को हाथ लगाकर उसे उठाने की काशिश की। चूंके वजन ज़्यादा
था। खलीफा से जरा भी ना उठा। उस वक्त काजी साहब ने कहा।

“ऐ खलीफा! जब तू इतना बोझ उठाने के काबिल नहीं तो कयामत
के दिन जब के हम सब का मालिक इंसाफ करने के लिए अर्श पर जलवा
अफरोज होगा और जिस वक्‍त वो गरीब बेवा जिसकी जमीन तूने बजोर ले
ली है, अपने परवरदिगार से इंसाफ की ख़्वाहाँ होगी तो इस जमीन के बोझ
को किस तरह उठा सकेगा? ” ।

खुलीफा इस तक्रीर से बड़ा मुतास्सिर हुआ। और फौरन वो महल मओ
तमामा चीजों के उस बूढ़िया को दे दिया। ( मख़्जन अखलाक्‌, सफा 42 )

सबक्‌:- अपनी इमारत और बड़ाई के जौम में कभी किसी गरीब के
हक पर हाथ ना डालना चाहिए। इसलिए के कल कृयामत के रोज खुदावंद
करीम को हर बात का फैसला फ्रमाना हैं और जालिमों को उनके जुल्म
की सजा देनी है। और ये भी मालूम हुआ के नेक दिल हाकिम कृयामत के
होलनाक दिन का खौफ अपने दिल में रखते हैं और उस दिन की सख्ती से
बचने के लिए अदलो इंसाफ से काम लेते हैं।

हिकायत नम्बर 876 एक लाख दीनार

 

एक अमीर आदमी मर गया। तो उसकी विरासत से एक लाख दीनार
उसके लड़के को मिले। लड़का हजरत जलनून मिस्री रहमत-उल्लाह अलेह
के पास आया। और कहने लगा। मैं चाहता हूँ ये एक लाख दीनार आप पर
खर्च कर दूं। हजरत ने फ्रमाया के तू बालिग है या ना बालिग? वो बोला
ना बालिग हूँ। फरमाया के जब तक तू बालिग ना हो ले। तब तक इस माल
का खर्च करना तुझे रवा नहीं।

जब वो लड़का जवान हुआ तो उसने हजरत जलनून के हाथ पर तौबा
की। और वो एक लाख दीवार दुरवैशों पर खर्च कर दिए। एक रोज वो जवान
दुरवैशों के पास आया। इत्तिफाक्‌ से उन दुरबैशों को कोई काम दरपेश था।
जिसमें उन्हें कुछ रकम की जरूरत थी। वो जवान ठंडी सांस भर कर कहने
लगा। के हाय अगर मेरे पास और सौ हजार दीनार होते तो मैं उन सबको भी
उन दुरबैशों पर खर्च करता। हजरत जूलनून ये बात सुनकर समझ गए के वो

असलकार से गाफिल है और उसको नजुर में क॒द्रो इज्जत दरहम व दीनार
की है। आपने उस जवान को अपने पास बुलाकर कहा के फलों अत्तार की
पर जाओ। और मेरी तरफ से कहो के तीन दरहम की फलाँ दवा दे
दो। वो जवान गया और वो दवा लेकर आ गया। आपने फरमाया के उसको
ओखली में डाल कर रगड़ो। और फिर तेल में गूंधथ कर उसकी तीन गोलियाँ
बनाओ। और हर एक गोली में सूई के साथ सुराख करके मेरे पास ले आओ।
उसने ऐसा ही किया। और तीन गोलियाँ तैयार करके ले आया। आपने उन
गोलियों को हाथ में लेकर मला। और इन पर कुछ फूंक दिया। एक दम वो
तीनों गोलियाँ याकृत के तीन टुकड़े हो गए। के कभी इस जवान ने बैसे
ना देखे थे। फिर आपने फ्रमाया के इन्हें बाजार में ले जाओ। और देखो
के क्या कौमत उठती है? लेकिन बेचना नहीं! वो जवान बाजार में गया।
और वो टुकड़े दिखाए। हर एक की सौ हजार दीनार कौमत लगी। वापस
ले आया। और कहा के ये कीमत उठती है। आपने फ्रमाया। अब फिर इन्हें
ओखली में डालो। और इन्हें चूरा चूरा कर दो। और खबरदार! के ये दुरवैश
रोटी पैसे के भूके नहीं हैं। उनके पास सब कुछ मौजूद है। उस जवान की
आँखें खुल गई। और उसकी नजूर में माले दुनिया की कुछ वक॒अत ना रही।
(तज॒ुकरत-उल-औलिया, सफा ॥44 )
सबक :- अल्लाह के बन्दों को बजाहिर मफलूक-उल-हाल देखकर
ये ना समझना चाहिए के उनके पास कुछ नहीं। मगर उनके दिल में माले
गा कुछ भी वक॒अत नहीं होती। और उनका फक्र फिक्र इख़्तियारी
ता है।

हिकायत नम्बर 877 लजीज खाना

 

हजूर जुलनून मिस्री अलेह अर्रहमा ने दस बरस तक कोई लजीज खाना
पनावुल ना फरमाया। नफ़्स चाहता रहा। और आप नफ़्स की मुखालफत
फेरपाते रहे। के मैं अपने नफ्स का कहा हर गिज ना मानूंगा। एक बार ईंद
की ग़त को दिल में कहा। के कल ईद के रोज अगर कोई लजीज खाना खा
लिया जाए। तो कया हर्ज है। हजरत ने अपने दिल से कहा के मैं दो रकअत
पढ़ंंगा। और हर दो रकअत में पूरा कुरआन खत्म करूँंगा। अगर तू इस

में मेरे साथ मुबाफ्कृत करे तो कल लजीज खाना मिल जाएगा। चुनाँचे
दिल ने इस अप्र मुवाफ्कुत की और आपने दूसरे रोज यानी ईद के

रैन लजीज खाना मंगवाया। मिव्यला उठाकर मुंह में डालना ही चाहते थे के

फिर रख दिया और ना खाया। यारों ने इसकी वजह पूछी तो फ्रमाया जिस
वक्त मैं निवाला मुंह के क्रीब लाया तो दिल ने कहा के देखा में आखिर
अपनी दस साल की ख्वाहिश में कामयाब हो ही गया ना! मैंने उसी वक्त
कहा के अगर ये बात है तो मैं तुझे हरगिज कामयाब ना होने दूंगा।
उसी वक्‍त एक शख्स एक लजीजु खाने का तबाक उठाते हुए हाजिर
हुआ। और कहने लगा ये खाना मैंने अपने लिए रात को तैयार किया था।
रात को ख़्वाब में मैंने रसूले करीम सल-लल्लाहो तआला अलेह व सल्‍्लम
की जियारत की। हुजर ने मुझ से फरमाया के अगर तू कल कयामत के रोज
भी मुझे देखना चाहता है तो येटखाना जलनून के पास ले जा। और उनसे
जाकर कह के हे |
हजरत मोहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब सल-लल्लाहो
तआला अलेह व सलल्‍लम सिफारिश करते हैं। के दम भर के लिए नफ्स के
साथ सुलह कर लो। और चन्द निवाले इस लजीज खाने से खा लो।
हजरत जलनून ये पैगामे रिसालत सुनकर वजद में आ गए। और कहने
लगे। मैं फरमाबरदार हूँ। मैं फ्रमाँबरदार हूँ और लजीज खाना खाने लगे।
(त्तज॒करत-उल-औलिया, सफा +%5 )
सबक्‌:- अल्लाह के मक्बूल बन्दे नफ्स के गलाम नहीं होते। और
‘नएसानी ख़्वाहिशात की कुछ भी परवाह नहीं। करते। और वो अल्लाह की
इबादत व इताअत ही में खुश रहते हैं। और उनकी ये शान होती है के अल्लाह
व रसूल की खातिर वो लजायजे दुनयवी से मुजतनिब रहते हैं और खुदा
और उसका रसूल खुद उन्हें खिलाता है। और ये भी मालूम हुआ के हमारे
हुजर सल-लल्लाहो तआला अलेह व सलल्‍लम अपनी उम्मत के हालात से
आज भी बा खबर हैं। द

हिकायत नम्बर 878 हवा

 

हजरत अबु मोहम्मद मुरतअश रहमत-उल्लाह अलेह से किसी ने
आकर कहा। के फला शख्स हवा में उड़ता है। फरमाया के ये कोई कमाल
नहीं। कमाल ये है के नफ्स की हवा की मुखालफत करे। नफ्स की हवा
की मुखालफत करना हवा में उड़ने से कहीं ज़्यादा अफ्जुल व आला है।
( तजुकरत-उल-औलिया, सफा 55)…

सबक्‌:- इत्तिबाओ शरीअत सबसे बड़ा कमाल है। और इत्तिबाओ
शरीअत ही से विलायत हासिल होती है। हवा में उड़ना या पानी की सतह पर

बलना के । ये बातें अल्लाह के मक्बूलों के
याद वकअत नहीँ रखती ० सामने एक खेल

हिकायत नम्बर 879 एक ताजिर

 

एक ताजिर अपने ऊँट पर बहुत सा माल तिजारत लाद कर मिस्र
गया। मिस्र पहुँचा तो वहाँ हजूम में अपना ऊँट मओे सामान के खो
बैठा बड़ा परेशान हुआ। और ऊँट की काफी तलाश की। मगर वो ना
प्रिला। एक शख्स ने उससे कहा के यहाँ एक बहुत बड़े बुजर्ग हजरत
अबु-अल-अब्बास व महूरी हैं। उनकी खिदमत में जाओ। वो दुआ करेंगे।
तो तुम्हारा ऊट मओ सामान के मिल जाएगा। चुनाँचे वो ताजिर हजरत
अबु अलअब्बास की खिदमत में हाजिर हुआ। और अर्ज की। के हजर!
पेश ऊँट मओ सामान के गुम हो गया है। मेरे लिए दुआ फरमाइये। हजरत
ने उसकी इस बात का तो कोई जवाब ना दिया। सिर्फ इतना कहा के
आज हमारे पास दो मेहमान आए हैं। उनके लिए कुछ आटा और कुछ
गोश्त दरकार है। ताजिर ने जब ये सुना। तो दिल ही दिल में कहने लगा।
कमाल है मैं अपना दुख बयान कर रहा हूँ और इन्हें अपने आटे गोश्त
की पड़ी है। बददिल होकर वापस आ गया। और वापस आते हुए उसे
अपना एक मक्‌रूज नजुर आया। जिससे उसने काफी रकम लेना थी। ये
उसके दरपे हो गया। और कहने लगा। आज तू मैं कुछ ना कुछ लेकर ही
छुड़ंगा। उसने साठ दरहम अदा कर दिए। ये ताजिर बाजार गया। और दिल
में कहने लगा के हजरत अबुअलअब्बास ने आटे और गोश्त का कहा
था। रूपे मिल ही गए हैं चलो ये चीजें खरीद लो। और चल कर हजरत
अबु अलअब्बास को दो। या तो सब कुछ मिल गया और या फिर ये साठ
रेहम भी गए। चुनाँचे उसने कुछ आटा, कुछ गोश्त और बाकी पैसे जो
षेचे उनसे कुछ मीठी चीजें भी खरीद लीं। और सब कुछ लेकर हजरत
अबु अलअब्बास के पास जाने लगा। जब हजरत के मकान के करीब
पुँचा तो क्‍या देखता है के उनका ऊँट मओ सामान के उनके दरवाजे
पास खड़ा है ये देखकर वो हैरान रह गया। क्रीब जाकर देखा तो
पाकई उसका अपना ही ऊँट था। और सामान भी सारा मौजूद था। खुशी
पे अन्दर गया। और सब चीजें अबु अलअब्बास के आगे रख दीं। हजरत
देखकर फरमाया। के आटे और गोश्त के अलावा ये चीजें कैसे हैं?
ने कहा। हजर! ये मैं अपनी तरफ से जायद ले आया हूँ। फ्रमाया

मुआहेदे में ये चीजें तो शामिल ना थीं अच्छा। अगर तुम ले आए हो तो
हम भी ज़्यादा कर देते हैं। जाओ अपना सामान मंडी में लेकर जाओ।
और अपना सामान अच्छी कीमत पर बेचो। और किसी दूसरे ताजिर के
आ जाने का खौफ मत करना।

अलबहख फी यमीनी वलबर्स फी शिमाली दरया मेरे दायें हाथ में
और खुश्की मेरे बायें हाथ में है। किस

मतलब ये के जब तक तुम अपना माल खातिर ख़्बाह दामों पर बेच ना
लोगे। दूसरा कोई ताजिर मंडी में ना आएगा। चुनाँचे ये ताजिर मंडी में पहुंचा।
तो और कोई दूसरा ताजिर वहाँ मौजूद ना था। उसने अपना सब माल अच्छे
दामों में बेच लिया। तो फिर देखा के एक दम दूसरे ताजिर भी आ गए। और ये
काफी नफा हासिल करके वहाँ से लौटा। ( रोज-उल-रियाहीन, सफा 200)

सबकः:- अल्लाह वालों की बारगाह में हाजूरी से बड़ी बड़ी मुश्किलें
हल हो जाती हैं। और उनकी किसी बात के मुतअल्लिक्‌ बदगुमानी अच्छी
नहीं। उनकी हर बात में कई भेद होते हैं। और ये भी मालूम हुआ के अल्लाह
वाले अपने अल्लाह की मर्जी के ताबओ होकर सारे आलम पर मुतसर्रिफ हो
जाते हैं। और ये उनकी अल्लाह ही की उन पर अता होती है।

हिकायत नम्बर 880 एक जिन्न

 

हजरत अबु अलफज्ल जोहरी मिस्री अलेह अर्रहमा की एक शख्स ने
बड़ी तारीफ सुनी। और वो उनकी जियारत की नीयत से मिस्र को रवाना
हुआ। जब हजरत की मजलिस में पहुँचा तो क्या देखता है के हजरत ने बड़ा
शानदार लिबास पहन रखा है। और बड़े अमीर नजर आ रहे हैं। उसने दिल
में सोचा के इस क॒द्र दुनयवी शानो शौकत रखने वाला खुदा का बन्दा नहीं
हो सकता। ये सोचकर वापस चला आया। वापसी में एक गली से गुजरते
हुए एक औरत को देखा जो रो रही थी। और बड़ी परेशान थी। उसने वजह
दरयाफ्त की तो बोली के मेरी एक ही नोजवान लड़की है। उसकी शादी का
दिन क्रीब है। और आज अच्चानक उस पर किसी जिन्न का साया हो गया
है। और वो सख्त बीमार है। मैं गरीब औरत हूँ और परेशान हूँ के जिन्न के
कब्जे से वो केसे निकले। उसने कहा। तुम घबराओ नहीं। उसका इलाज मेरे
जिम्मे रहने दो। और चलो मुझे अपनी लड़की के पास ले चलो। चुनाँचे वो
औरत उसे घर ले आई। उसने लड़की को देखा जो अजीब व गारीब हरकात
कर रही थी। उसने क्रआन पाक की आयात पढ़कर उस पर दम करना शुरू

क्रैया। तो जिन्न बजबान फसीह बोला।

“सुन लो मैं उन सात जिनों मे से हूँ जो हजरत अली रजी अल्लाहो अन्ह
के दस्ते हक्‌ परस्त पर ईमान लाए थे। हम सातों आज हजरत अबु अलफजल
के पीछे नमाज पढ़ने के लिए आए थे। वही हजरत अबु अलफजुल जिनके
पुतअल्लिक्‌ तुम अपने दिल में बदगुमानी पैदा करके लौट आए हो। बदनसीब
ते तुम जो लौट आए। हम उनके पीछे नमाज पढ़ने को हाजिर हुए थे। इस
लड़की ने हम पर निजासत फैंकी। मेरे साथी तो बच गए। मगर वो निजासत
पुझ्न पर पड़ी। और मैं नमाज से रह गया। इसी गस्से से मैंने उसे पकड़ा है।
और तुम ने भी जो हजरत अबु अलफजुल के मुताल्ल्कि बदगुमानी की है।
उसका भी मुझे रंज है। तुम तौबा करो। और हजुरत की खिदमत में फिर
हाजिरी दो ” उस शख्स ने कहा। अच्छा मैं सच्चे दिल से तौबा करता हूँ। और
अभी फिर वापस जाता हूँ। मगर तुम भी अब इस लड़की को माफ कर दो।
चुनाँंचे उस जिन्न ने कहा। लो मैं जाता हूँ ये कहकर जिन्न चला गया। और
लड़की अच्छी हो गई। ु

फिर ये शख्स भी वापस हुआ। और हजरत अबु अलफजल की खिदमत
प्रें हाजिर हुआ। हजुरत अबु अलफजूल ने उसे आता हुआ देखकर मुसक्राते
हुए फरमाया। । क्‍

“जब तक जिन्न ने नहीं कहा तुम ने हमारी बुजर्गी तसलीम नहीं की।”
(रोजू-उल-रियाहीन, सफा 45) हर

सबक्‌:- अल्लाह वालों से कभी बदगुनाम ना होना चाहिए। उन
लोगों के दिलों में बहरहाल अल्लाह की याद होती है। और दुनिया से
उनका ताल्लुक महेजु जाहिरी और कई हिकमतों की बिना पर होता है।
और ये भी मालूम हुआ के अल्लाह वालों की मक्बूलियत जिनों में भी
होता है। और ये नफूस कदसिया जिन्नो इंस के मरजओ व मतबूअ होते
हैं। और ये भी मालूम हुआ के अल्लाह वालों पर दिलों के इरादे और
जयालात भी मुनकशिफ हो जाते हैं। जा

हिकायत नम्बर 881 मों का हक

‘ एक शख्स ने अपनी माँ को कंधे पर सवार करके सात हज कराये।
भैतवें हज पर खयाल आया के शायद मैंने हक्‌ मादरी अदा कर दिया। रात
फो ख़ताब में देखा के कोई कह रहा है। सर्दी सख्त थी। तू बच्चा था, माँ के
पैस सो रहा था। तूने पाखाना कर दिया! तेरी माँ ने उठकर जिस्‍्तर धोया,

गुरीबी की वजह से दूसरा बिस्तर ना था। उसी गीले बिस्तर पर कड़कती सर्दी
में लेट गई। और तुझ को रात भर अपने सीने पर लिटाए रखा। तू कहता है
हक्‌ अदा हो गया। ऐ नादान! अभी तो उस एक रात का भी हक अदा नहीं
कर सका। ( तालीम-उल-अखलाक्‌ , सफा 267 )
सबक ः- माँ बाप का बहुत बड़ा हक्‌ है और बाप से भी ज़्यादा माँ
का हक्‌ है। खुश किस्मत हैं वो लोग जो अपने माँ बाप को खिदमत करके
अल्लाह तआला को खुश कर लेते हैं। और ये भी मालूम हुआ के माँ बाप
को जितनी भी खिदमत की जाए कम है।
अदब-उल-अरब
अहले अरब की फुसाहत व बलायत और
जहानत की दो दिलचस्प हिकायतें

 

हिकायत नम्बर 882 अरब का एक मेहमान और एक लड़की

 

अरब का एक शख्स कबीला बनी आमिर की किसी औरत के यहाँ
मेहमान हुआ। मेहमान नवाजी तो अहले अरब के रगो पै में सराईय्यत किए हुए
थी इसलिए खातिर व मदारात में कोई दकीका बाकी ना छोड़ा। इत्तिफाक से
जिस रोज वो जाने लगा। उसकी जुबान से ये शैर निकला के जिसमें कबीला
बनी आमिर की हिज्जो थी।

अशआर का तजुमा इस तरह है

तर्जुमा:- ( ऐ मुखातिब ) मुझ को तेरी जान अजीज की कसम! कबीला
बनी आमिर के बदन पर जब तक उनकी खाल ( सालिम ) रहती है उस वक्त
तक वो ( अपने ) कुर्तों को पुराना नहीं होने देते। यानी बदनी तकालीफ को
वो माली नुक्सान की ब निस्बत बहुत आसान समझतते हैं।

अपने मजाक के मवाफिक्‌ वो इस शैर को आहिस्ता आहिस्ता गुनगुना
रहा था। इत्तिफाक्‌ से इस मेजुबान औरत ने भी सुन लिया। अव्वल तो अश्आर
हिज्जोविया अललअपमूम कत्ल कर देने बाले सलाह से ज़्यादा समझते थे।
और अगर इस पर नजर डाली जावे के कत्ल में तल्फ रूह है। और हिज्जो
में आबरूरेजी। तो एक हद तक ये खयाल फासिद भी ना था। दूसरे मेहमान
नवाजी के पूरे एहसान के बदले में ऐसी सर्दमोहरी काबिले बर्दाश्त भी ना
थी। ताहम उसने जुब्त से काम लेकर अपनी लोंडी के जरिये से मेहमान से
पूछा के मैंने आपकी मदारात और खातिर में कोई कोताही की थी? उसने
कहा के नहीं नहीं हर गिज नहीं। लोंडी ने कहा। के फिर आपको क्‍या जुरूरत

ल्‍ आई के आप इस किस्म के अशआर तसनीफ करें। जिनसे हमारे कबीले
कसरे शान होती है। उसने कहा के मेरी जबान से ये शैर बगैर कसद के
निकल गया। मैंने अमादन ऐसा नहीं किया। लोंडी ने यही जवाब उस मेजबान
औरत को सुना दिया। मेहमान को खयाल था के खुदा जाने ये औरत क्या
बर्षा करेगी। मैं इसी के कबीले में हूँ। अगर उसने अपने कबीले वालों
से कह दिया तो वो मेरी जान के दरपे होंगे। इसलिए चाहता था के जल्द से
जल्द वहाँ से रवाना हा जावे। थोड़ी देर ना गुजरी थी के एक नो उप्र बच्ची
को देखा। के वो कमान से निकल कर बाहर आईं। और उस मेहमान के पास
बैठकर इधर उधर की बातें करने लगी। उस लड़की की बातें कुछ ऐसी प्यारी
प्यारी थीं। के वो शख्स उसकी बातों में अपने उस खौफ को भी भूल गया।
जो अभी थोड़ी देर हुई के उसको जल्द रवाना हो जाने पर मजबूर कर रहा
था। जब उस लड़की ने अपनी खुदा दाद फिरासत से मालूम कर लिया के
प्रेहमान अब मुतमईन हो गया है तो बातों बातों में उससे दरयाफ्त किया। के
ऐ इब्ने अम ( चचा जाद भाई ) आप किस कबीले के हैं। जवाब दिया के मैं
कबीले तमीम का एक शख्स हूँ। |
लड़की:- क्या आप उस शख्स को जानते हैं के जिसके ये शौर हैं।
. लड़की के अजश्ञआार का तजुमा
कबीला तमीम को कृता( एक जानवर का नाम है जो पानी का पता
लगाने में जर्ब-उल-मिस्ल है ) ह
से ज़्यादा दनाईय्यत और कमीना पन का रास्ता मालूम है और अगर वो
इज्जत और शराफत के रास्तों पर चलते तो ( यक्कीनन ) गुमराह होते।
लड़की के अश्ञार का तजुमा
मैं देखता हूँ के रात के जुलमत को दिन दूर कर देता है( मगर ) मैंने
जिल्लत और रूसवाईयों की आदतों को तमीम से अलेहदा होते हुए कभी
नहीं देखा।
लड़की के अश्आर का तर्जुमा
(उनकी नामर्दी इस हद को पहुँच गईं है के! अगर कोई मच्छर जूं की
पीठ पर ( सवार होकर ) कबीला-ए-तमीम की दोनों सफों पर हमला कर दे
उनको बजुज भागने के और कुछ भी बन ना पड़े। क्‍
लेड़ेकी के अआआर का तजुमा…_ ही न
धूंग अगर कबीला-ए-तमीम मओ अपनी तमाम जमातों के किसी बंधी हुई
चूँटी पर हमला कर दें तो वो च्यूंटी ( भी ) उनको कूलील समझे।

लड़की के अहआर का त्जुमा
कबीला तम्राम गथे के बदत्तर और जुलील बच्चे की तरह है के अपनी
माँ का दूध पीता है। और अगर इधर उधर हो जाती है तो बहज्जार जिल्लत
उसके पीछे पीछे लगा रहता।
लड़की के अजआर का त्जुमा |
हम ने ( मेहमान नवाजी में ) जानवर जिबह किए और उन पर खुदा का
नाम लिया। लेकिन कुबीला-ए-तमीम ने एक दिन भी जिबह ना किया। के
उनको बिस्मिल्लाह अल्लाहू अक्बर कहने की नोबत आती।
अगरचै छोटी लड़की के सवाल का जाहिरी मनशा उस शायर का नाम
मालूम करना था। मगर मेहमान ऐसा बेवक्‌फ ना था के लड़की के अलफाज
का मतलब यही समझता। वो समझ गया के उससे लड़की का मनशा क्‍या
है। और अगरचै ये अशआर इस खूर्द साल लड़की की बदीहा गोई और तेजी
तबओ का नतीजा थे। मगर मेहमान को ये खयाल हुआ के किसी शख्स ने
कूबीला तमीम की हिज्जो की है जो इस क्‌द्र मश्हूर हुई के बच्चे बच्चे की
जुबान पर है। जिल्‍लत के खयाल से कांप गया। सर से पैर तक पसीना पसीना
हो गया। और जिल्लत से बचने क्री कोई तदबीर बजुज उसके समझ में ना
आईं। के अपने बयान का इंकार करे। चुनाँचे उसने उन अश्आर को सुनकर
घबरा कर कहा। अजीज बहन! मैं सफर की तैयारी में मसरूफ था। तुम ने
मेरे कूबीले का हाल दरयाफ्त किया। मेरा दिल तो सामान सफर में मशगल
था। जुबान से बे इख़्तियारी में निकल गया के मैं कबीले तमीम का शख्स
हूँ। वरना हक्कोकृत ये है के मेरा नसब कबीले तमाम से नहीं मिलता है। ना
मैं इस कबीले में से हूँ।
लड़की:- झूट से ज़्यादा शर्मनाक चीज खुदा की पैदा की हुई चीजों में
से बमुश्किल मिल सकेगी। अच्छा! अगर आप क्‌बीले तम्ीम में से नहीं हैं तो
फिर किस क्‌बीले से हैं?
मरेहमान:- अजीज बहन! खुदा की कसम मैंने जो कुछ कहा। सच कहा।
मुझ को जुरूरत क्‍या थी। के मैं झूट की निजासत से अपनी जबान को आलूदा
करता। शायद तुमने सुना होगा के अरब में एक बहुत ही जी इज्जत कुबीला
बनी जुबा के नाम से पुकारा जाता है। में उसका एक शख्स हूँ। मुमकिन है
के तुम ने उसके वो औसाफ और मफाखिर बवजह कम सुनी और दूर होने
के ना सुने हों जिनको अरब को छोटा बड़ा जानता है। लेकिन गालिबन नाम
जुरूर सुना होगा। ।

लड़की:- आपने बजा फरमाया। मैं चन्द शैर और पढ़ें क्या। आप
अबराहे करम बतला सकेंगे के ये शैर किस के हैं? ५५
_ लड़की के अहआर का तजजुमा
जबा का हर हर शख्स दनाईय्यत की वजह से नीलगूं चश्म है।
मेहमान ने जब शैर सुना तो दिल में अपने आपको खुद ही मलामत
करने लगा। के ख़्वाह-म-ख़्वाह झूट भी बोला। और काम भी ना चला।
अगर नाम लिया ही था तो किसी ऐसे कबीले का नाम लिया होता जो
ऐस्ता जुलील तो ना होता के उसकी हिज्जो के अश्आर बच्चा बच्चा की
जुबान पर हैं। उस लड़की की भी कुछ उम्र है? इस कूबीला-ए-बनी जबा
की दनाईय्यत यहाँ तक तो पहुँच गई के उसकी हिज्जो के अशआर इस
बुर्द साल लड़की के कानों तक पहुँच गए। अब मैं किसी मुंह से कहूंगा
के मैं इस क्‌बीले का नहीं हूँ। उसने मेरे पहले इंकार ही की कब तसदीक्‌
की थी जो अब करेगी। लेकिन ये जिल्लत तो काबिले बर्दाश्त नहीं के मैं
ऐसे कूबीले की तरफ मनसूब हूँ। जिसकी हिज्जोयों जबान जद हो और
सब्कृत लिसानी तो आखिर बड़े बड़े फुसहा और बलगा से हुआ करती
है। अगर मैं भी सब्कृत लिसानी का एत्राफ कर लूंगा तो कौन सा गुनाह
है।ये खयालात थे। जो मेहमान के दिल में आन की आन में बिजली की |
तरह इधर से उधर तक दौड़ गए। और जरा सी देर में इज्जत के खयाल
गे ये फैसला सुना दिया। के इस जिल्लत से झूट अच्छा है। इसलिए उसने
लड़की से नदामत आमेज लेहजे में कहा।
अजीज बहन! अब तो गालिबन तुम को यकीन आ गया होगा के मैं
‘पैफर के सामान और उसके इन्तिजाम में ऐसा अजुख्रुद रफ़्ता हो रहा हूँ। के
भृबान गोया मेरे काबू ही में नहीं। देखो फिर मुझ से गूलती हुईं किस कुबीले
का नाम लेना चाहता था। और किस कबीले का नाम जबान से निकल गया।
भला! मुझ को बनी जूबा से क्‍या ताललुक शायद तुम को यकीन ना आवे।
पगर मैं खुदा की कुसम कूबीला बनी जबा में से नहीं हूँ।
लड़की :- “नहीं नहीं।” मैं आपको दरोग गो खयाल नहीं न हूँ
बेशक ऐसा इत्तिफाक होता है के बअज मर्तबा इंसान कहना कुछ
और निकलता कुछ है। मगर मैं भी चाहती हूँ के आपके कबीले का
पही हाल मालूम करूं। तो फिर आप किस कबीले में से हैं।?
भेहमान:- ( दिल में ) इस मर्तब/ किसी कबीले का नाम लेना
फेजो शराफत और हज़्जत में अपनी नजीर आप हो। किसी शख्स ने

हिज्जो की हो ( लड़की से ) बहन! मैं कुबीला बनी अजल का हूँ और ये वो
कबीला है के जो शरफ्‌ और इज्जूत….. ५
लड़कीः- ( बात काट कर ) हाँ मैं इस कबीले को खूब जानती हू।
खसूसन इस वजह से और भी जानती हूँ के इसकी निस्‍्बत दो शैर मुझ को
याद हैं। मेरा दिल चाहता है के मैं मालूम करूं के ये दोनों शैर किसने तसनीफ
किए हैं।
लड़की के अश्ञार का तर्जुमा पदक
मैं (शरीफ ) लोगों को देखता हूँ के वो. अताऐ कसीर ( मोहताजों
और मसाकौन को ) तकसीम किया करते हैं और कुबील-ए-बनी अजल
की अता सिर्फ तीन और चार ही पर मौकफ रहती है। ( यानी बहुत ही
कलील-उल-खैर लोग हैं। )
लड़की के अश्भार का तजुमा
जब कबीला बनी अजल का कोई शख्स जमीन ( के किसी हिस्से ) में
मरता है तो बवजह जलील होने के ज़्यादा ( जमीन की जूरूरत नहीं होती )
उस जमीन में सिर्फ एक हाथ और एक उंगली ( के बराबर ) खत खींच कर
उसमें ( दफ्न ) कर दिया जाता है। |
इन शैरों को सुनकर मेहामन की तो ये हालत हो गई के काटो तो लहू
नहीं बदन में। हैरत से लड़की का मुंह तकने लगा। और दिल ही दिल में कहने |
लगा के इस लड़की से मैंने झूट बोल कर कहा के मैं कुबीला बनी अजल का’
हूँ और कबीला-ए-बनी अजल की जो कुछ इज्जत और वक्‌अत यहाँ है। वो
मोहताज बयान नहीं। इन शैरों से जाहिर है के अगर लड़की ने घर बालों से
जाकर कहा। के हमारा मेहमान कुबीला-ए-बनी अजल का है तो इसमें मेरी
किस क॒द्र जिल्‍लत होगी। और यहाँ वाले मुझ को कैसे हिकारत की नजर से
देखेंगे। लेकिन! आखिर चारह-ए-कार क्या है। कई मर्तबा तो झूट बोल चुका
हूँ। अब ये लड़की क्‍यों यकीन करने लगी। खैर! अगर यक्वीन ना करेगी तो
ना करे। लेकिन मुझ को तो इंकार कर ही देना चाहिए। ये सोच कर कहने
लगा। बहन! इस मर्तबा या तो तुम ने गौर से सुना नहीं और या मुझ से फिर
नाम लेने में गलती हुई। मैं तो इस वक्‍त ऐसी मुजुतरिब हालत में हूँ के अगर
कोई मुझ से मेरा नाम भी पूछे। तो शायद उसके जबाब में भी मुझ से गलती
हो जावे। अगर तुम को मेरे कबीले का हाल ही मालूम करना है तो जरा गौर
से सुनो! मैं कुबीला-ए-अज्द का रहने वाला है।….. क्‍
लड़कीः- आपने बजा फरमाया। इस कबीले का हाल तो हमारा बच्चा

बध्व जानता है। इस कबीले के बारे में मुझ को भी दो शैर याद हैं। अगर
आप उनको सुनने का वादा करें तो मैं आपको वो अहआर सुना दूं। जिसमें
(प कबीले का जिक्र ख़ैर किया गया है? लेकिन अगर आपको न अश्ञआर
के मुसन्रिफ का नाम मालूम हो तो बताने में दरीग ना फरमावें।

मेहमान ये मालूम करके के फिर ये शैर पढ़ेगी। दिल में तो थर्रा उठा
और कहने लगा। के ऐसा ना के कबीला अज़्द की हिज्जो के अश्आर भी
उसको किसी ने याद करा दिए हों। ताहम बजाहिर अपना चहरा बेखौफों और
मुतमईनों का सा बना कर कहने लगा। के बहन! तुप जरूर अश्आर सुनाओ।
पेश दिल भी यही चाहता था के तुम मुझ को शैर सुनाओ। मुझ को अगर इस
शायर काहाल मालूम होगा तो यकीन जुरूर और मुफस्सिल बयान करूंगा।

लड़की तो इजाजूत की मुंतजिर थी। फौरन उसने शैर निहायत खुश
आवाजी से पढ़ना शुरू कर दिए।

लड़की के अश्आर का तर्जुमा

तर्जुमा:- कबीला अज्द की कोई औरत खतान से नहीं घबराई और
ना उस औरत को तआक्कब किए हुए शिकार का गोश्त कभी नसीब हुआ
(यानी शिकार करना बहादुरों का काम है। और उनके मर्द बुज॒दिल और
नाम्द हैं। के किसी शिकार का तआक्कूब करके शिकार नहीं करते हैं। के
उनकी औरतें उनको खावें ) ना कोई शिकारी उसके खैमों में शिकार का
गोश्त कभी लाया। ( यानी अगर कुछ भी इज़्जतदार होते तो बतौर तोहफा
और हदिया ही के उनके यहाँ गोश्त शिकार का आ जाता। मगर उनको ये भी
नसीब नहीं ) और ना उसने मछली की खाल के जुर्फ में कोई चीज पी ( इस <
किस्म के नफीस बर्तन अरब के शुरफा में हुआ करते थे )

मेहमान इन अश्आार को सुनकर बिलकुल ही सटपटा गया। और
दिल में कहने लगा के ये किस्सा है? मैं छांट छांट कर ऐसे ऐसे कबीलों
का नाम ले रहा हूँ। के जिनकी इज्जत फख़, शौहरत तमाम अरब में
गर्ब-उल-पिस्ल है। और ये नो उप्र लड़की उसके हिज्जो के अशआर पढ़

है। क्या इस खानदान के लोगों ने उसको बचपन ही से कबायल
अरब की हिजोया अएआर याद करा दिए हैं। क्या उसके यहाँ इसी की
गालीम दी जाती है। और अगर ये नहीं तो आखिर वो कौन जालिम था।

इस बच्ची को इस किस्म के अ9आर याद कराये? इस बाए जा का

पैक्त तो ऐसा था के उसको उम्दा उम्दा अखलाकी अएआर सिखाए जाते
‘हेजीब की देवी बनाया जाता। वो वो तरीके सिखाए जाते के

ये खाविंद के दिल पर काबू पा सकती। ये भी कोई तालीम है। के इस
किस्म के अशआर से उसके पाक और मासूम जेहन को आलूदा किया
गया है। मगर कहीं ऐसा तो नहीं के ये लड़को खुद ब खुद इन अएआर
को तसनीफ कर लेती हो। अगर ऐसा है तब तो ये लड़की गजब की
जुहीन और जुकी होगी। लेकिन इसकी उम्र तो इस काबिल मालूम नहीं
होती मुझ को इस उधैड़ बुन में बहुत देर हो गई। ये लड़की अपने दिल
में खयाल करती होगी के मैं इसी मज॒मूम कुबीले का हूँ। मेरा इस कूद्र
तबील सकूत अपनी जिललत के इक्रार का काम देगा। मुझ को जल्द
इंकार करना चाहिए। ये खयाल आते ही बोला। बहन! तुम ने अएआर
तो निहायत ही फसीह और बलीगृ याद कर रखे हैं। मगर हकीकत ये है
के मैं भी तुम्हारा इम्तिहान ही कर रहा था। के तुम को कुबायल अरब
की तहकीक है। या और लोगों की तरह सिर्फ जाहिरी शौहरत पर ही
‘इक्तिफा कर लिया है। सो बहम्दुलिल्लाह! तुम को कृबायल अरब की
असली कैफियत का सही इल्म है। और उनके मुतअल्लिकु अशआर खूब
याद हैं। तुम चूंके खुद समझदार हो। इसलिए तुम से ये उम्मीद बेजा नहीं
के तुम खुद मेरे अंदाज से समझ चुकी हो के मैंने अपने कबीले का सही
नाम ना बता कर अपना नसब छुपाने की जो काशिश की थी इससे यही
मक्सूद था के तुम्हारी तहकीकात का हाल मालूम कर सकूं। अब सुनो!
मैं कुबीला बनी अबस का एक शख्स हूँ।

लड़की ने इस तमाम तकरीर को बगौर सुना और यही नहीं के जुबान से
उसकी तकजीब या तसदीक नहीं की बल्के अपने चहरे से भी ऐसे आसार
जाहिर ना होने दिए। के मेहमान की मुतजस्सुस नजरें उसको मालूम कर
सकतीं के लड़की ने मेरी इस राम कहानी को सच्चा समझा या झूट। और
तक्रीर खत्म हो चुकी तो अपने पहले से मुसतफसराना अंदाज पर पूछा। के
जब आप बनी अबस के कूबीले में से हैं। तो ग़ालिबन ये मालूम होगा के ये
शैर किस का है और शायर ने उसको क्‍यों नज़्म किया था?

लड़की के अश्आर का वर्जुमा

जब कबीला बनी अबस की किसी औरत के कोई बच्चा पैदा हो तो
उसको खुशखबरी दे दो। के उस बच्चे के पैदा होने से उसकी दनाईय्यत में
और इजाफा हो गया। हि

मेहमान ने झूट बोलने के जितने तरीके थे। सब खृत्म कर लिए थे और
बात बाकी ना थी के उसकों कहता। हया व नदामत की वजह से जमीन में

 

डा जाता था। दिल चाहता था के इस बच्ची के सामने से उठ कर चल दे
प्रगर जानता था के उसमें रही सही जिललत होगी। घबरा कर कहने लगा के
बहन! मैंने कुबीला जनी अबस का नाम नहीं लिया था। बनी फजारह कहा
था। मैं तो कुबीला-ए-बनी फजारह का एक शख्स हूँ। कुबीला-ए-बनी अबस
तो मुझ से कोसों दूर है।

लड़की:- आपने बजा फ्रमाया। मुमकिन है के मुझ से सुनने में या आप
से कहने में गलती हुईं हो। ये कुबीला-ए-बनी फजारा वही कबीला तो है
के जिसकी निसबत किसी शायर ने ये शैर कहा है। आपको तो मालूम होगा
के किस का है।

लड़की को अह9आर का तजुमा

तर्जुमा:- अगर तुम कूबीला-ए-बनी फजारह के किसी शख्स के पास
जाओ तो वहाँ जाकर अपनी ऊँटनी ( के खोए जाने पर ) मुतमईन ना हो
जाना और उसको रस्सियों से खूब बाँध देना। ( वरना चूंके बखिलाफ आदत
अरब कुबीला-ए-बनी फजारह के शख्स मेहमानों के साथ गद्दारी करते हैं।
और उनके मालों को खुर्दबुर्द कर जाबेंगे। और तुम हाथ मलते रह जाओगे। )

शैर कया था के मेहमान के खुरमने अकल के लिए बर्क था। होश व
हवास जाते रहे। हैरत से लड़की का मुंह तकने लगा। दिल ही दिल में कहने
लगा के लड़की तू हर्फों की बनी हुई मालूम होती है। किस ढिटाई से पूछती
है के ये शैर किसका है। हालाँके मक्सूद मुझ को जुलील करना है। और जरा
उसके चहरे पर नजर डालो तो मुसकुराहट के आसार भी मालूम नहीं होते।
मालूम है के वाकई उसको दरयाफ्त ही करना मक्सूद है। अच्छा इस मर्तबा
मैं ऐसे कुबीले का नाम लूं के उसकी हिज्जू किसी शायर ने की ही ना हो।
अब झूट बोला है। तो इस लड़की को भी आजिज कर देना चाहिए। ये सोच
कर बोला। के नहीं खुदा की कसम! मैं कुबीला बनी फजारह का नहीं हूँ।

लड़की:- बजा फरमाया। तो फिर आप किस क्‌बीले के हैं?

मेहमान:- बहन! मैं कबीला बजीला का एक शख्स हूँ।

लड़की:- आपको मालूम है के ये शैर किस के हैं?

लड़की के अछआर का तजुमा

तर्जुमा:- जब ( हमारे सामने ) कुबीला बजीला ( की जमात य्् आई तो’
हमने उसके हाल हाल की तफ्तीश की ताके वो बतला दे के उसके
ने उसको किस जगह से करीब किया है। तो जब हम ने तफ्तीश की
केबीला बजीला की जमात ( ये भी ) ना बता सकी के उसका नसब क्‌

(सरदार कुबीला का नाम है ) से मिलता जुलता है या नजार। ( दूसरे कबीले
के सरदार का नाम है ) तो कुबीला बजीला को जमात दरमियान ही में रह
गई ( ना इधर ना उधर ) और वो ( अपनी जमात से इस तरह ) निकाल दी
गई। जिस तरह लगाम उतार कर फैंक दी जाती है।

मेहमान:- ( दिल में ) खुदाया ये क्या मुसीबत है के अरब का कोई
कबीला इस खुर्द साला बच्ची की जूबान जोरी से बचा हुआ नहीं है। मुझ
को कृबीला का नाम सोचने में देर लगती है और उस.फो बे मुहाबा शैर पढ़
देने में देर नहीं होती। ( लड़की से ) खिलाकु आलिम की कसम! में कबीला
बजीला में से नहीं हूँ।

लड़की:- तो फिर आप किस कूबीले के हैं?

मेहमान:- मैं कूबीला बनू नमीर का एक शख्स हूँ।

लड़की:- ग्रालिबन ये शैर तो आपने सुने होंगें आपको मालूम है के शैर
किस के हैं।

लड़की के अहझआर का वर्जुमा

तजुर्मा:- कुबीला बनी नमीर के किसी शख्स से मुखातिब होकर कहती
है तू अपनी नजर नीची कर ( यानी जिल्‍लत के साथ चल ) इस वास्ते के तू
क्‌बीला बनी नमीर का है। ( कुबीला बनी नमीर बबजह जिल्लत के नजर उठा
कर चल नहीं सकता है ) पस ना तो ( बवजह दनायईय्यत के ) तो कबीला
कअब तक पहुँच सका। और ना कुबीला कलाब तक। और अगर बनी नमीर
के सरयन लोहार की भटट्टी के छूटे हुए जुंग पर रख दिए जाबें तो बवजह
हरारत के वो जुंग पिघल जावे ( रसयन की शिद्दत हरारत खून की खराबी
पर दलालत करती है।)

मेहमान के अब होशो हवास मख़्तल हो चुके थे। अक्ल काम ना करती
थी झूट बोलते बोलते और उसके असबाब बयान करते करते वो आजिज
आ गया था। ये भी समझ चुका था के लड़की मेरी तकजीब के दरपे नहीं है।
मुमकिन है के दिल में मेरे कहे हुए की तसदीक ना करती होती। मगर जुबान
से तकज़ीब भी नहीं करती है। इसलिए बगैर किसी तमहीद के साफ इंकार
कर गया और निहायत ढिटाई और जुर्रात से कहने लगा। खुदा की कसम!
मुझ से और कबीला बनू नमीर से कोई ताल्लुक नहीं। ना मैं उनके सिलसिले
नसब में दाखिल हूँ। क्‍

._लंड्की:- अगर आप कबीला बनू नमीर में से नहीं हैं तो आखिर किस

कंबीले में से हैं?

 

मेहमान:- ( दिल में ) मैंने मौअज््जिज मौअज्जिज कृबायल अरब के
नाम लिए। मगर चूंके उनको छोटे बड़े लायक नालायकु, हर तरह शख्ों से
सबका पड़ता है। इसलिए उनको अगर सो अच्छा कहते हैं तो दो चार बुरा
भी कहते हैं। इस मर्तबा ऐसा नामा बताना चाहिए के वो ऐसा बदत्तर और
कमीना फिर्का हो के हिज्जो करना तो दरकिनार कोई उसको मुंह भी ना
लगाता हो। ( थोड़ी देर दूर सोच कर दिल ही दिल में ) बस! ठीक है। यही
कह दूं के मैं कूबीला बनू बाहला में से हूँ ये तो ऐसा कमीना फिर्का है के
इसी की निस्बमत किसी दिल जले ने कहा है के

मेहमान के अहआर का तजुमा |

तर्जुमा:- ( बनू बाहला कमीने पन में इस दर्जे को पहुँच गए हैं के ) अगर
किसी कुत्ते को बाहली कहकर पुकारा जाए तो वो भी उस पर बावेला मचाने
लगे के मुझ को गाली दी गई।

लेकिन अगर यही शैर उसको भी याद हो तो क्‍या होगा? नहीं नहीं।
किसी ने तफरीह तबओ के तौर पर उसको मौअज़्जिज कृबायल की हिज्जो
के अश्आर याद करा दिए हैं। इस कूबीले बने बाहला की उसको खबर भी
ना होगी। और अगर बिलफर्ज उसको खबर हो भी तो फिर मैं इंकार कर
दूंगा। लड़की तो मेरे इस इंकार पर कुछ कहती नहीं जब ये खयालात दिल
में आ चुके और कुल्ब ने यही फैसला किया तो कहने लगा के वल्लाह! मैं
बनू बाहला में से हूँ। |

लड़की:- इस मर्तबा तो आप बहुत देर तक खामोश रहे। में समझी के
शायद मेरी समओ खराशी बार खातिर गुजारी। इस मर्तबा गालिबन आपने
सोच कर बताया है और ठीक बताया होगा।

मेहमान:- (ये समझ कर के लड़की इस हिज्जो में कोई शैर नहीं पढ़
सकी। दफओ अलवदक्ती कर रही है ) हाँ हाँ! मेरी बहन में 2
बनू बाहला में से हँ इससे कम्बख़्त नाम ही याद ना आता था।
तमाम नाम याद आया है।

लड़की:- बजा फरमाया। आप जानते हैं के ये शैर किस के हैं।

लड़की के अह_आर का वजुमा

जिस वक्‍त असबाब शरफ्‌ व फख़ की तरफ शरमाऐ कौम तेजी
साथ चलते हैं तो ( उनके हमराह होना या पीछे चलना तो दरकिनार
का शख्स मजमओ से भी दूर हो जाता है। . ह

लड़की के अशआर का वर्जुमा

 

और जब किसी बाहली शख्स की बीबी कोई लड़का जनती है तो
नालायकों और नाकिसों के अदद में इजाफा हो जाता है। और अगर
( खुदानख्वास्ता ) तख़त खिलाफत पर कोई बाहली शख्स काबिज हो जाए।
तब भी ( बावजूद इस रफ्‌अत क॒द्र के ) श्रफा कौम का मुकाबला बुलंदी
मर्तबा में ना कर सके और बाहली की आबरू अगरचे वो इस पर बड़ी सख्त
निगहबानी करे मगर इस रूमाल की तरह है, जिससे खाना खाने की बाद
हाथ मुंह पोंछा जाता है। ( यानी जलील है )।
मेहमान इधर तो हिज्जो के अ!ःआर और वो भी एक खुर्द साला लड़की
की जबान से सुनकर नदामत की बजह से जमीन में गढ़ा जाता था। इधर ये
खयाल के लड़की अपने दिल में जुरूर झूटा खयाल करती होगी, उसके सर
को ऊपर ना उठने देता था। इस पर ये खयाल उसके ९.७ और भी सोहान
रूह हो रहा था के अगर कोई तीसरा शख्स किसी जगह छुप कर सुन रहा हो
के में अपने नसब के सिलसिले में इस कुद्र कुबीलों को दाखिल कर चुका
हूं और कसमें खा खा कर इंकार कर देता हूँ तो वो यकौनन मुझ को हरामी
खयाल करेगा। और बिलफर्ज कोई शख्स हम दोनों की ये बातें इस वक्त
ना सुनता हो। मगर जब ये लड़की घर में जाकर इस का जिक्र करेगी तो जो
सुनेगा वो हरामी ही कहेगा। उस वक्त मैं अपने मेजबानों की नजर में कंसा
ख़्यार और जलील होंगा। और उसको भी जाने दो ये लड़की भी किसी से ना
कहेगी। मगर डूब मरने की बात तो ये है के ये खुद अपने दिल में मेरी निसबत
क्या खयाल कायम कर चुकी होगी। लेकिन ये सब कुछ सही। उसके सिवा
और चारा भी तो नहीं है के मैं इस नसब का इंकार कर दूं। गैरत की वजह
से आवाज तो निकल ना सकी बहुत दबी हुई आवाज से कहा खुदा शाहिद
है के मैं कूबीला बाहला से नहीं हूँ।
लड़की:- तो फिर आप किस क्‌बीले के हैं?
मेहमान:- मैं कूबीला सकीफ का शख्स हूँ।
लड़की:- आपको मालूम है के ये शैर किसके हैं?।
लड़की के अहआर का तजुमा
जिस क॒ट्र कुआयल अरब का नसब हम को मालूम है उनमें सबसे ज़्यादा
गुमराह कबीला सकीफ है। इस वास्ते के उनका कोई बाप ही सिवाए गुमराही
के नहीं है। अगर उनका नसब किसी से मिलाया जावे या ये खुद नसब में
अपना ताल्लुक किसी से जाहिर करें। तो यक्रोनन ये मुहाल है ( इस बास्ते के
ये लोग बे नसब हैं ) ये लोग पाखानों में रहने वाले सुबर हैं तो तुम इनसे खूब

अच्छी तरह से क॒त्लो किताल करो क्‍योंके उनके खून तुम्हारे लिए हलाल है।

मेहमान इन अश्आर को सुनकर दिल में कांप उठा और घबरा कर कहने
लगा के “नहीं नहीं” खुदा की कसम! मैं कुबीला सकीफ में से नहीं हूँ।

लड़को:- तो फिर आप किस कबीले के हैं?

मेहमान:- मैं कूबीले सनीह का एक शख्स हूँ

लड़की:- आपको मालूम है के ये मिसरआ किस का है?

लड़की के मिश्ने का तजुमा

_ अल्लाह तआला कबीला सनीह के इजतमे को मुतफर्रिक्‌ कर दे।”

मेहमान जिस हालत में मुबतला था। उसको वही खूब जान सकता था।
लड़की कांटों के झाड़ की तरह उसको चिमटी हुई थी। और वो किसी तरह
राह गुजीर ना पाता था। मजबूर होकर फिर उसने वही अपना पुराना राग
अलापा और कहने लगा। अपनी जान अजीज को कसम! मैं तो कबीला
सनीह से नहीं हूँ।

लड़की:- तो फिर आप किस कूबीले के सिलसिले नसब में दाखिल हैं?

मेहमान:- सच पूछो तो मैं कुबीला खजाआ में से हँ।

लड़कीः- तब तो आप मेरी इस तमन्ना को पूरा कर सकेंगे के मैं इन शैरों
के शायर का नाम मालूम करती। क्या आप बता हेंगे।

लड़की के अःआर का तजुमा

अगर कबीला खजाआ किसी मजलिस में शेख, बगारना चाहें तो सिर्फ
उनकी शेखी शराब के पीने पर मुनहसिर होती है। उन्होंने अजराहे जहालत
खाने खुदा को शराब की एक मश्क के अवज में बेच डाला। बदकारी पर
फख करने वाले ये लोग बहुत बुरे हैं ?।

मेहमान की जबान से कबीला खजाआ का नाम निकलने को निकल
‘या। मगर लड़की ने अश्आर में इस कूबीले के ऐसे ऐब को जाहिर किया के

मेहमान अज सरतापा बहर नदामत में गृक हो गया। खुद ही अपने आपको

मलामत करता था। के आज मेरी हालत क्‍या हो गई है। के जिस कबीले
‘ नाम लेता हूँ वो इस कबीले से दनाईय्यत में बदर्जहा बढ़ा हुआ होता हे।
जिसका नाम मैंने पहले लिया है। क्या अरब के गैर महसूर कबायल में से
फोड़ ऐसा कूबीला इस वक्‍त मुझ को याद ना आवबेगा। जिसने उमूर शनीया
फा इर्तिकाब ना किया हो और उसकी हिज्जो ना की गईं हो? आज मेरे
ऐफ्जे को क्या हो गया। बिलआखिर सोचते सोचते ये कहा के मैं कबीला |
पेनी बरश्कर से हूँ।

 

 

 

लड़की ने अब इस तरफ्‌ इलतिफात करना भी छोड़ दिया था के मैंने
जो कुछ कहा। सच है या झूट। पहले क्या कहा था। अब क्या कहता हैः
उसके चेहरे के अंदाज से ये बात मालूम होती थी। के वो सिर्फ मेहमान से
कबीले का नाम सुनना चाहती है। और बस! इधर मेहमान ने ये कहकर के
मैं फलाँ कबीले का हूँ। अपनी बात खत्म की के लड़की ने अश्आर पढ़ना
शुरू कर दिए। और अगरचै मक्सूद उसका बजुज उसके और कुछ ना होता
था के मेहमान ने जिस कबीले का नाम लिया है उसकी हिज्जो करे। लेकिन
जाहिर ये करती थी के वो इस शैर को नज़्म करने वाले का नाम मालूम
करना चाहती है। मेहमान के इस कलाम को सुनकर फौरन बोली! के आप
को मालूम है के ये शैर किसके हैं?

लड़की के अज्झार का तजुग्ा द

कबीला बनी यश्कर ( दनाईय्यत और कमीना पन में इस दर्जे को पहुँच
गया है के ) अगर अपनी तबीयत को वफाऐ अहद पर मजबूर करना चाहे
तो ) बफा करने पर कादिर नहीं। और ( चूंके ऐब करने को हनर चाहे ) अगर
वो बेवफाई करना चाहे तो बेवफाई करना भी नहीं जानता है। कबीला यश्कर
ऐसा कुबीला है के उसकी जिन्दगी सिर्फ रहने में खृत्म होती है ये लोग खुद
जुलील और उनकी जड़ बुनियाद भी जुलील है।
न मेहमान: – ( बहुत जल्दी से ) खुदा की कसम! मैं कबीला यश्कर से

हूँ।

लड़की:- तो फिर आप किस कबीले से हैं?

मेहमान:- मैं बनी उमय्या के कबीले में से हूं

लड़की:- तो गालिबन आप इस शख्स को जानते होंगे जिसके ये शौर हैं?

लड़की के अहआर का तजुमा

कबीला बनू उमय्या की शरफ्‌ और इज़्जृत की बुनियादें मुतज॒लजिल
हो गईं इसलिए आम आदमियों में उनका नैस्त व नाबूद हो जाना एक मामूली
बात हो गई और गुजिश्ता जुमाने में बनू उमय्या की सतबत उनको खुदा के
मुकाबले में भी बेबाक बनाए हुए थे। तो ना आले हर्ब ने खुदा की इताअत
की ना उनके मर्दों ने खुदा का खौफ किया।

लड़की ने तो इस पर सवाल करना भी छोड़ दिया था। के उसके कौल
में तदाफओ हो रहा है। कभी किस कबीले की तरफ। हाँ! मेहमान अव्वल
अव्वल बहुत परेशान हुआ था। मगर अब इस कुद्र झूट बोल लेने के बाद
उसको भी खुद अपने मुंह अपने कौल को रद करते हुए शर्म मालूम ना होती

 

धी। इसलिए उसने इन शैरों को सुनते हुए फौरन कहा। के खुदा की कुसम!
मैं बनू उमय्या के कबीले से नहीं हूँ। बनू उमय्या फीलवाके जलील है।

लड़की:- तो फिर किस कबीले के हैं?

मेहमान:- मैं कूबीला अंजा का एक शख्स हँ।

लड़की :- आप इन शौरों के कहने वाले जानते हैं?

लड़की के अशआर का तजुमा

अगरचै जुमाना की नजरें हमारे ऊपर बुरी बुरी पड़ने लगी थीं। मगर मुझ
को ये खयाल था के एक ऐसा वक्‍त भी आवेगा के कबीले अंजा भी मेरी
गीबत करने पर आमादा हो जाएगा। मुझ को कूबीले वायल से ना समझना।
अगर मैं उन गुमराहों से जरा भी खौफ करूं। ये तो ऐसे बेकद्र हैं जैसे के
किसी के पास से पत्थर के छोटे छोटे टुकड़े मफ्कद हो जावें! .._

मेहमान:- खुदा की कसम! मैं कूबीला अंजा का भी नहीं।

लड़की तो फिर आप किस कबीले के हैं?

मेहमान:- मैं कूबीला कन्दा का एक शख्स हूँ।

लड़की:- तो कया आपको मालूम है के ये शैर किसके हैं?

लड़की के अश्ञार का तजुमा

अगर कूबीला कंदा का कोई खूबसूरत औरतों की सी चोटी पर फर
करे तो कुबीला कंदा को तुप जलील पेशों के लिए रहने दो। इस वास्ते के
उसका आला दर्जा का फर्् लोगों को तकालीफ पहुँचाना है।

म्रेहमान:- खुदा की कुसम! मैं कबीला कंदा का भी नहीं हूँ। कुबीला
कन्दा फी अलहकौकत जदील कामों में मसरूफ रहता था।

लड़की:- तो फिर आप किस क्‌बीले के हैं?

मेहमान:- मैं कबीले बनी असद का एक शख्स हूँ।

लड़की:- तो क्या आप जानते हैं के ये शैर किसके हैं?

लड़की को अश्ञार का त्जुमा

जब कबीला बनी असद की कोई औरत सने शऊर को पहुँचती तो जल्द
उसका निकाह करा दे। लेकिन इस क्बीले में जिना की ऐसी कबीह आदत है
के बावजूद निकाह कर देने के भी तो इस के जिना से पुतमईन ना होना और
अगर कबीला बनी असद की कोई लड़की अपने हाथों मेहंदी लगावे। और
अब तक वो जिना में मुलव्विस ना हुई हो तो उसके माँ बाप उसको अपना
शरीक कर लेते हैं। यानी उसका बाप भी उससे जिना कर लेता है।

मेहमान: – खुदा की कसम! मैं कुबीला बनी असद में से भी नहीं हूँ। इस

 

कबीले में बेशक जिना की आदत आम थी।
लड़की:- तो फिर किस कुबीले के हैं?
मेहमान:- मैं कुबीला हमदान का एक शख्स हूँ।
लड़की:- तो क्या आपको मालूम है के ये अएआर किस शख्स के हैं?
लड़की को अश्झञार का तजुमा
कबीला हमदान की लड़ाई की चक्की मुकातलीन के सरों पर किसी
दिन चले तो तुम देखोगे के वो निहायत तेजी से लड़ाई से भागे हुए जा रहे हैं।
मेहमान:- सच है कबीला हमदान अक्सर लड़ाईयों में से भागा करते
थे। शुजाअत की उनको हवा भी ना लगी थी। लेकिन खुदा की कसम! मैं
कबीला हमदान में से नहीं हूँ। ह
लड़की:- तो फिर आप किस कूबीले के हैं?
मेहमान:- मैं कबीले नहद का एक शख्स हूं।
लड़की:- तो क्‍या आपको मालूम है के ये शैर किस के हैं?
लड़की के अश्ञार का तजुमा
कबीला नहद के अफ्राद कमीने साबित होते हैं, जब के उनके पास कोई
मेहमान आ जाता है। उनके चहरे रफूत और कारे की तरह काले हैं और जो
शख्स मुसीबत के वक्त उनसे फ्रयाद करे वो ऐसा नादान है जैसे के कोई
गर्म जमीन से बच कर आग में जा कूदे।
ये अएआर सुनते ही मेहमान ने कहा। ये अहआर बिलकुल सच्चे हैं। मगर
खुदा की कसम में तो कुबीला नहद से नहीं हूँ।
लड़की:- तो फिर आप किस क्‌बीले के हैं?
मेहमान:- मैं कबीला क॒ुजा का एक शख्स हूँ।
लड़की:- क्या जानते हैं के ये अःआर किसके हैं?
लड़की के अहआर का तर्जुत्ा
कबीला कुजाआ के किसी शख्स को अपने कुंबे पर फख्र भहीं करना
चाहिए इस वास्ते के ना वो यमन के खालिस अलनसब लोगों में से है ना
मुजिर के शरीफों में से। ये लोग दोगूले हैं, ना कोहतान उनका बाप है और
ना नजार, इसलिए उनको जहलन्नुम में झोंक दो।
मेहमान:- हाँ हाँ! कुबीला कुजाआ का नसब काबिले ऐतबार ना था
मगर खुदा की कुसम मैं तो कूबीला कुजाआ से नहीं हूँ।
लड़की:- तो फिर आप किस कबीले के हैं?
मेहमान:- मैं कुबीला बनी शीबान में से हूँ।

 

 

लड़कौ:- तो क्या आपको भालूम है के ये अश्आर किसके हैं? द

लड़की को अएआर का त्जुमा

बनी शीबान का कबीला बड़ी जमात वाला है। मगर उनमें से हर एक
अव्वल नम्बर का अपनी अपनी असल के ऐतबार से कमीना और पाजी है। ये
इस बचे हुए पानी को पिया करते हैं जो आम लोगो के पीने से बच रहता है।
. फिजू मा जिसको हमने बचे हुए पानी से ताबीर किया है। एक खास
तरीके से हासिल शुदा पानी को कहा जाता है। यानी जब चश्मों और
झीलों पर अहले अरब पहुँच जाते थे तो अपनी मशएकों और पखालों
में पानी साफ और उम्दा भर लेने के लिए काफले के शरफा और जी
इज्जत लोग जाते थे। और जब वो अपने लिए पानी काफी जमा कर
लेते थे तो उसके बाद काफले घटिया और अदना दर्जे के लोग पानी
पहुँचते थे। उसके बाद जब के मर्दों से चश्मा खाली हो चुकता था। तो
औरतें जाती थीं। और इतमीनान से नहाना। कपड़ों का धोना और इसी
किस्म की जरूरियात को पूरा करना उनका काम होता था। जब ये अपनी
जुरूरियात से फारिगू हो चुकती थीं। तो उनके बाद लोंडी। गलाम और
ऐसे लोग के जिनकी कोई इज्जत और वक॒अत काफले में ना होती थी
पहुँचते थे। यही पानी फिजल मा कहा जाता था और इसी को हासिल
करने वाले जूुलील और अदना दर्जे के लोग कहे जाते थे।

गर्ज ये के इन अश्आरों को सुनकर मेहमान ने कहा। के बेशक कबीला
शीबान अगरचै बड़े जथ्थे वाला है। लेकिन उसने मुल्क अरब में किसी किस्म
को कोई इज़्ज्त नहीं पैदा की है। मगर खुदा की कसम मैं तो कूबीला शीबान
पे हूँ ही नहीं।

लड़की:- तो फिर आप किस कबीले के हैं।

मेहमान:- मैं कूबीला तनूख का हूँ।

लड़की क्‍या आपको मालूम है के ये अआआर किसके हैं?

लड़की के अश्आर का तजुमा…

जब कबीला तनूख किसी कबीले को लूटने के इरादे से किसी जगह
को सफर करता है तो वो अपनी इज्जत और शरफ्‌ और अपने कुंबे _
पड़ोसियों की शौहरत को खो बैठता है।

मेहमान:- सच है कुबीला तनूख ऐसा ही बुज॒दिल है। मगर खुदा की
फेसम मैं तो कुबीला तनूख में से नहीं हूँ।

लड़की:- तो फिर आप किस कबीले के हैं?

 

मेहमान: – मैं कूबीले जहल का हूँ।
लड़कीः- तो क्या आपको मालूम है के ये शैर किसका है।
लड़की के अहआर का तजुमा
खुदा बंद आलम कुबीला ज॒हल को हमेशा बदबख़्त रखे। जिस क॒द्र लोग
आसमान के नीचे बस्ते हैं। ये लोग उन सब से बदत्तर हैं।
मेहमान:- जिस शख्स ने ये शैर कहा। बिलकुल सच कहा। बेशक
कबीला जृहल ऐसा ही बदनाम है। लेकिन खुदा की कसम मैं कुबीला जहल
से नहीं हूँ।
‘. लड़कीः- तो फिर किस कूबीले के हैं।
मेहमान:- मैं कूबीला मजूनिया का हूँ।
लड़कीः- क्या आपको मालूम है के ये शैर किसका है?
लड़की के अश्आर का वर्जुबा
कबीला मजनिया एक ऐसा जलील कुबीला है जिससे ना कमर की
उम्मीद की जा सकती है ना दी की।
मेहमान:- सच है ये कुबीला मजनिया ऐसा ही बेखबर बद दीन है। मगर
मैं खुदा की कसम इस कूबीले का नहीं हूँ।
लड़की:- तो फिर आप किस क्‌बीले के हैं?
मेहमान:- मैं कुबीला नखओ का एक शख्स हूँ।
लड़की:- तो क्या आप जानते हैं के ये शैर किसके हैं।
लड़की के अज्ञार का तर्जुमा
कबीला नखओ जो अव्वल नम्बर का कमीना है। अगर उसके सारे अफ्राद
किसी पहाड़ की तरफ दोौड़ें तो ये लोग तादाद में इस क॒द्र हैं के उनकी कसरत
की वजह से वो भी हिलने लगें। लेकिन उनसे किसी को जरा सा भी नफा
नहीं पहुँचता है। और ना खालिस शुरफा में उनका शुमार है।
मेहमान:- बिलकुल दुरूस्त! मगर खुदा की कसम मैं इस कूबीले का
नहीं हूँ।
लड़की:- तो फिर आप किस क्‌बीले के हैं।
मेहमान:- मैं कबीले तेय का एक शख्स हूँ।
लड़की:ः- आपको मालूम है के ये शैर किस का है?
बलो असफ्रन यमद जनाहा
अला दूर तय कलहा ला सतजलत लत
अगर छोटी सी चुड़िया अपने सर सारे कुबीलें तय पर फैला दे तो

 

(लह व ओ और कमी तादाद के सारा कुबीला उसके परों के
आ जावे।
मेहमानः- दुरूस्त है मगर खुदा की कसम मैं कुबीला तय से नहीं हूँ।
लड़की:- तो फिर आप किस कूबीले के हैं?
मेहमान:- मैं कूबीला अक का एक शख्स हूँ।
लड़की:- क्‍या आपको मालूम है के ये शैर किसका है?
लड़की के अशआर का वर्जुम्रा
कबीला अक के तमाम आदमी कोढ़ी और खिदमत गार हैं। ये लोग
प्रलामत से कभी जुदा नहीं हो सकते हैं।
अब मेहमान कबीलों का नाम लेते लेते घबरा गया था। और वो सोच
प्रोच कर कुबायल के नाम बताने लगा था। और लड़की उसके मुंह को इस
हह गौर से और मतानत के साथ तक रही थी। गोया कोई शिकारी जानवर
अपने शिकार की तरफ बगौर देखता है। मेहमान बिलकुल सटपटा गया
था। और दुआएँ माँगता था के लड़की की जबान से इस सिलसिले कलाम
में कोई लफ़्ज ऐसा भी निकल जाबे जिसको मैं अपनी तोहौन करार देकर
एससा जाहिर करने के बाद बात करना तर्क कर दूं। काश ये मुझ को झूटा ही
कह देती। तो मैं उसी पर गजबनाक हो जाता। मगर हाँ! उसने अव्वल अव्वल
पुप्त को झूटा कहा तो था तो क्या उसी पर गस्सा करूं। और इस जुबान जोर
लड़की को धतकारूं? “नहीं नहीं हर गिजू नहीं” अव्वल तो उसने मुझ को
परहातन झूटा कहा नहीं था। और अगर बिलफर्ज उसने सराहत के साथ ही
सूट कहा भी था तो वो बात तो बहुत देर हुईं के गुजर चुकी। अब इस पर
सा करने का क्‍या मौका। ये तो मेरे पीछे पंजा झाड़ कर पड़ गईं है। इस
‘जब को तो देखो के मुझ को कबीले के नाम सोचने में देर लगती है। मगर
अको शैर पढ़ते हुए देर नहीं लगती!
इलाहल आलमीन! मैं अपना पीछा इससे किस तरह छुड़ाऊँ? लेकिन मैं
दूसरी ही फिक्र में पड़ गया। वो लड़की मेरे सकूत को हिकारत आमेज
बस्सुप के साथ देख रही थी। मुझ को जल्द किसी कबीले का नाम लेना
| पहिए। ( कुछ सोच कर ) खुदा की कसम! मैं कबीला अक का नहीं हँ।
लड़की:- तो फिर आप किस कबीले के हैं? का
मेहमान:- में कुबीला लख्म का एक शख्स ह्।
लड़की:- तो कया आपको मालूम है के ये शैर किसका है?
लड़की के अ9आर का त्जमा

 

 

जब कोई जमात अपने क॒दीमी फज्ल की वजह से अशरफ और जी
इज्जत समझी जाती है तो उस वक्त यही अता करम का फख्र कबीला लख्म
के हर एक शख्स से दूर रहता है।

मेहमान:- सच है! मगर मैं खुदा की कसम इस कबीले का नहीं हूँ।

लड़की:- तो फिर आप किस कूबीले के हैं?

मेहमान: – मैं कबीले जजाम का एक शख्स हूँ।

लड़की:- क्‍या आप जानते हैं के ये शैर किसका है?

लड़की के अशआर का तजुमा द

‘ अगर इस गर्ज से के शराब के नशे में दाद व दहश खूब होगी, दौरा

शराब चले तो कबीले जजाम की शिरकत इसमें भी नहीं हो सकती है।

मेहमान:- सच है! मगर खुदा की कसम मैं तो कुबीला जजाम में से
नहीं हूं।

लड़की:- तो फिर आप किस कयीले के हैं।

मेहमान:- मैं कबीले कल्य का एक फर्द हूँ।

लड़की:- क्या आपको मालूम है के ये शैर किसका है?

फला तकरबिन कब्बा वला बाय दारहा

बला यतप्ईन सारीरी जऊ नारहा ।

कुबीला कल्ब के बलल्‍के उसके दरवाजे के करीब भी तुम हर गिज ना.
जाना और रात को वो मुसाफिर जिसने उसकी आग की रोशनी देख ली हो।
उसको हर गिज उसकी उम्मीद ना करनी चाहिए के वो कबीले कल्ख का|
मेहमान बन कर आराम से रह सकेगा।” ः

मेहमान:- खुदा की कसम! मैं कबीलें कल्ख से नहीं हू। |

लड़की:- तो फिर आप किस कबीले के हैं?

मेहमान:- मैं कुबीले बिलकीन का एक शख्स हूँ। ।

लड़की:- तो क्‍या आप जानते हैं के ये शैर किसका है? ।

लड़की के अझआर का त्जुमा
अगर तुम दनानियत के मुतअल्लिक्‌ तहकीक करो पूछो के
हैड कवारटर कहाँ है तो तुम देखोगे के वो कृबीला बिलकीन के के
आखिर अहाता किए हुए है।

मेहमान:- बिलकुल ठीक है। मगर खुदा की कसम में तो कील
बिलकीन से नहीं हूँ। |

लड़की:- तो फिर आप किस कबीले के हैं?

 

मेहमान:- मैं कृबीला बनी अलहारिस बिन कअब का एक शखसख्स हूं।
लड़की:- क्‍या आप जानते हैं के ये शैर किसके हैं? |
लड़की को अहआर का तजुबमा.

ऐ कबीला हारिस बिन कअब क्‍या तुम्हारी अकलें तुम को तुम्हारी
रसानी से नहीं रोकेंगी हर तुम तो बिलकुल खोखली हड्ढी की तरह ज
से खाली हो। इन लोगों में बदन की लम्बाई और चौड़ाई का ऐज नहीं। इस

बास्ते के उनके जिस्म खच्चरों अकलें चुड़ियों हें
वा म खच्चरों से हैं मगर उनकी अकालें चुड़ियों की सी हैं।
मेहमान:- इसमें तो शक नहीं के कबीले हारिस बिन कअब हकीकत में
2 के है। मगर खुदा की कसम मैं तो कूबीले हारिस बिन कअब
नहीं हूँ। क्‍ क्‍
लड़की:- तो फिर आप किस कबीले के हैं?

मेहमान:- मैं कूबीला बनी सलीम से हूँ।

लड़की:- क्या आपको मालूम है के ये शैर किसका है?

लड़की के अहआर का तजुना ै

अगर तुम कबीला सलीम के पास किसी मुसीबत से घबरा कर पहुँचो-
तो जिस तरह गए थे इसी तरह ना काम और जलील व शर्मिंदा होकर वापस
होना नसीब हो।

मेहमान:- हाँ हाँ! ये लोग ऐसे ही थे। हमीयत और गैरत तो उनके पास भी
होकर ना गुजूरी थी। मगर मैं खुदा की कसम कबीला बनी सलीम से नहीं हूँ।

लड़की:- तो फिर आप किस कबीले के हैं।

अब मेहमान मुतरहुद था के क्‍या करे। किसी कबीले का नाम उसको
याद ना आता था। आखिर को मजबूर होकर कहने लगा के दरअसल बात
ये है के मुझ्न को उसका इम्तिहान करना था के तुम को किस क॒द्र शैर याद
हैं। और किस क॒द्र कबायल से वाकिफ हो। मैं फी अल हकीकत अरबी नस्ल
हूँ ही नहीं। बल्के में तो एक फारसी नसाद शख्स हूँ

लड़की के अश्ञार का तर्जुमा

सुन लो! ऐसे मोहताजों से जो अपनी मुरादों की कामयाबी के कोशा हैं
कह दो के इन कमीने मुल्क फारस के बाशिन्दों के क्रीब भी ना जावें इस
वास्ते के वो अपने ( मोहताजीन तो दर किनार ) अकारिब और अनसार को
भी खूबस बातिन की वजह से महरूम वापस कर देते हैं।

अब मेहमान बिलकुल ही तंग हो गया था। और दिल ही दिल में कह
रहा था के इलाही क्या करूं इसकी जुबान से तो फारसी लोग भी ना बचे।

अब किसका नाम ले दूं। अब तो किसी ऐसी जमात की तरफ अपने आपको
मनसूब करना चाहिए के जिसके मुतअल्लिकु किसी शायर का खयाल भी
ना गया हो। ना उसकी हिज्जो हो सके। इसलिए सोच कर नोला। “खुदा की
कुसम! मैं फारसी अलअसल नहीं हूँ, जिनको उनके मालिकों ने अज्राहे
तरहम आजाद कर दिया था।”

लड़की:- आप सच फरमाते हैं। आपको मालूम है के ये शैर किस का है?

लड़की के अ#आर का तजुमा

अगर किसी शख्स को अखलाक रजीला का मरकज मालूम करना हो
तो वो जान ले के आजाद किए हुए गलामों के पास अखुलाक्‌ रजीला का
मुजस्सम तसवीर मौजूद है। द

. मेहमान इस शैर को सुनकर चोंक उठा और दिल ही दिल में कहने लगा

के अब मौका है के मैं गुस्सा करूं उसने निहायत सख्स अलफाज इस छौर में
बयान किए और गृस्सा करके अपनी तोहीन का एक शौर मचा दूं और नाराज
होकर चल दूं। इस सूरत में बात दब जावेगी। और मैं अपनी इस जिल्लत का
फी अलजुमला कुछ अवज कर सक्ूंगा। मगर इस क॒द्र झूट बोलने और हर
मर्तबा घरवरदिगारे आलम की झूटी कुसम खाने के बाद इजहारे गजब पर
‘क्या मुझ को शर्म ना आवेगी। मैं तो इस क॒द्र झूट बोलते बोलते और झूटी
कसमें खाते खाते इस दर्जे पर पहुँच गया हूँ के इस नो उम्र बच्ची के सामने
सर ना उठा सकूं अब मैं किस मुंह से गस्सा कर सकता हूँ।..

औरं इससे ज़्यादा ये के गुस्सा किस बात पर करूं? ये जबान दराज
लड़की मुझ से तो खिताब करती ही नहीं। शैर पढ़कर शायर का नाम पूछती
है। अब इसमें गुस्से की क्या बात? इलाही मैं किस मुसीबत में फंस गया। यहाँ
तक पहुँच कर फिर उसको कुछ याद आया। और जल्दी से कहने लगा के
खुदा को कसम मैं आजाद किए हुए गलामों से भी नहीं हूँ। बल्के हजरत नूह
( अला नबिय्यीना व अलेह अस्सलातो वस्सलाम ) की औलाद में से जो एक
साहबजादे हाम थे। उनकी औलाद में से हे

ये कहकर अपने दिल में बहुत खुश हुआ के इस मर्तबा ऐसी बात जबान
से निकली के इस तरफ्‌ इस लड़की का तो क्‍या किसी का जहन भी नहीं
3 कैब खयाल दिल में अच्छी तरह से गुजरने भी ना पाया
था के लड़को ने अपने इसी मामूली अंदाज में आपको
कोल हर किला इसी मामूली अंदाज में कहा। के आपको मालूम है

लड़की के अश्ञार का तजुमा

9९९06 099 (थ्वा]5८शाशश’

सच्ची हिकायात 805 हिस्सा चहारम
इब्ने अकू का तो जिक्र ही फिजल है। हाम की तमाम औलाद में से

है.

किसी से रिश्ता कायम ना करो। इस वास्ते के खुदा की तमाम मखलूक में
वो बदतरीन मखलूक हैं।

मेहमान को परेशानी कीं अब हद ना थी। जिस क॒द्र सूरतें वो निजात
मी सकता था। वो सब खत्म हो चुकी थीं। चहरे पर हवाईयाँ उड़ने
लर्गी थी। मगर क्या ».र सकता था आखिर को झुंझलाकर कहा “खुदा की
कसम! मैं औलादे हाम में से भी नहीं हूँ।” किक

लड़को:- ( मामूली अंदाज से ) तो फिर आप किस की औलाद में से हैं?
ह + मेहमान:- ( करख़्त आवाज से झुंझलाकर ) मैं शैतान की औलाद में

लड़कीः- ( इसी मामूली लहजे से ) शैतान और उसकी तमाम जियारत
और उसके तमाम आवान पर खुदा की लानत हो। आपको मालूम है के ये
शैर किसका है?

लड़की के अः9आर का तजुमा

ऐ खुदा के बन्दो! सुन लो ये ( इबलीस लईन ) तो तुम्हारा दुश्मन है। और
ये इस मलऊन दुश्मन खुदा के साहबजादे तशरीफ फरमा हैं।”

मेहमान बदहवास हो चुका था। होशो हवास बजा ना थे। घबरा कर उठा
और लड़की के कदमों पर गिर पड़ा और निहायत आजजी के साथ माफी
की दरख्वास्त की और वहाँ से जल्द अज जल्द रवाना हो गया।

( अदब-उल-अरब, सफा 9!)

सबक :- ये हैरत नाक फी अलबदीहा शैर गोई अरब के सिवा किसी
कौम में नहीं भिल सकती है। उसके साथ ही ये बात भी अजीब मालूम होती
है।के जब मेजबान औरत को मालूम हो गया के बावजूद हर तरह की खातिर
व मदारत के मेहमान ने हमारी हिज्जो में शैर नज़्म किया या कम अज कम
ये के किसी दूसरे का शैर पढ़ा। उस वक्‍त अरब के तर्ज के मवाफिक्‌ बहुत
आसान था के बो अपनी जिलल्‍लत की जानिब अपने कूबीले के मर्दों को
मृतवज्जह करती और एक वाजलाह की आवाज से सारे कबीले को उसके
खून का पियासा बना देती। लेकिन वो जानती थी के जिस पर एक मर्तबा

मेहमान बना कर एहसान किया जा चुका है। उसको खुद अपने हाथों से
जूलील करना शर्मनाक है। अलावा उसके अहले अरब के अक्सर लोगों को
रस तफ्सील की तो खबर होती नहीं। के मेहमान ने ममनून एहसान होने के
बावजूद मेजबान की अहानत की थी। हाँ ये बात शौहरत पजीर होती के फलाँ

9८९06 99 (थ्वा5८शाशश’

सच्ची हिकायात 806 हिस्सा चहारम
खानदान के लोगों ने एक शख्स को मेहमान बना कर क॒त्ल कर दिया। और
इस ग॒द्दारी का धब्बा पुश्तहा पुशएत तक लगता। गोया मतलब ये होता के पहले
तो सिर्फ एक शख़्स जबानी हिज्जो कर रहा था। उसके रोकने की कोशिश में
खसायल कबीहा का अमली जामा पहन कर अपने आपको मतऊन कराया
गया। ये एक मामूली फतानत थी। जिससे अरब की एक औरत ने काम लिया
था। और ऐसी उम्दा सजा दी के उससे उम्दा सजा खयाल में भी ना आ सकती
थी। अगर उसको कत्ल कर दिया जाता। तो इस जिल्‍्लत में कमी हर गिज
ना आती जिसने उस औरत को बुरा फ्रोख़्ता कर दिया था। बल्के जितने मुंह
उतनी जबानें हो जातीं और पहले एक शख्स ने हिज्जो की थी तो अब इजारों
जुबानें हिज्जो करने लगतीं। और अगर अपने एहसान का खयाल करके कत्ल
ना किया जाता बल्के इस तजुलील के बदले में उसकी तोहीन करके कबीले
से निकाल दिया जाता तो क्‍या ये मुमकिन था के अगर मेहमान की जुबान से
बे इख्तियारी की हालत में एक शैर ऐसा निकल गया था जिससे कूबीले की
हिज्जो होती थी। तो इस तजलील के बदले में वो क्सदन हिज्जो के कुसायद
तसनीफ करे और मुल्क अरब मे उनकी शौहरत दे।

क्‍या और शौअरा की वो जबानें जो हमला करने के लिए मौका और
वक्त की मुंतजिर रहा करती थीं। इसका साथ ना देतीं? और अगर गौर करो
तो कत्ल या दूसरी किसी किस्म की सजा इसलिए भी मुनासिब नहीं के
उसके जुर्म से बढ़ जाती। उसने अपनी बे लगाम जुबान से सदमा पहुँचाया था।
उसकी सजा में जबान ही से काम लेना चाहिए था। अब उसको ऐसी सजा
दी गई के वो खुद नादिम हुआ। और दिल से सच्ची तौबा करने पर मजबूर
हुआ। मुमकिन था के सख्त से सख्त सजा देकर आईंदा ऐसी हरकत ना करने
के वादे उससे ले लिए जाते। मगर वो इस बादे पर साबित कदम भी रहेगा।
उसकी जमानत मुश्किल थी। इस सजा के बाद ना मुमकिन हो गया के वो
इस कबीले की हिज्जो करे।

हिकायत नम्बर 783 हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज

हजूरत उमर बिन अब्दुल अजीज की तख़्तनशीन  की इब्तिदा ही थी

के शौअरा की एक जमात ने दरबारे खिलाफत में हाजिर होने की इजाजत
चाही। शौअरा इस अप्र के आदी हो चुके थे। के अम्गआ और सलातीन के
दरबारों में हाजिर होकर अपने कुसायद मदहिया से दरबारों को गर्म करें।
और उनसे दिल भर कर नकद और खुलअत वसूल करें। उनके इन मजामीन

((खीलह में ऐसी तासीर होती थी के बखील सा बखील अमीर भी बगैर
ना रह सकता था। ये शौअरा कुछ इस तर्ज से ईनामात तलब करके थे
के हुस्न तलब उनसे अच्छी गोया किसी को आती ही नहीं थी। और उनके
न समरात फिक्र का ऐसा गूलगला मचा हुआ था के बअज बअज अमरअ
जी हजारों लाखों की तादाद में रुपया महेजु इस तमन्ना में सर्फ कर दिया
करते थे के फलाँ शायर हमारी मदह में ज़्यादा ना सही एक ही कसीदा
ज़्म कर दे। और उनमें से जिनकी तबाऐ ज़्यादा मोजें मारती थी। उनकी तो
ऐसी ऐसी बड़ी तनख़्वाहें होती थीं। के शायद आज कल के औसत दर्जा के
क्र दार भी आमदनी में उनका मुकाबला ना कर सकें। गर्ज ये के इधर
त्री उनके मजामीन की आम रगृबत जैबों और खजानों से रुपया निकलवाने
के लिए काफी थी। और इधर ना देने की सूरत में हिज्जो का खौफ भी
रूह होता था। शौअरा की हिज्जो क्या थी गोया के एक सेफ कातओ
थी के जिससे अम्रअ के कूलूब कांप उठा करते थे और शौअरा की जमात
हिज्जोया को कुछ ऐसे अजीब पैराया में अदा करती थी-के बबजह
व बलागृत और मजामीन की उम्दगी के इधर शायर की जबान से
के अश्आर निकले के इधर बच्चे बच्चे ने उनको याद कर लिया।
भब गोया उस जगह का हर हर बच्चा उसकी हिज्जो कर रहा है। गर्ज ये के
की जमाते अपनी मुंह माँगी मुरादें हासिल करती जुरूर थी। ख़्वाह
पने इन तखिय्युलात की रगूबत की वजह से या हिज्जो के खौफ से।
शौअरा की मज॒कूरा बाला जमात अमीर-उल-मोमिनीन की खिदमत में
शिजिर होने की तमन्ना में कई दिन तक मौजूद रही। मगर हाजरी ना मिलना थी
गी मिली। अपनी जिलल्‍लत के खयाल से ये जमात बे नील मराम जाना पसंद भी
गा करती थी। हुस्‍स्ते इत्तिफाक्‌ से अदी बिन इरताता खूलीफतुल मुस्लिमीन की
प्त में बारयाब होने की गर्ज से तशरीफ्‌ लाए। खलीफातुल मुस्लिमीन
भदी बिन इरताता की बवजह के इल्मो फज्ल के ताजीम व तकरीम बहुत
केरते थे। इसलिए उनसे अच्छा सिफारिश करने वाला इस जमात को और
फोन नसीब हो सकता था। इसलिए सब की राय हुई के उनको हाजूरी की
रजाजत मिलले के लिए अपना शफी बनाया जाए। इस जमात में अरब
का एक मएहूर शायर जरीर नामी मौजूद था। फौरन अदी बिन इरताता की
शिदमत में हाजिर हुआ और सामने आकर फी अलबदीहा ये अश्आर पढ़े।
अश्ञआर का तर्जुया
तर्जुमा:- ऐ बुजुर्ग! अपनी सवारी को तेजु हांकने वाले, अब जुमाना आप

हजरात के मवाफिक्‌ है, हमारी जमात का जमाना तो गया गुजरा हुआ। अगर
आप दरबारे खिलाफत में बारयाब हों। तो हमारे खलीफा को हमारा इस
पैगाम जरूर पहुँचा दें के हमारी जमात आपके दरवाजे पर इस जानवर की
तरह पड़ी हुईं है जिसको रस्सी में बाँध कर डाल दिया गया हो। खुदा आपकी
मगृूफिरत करे। आप हमारी हाजत को भूल ना जावें। जमाना दराज गुजरा है।
के हमारी जमात अपने बाल बच्चों और वतन से दूर पड़ी हुई है।

अदी इब्ने इरताता से रकीकू-उल-कल्ज पर इस “इन पमिनल
बयान-उल-सहरा ” के मिसदाकु कलाम का असर क्‍यों ना होता। फौरन
तसलल्‍ली देकर सिफारिश का वादा फ्रमा लिया। जब दरबार खिलाफत
में हाजिर हुए तो बातों बातों में अर्ज किया के अमीर-उल-मोमिनीन!
शौअरा की जमात दरवाजे पर मौजूद है उनकी जूबानें जेहर की बुझी हुईं
हैं। ये नाराज होकर जिसके मुतअल्लिक्‌ अपनी जूबानें खोलते हैं वो इग्
काबिल नहीं रहता के अपने दोस्त अहबाब अजीज व अकारिब किसी को
अपना मुंह दिखावे उनके अएआर के तीर जब उनकी जूबानों की कमानों
से चलते हैं तो कभी खता नहीं करते हैं। अगर आप उनको हाजरी की
इजाजुत देकर उनको कुछ थोड़ा बहुत देकर दहन सग बा लुक॒मा दो खता
बह पर अमल करें। तो ना मुनासिब नहीं बल्के खिलाफत के रौब व अदब
में फक ना आवेगा।

खलीफत-उल-मुस्लिमीन: ( निहायत बे ऐतनाई के साथ ) इस जमात
को भेरे पास आने से क्‍या वास्ता? मैं अपने अजीज वक्‍त को उनके लगवियात
में सर्फ करना बे फायदा समझता हूँ,

अदी बिन इरतात: अमीर-उल-मोमिनीन! आपने मेरी गुजारिश पर गौर
. नहीं फ्रमाया। उनकी हाजरी इस कृद्र बेकार नहीं। जिस क॒ट्र के गलामाने
आली के जहन में है। और आप तो आप हैं। क्या आप ने ये नहीं सुना के
सरवरे कायनात अलेह अलिफ अलिफ सलात व तहसय्यात की मदह की गई
और आप ने खुद सुनी और इस पर ईनाम अता फरमाया। आम मुसलमानों
और खसूसन अमीर-उल-मोमिनीन से मतबओ शरीयत के लिए इससे ज़्यादा
और क्‍या चाहिए के वो खातिम-उल-अंबिया ( रूही व रूह अबी वामी
फदाह ) का इत्तिबा करें।
.._ अमीर-उल-मोमिनीनः ( कुछ ताम्मुल के बाद ) आपने बजा फ्रमाया।
मगर ये तो मालूम हो के उनमें से कौन कौन हाजरी की इजाजत का तालिब है।

अदी बिन इरतात: अमीर-उल-मोमिनीन! हाजरी की तमन्ना करने

में हुज्र के चचा जाद भाई उमर बिन अबी रबिआ अलकर्शी भी हैं। जिनकी

 

फुसाहत व बलागृत, नज़्मो नस्र का सिक्का जमा हुआ है।

अमीर-उल-मोमिनीन: ( इस नाम से निहायत बराफरोख़्ता होकर ) खुदा
उसकी क्राबत को बर्बाद करे और उसको जिन्दगी में कभी इज्जत नसीब
ना हो। ये शख्स वही तो है जिसके ये अ)आर मुझ तक पहुँचे हैं।

अश्आर का तजुधा

तर्जुमा:- 20 काश के जिस रोज मेरी मौत मुझ से क्रीब होती उस रोज
मैं तेरी आँखों और मुंह के माबैन को सूंघता ओर चूमता और ऐ काश के
(मरने के बाद ) जिस चीज से मुझ को गृसल दिया जाता वो तेरा लुआब
दहन होता। और ऐ काश के वो खुश्बू जो मरने के बाद मेरे बदन और
कफन पर लगाई जाती वो तेरे ही गोश्त व पोस्त की होती और ऐ काश
के सलमा ( मेहबूबा का नाम है ) कुब्न में मेरे, हमबिस्तर होती। ख्वाह यहाँ
या जन्नत में या दोजख में।

अगर ये दुश्मन खुदा इस क॒द्र करता के दुनिया में सलमा से मिलने की
तमन्ना करता और उसके कुफ्फारा में आमाल सालहा करता और इस क॒द्र
खुराफात जबान से ना बकता के जहतन्नुम में भी इससे मिलने की तमन्ना का
इजहार करता तो भी इस कद्र बुरा ना होता। खुदा की कसम! में ऐसे बेबाक ,
गुस्ताख्‌, मुंह जोर को हर गिज॒ हर गिज अपने पास जा आने दूंगा। अच्छा के
सिवा किसी और का नाम लीजिए। जो हाजरी का ख्ब्ास्तगार हो।

अदी बिन इरताता: हमील बिन मोअम्मर अलअजरी भी मौजूद है जो आज
अपना नजीर खूद है। उसकी शिकायत तो गालिबन अमीर-उल-मोभिनीन ने
भी न सुनी होगी।

अमीर-उल-मोमिनीन: ( निहायत नफरत के साथ ) क्‍या ये बही शख्स
नहीं जिसकी जसारत यहाँ पहुँच गई के वो इस किस्म के अहआर तसनीफ
करे और उन पर फख््र करे।

अशआर का तर्जुमा

तर्जुभा:- काश के हम दोनों साथ साथ जिन्दा रहते। और अगर मरते तो
कब्रिस्तान में मेरी और उसकी कुत्र बराबर होती जब ये कहा जावे के लैला
को दफन करके मिड्री और पत्थरों में छुपा दिया गया तो मैं जिन्दा रहकर
क्या करूंगा। मेरा दिन तो इस तरह गुजुरता है के मअशूका के दीदार को
मेरी आँखें तरसती रहती हैं। लेकिन रात को ख़्वाब में मेरी और उसकी रूहें
जरूर मिल लेती हैं।”

ये शख्स के जिसको दिन रात के चौबीस घंटों में एक लम्हा भी अपने
खालिक का खयाल ना आवे और एक औरत का खयाल उसको घेरे रहे।
आप खुद ही खयाल फ्रमावें के किस क॒द्र बद इतवार होगा। खुदा की कसम!
मैं उसको भी अपने पास आने की इजाजत ना दूंगा। अच्छा उसके सिवा किसी
और का नाम बताईये।
अदी बिन इरतातः कसीर इज़्जुत। ये वो मश्हूर शायर है जिसके
मदहिया कूसायद की आरज बड़े बड़े अम्गअ ने की है और उसने अपने
कमाल के जौम में मामूल अम्रअ की तारीफ अपने लिए बाइसे तोहीन
खयाल की है। और बावजूद बड़े बड़े ईनामात के वादों के उसने किसी
को मुंह नहीं लगाया है।
अमीर-उल-मोमिनीन:- मालूम होता है के आप इस जमात के हाल से
बिलकुल ही बे खबर हैं। इन्हें जामओ कमाल के ये अएआर हैं।
अशज्भार का त्जुमा
तर्जुमा:- मदयन के तारिक-उद्दुनिया और जिन जिन लोगों से मैं मिला
हूँ। उनको मैंने खुदा के अजाब से रोते पीटते देखा। और अगर वो मेरी प्यारी
महबूबा अज्ज्त की बातें इस तरह सुनते जिस तरह के मैंने सुनी हैं। तो कोई
उसके सामने ताजीमन सर झुकाता कोई सज्दा करता।
अल्लाह उस पर लानत करे। ये एक नाकिस-उल-अक्ल वालदैन,
औरत को काबिले सज्दा समझता है। और खुदा के अजाब से डर कर
रोने वालों का तमसखुर उड़ाता है। ये पहाड़ के बराबर कलमात जबान
से निकाल देने वाला क्‍या दरबार में हाजिर होने की इजाजत दिए जाने
के काबिल है। खुदा की कसम मैं ऐसे नाहिनजार को अपने पास आने
की इजाजत देकर गुनहगार ना बनूंगा। अच्छा! इसके सिवा और कौन
इजाजत का तालिब है।
अदी बिन इरतात: अदी बिन अहवस अनसारी भी मौजूद है और उसके
फज्लो कमाल का तो हर छोटा बड़ा मदाह है। क्‍
अमीर-उल-मोमिनीन:- खुदा इस पर अपना गजब नाजिल फरमावे।
क्या उस बद किरदार और बद अक्वाल को मैं अपने पास आने दूंगा। “नहीं
नहीं हर गिज नहीं।” मैं उसकी हालत से अच्छी तरह वाकिफ हूँ। ये बदइतवार
वही तो है जो मदीने के एक शख्स की लॉडी को फिसला कर ले भागा था।
और खाकिश हिदहन उस पर ये शैर फख्न पढ़ा था। |
शैर का तर्जुमा ।

ः – मेरे और इस लोंडी के मालिक में हायल होकर खुदा उसको

से अलेहदा करना चाहता है और मैं उसके पीछे पीछे हँ। ”
अब तो आपको उनके हुस्ने लर किसी
थाम बताईये। हंसने इस्लाम की ख़बर हो गई। खैर किसी और
अदी बिन इरतात: हमाम बिन गालिब अलफरजुदिक। उसकी
जी और लतीफा गोई तो रोतों को हंसा द्ेती दंसक इजाजत २ ही
तो गालिबन ना मुनासिब नहीं। या 9 0७७20;
अमीर-उल-मोमिनीन: आपने भी अच्छे का नाम लिया! आपको खबर
के आप जिना के गुनाह में मुबतला हुआ और उस पर ये अशआर

 

 

 

 

 

 

अश्ञार का तजुमा
तर्जुमा:- उन दोनों ने मुझ को बड़ी बुलंदी से इस तरह लटकाया जिस
के कोई नर्म परों वाला बाज किसी शिकार पर प्र तोल कर यकायक
गरता है। तो जब मेरे दोनों पैर जमीन पर जमे। तो इन दोनों ने कहा। के
आया ये जिन्दा है। के इससे उम्मीद की जा सके। या ये ठंडा हो लिया के
इससे अलग हो जावें। तो मैंने कहा। के ऐसा ना हो के निगहबानों को ख़बर
हो जावे और मैं जल्दी से रात ही रात में निकल भागा।”
.._ खुदा की कसम! मैं उसको भी अपने पास ना आने दूंगा। अच्छा किसी
और का नाम लीजिए। द

अदी बिन इरताता: अख््तल तगलबे भी हाजरी का झुत्नास्तगार है। इसमें
पुझ्त को तो कोई ऐब नहीं मालूम होता है।

अमीर-उल-मोमिनीन: ( मुस्कुरा कर ) ऐब नहीं मालूम होता। ये भी
आपने खूब फरमाया। इससे ज़्यादा मुंह फट शायर कम होंगे। आपने उसके
ये शैर सुने होंगे।

अश्ञार का तर्जुमा

तर्जुमा: मैंने सारी उप्र में कभी रमजान के रोजे नहीं रखे और कुर्बानी
करना तो बजाए खुद मैंने कभी कुर्बानी का गोश्त खाया भी नहीं। ना मैंने
सुबह के वक्त, मक्का के टीलों की तरफ ऊँटों को ब्रज हिसूले निजात
अखरबी तेज भगाया। और ना मैं खरीदे हुए गुलाम की तरह सुबह के वक्त
हेव्या अलल फलाह कहकर लोगों को नमाज के लिए बुलाता हूं। हाँ ठंडी
और तेज शराब के गिलास जुरूर चढ़ा जाया करता हूँ। और सुबह होते होते
सन्‍्दे कर लिया करता हूँ।”

 

ये जात शरीफ तो फरजदिक से भी चार हाथ आगे हैं। खुदा की कसम!
मैं इस पुसलमान सूरत काफिर सीरत को अपने फर्श पर भी कदम ना रखने
पूँगा। इसके सिथ्रा अगर कोई और हो तो उसका नाम लीजिए।

अदी बिन इरताता: जरीर भी है। उसकी जबान फ्रजृदिक्‌ के मुकाबले
तो श्रेशक खुली है। मगर उसने फरजदिक्‌ पर ही बस की। मेरे इल्म में
कोई ऐसी जसारत नहीं की जिससे हदूद शरया पामाल होते हों।

अमीर -उल मोमिनीनः: आपने उनकी मजनूनाना बड़ नहीं सुनी। उनके ऐौर हैं।

शैर का तर्जुमा

तर्जुमा:- अशाक के दिलों को शिकार करने घाली तेरी पास रात को
आए और ये बक्त मुलाकात का वक्त नहीं तो खैरियत से वापस हो जा।”

ताहम अगर शायरों को आने की एृजाजत देना आपके खयाल में जरूरी
ही है तो खैर उसको खुलवा लीजिए।

अदी बिन इरताता अपने दिल में ये कहते हुए बाहर तशरीफ लाए के
अलहम्दू लिल्लाह इस क॒द्गर॒ वक्‍त सर्फ करने के बाद अपमीर-उल-मोमिनीन
ने एक को तो इजाजत हाजिर होने की दे दी। अगर उसकी निसबत भी
इंकार फरमा देते तो मैं क्या कर लेता। बाहर आकर देखा तो सब के सब
चूं गोश रोजादार पर अल्लाहू अकबर सत का मंजर बने हुए थे। आपने
जरीर को हमराह लिय और खलीफात-उल-मुस्लिमीन की खिदमत में
हाजिर हुए। जरीर एक पुरकाला आतिश था। और फी अलबदीहा कहने
में तो ऐसा मशाक था के बसाअवकात उसके फी अलबदीहा शैर पढ़
देने पर लोगों को गुपान होता था। के ये घर से याद कर लाया है। मौका
पाकर पढ़ दिए। खलीफत-उल-मुस्लिमीन को दूर से देखते ही ये शैर
पढ़ना शुरू कर दिए।

अश्ञर का तर्जुम्रा

तर्जुपा:- बेशक जिस कादिर मतलक मे नबी उम्मी सल-लल्लाहो
तआला अलेह व सलल्‍लम को नवी घनाकर खलल्‍्क्‌-उल्लाह की हिदायत के
लिए भेजा। उसने तड़ते खिलाफत पर एक आदिल खलीफा को मुतमकिन
किया है। सारी रिआया के लिए उसका अदूल व बकार आम है। यहाँ तक के
उसकी रिआया का एक एक शख्स अमूरे कृबीहा से मुंतखिण है। और उसने
बड़े बड़े टेढ़ों की कजी को सीधा कर दिया। मैं उसके पास नफा आजिल
की उम्मीद लेकर हाजिर हुआ हूँ और हर शख्स जानता है के इंसानी नफस
मुनाफओ आजिला का दिलदादा है। मालिक हकीकी ने अपने क्रआने पाक

| मुसाफिर और अयालदार फक्कीर का हिस्सा मुक्रर फ्रमा दिया है। ( और
इझ में ये सारे ओसाफ मौजूद हैं )
अमीर-उल-मोमिनीन: ( अपने खयाल में इढस मदह को हद से बढ़ा
[आ समझकर ) जरीर! अल्लाह से डरो और जुबान से कोई बात हक्‌ बात
के सिवा ना निकालो। जरीर ने ये सुनते ही फिर शैर पढ़ना शुरू कर दिए।
अश्आर का तजुमा क्‍
तर्जुमा:- मेरे बतन यमामा नामी में बहुत से परागंदा बाल रांड औरतें हैं।
बहुत से यतीम हैं। के बबजह फाका कशी के ना उनकी आवाज निकलती है।
॥ उनकी नजर ऊपर उठती है ) ये ऐसी जमात है के बबजह आपके इंसाफ
के उनके माँ बाप के नओम-उल-बदल हो गया। वो चिड़िया के जईफ बच्चे
की तरह हैं जो चल ना सकता है ना उड़ सकता है ) क्‍या मैं इस तकलीफ
जगर मुशक्कृत का हाल बयान करूं जो मेरे ऊपर नाजिल हो चुकी। या
शो कुछ आपको मेरे मसायब और शदायद का हाल सुनाया गया। वही मेरे
पर रहम करने के लिए काफी होगा। जब बारिश हम से मुंह फैर लेती है
हम्न को अपने खलीफा से ऐसी ही उम्मीद लगी रहती है जैसी के बारिश
मै आज कल खिलाफत हक बहकदार रसीद की मिसदाक्‌ है। जैसे के मूसा
अले त्न्‍क्‍ अपने रब से कलाम करने के मुसतहिक्‌ समझे गए। हुजर ने
गैंडों और दुखिया औरतों की तो हाजत रबाई फ्रमा दी। मगर अब इस रंडबे
र्द की हाज़त रवाई कौन करेगा। जब तक आप दुनिया में तशरीफ फरमा हैं।
हम से जुदा नहीं हो सकती। ऐ खैर मुजस्सिम उमर बिन अब्दुल अजीज
भाप पर खुदा की बर्कात की बारिशें होती रहे