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सुकूने क़ल्ब ज़माने के वास्ते तुम हो- मनकबत Mankabat Imam Husain
मनक़बत
नबी का चैन हो ज़हरा के लाडले तुम हो।
सुकूने क़ल्ब ज़माने के वास्ते तुम हो।
सभी के सीनों में शब्बीर यूँ बसे तुम हो।
हमेशा राहे सदाक़त पे जो चले तुम हो।
किसी लई़न के डर से कहाँ रुके तुम हो।
के जबभी दीन का लेकर अ़लम बढ़े तुम हो।
शजर ये सूखता इस्लाम का भला कैसे।
के जिसके वास्ते आख़िर यहाँ मिटे तुम हो।
रखा हमेशा शग़ुफ्ता ही तुमने लहजा बस।
हुजू़र जब भी किसी से कभी मिले तुम हो।
कटा के राहे सदाक़त में तुम गला अपना।
जहाँ के सामने यूँ सुर्ख़रू हुए तुम हो।
तुम्हारी शान की कोई मिसाल क्या होगी।
अली के लाल हो ज़हरा के लाडले तुम हो।
बुलन्द कितना तुम्हारा है मर्तबा हज़रत।
के पुश्ते अह़मदे मुख़्तार पर चढ़े तुम हो।
हरेक बात तुम्हारी है अफ़्ज़ल ओ आ़ला।
मुनाफ़िकों को यहाँ इसलिए खले तुम हो।
नमाज़े इश्क़ अदा की है तुमने मक़तल में।
ज़माने भर के शहीदों में यूँ भले तुम हो।
गवाही क्यों न दे तारीख़ यह शुजाअ़त की।
अकेले फ़ौजे सितमगर से जब लड़े तुम हो।
हुआ जो ह़क्मे ख़ुदा तो झुका दिया सर भी।
भला यज़ीद के लश्कर से कब डरे तुम हो।
फ़राज़” कैसे भुलायेगी करबला आख़िर।
जहाँ पे भूखे पियासे कभी लड़े तुम हो।
सरफ़राज़ हुसैन ‘फ़राज़’
पीपलसाना मुरादाबाद
इमाम हुसैन की शहादत मुहर्रम पर शायरी | मुहर्रम दुःख भरी शायरी हुसैनी शायरी
मनक़बत
सीने में जिनके बस गई उल्फ़त ह़ुसैन की।
उनकी ज़ुबाँ पे रहती है मिदह़त ह़ुसैन की।
देखी है करबला ने शुजाअ़त ह़ुसैन की।
यूँ उससे जा के पूछिए अ़ज़मत ह़ुसैन की।
बन कर यज़ीद रह गया पैकर बुराई का।
ज़िन्दा है अब भी देखो सदाक़त ह़ुसैन की।
सजदे में सर झुका के उठाया न आपने।
कितनी है बेमिसाल इ़बादत ह़ुसैन की।
नोक ए सिनाँ पे सिर था ज़ुबाँ पर कलामे ह़क़।
मशहूर है यूँ जग में तिलावत ह़ुसैन की।
नरग़े से बातिलों के रवा राह की तरफ़।
ह़ुर को भी खींच लाई मुह़ब्बत ह़ुसैन की।
ह़ैदर का वो क़रार हैं ज़हरा का चैन भी।
हर दिल में इस लिए है मरव्वत ह़ुसैन की।
बातिल का नाम मिटना था आख़िर वो मिट गया।
इस्लाम की बक़ा है शहादत ह़ुसैन की।
क़ल्ब ओ जिगर की मेरे यह आवाज़ है फ़राज़।
जन्नत में ले के जाएगी चाहत ह़ुसैन की।
सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़
पीपलसाना मुरादाबाद।
शहादत इमाम हुसैन मुहर्रम शायरी Moharram Shayari
मनक़बत
गुलज़ारे मुस्तुफ़ा के गुल ए तर ह़ुसैन हैं।
जन्नत की ख़ुश्बुओं से मुअ़त्तर ह़ुसैन हैं।
नायाब है जो सबसे वो गौहर ह़ुसैन हैं।
इस्लाम जिनसे चमका वो ख़ावर ह़ुसैन हैं।
ज़हरा के चैन दीन के सरवर ह़ुसैन हैं।
इब्न ए अ़ली हैं सिब्ते पयम्मबर ह़ुसैन हैं।
सब्र ओ रज़ा का सारे ज़माने में मोमिनो।
जिनका नहीं है कोई भी हमसर ह़ुसैन हैं।
कोई भी नाम लेवा नहीं है यज़ीद का।
है ज़िक्र जिनका आज भी घर घर ह़ुसैन हैं।
बातिल के सब चराग़ ख़ुदा ने बुझा दिए।
चर्ख़ ए बरीं पे अब भी मुनव्वर ह़ुसैन हैं।
चलता रहेगा राहे सदाक़त पे वो सदा।
जिस शख़्स के भी सीने के अन्दर ह़ुसैन हैं।
शिमर ए लय़ीं का नाम ही दुनिया से मिट गया।
सुर्ख़ी में अब भी रू ए ज़मीं पर ह़ुसैन हैं।
वो तिश्ना लब ही लड़ते रहे तीन रोज़ तक।
मौला अ़ली के ऐसे क़लन्दर ह़ुसैन हैं।
इमलाक जीत लेना बड़ी बात ही नहीं।
जीते हैं जिसने दिल वो सिकन्दर ह़ुसैन हैं।
आँसू लहू के रोए न क्योंकर यह करबला।
बाज़ू में थामे लाशा ए असग़र ह़ुसैन हैं।
अहल ए ख़िरद समझते हैं दीवानगी मिरी।
दिल में मिरे ह़ुसैन हैं लब पर ह़ुसैन हैं।
हम तो फ़राज़ यह ही समझते हैं देखिए।
ताबिश क़मर सी जिनकी वो अख़्तर ह़ुसैन हैं।
सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़
पीपलसाना मुरादाबाद।
कर्बला की शायरी मोहर्रम का मरसिया शहादत इमाम हुसैन मुहर्रम शायरी हिंदी
मनक़बत
दुनिया में ऐसा कोई भी तबक़ा नहीं मिला।
जिसका ग़मे ह़ुसैन से रिश्ता नहीं मिला।
दिल से ग़मे ह़ुसैन मिटा दे जो दोस्तो।
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ऐसा जहाँ में कोई भी नुस्ख़ा नहीं मिला।
नज़रों के सामने ही लुटा घर का घर तमाम।
फिर भी ज़ुबाँ पे आपकी शिकवा नहीं मिला।
अ़र्ज़ ए तमन्ना रब से तमाम अम्बिया ने की।
फिर भी उन्हें ह़ुसैन का सजदा नहीं मिला।
वादा वफ़ा करे जो तुम्हारी तरह ह़ुसैन।
रू ए ज़मीं पे ऐसा नवासा नहीं मिला।
यूँ तो शहीद लाखों करोड़ो हुए मगर।
मेरे ह़ुसैन सा उन्हें रुत्बा नहीं मिला।
कूफ़े कि सिम्त तुमने बढ़ाया न करवाँ।
मुस्लिम का जब तलक तुम्हें रुक़आ़ नहीं मिला।
ख़ुश है बहा के ख़ून तू आले रसूल का।
तुझसा यज़ीद कोई भी पगला नहीं मिला।
बावस्ता जो ह़ुसैन के ग़म से नहीं फ़राज़।
उनको ख़ुशी का कोई भी मुज़दा नहीं मिला।
सरफ़राज़ हुसैन फ़राज़
पीपलसाना मुरादाबाद।
मनकबत हिंदी में लिखी हुई | Mankabat Imam Husain Shahidi Kalam
मनक़बत
मिरे रसूल मुहम्मद मिरे इमाम अली।
बनाया आप को रब ने महे तमाम अली।
हूँ मैं भी आपका अदना सा इक ग़ुलाम अली।
इसी लिए तो मैं रहता हूँ शाद काम अली।
कभी जो मुश्किलें आतीं हैं राह में अपनी।
ज़बाँ पे आता है बस आपका ही नाम अली।
हुआ न होगा कोई आप सा ज़माने में।
बुलन्द रब ने किया आप का मुक़ाम अली।
रहा हमेशा शगुफ़ता ही आप का लहजा।
किसी से आप हुए जब भी हमकलाम अली।
ज़बाँ पे आपके दीवानों के क़यामत तक।
रहेगा आपका ही नाम बस मुदाम अली।
यही तमन्ना है अब तो फ़राज़ के दिल की।
क़ुबूल कीजिए मेरा भी अब सलाम अली।
सरफ़राज़ हुसैन ‘फ़राज़’ पीपलसाना मुरादाबाद
मनकबत इमाम हुसैन फोटो | Mankabat Imam Husain Shahidi Kalam Photo Hd
मनकबत इमाम हुसैन फोटो | Mankabat Imam Husain Shahidi Kalam Photo Hd
सभी के सीनों में शब्बीर यूँ बसे तुम हो मनकबत हिंदी में | Imam Hussain Manqabat Lyrics
मनक़बत
सभी के सीनों में शब्बीर यूँ बसे तुम हो।
हमेशा राहे सदाक़त पे जो चले तुम हो।
किसी लई़न के डर से कहाँ रुके तुम हो।
के जबभी दीन का लेकर अ़लम बढ़े तुम हो।
शजर ये सूखता इस्लाम का भला कैसे।
कि जिसके वास्ते आख़िर यहाँ मिटे तुम हो।
रखा हमेशा शग़ुफ्ता ही तुमने लहजा बस।
हुजू़र जब भी किसी से कभी मिले तुम हो।
कटा के राहे सदाक़त में तुम गला अपना।
जहाँ के सामने यूँ सुर्ख़रू हुए तुम हो।
तुम्हारी शान की कोई मिसाल क्या होगी।
नबी का चैन हो ज़हरा के लाडले तुम हो।
बुलन्द कितना तुम्हारा है मर्तबा हज़रत।
कि पुश्ते अहमदे मुख़्तार पर चढ़े तुम हो।
हरेक बात तुम्हारी है अफ़्ज़ल ओ आ़ला।
मुनाफ़िकों को यहाँ इसलिए खले तुम हो।
नमाज़े इश्क़ अदा की है तुमने मक़तल में।
ज़माने भर के शहीदों में यूँ भले तुम हो।
गवाही क्यों न दे तारीख़ यह शुजाअ़त की।
अकेले फ़ौजे सितमगर से जब लड़े तुम हो।
हुआ जो ह़क्मे ख़ुदा तो झुका दिया सर भी।
भला यज़ीद के लश्कर से कब डरे तुम हो।
फ़राज़” कैसे भुलायेगी करबला आख़िर।
जहाँ पे भूखे पियासे कभी लड़े तुम हो।
सरफ़राज़ हुसैन ‘फ़राज़ पीपलसाना
शहादत
वो वादा वफ़ा किया हजरत हुसैन ने।
हाँ इमान नही दिया हजरत हुसैन ने।।
ड़रकर नही काटी कभी जिंदगी जिसने।
शहादती जाम पिया हजरत हुसैन ने।।
जहाँ ने देखा हैदरी जलाल करबला में।
नेजे पे सर को लिया हजरत हुसैन ने।।
भूखें प्यासे करबला के शहीद हुयें।
पानी नही पिया हजरत हुसैन ने।।
तिरों की बारीश होती रही चार सू।
तिरों को सिने पे लिया हजरत हुसैन ने।।
यजिदी की जुल्मतें हद पार कर गईं।
असगर का लाशा लिया हजरत हुसैन ने।।
‘शहज़ाद’ सुनकर निकल आते हैं आँसू।
आख़री सज़दा किया हजरत हुसैन ने।।
सज़दा हुसैन का याद कायनात करेगी।
इमान वालों आज करबला बात करेगी।।
यजीद घबराया हौसला ए हुसैन देखकर।
तीस हजार फौज भला क्या साथ करेगी।।
बच्चा हुआ कुरबान अपने इमाम पर वो।
अपने इमाम की फजिलत हर नात करेंगी।।
उमर जियाद शुमरे लई सच्चों के कातील।
करतुत बयां मोहर्रम की हर रात करेगी।।
कासीम बने दुल्हा हुये वो रन में शहीद।
बहादूरी बयां शहीदों की जात करेगी।।
अब्बास के बाजू कटे नहरे फराद पर।
अली असगर की प्यास दिल पर मात करेगी।।
“शहज़ाद” शहीदों की याद ताजा हो गई।
कौम नये साल में जो मुनाजात करेगी।।
हुसैन आपके सदके में जन्नत बनी है।
इसलिये हर करबला का शहीद बना गनी है।।
तलवार भाला तेग के नीचे लड़े धुप में।
शहीद के सर फातेमा की चादर तनी है।।
मासूम अली असगर हुये थे जब शहीद तब।
हजारों यजिदियों से तब हुई जंग घनी है।।
एक दिन के बनें दूल्हा कासिम हुये थे शहीद।
बोली सुगरा कहा खोया मेरा धनी है।।
हुसैन आपने तो किसी का बुरा नही किया।
फिर क्यों लगा यजिद आपके पीछे शनी है।।
इस्लाम को गिजा मिली हुसैन के खून की।
मार्फत ये किरदारे हुसैन से छनी है।।
लड़ो बेटा मैंदान मे खीचड़ा पकता रहा।
हांडी में सिर्फ पत्थर और दिखा पानी है।।
बहादुरी के जौहर दिखे थे हुसैन के।।
हैदरी तलवार अली तेवर सें बनी है।।
‘शहजाद ‘ हर साल महिना आता मोहर्रम का।
दिखा जुगराफिया हुसैन यजीद मे ठनी है।।
नाना का प्यार
नाना का नवासों से प्यार देखिए।
मुस्तुफा का इस्लामी इजहार देखिए।।
वैलैल जुल्फे नवासों के हाथ में।
उँटों में मोहम्मद की कतार देखिए।।
प्यारे थे नवासे नबी को कितने।
होटों का बोसा गले का हार देखिए।।
बचपन हसन हुसैन का शानों पे गुजरा।
उम्मत हो नबी के ये दुलार देखिए।।
दोनों नवासे बराबर मुस्तुफा को।
तकती पे कटा बराबर अनार देखिए।।
कुदरत ने दिया कैसे साथ नबी का।
आया जन्नत का जोड़ा बिसार देखिए।।
इस्लाम के निगहबां प्यारे नवासे।
हुसैन की वो शहादत निसार देखिए।।
‘शहजाद ‘सारा जहाँ हुआ कैसे फिदा।
मुस्तुफा नवासे प्यार का वकार देखिए।।
यादें हुसैन गुंजती हैं आज करबला में: करबला में इमाम हुसैन की शहादत पर शायरी
शहादत
यादें हुसैन गुंजती हैं आज करबला में।
हर आँख अश्क चुमती हैं आज करबला में।।
दस दिन का ये मातम कितना ग़म जदा हुआ।
माँ बच्चों को ढुंढती है आज करबला में
पानी की नही बारीश, हुई थी तिरों की।
शहिद की आँख मुदंती है आज करबला में।।
बच्चों को नही मिला खाना, नही पानी
बस मलकुल मौत चुनती है आज करबला में।।
शुमरें लई का तिर मासूम असगर पर चला
हाथ में लाश झुमती है आज करबला में
‘शहजाद’ लुट गया चमन फातेमा जहरा का
तड़प आवाज घुमती है आज करबला में
ये पुछते हो क्यों सर कटाया हुसैन ने।
नाना जान की उम्मत बचाया हुसैन ने।।
भूखें प्यासें लढ़ गयें छोटे बड़े सभी।
शहीदों को जन्नत में बिठाया हुसैन ने।।
बोली सकीना बाबा पानी मुझे पिना।
अब्बास के हाथ दरिया से उठाया हुसैन ने।।
बच्चें की प्यास तिरों से बुझायी जाती।
खौफ़नाक मंजर जहाँ को दिखाया हुसैन ने।।
दुल्हा बनें कासिम चलें रन में लड़ने को।
लख्ते जिग़र की लाश दफ़नाया हुसैन ने।।
झुठे यजीद के हाथों बैत नही किया था।
सच्चाई की खातिर घर लुटाया हुसैन ने।।
पंजतनी जहाँ का वसिला बना शहीदी से।
इन्सानियत कैसी हों दिखाया हुसैन ने।।
‘शहज़ाद’ हुसैन यही पैगंम्बरी आल है।
सर दे अपना इस्लाम बनाया हुसैन ने।।
कर्बला शायरी शहादत पर शायरी
शहिदी
नही मांगते थे राज इमान पे अड़े थे।
हुसैन तो हमेशा वफ़ा की तरफ़ खड़े थे।।
यजीद को डर था हुसैन की पासबानी से।
इसीलिए तो हुसैन के पिछे यजिदी पड़े थे।।
जान दे बचाया इमान की पासबानी को।
हुसैन में हिरे नबी की वफ़ा के जड़े थे।।
हैदर ए कर्रार अजीम शेरे खुदा के शेर।
पाने शाहदत कर्बला की तरफ़ बड़ें थे।।
वादा निभाया नानाजान से बचपन का।
कर्बला में फूटे वो जवानी के घड़े थे।।
कर्बला याद दिलाती है शाने इमाम की।
नेजे पे सर आज़ भी हुसैनी के खड़े थे।।
लुटाया घरबार नाना की उम्मत के लिए।
जन्नत में हकदारों के लिए झड़ें गड़ें थे।।
‘शहज़ाद ‘ अहसान हुसैन ना भूला कोई।
इसके पीछे बने हुसैन शहिद की जड़े थे।।
हौसला हुसैन का : इमाम हुसैन की शान में शायरी
शहीदी
कितना अजीम बुलन्द तर हौसला हुसैन का।
कुर्बान हो गया सच्चाई पे कबिला हुसैन का।।
यजीद का फरेब भरा मिला दावत नामा।
चल पड़ा साथ में हरेक वसिला हुसैन का।।
शहीद होने जा रहा था खेमें का हर जवान।
जहाँ की नज़र में जवा था सजिला हुसैन का।।
बच्चें भी बहादूर थे सर कटाने वाले।
अली असगर ने चलाया सिलसिला हुसैन का।
एक दिन के दूल्हा बनकर कासिम हुये शहीद।
था भतिजा वो हथेली का छाला हुसैन का।।
भूखे प्यासे शहीद होते थे करबला मे।
यजिदीयों ने किया रास्ता अड़ीला हुसैन का।।
शमशीर हैदरी का जोह़र मैदाने जंग मे।
बचपन का वादा निभाना फैसला हुसैन का।।
‘शहज़ाद ‘ अकिदा हुसैन का बढ़ेगा हमेशा।
आखरी सजदा जमीने कर्बला हुसैन का।।
हजरत-ए-इमाम हुसैन की नज्र जदीद-व-मुन्फरिद गजल | इमाम हुसैन की शान में शायरी
जदीद-व-मुन्फरिद गजल
यारो!, हुसैन-इब्न-ए-अली हो गये शहीद!
बस दीन-ए-हक के वास्ते, इस्लाम के लिए!!
शब्बीर-ए-हक, यजीद के आगे नहीं झुकें!
इन-आम/ इनाम के लिए, किसी इकराम के लिए!!
सारे यजीदी रिन्द, गुनहगार-ए-या-हुसैन!
तड़पि करेंगे खुल्द सा इन-आम/ इनाम के लिए!!
कुफ्फार हैं, गुमान-व-औहाम के लिए!
या, कुफ्रिया कलाम के इब्हाम के लिए!!
सारे यजीदी रिन्द, ये कातिल, हुसैन के!
तरसा करेंगे, खुल्द के आराम के लिए!!
फिर्दौस/ फिरदौस में हैं, कौसर-व-तसनीम मौज-जन!!
तरसा करेंगे रिन्द, खुल्द के इक जाम के लिए!!
शायर हैं कुछ, गुमान-व-औहाम के लिए!
जैसे जदीद शेर के इब्हाम के लिए!!
डाक्टर जावेद अशरफ़ कैस फैज अकबराबादी
द्वारा डॉक्टर रामदास राजकुमार दिलीप कपूर, डॉक्टर इनसान प्रेमनगरी हाऊस, डॉक्टर खदीजा नरसिंग होम, रांची हिल साईड,इमामबाड़ा रोड, रांची, झारखण्ड, इन्डिया!
हजरत-ए-इमाम हुसैन की नज्र एक जदीद गजल | कर्बला की शायरी
जदीद गजल
करबला की रेत, करबला की धूप, करबला की गर्मी!!!
याद आती है, सभी की कुर्बानी, यजीद की बेशर्मी!!
अब भी याद आती है, वो गुलामान-ए-हबीब-ए-रब की नर्मी!!
लाजिमी है, दीन-व-मजहब-ए-इस्लाम में सिला-ए-रहमी!!
था जबरदस्ती का शाह, बातिल आदमी, यजीद-ए-मलवून!!
अस्ल में था बादशाह, ” अहमद” का नवासा, शब्बीर-ए-जाह!!
थी यजीदी फौज और बहत्तर मोमिनान-ए-बर-हक में जंग!!
थी जरूरी बातिल और हक में जंग, ऐ मुसलमान् भाई!!
सुर्खरू है, और इराक में है ” करबला ” मुनव्वर अब तक!!
रंग लाई, ऐ सखी!, शहीदान-इराक की कुर्बानी!!
थी जरूरी, बातिल और हक में जंग, ऐ मुसलमा( مسلماں) भाई!!
डाक्टर रामदास प्रेमी राजकुमार जानी दिलीपकुमार कपूर
हजरत-ए-इमाम हुसैन की नज्र Muharram Par Shayari
जदीद गजल Imam Hussain Shahadat Shayari
” मुहर्रम ” की फजीलत को हर इक मोमिन समझता है, ऐ सखी!!
हुसैन-इब्न-ए-अली की भी शहादत रायगा(راءگاں) न गयी!!
थे सब हैरत-जदा!,” शब्बीर-ए-आजम” थे खूब-रू गब्रू!!
शबीह-ए-मुस्तफा ” ठहरे हुसैन इब्न-ए-अली, ऐ मेरी सखी!!
तमामी आल-व-औलाद-ए-मुहम्मद,काबिल-ए-तारीफ है ही!!
” मुहम्मदी ” की फजीलत को मुसलमा( مسلماں) जानता है, प्यारी सखी!!
तमामी आल-व-औलाद-ए-मुहम्मद हो गये कुर्बान-व-शहीद!!
शहादत रंग लाई हर शहीद-ए-करबला की, सुन ले/ ऐ सखी!!
डाक्टर इन्सान प्रेमनगरी