Sultan e Karbala Ke Mehman Noha Lyrics
लिक्खा है या हुसैन मोहर्रम के चांद पर
ज़हरा भी आ गईं हैं बकईया को छोड़कर
टूटे हुए दिलों का सहारा है, जिसका दर
आ जाओ उस हुसैन की जानिब करें सफ़र
जो किब्रिरया की शान मोहम्मद की जान है
हां अपने ज़ाइरों का जो ख़ुद मेज़बान है
या हुसैन …..
या हुसैन ..
या हुसैन ….
दम बा दम क़दम क़दम है दिल में इश्क़ ए कर्बला
हुसैना हुसैना
ज़ाइरों के क़ाफ़िलों से आ रही है ये सदा
हुसैना हुसैना
चले चलो बढ़े चलो हुसैन की सदा सुनो
हुसैन तुम को बुला रहे हैं,
है सामने…. कर्बला
अकबर के साथ ग़ाज़ी खुद लेने जा रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
परचम के साए में है अब्बास की सवारी
मेहमां नवाज़ियों की तैयारियां हैं जारी
शब्बीर का हरम है हलचल है ख़ादिमों में
गुम्बद पे शाहे दीं के परचम लगा रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
अकबर के साथ ग़ाज़ी खुद लेने जा रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
जो बे-कफ़न है उसका दरबार सज रहा है
वो हो रहा है जो भी अब्बास ने कहा है
हैं सुर्ख़ रौशनी में काले लिबास वाले
रो रो के फ़र्शे मातम ख़ादिम बिछा रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
अकबर के साथ ग़ाज़ी खुद लेने जा रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
रो रो के कह रहे हैं अफ़सोस है ये बीबी
ऐ काश हम जो होते आशूर वाले दिन भी
नौ लाख ज़ालिमों में तन्हा ना होते मौला
लब्बैक कह रहे हैं और रोते जा रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
अकबर के साथ ग़ाज़ी खुद लेने जा रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
नूरानी चेहरे वाले गालों पे ख़ाक मल कर
जव्वार आ रहे हैं पैदल नजफ़ से चलकर
इस इश्क़ के सफर में हर शख्स मेज़बां है
कुछ लोग रास्ते से पत्थर हटा रहे
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
उन पर सलाम हो जो बेसाखियों पे आए
पांव के बल नहीं थे फिर भी ना लड़खड़ाए
मिलती नहीं सभी को ये इश्क़ की बुलंदी
बस या हुसैन कह कर वो चलते जा रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
अकबर के साथ ग़ाज़ी खुद लेने जा रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
थामे हुए तबर्रुक राहों में जो खड़े हैं
क़ासिम का नाम लेकर तक्सीम कर रहे हैं
दोनों जहां में ऐसा जज़्बा कहीं न देखा
जो साल भर कमाया वो सब लुटा रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
अकबर के साथ ग़ाज़ी खुद लेने जा रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
ये वो ज़मीं है जिस पर प्यासी रहीं सकीना
ग़ाज़ी को याद करके रोती रहीं सकीना
अब इस जमीं पे कोई प्यासा नहीं है देखो
प्यासों को मश्क वाले पानी पिला रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
अकबर के साथ ग़ाज़ी खुद लेने जा रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
ज़ीशान और रज़ा जब मौला के पास जाना
हुर की क़सम है तुमको तब्दील होके आना
ऐ ज़ायरीन ए मौला है अस्ल ये ज़ियारत
उनकी है मेज़बानी जो हुर बना रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
अकबर के साथ ग़ाज़ी खुद लेने जा रहे हैं
सुल्तान ए कर्बला के मेहमान आ रहे हैं
तुम अपने दिल में ज़ियारत की आरज़ू रखना
फिर उनका काम है जज़्बे की आबरू रखना
Kalam: Sultan e Karbala Ke Mehman
Recited by: Syed Raza Abbas Zaidi
Poetry by: Zeeshan Abidi