आख़री उम्र में क्या रौनके-दुनियां देखूं
आख़री उम्र में क्या रौनके-दुनियां देखूं
अब तो बस एक ही धुन है के मदीना देखूं
अब तो बस एक ही धुन है…
जालियां देखूं के दीवारो-दरो-बामे-हरम
अपनी मअज़ूर निगाहों से मैं क्या क्या देखूं
अब तो बस एक ही धुन है के मदीना देखूं
अब तो बस एक ही धुन है…
मैं कहां हूँ ये समझ लूं तो उठाऊं नज़रें
दिल जो संभले तो मैं फिर गुम्बदे-ख़ज़रा देखूं
अब तो बस एक ही धुन है के मदीना देखूं
अब तो बस एक ही धुन है…
मेरे मौला मेरी आँखें मुझे वापस कर दे
ताकि इस बार मैं जी भर के मदीना देखूं
अब तो बस एक ही धुन है के मदीना देखूं
अब तो बस एक ही धुन है…
काश इक़बाल यूं ही उम्र बसर हो मेरी
सुबह क़ाबे में हो तो शाम को तयबा देखूं
अब तो बस एक ही धुन है के मदीना देखूं
अब तो बस एक ही धुन है…