दर से न टाल साक़िया सदक़ा दिये बग़ैर

दर से न टाल साक़िया, सदक़ा दिये बग़ैर
मय-कश न दर से उठेंगे हरगिज़ पिये बग़ैर

उनकी गली में जोश-ए-जुनूं का ये हाल है
निकला न कोई चाक गिरेबां किये बग़ैर

सज्दे में सर झुका तो कहा जज़्ब-ए-इश्क़ ने
सज्दा अदा न होगा यहाँ सर दिये बग़ैर

ए आतिशे-फ़िराक़ ! तेरी बे-नियाज़ियां
परवानें जल रहे हैं चराग़ाँ किये बग़ैर

वो बे-ख़बर है आदमी, अहदे-हयात से
जो जी रहा है दर्दे-मोहब्बत लिये बग़ैर

मुस्लिम ! ग़ुनाह कर के भी नादिम नहीं हूँ मैं
वोह भी तो रोते हैं जो इस्याँ किये बग़ैर

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